बुधवार, 31 जनवरी 2018

कैसा हो बजट ?









वीरवार (पहली फरवरी) को संसद में वित्तीय साल 2017-18 के लिए पेश  होने वाले बजट से करोडों भारतवासियों की उम्मीदें बंधी हैं। बजट परिवार का हो या देश  का, इसमें आय और व्यय को  संतुलित रखना ही असली वित्तीय कौशल है। जिस तरह परिवार के मुखिया को अपने बजट में हर सदस्य की उम्मीदों और अपेक्षाओं को तसल्लीबख्श  तरीके से पूरा करना पडता है, उसी तरह देश  के वित मंत्री को भी हर वर्ग की उम्मीदों का ख्याल रखना पडता है। बडे-बुजर्ग  कह गए हैं कि “जितनी चादर हो, उतने ही पैर पसारने चाहिए“। यानी जितनी आय हो, उसी में अपने खर्चे पूरे करने चाहिए। उधारी लेकर न तो परिवार को ज्यादा समय तक वित्तीय सुरक्षा मिल सकती है और न ही देश  को। एक सीमा से ज्यादा सरकारी राजकोषीय  घाटा भी  मुद्रा-स्फीति को बढावा देता है। बहरहाल, एक आम गृहणी से लेकर टॉप कंपनी के सीईओ, किसान से लेकर उद्यमी और उधोगपति , नौकरी-पशा   लोगों से व्यापारियों तक, हर तबके को बजट से ढेर सारी अपेक्षाएं रहती हैं।  गृहणी के लिए रसोई सबसे ज्यादा मायने रखती है। इसलिए हर गृहणी  रसोई से जुडी हर वस्तु पर कर छूट की उम्मीद करती है। जो सरकार  गृहणी को खुश  रखे, उसका सत्ता में बना रहना तय है। जेटली अपने बजट में गृहणियों को खास तोहफा दे सकते हैं। नौकरी-पेशा   मध्यम वर्गीय हर साल आयकर सीमा में और ज्यादा छूट और छोटी बचत के लिए प्रोत्साहन की उम्मीद करते  हैं। भाजपा जब विपक्ष में थी, आयकर सीमा को 5 लाख तक बढाने की पैरवी करती थी। मौजूदा वित्त मंत्री अरुण जेटली ने  अप्रैल, 2014 में अमृतसर में आयकर सीमा को पांच लाख तक बढाने की वकालत की थी।  2014 का लोकसभा चुनाव जेटली ने अमृतसर से लडा था। जेटली  के अनुसार आयकर सीमा 5 लाख तक बढाने से मध्यम वर्ग के 3 करोड आयकरदाता हर साल 24 करोड रु की बचत कर सकते हैं और इस रियायत से देश  के प्रत्यक्ष कर में मुश्किल  से 1 से 1.5 फीसदी की कमी आएगी। पिछले चार साल में जेटली अपनी ही कही बात का मान नहीं रख पाए हैं । और अब मोदी सरकार के मौजूदा कार्यकाल के अंतिम नियमित बजट में देश  के नौकरी-पेशा   लोगों को उम्मीद है कि जेटली अपने वायदे को पूरा करेंगे। भाजपा ने किसानों की आय बढाने के लिए सिंगल नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट स्थापित करने का वायदा कर रखा है। अभी तक यह वायदा पूरा नहीं हुआ है। प्रधानमंत्री ने किसानों की आय पांच साल में दोगुना करने का भी वायदा कर रखा है। किसानों को पटाने के लिए कुछ राज्यों ने उनके कर्जे माफ किए हैं मगर इससे आत्महत्याओं का सिलसिला थमा नहीं है। इस बार बजट में किसानों की आय बढाने के लिए विशेष  प्रयास किए जा सकते हैं। कृषि  पर और ज्यादा फोकस किया जा सकता है। पहले नोटबंदी, फिर जीएसटी और तत्पश्चात  रिटेल कारोबार में सौ फीसदी विदेशी  निवेश , इन सब कदमों ने  मझोले, छोटे और सीमांत व्यापारियों-दुकानदारों की कमर तोड कर रख दी है। अब तक व्यापारी और दुकानदार भाजपा के कटटर समर्थक रहे हैं। मगर इस बार वे भाजपा से सख्त नाराज हैं। इस स्थिति के  दृश्टिगत  वित्त मंत्री अपने बजट में छोटे और सीमांत कारोबारियों को कुछ राहत दे सकते हैं। वैसे सालाना 20 लाख तक आय वाले व्यापारियों को पहले ही जीएसटी से बाहर रखा गया है। रोजगार सृजन मोदी सरकार की सबसे बडी चुनौती है। भाजपा ने हर साल दो करोड रोजगार के अवसर सृजित करने का वायदा किया था। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने चीन का हवाला देते हुए मोदी सरकार पर तंज भी कसा है। राहुल के मुताबिक चीन में हर रोज 59,000 लोगों को रोजगार दिया जाता है, भारत में  बमुश्किल  450 लोगों को। बजट में रोजगार सृजन के लिए स्वदेशी  और विदेशी  निवेश  बढाने के लिए खास रियायतें मिल सकती है। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले यह आखिरी नियमित बजट है, इसलिए बजट से लोक-लुभावनी रियायंतों की उम्मीद की जा सकती है।       

मंगलवार, 30 जनवरी 2018

हरा-भरा आर्थिक सर्वेक्षण

आम बजट  से  पहले संसद में हर साल आर्थिक सर्वेक्षण (इकोनोॅमिक सर्वे) पेश  करने की रिवायत है। यह सर्वेक्षण देश  के आर्थिक विकास का लेखा-जोखा होता है और इससे देश  की आर्थिक सेहत का पता चलता है। अगला बजट कैसा होगा, सर्वेक्षण में इसकी भी कुछ झलक मिल जाती है। वीरवार (एक फरवरी)  को संसद में आम बजट पेश  होना है। सोमवार को वित्त मंत्री ने संसद में आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट पेश  की। सर्वेक्षण  में अर्थव्यवस्था की हरी-भरी तस्वीर पेश  की गई है। इसमें कहा गया है कि अगले वित्तीय साल में आर्थिक ग्रोथ 7 से 7.5 फीसदी रहने का अनुमान है। इस साल यह 6.7 फीसदी के आस-पास रहेगी। जीएसटी में 12 फीसदी की वृद्धि के कारण सरकार का राजस्व बढा है। यह अन्य टैक्स के मुकाबले काफी बेहतर है। अप्रत्यक्ष करदाताओं में 50 फीसदी से ज्यादा की बढोतरी दर्ज  हुई है। इसे मोदी सरकार की बडी उपलब्धि माना जा रहा है। 2017-18 के दौरान मुद्रा-स्फीति (महंगाई) पिछले छह सालों में सबसे कम रही है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) की महंगाई दर 3,3 फीसदी थी। पांच राज्यों- महाराष्ट्र , गुजरात, कर्नाटक, तमिल नाडु और तेलगांना- का कुल निर्यात में 70 फीसदी योगदान रहा है। ऐसा पहली बार हुआ है और यह देश  की  तीव्र आर्थिक ग्रोथ के लिए शुभ संकेत है। कृषि  सेक्टर में 2.। फीसदी ग्रोथ की उम्मीद है और कृषि   में मशीनीकरण का बढता उपयोग ग्रोथ के लिए अच्छा है । सर्विस सेक्टर में 8.3 फीसदी ग्रोथ की उम्मीद है। सरकार का बढता राजकोषीय  घाटा चिंता का विषय है। राजकोषीय घाटे को 2018-19 तक  जीडीपी का 3.2 से 3  फीसदी तक लाने का लक्ष्य पूरा होता नहीं दिख रहा है। सर्वे के अनुसार अर्थव्यवस्था को गति देने और अगले साल के लोकसभा चुनाव के  मद्देनजर   सरकार का खर्चा बढने से राजकोषीय  घाटा बढ सकता है। सर्वे में अगले साल तेल की कीमतों में 12 फीसदी उछाल आने की संभावना जताई गई है। इस स्थिति में  राजकोषीय घाटा और  अधिक बढ सकता है। संप्रग सरकार की तुलना में मोदी सरकार के चार साल के दौरान  तेल की  कीमतों काफी स्थिर रही  हैं  मगर पिछले कुछ माह से कीमतें फिर बढ रही है। इससे सरकार की मुश्किलें  बढ सकती है। पूरी दुनिया में अब इलेक्ट्रिक वाहनों के प्रति रुझान बढा है। नीति आयोग का आकलन है कि  इलेक्ट्रिक वाहनों के कारण भारत 2030 तक  60 अरब डॉलर की बचत कर सकता है। इसके अलावा एक गीगाटन कार्बन उत्सर्जन भी बच सकता है।  बजट में  इलेक्ट्रिक वाहनों को खासा प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार सरकार रोजगार सृजन, शिक्षा और कूषि  पर फोकस कर रही है। जाहिर है  इन क्षेत्रो को बजट में अच्छे-खासे आवंटन की उम्मीद की जा सकती है। वैसे भी प्रधानमंत्री ने पांच साल में किसानों की आय को दोगुना करने का वायदा कर रखा है। इतना ही नहीं उन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान  हर साल दो करोड युवाओं को रोजगार देने का वायदा किया था। इसीलिए आर्थिक सर्वेक्षण में रोजगार पर विशेष  जोर दिया गया है।  बजट में कृषि , रोजगार और शिक्षा के लिए नई नीतियों की घोषणा की जा सकती है। आर्थिक सर्वेक्षण में संकेत दिए गए हैं कि निजी निवेश  और निर्यात को प्रोत्साहित करने के लिए कुछ रियायतें दी जा सकती है। आर्थिक ग्रोथ को और तेज करने के लिए निवेश  को बढाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लिफ्ट करने की जरुरत है। नोटबंदी ने  ग्रामीण अर्थव्यवस्था  की कमर तोडी है। आर्थिक सर्वेक्षण से यह भी संकेत मिलते हैं कि बजट में “डिजिटल इंडिया“, “मेक इन ईंडिया“ एवं “स्टार्ट अप इंडिया“ को खासी तवज्जो मिल सकती है। मोदी सरकार का लोकसभा चुनाव से पहले यह आखिरी नियमित बजट होगा। इसलिए, इसमें लोक लुभावनी रियायतें भी दी जा सकती है हालांकि प्रधानमंत्री इस बात से इंकार कर चुके हैं। मगर राजनीतिक हितों के सामने आर्थिक यथार्थ और कुशल वित्तीय प्रबंध ज्यादा मायने नहीं रखते हैं। 

शुक्रवार, 26 जनवरी 2018

“बनाना“ गणतंत्र तो नहीं है पर ......

गणतंत्र के 69वें दिवस  पर  हार्दिक बधाई।   भारत का डंका पूरी दुनिया में बोल रहा है और इस बार  आसियान  के  11 राष्ट्राध्यक्ष भारत  के  गौरवपूर्ण  सफर के  गवाह  होंगे ।1947 में देश   के विभाजन की पीडा और अवसाद को भूलकर  दुनिया के विशालतम गणतंत्र  भारत  ने सात दशक में धरती से मंगल ग्रह तक सफलता और ठोस उपलब्धियों के अनेक पायदान तय किए हैं और कई कीर्तिमान स्थापित किए हैं। भारत मंगल ग्रह को भी फतेह कर चुका है। अंतरिक्ष विज्ञान में भारत की तूती बोलती है। दुनिया का सबसे बडा सफलतम लोकतंत्र है और सार्वभौमिक मताधिकार की निष्पक्ष  और स्वतंत्र चुनाव प्रकिया से सरकार चुनने के लिए दुनिया का मार्गदर्शक  बना हुआ है। विविधता में एकता का सबसे बडा प्रतीक है। दुनिया कि किसी भी देश  में इतनी धार्मिक- जातीय (एथेनिक) विविधता नहीं है, जितनी भारत में है। हर त्यौहार, उत्सव   और सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजन को हम पूरे उल्लास से मिल-जुल कर मनाते हैं। भारत दुनिया की पांचवी बडी सैन्य शक्ति है। इस साल (2018) भारत दुनिया की पांचवी सबसे बडी अर्थव्यवस्था बन जाएगी। 2030 तक भारत दुनिया की तीन सबसे बडी  अर्थव्यवस्थाओं में  शुमार हो जाएगा और हम चीन की बराबरी पर आ जाएंगें। ग्रोथ के मामले में भारत ने अभी से चीन को पीछे छोड दिया है। विदेशी  लुटेरों की भारी लूट-खसोट के बावजूद भारत पांच हजार साल से भी ज्यादा समय से अखंड और उन्नत बना हुआ है। पाकिस्तान की भारत को अस्थिर करने की “फितरती आतंकी“ हरकतों के बावजूद भारत की अखंडता पर जरा भी आंच नहीं आ पाई है। इसके विपरीत पाकिस्तान ं विभाजित हो चुका है और फिर विभाजन की कगार पर है। बांग्ला देश  1971 में उससे  अलग हो गया था।  कश्मीर  से कन्याकुमारी और कच्छ एवं काठियावाड से काकीनाडा एवं असम के कामरुप तक फैले भारत ने अपने दमखम पर पाकिस्तान की तुलना में कहीं ज्यादा आर्थिक तरक्की की है। पाकिस्तान पहले अमेरिका का “उपनिवेशी “ मुल्क था और आज उसी तरह चीन की मदद का मोहताज है। अपने दम पर न तो पहले तरक्की कर पाया और न ही आज।  भारत को आतंक की भठ्ठी में झोंकते-झोंकते खुद ही उसकी आग में झुलस रहा है। मगर इन सब उपलब्धियों के बावजूद मौजूद असहिष्णुता  का माहौल न केवल देश  की अखंडता के लिए खतरा बना हुआ है, अलबत्ता  सात दशक पुराना गणतंत्र भी दबाव में है। स्कूली पढाई से लेकर उच्च  शिक्षा  तक देश  के हर छात्र को पढाया और रटाया जाता है कि भारत एक सार्वभौमिक, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतात्रिक गणतंत्र है। भारत के संविधान प्रस्तावना में इस बात का साफ-साफ उल्लेख है। पद और सत्ता संभालने पर हर सांसद और विधायक इसी संविधान की रक्षा करने की शपथ लेता है। यानी   भारतीय गणतंत्र की समाजवादी, धर्मनिरपेक्षता की भावना की रक्षा करना हर सांसद और विधायक की संवैधानिक जिम्मेदारी है मगर देश  के मौजूदा सियासी माहौल से सियासी नेताओं से अवाम आश्वश्त नहीं  है। जमीनी सच्चाई यह भी है कि भारत में बहुत पहले समाजवादी व्यवस्था को तहस-नहस करके उदारीकरण से इसे पूंजीवादी  बनाया दिया गया था  और इसमें कांग्रेस की सबसे बडी भूमिका रही है। इस मामले में संवैधानिक मूल भावना को नष्ट  करने के लिए इतिहास कांग्रेस को  कभी क्षमा नहीं करेगा। और अब वर्तमान सतारूढ दल भाजपा संविधान की धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था की भावना को नष्ट  करने पर आमादा है। भारतीय गणतंत्र के लिए यही सबसे बडा खतरा है। अगर सियासी लोग ही संविधान की मूल भावना को नष्ट  करने लग जाए, तो गणतंत्र का डगमगाना तय है। सुखद स्थिति यह है कि  भारत “बनाना“ गणतंत्र  नहीं है और इसकी पक्की बुनियादों को खोदना आसान नहीं है। तथापि, कुछ ऐसी घटनाएं हैं जो इसे “बनाना“ गणतंत्र जैसा बना सकती है। अर्थशास्त्र में उत्पादन और वितरण पर सरकार और पूंजीपतियों के नियंत्रण वाले वाले देश  को “बनाना गणतंत्र“ माना जाता है। भारत में 80 फीसदी संपत्ति पर 10 फीसदी अमीरों का कब्जा है और यह सरकार की मदद के बगैर मुमकिन नहीं है। ऐसा “बनाना गणतंत्र“ में ही हो सकता है।     

गुरुवार, 25 जनवरी 2018

Running Fringe Riot On Padmavati: Is India Ruled By Goons?

Trouble makers are lined up in every nook and corner  in India . Law and Order in India means  nothing. Rules are more honoured in breach. Taking law into their hands is their favourite past time. Worst, the "ever-ready political poachers' come to help them. The fringe of  spate of arson and violence ahead of release of film "Padmavat" on Jan 25 is the latest naked display of "goondagardi". 

Despite nation's top court ordering states to ensure safe screening of the  film from Friday, there is hardly any hope of its release in BJP ruled sates. The saffron party and its affiliates are "hand in glove" with those opposing the screening of film for alleged "dishouring " of Rajput's pride. The film will not be screened in  in Rajasthan, Gujarat, Madhya Pradesh and Goa, all four ruled by BJP. The Multiplex Association of India said on Thursday that  its members would not screen Padmaavat in these states as fringe run riots. The situation in Haryana is too bad. 

The bitter memories  of  Sirsa based Dera Sacha Sauda violence in August last after Gurmit Ram Rahim  was convicted in Sadhvi rape case hard to be erased. Thousands of Dera followers were allowed to assemble and position themselves near the court complex. They were pampered and made to feel at home by the administration despite the apprehension of violence in case Dera chief was convicted. The failure of the Khattar govt to " perform its constitutional duty   is unparalleled in Haryana history. This was the second time the state was plunged into lawlessness and administration remained silent spectator.

 Earlier, the reservation agitation by Jats had paralysed the state for over ten days. The sate was shamed  by Murthal gang-rape incident. Women traveling to their destinations were pulled out of cars, stripped and gang-raped by goons during the agitation. The incident had not only shamed India but had hurt the Nation's pride. With cinema owners deciding not to screen the film, four states have heaved a sigh of relief but the big question remain: Is India rule by law or by goons?  

PM Modi At Davos: More Rhetoric Than Achievement

स्विटजरलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का शरीक होना ही  दर्शाता  है कि समकालीन वैश्विक  आर्थिक परवेश  में इस मंच का कितना महत्व है। यद्यपि 1971 में इस मंच का गठन हो चुका था और  स्विटजरलैंड के जेनेवा में इसका मुक्यालय है मगर  1991 में भूमंडलीकरण के बाद ही इस मंच का महत्व बढा है। विश्व  आर्थिक मंच हो या होई अन्य अंतरराष्ट्रीय  फोरम, दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र और तेजी से आगे बढते भारत को कहीं भी दरकिनार नही किया जा सकता। दुनिया के हर छोटे-बडे मंच पर भारत की चर्चा होती है। भारत में मौजुद अपार संभावनाओं को हर दश भुनाना चाहता है। भारत के प्रधानमंत्री का दावोस में  वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की 48वीं बैठक में शिरकत करने  से इसका मह्त्व और ज्यादा बढ गया है। अब तक एक बार  को छोड़कर कभी भी  भारत के प्रधानमंत्री ने इस फोरम की बैठक मेंशिरकत नहीं की थी ।  इससे पहले 1997 में तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवगौडा ने इस फोरम की बैठक में शामिल हुए थे । फोरम में शिरकत करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि पूरी दुनिया जानती है कि वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम  विश्व  की आर्थिक पंचायत है। इस पंचायत में दुनिया की बडी-बडी आर्थिक हस्तियां इक्कठी होती हैं और इसमें भावी आर्थिक नीतियां और दिशा  तय की जाती हैं। दुनिया के समक्ष इस समय जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद और गरीबी-भुखमरी सबसे बडी चुनौतियां हैं। आतंकवाद ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है। जलवायु परिवर्तन ने धरती पर जीवन को ही खतरे में डाल दिया है और अगर धरती पर जीवन ही नहीं रहेगा तो बाकी सारी बातें अप्रासंगिक हो जाती है। अपेक्षा के अनुरुप प्रधानमंत्री ने इन विषयों की दावोस में चर्चा की और मिलकर इनका सामना करने का आहवान किया। प्रधानमंत्री का भाषण  वैसा ही था जैसे सामान्य तौर पर अंतरराष्ट्रीय  मंचों पर होता है। मोदी के भाषण का निचोड यह था कि भारत सबसे मिलकर आगे बढना चाहता है और भारतीय संस्कृति का पूरी दुनिया से हमेशा  विशेष  जुडाव रहा है। प्रधानमंत्री ने ग्लोबल के नामी-गिरामी उधमियों और बिजनेस नेताओं को भारत आना का न्यौता भी दिया। प्रधानमंत्री के अनुसार भारत में “रेड टेप इज आउट, रेड कारपेट इज इन“। भारत में लालफीताशाही (रेड टेप) ने विदेशी षी निवेशकों को हमेशा षा ह्तोत्साहित किया है। मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही इसे जड से उखाडने का संकल्प ले रखा है मगर उसे कुछ हद तक सफलता भी मिली है। प्रधानमंत्री ने दावोस में  नए और  तकनीक उन्नत , युवा भारत को प्रस्तुत करने की हर संभव कशिश की। हालांकि दावोस जैसे मंचों पर कंपनियां निवेश  के फैसले नहीं लेती और न ही फ्री ट्रेड इन्वेस्टमेंट (एफटीए) किए जाते हैं मगर इनमें इन बातों के लिए पृष्ठ्भूमि  तैयार की जाती है। इस समय अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपियन यूनियन, क्नाडा के एपटीए प्रस्ताव विचाराधीन है। पूरी दुनिया इस समय भारत की ओर देख रही है। भारत की भूमंडलीकरण प्रतियोगिता और आर्थिक उदारीकरण में भी विशेष  भूमिका रही  है। पूरी दुनिया की इस बात पर नजर है कि भारत  भूमंडलीकरण और आर्थिक उदारीकरण में और कितनी छलांग लगाने जा रहा है। दावोस में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मौजूदगी बहुत बडी बात थी। इसलिए, भारत से  भूमंडलीकरण और उदारीकरण के नए दौर के  घोषणा की उम्मीद की जा रही थी पर ऐसा नहीं हुआ। दावोस में भारत को अपनी उादारीकरण की छवि को निखारने का भी मौका था। इस समय दुनिया में जिस तरह से आर्थिक धु्रवीकरण हो रहा है, उसके दृष्टिगत   दुनिया की नजर भारत पर है। सब जानना चाहते हैं कि भारत अमेरिका के साथ है या चीन के। यह भी स्पष्ट  नहीं हो पाया है। इस साल दुनिया आर्थिक मंदी से उभर कर नए आर्थिक रिश्ते  तलाशेगी । विश्व  आर्थिक मंच में इस तरह का नजरिया स्पष्ट  होना चाहिए।       

बुधवार, 24 जनवरी 2018

यह कैसा विकास जिसमें गरीब और गरीब हो रहा है?

 स्विटरजलैंड के दावोस में  विश्व  आर्थिक मंच (वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम) की बैेठक में जहां भारत की तूती बोल रही है, वही सोमवार को फोरम द्वारा जारी इनक्लूसिव डेवलपमेंट इंडेक्स में देश  की दो पायदान की गिरावट चिंताजनक है। और इससे भी ज्यादा शर्मनाक बात यह है कि भारत इनक्लूसिव डेवलपमेंट के मामले में पाकिस्तान से भी पिछड गया है। चीन भी भारत से आगे है। दुनिया की 74 उभरती अर्थव्यवस्थाओं में भारत इस बार 62 पायदान पर है। पाकिस्तान की रैंकिंग में पांच पायदान का सुधार आया है। पिछले साल भारत 60वें पायदान पर था। यानी भारत इनक्लूसिव डेवलपमेंट के  मामले  में  निचले पायदान पर है। इसके बावजूद हम कह रहे हैं कि भारत तेजी से बढती अर्थव्यवस्था है और उसका ग्रोथ रेट चीन से भी ज्यादा है। दावोस में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंगलवार को दुनिया को भारत की तीव्र ग्रोथ का पाठ भी पढाया। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के  चेयरमैन क्लॉस स्वॉप ने भारतीय “वसुधैव कुटुबकम“ दर्शन  की प्रशंसा करते हुए कहा कि इसकी अंतरराष्ट्रीय   मुद्दों को सुलझाने में अहम भूमिका रही है। इस बीच, ग्लोबल कंसल्टेंसी कंपनी पीडब्ल्यूसी की ताजा रिपोर्ट  में बताया गया है कि भारत निवेश  के लिए दुनिया में पांचवा आकर्षक   डेस्टीनेशन है मगर इस मामले में भी वह चीन से पीछे है। चीन दूसरे  स्थान पर है। ये सब बातें सुनने-कहने में तो अच्छी लगती है मगर जमीनी सच्चाई यह है कि आर्थिक विकास के तब तक कोई मायने नहीं जब तक इसके हर प्रतिभागी को समान अवसर न मिले। और इसीलिए  समकालीन  वैश्विक  परिवेश  में समावेशी  विकास  (इनक्लूसिव डेवलपमेंट)  ही आर्थिक उन्नति और प्रगति का सटीक पैमाना माना जा रहा है। इनक्लूसिव ग्रोथ की अवधारणा में सभी आर्थिक प्रतिभागियों को बराबर का अवसर मिलता है।  इसमें  रोजगार सृजन पर विशेष  जोर दिया जाता है। आर्थिक समानता को दूर करने के लिए जरुरी है कि अर्थव्यवस्था के हर हाथ को पर्याप्त काम मिले। बढती आर्थिक असमानता और संससाधनों की बंदरबांट से भारत ही नहीं, पूरी दुनिया चिंतित तो है मगर इसे दूर करने में बराबर विफल रही है। आजादी के सात दशक बाद भी भारत में अमीर और ज्यादा अमीर और गरीब पहले से भी अधिक गरीबतम हुआ है। सोमवार को अंतरराष्ट्रीय  स्वंयसेवी एजेंसी आक्सफैम की सालाना रिपोर्ट में बताया गया है कि 2017 में जितनी भी संपत्ति अर्जित की गई, उसका 73 फीसदी अथवा पांच लाख करोड मात्र एक फीसदी अमीरों के पास चला गया। इन एक फीसदी अमीरों की संपत्ति पिछले साल 25 फीसदी  बढकर 21 लाख करोड रु हो गई। पिछले ही साल  67 करोड भारतीयों की संपति में महज एक फीसदी का इजाफा हुआ। देश  की कुल संपति का 59 फीसदी हिस्सा एक फीसदी अमीरों  और 80 फीसदी हिस्सा 10 फीसदी अमीरों के पास है। भारत में आर्थिक असमानता का आलम यह है कि गॉवं  में एक कामगार पचास साल में भी जितना नहीं कमाता, किसी बडी कंपनी का प्रबंधक 15 दिन में उससे ज्यादा कमा लेता है। किसानों का हाल यह है कि उन्हें गुजर-बसर करना भी  दुर्भर  हो रहा है। देश  के कुल  9 करोड कृषक परिवारों  का 70 फीसदी हर माह अपनी आय से ज्यादा खर्च करता है और इसके लिए वह कर्ज-दर-कर्ज लेता है। लगभग साढे छह करोड़ किसानों  के पास तो एक हेक्टेयर से भी कम जमीन है। नतीजतन, किसान कर्ज के मकडजाल में फंसकर आत्महत्या पर विवष हो रहा है। आर्थिक असमानता भ्रश्टाचार को ही बढावा देती है। दुनिया के गरीब मुल्कों  में अमीर मुल्कों की तुलना में कहीं ज्यादा  भ्रष्टाचार  है। आजादी के 70 साल बाद भी भारत में 20 फीसदी से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रही है। ऐसा विकास  किस काम का ?

मंगलवार, 23 जनवरी 2018

“लातों के भूत बातों से नहीं मानते“

सीमा पर पिछले कुछ दिनों से  पाकिस्तान की तरफ से लगातार जारी गोलीबारी से क्षुब्ध अवाम फिर मांग कर रहा है कि अब समय आ गया है कि “फितरती पडोसी“ को आए-रोज की भडकऊ हरकतों के लिए सबक सिखाया जाए।  पिछले एक सप्ताह के दौरान गोलीबारी में 12 जवान षहीद हो चुके हैं और 60 से ज्यादा घायल हुए हैं। 2017 में पाकिस्तान ने कुल मिलाकर 730 से ज्यादा सीजफायर तोडे और इनमें 67 सैनिक और 79 नागरिक मारे गए। 2001 से अब तक सीजफायर उल्लघंन के मामलों में 4675 भारतीय सैनिक मारे जा चुके हैं। पाकिस्तान के 5,000 से ज्यादा सैनिक मारे गए हैं। सामान्य स्थिति (पीस टाइम) के दौरान सैनिकों की यह शहादत बहुत ज्यादा है। बहुत पुराना जुमला है कि “लातों के भूत बातों से नहीं मानते“। पाकिस्तान को दोस्ती और अच्छे पडोसी की भाषा  समझ नहीं आती है। 1971 का शिमला समझौता भी देख लिया और 2003 का सीजफायर एग्रीमेंट भी। पाकिस्तान ने न तो  शिमला समझौते की भावना का सम्मान किया और न ही 2003 के सीजफायर एग्रीमेंट को माना। पाकिस्तान के साथ बडे से बडा समझौता कर लिया जाए मगर वह भारत को अस्थिर करने से बाज नहीं  आएगा। भाजपा विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस को पाकिस्तान के साथ सख्ती नहीं बरतने के लिए जी भर कर कोसा करती थी और सत्ता में आने पर इस्लामाबाद को ताउम्र का सबक सिखाने का दम भरती थी। भाजपा को सत्ता में आए साढे तीन साल से ज्यादा का समय हो गया है मगर सिवा एक सर्जिक्ल स्ट्राइक के और कोई कार्रवाई नहीं हुई है। माना मोदी सरकार आतंक के मुद्दे पर दुनिया में पाकिस्तान की कलई खोलने और उसे अलग-थलग करने में काफी हद तक सफल हुई है। यह भी माना कि भारत से दोस्ती निभाने के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान को उदार आर्थिक मदद देनी बंद कर दी है और उस पर हाफिज सईद जैसे आतंकी सरगना की गिरफ्तारी के लिए दबाव डाला है मगर इससे न तो पाकिस्तान का आतंकियो को पालने-पोसना बंद हुआ है और न ही  कश्मीर  में अमन-चैन बहाल हो पाया है। इसके विपरीत,  कश्मीर  में हालात बिगडते जा रहे हैं। जम्मू-कश्मीर  में भाजपा की सहयोगी पार्टी पीडीपी और मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी कहना शुरु कर दिया है कि भारत और पाकिस्तान के बीच की लडाई में  कश्मीर  “हलाल“ हो रहा है।   सच कहा जाए तो 1971 के बाद पाकिस्तान को सबक सिखाने की कोई बडी कार्रवाई नहीं हुई है। हां, 1999 के “कारगिल युद्ध“ (ऑपरेशन विजय) ने पाकिस्तान समर्थक आतंकियों को जरुर खदेडा था। अगर यह युद्ध ज्यादा देर चलता तो इसके परमाणु युद्ध में बदलने का खतरा था। पाकिस्तान के पूर्व  राष्ट्रपति   और तत्कालीन सेनाध्यक्ष  जनरल परवेज मुषर्रफ ने हाल ही में स्वीकारा था कि अगर युद्ध ज्यादा समय तक खींचता पाकिस्तान न्युक्लियर  अस्त्र-शस्त्र का इस्तेमाल कर सकता था। यह स्थिति दोनों  मुल्कों   के लिए बेहद खतरनाक साबित होती। यही खतरा आज भी बना हुआ है। पाकिस्तान, भारत से कन्वेशनल युद्ध में जीत नहीं सकता मगर परमाणु युद्ध में वह भारत से मुकबाला कर सकता है। दोनों देशों  के पास लगभग बराबरी के परमाणु हथियार हैं। समकालीन वैश्विक  हालात में दो परमाणु सपन्न देशोँ  में युद्ध पूरे विश्व   मे तबाही ला सकता है। सभी परमाणु हथियार सपन्न देश  इस हकीकत को बखूबी जानते है। यही कारण है कि भारी तनाव और धमकी-दर-धमकी के बावजूद उत्तर और दक्षिण कोरिया द्धिपक्षीय वार्ता के लिए राजी हुए हैं। बहरहाल, पाकिस्तान को सबक सिखाना बनता है। लंबे समय से सीमा पर पाकिस्तान से 1971 जैसा लोे-इंटेन्सिटी वार लडा जा रहा है। इससे भारत को ज्यादा  नुक़सान   हो रहा है।  बहरहाल, पाकिस्तान को सबक सिखाना बनता है।   इसे किस रुप में अमल में लाया जाए, यह सोचना सरकार और रक्षा विषेशज्ञों का काम है।

शनिवार, 20 जनवरी 2018

Learn From Israel

                   इसरायल से सीखें

इसरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की छह दिन की भारत यात्रा ने नई दिल्ली और यरूशलम के बीच  संबंध और मजबूत हुए है मगर दोनों देशों  के बीच कोई समानता नहीं है। भारत आकार और आबादी में इसरायल से कहीं ज्यादा विशाल है। आकार में इसरायल हिमाचल प्रदेश  से भी छोटा है। गोलन हाइट समेत इसरायल का भोगोलिक क्षेत्रफल मात्र 22,145 वर्ग किलोमीटर है। हिमाचल प्रदेश   55,673 वर्ग  किलोमीटर में फैला हुआ है। यानी इसराइल से दोगुने से भी ज्यदा। इसरायल की आबादी 85 लाख है और हिमाचल प्रदेश  की आबादी 70 लाख के करीब  है। इसराइल भी 1948 में अस्तित्व में आया और हिमाचल प्रदेश  का गठन भी इसी साल हुआ। मगर संपदा के मामले में इसरायल, भारत तो क्या हिमाचल प्रदेश  के सामने भी कहीं नहीं टिकता है। 1948 में इसरायल के पास न तो खनिज संपदा थी, न ही तेल और नही सिंचाई के साधन। और उसके पास भारत जैसा विशाल मार्केट भी नहीं है।  इसके विपरीत हिमाचल प्रदेश  के पास विशाल खनिज संपदा थी। और आज सात दशक बाद इसरायल दुनिया में उच्च तकनीक संपन्न और सैन्य शक्ति के रुप में जाना जाता है और भारत भी उससे  उच्च तकनीक  हासिल करना  चाहता है । उपग्रह प्रक्षपेण में इसराइल की कोई सानी नहीं है और उसके जासूसी उपग्रह दुनिया में सर्वश्रेष्ठ  माने जाते हैं। आज की तारीख में इसरायल हाईटेक सुपर पावर है और वह हर साल 6.5 अरब डॉलर के हथियार बेचता है।1985 तक इसरायल ड्रोन का सबसे बडा निर्यातक था। ड्रोन की 60 फीसदी मार्केट पर उसका कब्जा था। इस छोटे से देश  का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 318 अरब डॉलर से भी ज्यादा है। हालांकि भारत की 2.2 खरब डॉलर के मुकाबले यह काफी कम है मगर हिमाचल प्रदेश  से कहीं ज्यादा। सात दशक बाद इसरायल उच्च तकनीक सपन्न और सुपरपावर बन  चुका है? पूरी दुनिया में इसरायल को हांगकांग और दक्षिण कोरिया के साथ सबसे स्थिर अर्थव्यवस्था माना जाता है। और सात दशक बाद इसरायल की तुलना में  हिमाचल प्रदेश  की  हालात इतनी खराब है कि राज्य सरकार को अपना रोज का खर्चा  भी उधार लेकर चुकाना पड रहा है। हिमाचल में पिछले माह की नई भाजपा सरकार ने सत्ता संभाली है और एक महीने में उसने ऐसा कोई काम नहीं किया है जिससे वह पिछली सरकार से अलग नजर आए। नई सरकार वही कर रही है, जो पिछली सरकार करती थी। खर्चा  चलाने के लिए नई सरकार को भी 500 करोड रु का कर्जा लेना पड रहा है। और अगर यही सिलसिला जारी रहा तो साल के अंत तक सरकार को 5000 करोड रु से ज्यादा का कर्जा  लेना पड सकता है। लोकतंत्र में जनसेवा के लिए मिशनरी आचरण की दरकार होती है। हेलिकाप्टर से सैर-सपाटा करके अथवा सचिवालय के वातानुकूलित कमरों में बैठकर जनसेवा नही की जा सकती। जब तक यह नौटंकी बंद  नहीं होगी, जनसेवा नहीं की जा सकती। सत्ता में आकर पांच साल जनता को मूर्ख  बनाने एक बात है, जनसेवा करना दूसरी। यह सब ज्यादा देर तक नहीं चल सकता।

आप को झटका

दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को निर्वाचन आयोग से जबरदस्त झटका लगा है। मुख्य चुनाव आयुक्त ने राष्ट्रपति  से पार्टी के 20 विधायकों को “लाभकारी पदों“ (ऑफिस ऑफ प्रॉफिट) पर बने रहने के लिए अयोग्य करार देने की सिफारिश  की है। निर्वाचन आयोग की सिफारिश  पर राष्ट्रपति की मुहर लगते ही विधानसभा की 20 सीटों पर फिर से चुनाव कराने पडेंगे। 20 सीटों के खाली होने के बावजूद सत्तारूढ आम आदमी पार्टी की सरकार अस्थिर नहीं होगी। 70-सीटों की विधानसभा में आम आदमी पार्टी के 66 विधायक हैं और 20 विधायक अयोग्य घोषित होने के बाद भी पार्टी के पास 46 विधायकों का प्रचंड बहुमत बना रहेगा। 2015 में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 21 विधायकों को संसदीय सचिव के पदों से नवाजा था। तब केजरीवाल ने “संसदीय सचिव“ पद को  लाभ के पद से बाहर रखने का कानून भी बनाया था मगर इसे उप-राज्यपाल की स्वीकृति नहीं मिल पाई।   बाद में इन मेंसे  विधायक जनरेल सिंह ने पंजाब में पार्टी टिकट पर विधानसभा चुनाव लडने के लिए अपने पद और सद्स्यता छोड दी थी। इसलिए अब 21 की जगह 20 विधायकों को अयोग्य ठहराया गया है।   इससे पहले निर्वाचन आयोग आप विधायको की याचिका भी नामंजूर कर चुका है। आप के 21 विधायकों ने आयोग से अपील की थी क्योंकि  उनके पास कोई “ऑफिस ऑफ प्रॉफिट“ नहीं है, लिहाजा उन पर कोई चार्ज नहीं बनता है। आप के विधायकों ने इस मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय में भी याचिका दायर की थी मगर अदालत ने इन नियुक्तियों पर उप-राज्यपाल की अनुमति नहीं होने से इसे अस्वीकार कर दिया था। दिल्ली में सरकार के हर फैसले पर उप-राज्यपाल की स्वीकृति अनिवार्य  है।  आम आदमी पार्टी ने निर्वाचन आयोग के फैसले पर मुख्य चुनाव आयुक्त पर ही सवाल उठाया है। आप के विधायक सौरभ भारद्धाज का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने अचल कुमार ज्योति ने प्रधानमंत्री का कर्ज  चुकाया है। वे 23 जनवरी को रिटायर हो रहे हैं। ज्योति प्रधानमंत्री के काफी करीब है। जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, ज्योति तीन साल तक गुजरात के मुख्य सचिव थे। 2013 में रिटायर होने पर मोदी ने ज्योति को राज्य सतर्कता आयुक्त बनाया था। 2015 में मोदी सरकार ने ज्योति को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया था। जून 2017 में ज्योति मुख्य चुनाव आयुक्त बनाए गए  थे। बहरहाल, हमेशा  की तरह केजरीवाल एंड कंपनी को आम आदमी पार्टी के खिलाफ हर छोटे-बडे फैसले में  प्रधानमंत्री मोदी का हाथ नजर आता है। मगर सत्य को छिपाया नहीं जा सकता। देश  में इमानदार, साफ-सुथरी और औरों से अलग राजनीति का दावा करने वाले अरविंद केजरीवाल ने सत्ता में आने के बाद वही सब कुछ किया जो आज तक कांग्रेस और भाजपा करती रही है। देश  की न्यायपालिका कई बार यह व्यवस्था दे चुकी है कि मंत्रिमंडल का आकार संविधान सम्मत होना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत मंत्रिमंडल का आकार सदन (हाउस) की कुल संख्या की 15 फीसदी से अधिक नहीं हो सकती। यह कानून 2004 में बनाया गया था। इससे पहले मंत्रिमंडल आकार की कोई सीमा नहीं थी और अक्सर दैत्य आकार के मंत्रिमंडल हुआ करते थे। इस कानून के बाद इसका तोड निकालने के लिए राजनीतिक दलों ने मुख्य संसदीय सचिव अथवा संसदीय सचिव बनाने का रास्ता निकाला है। मगर ये पद पूरी तरह से असंवैधानिक है। केजरीवाल और आम आदमी पार्टी लाख  स्पष्टीकरण  दें मगर सच्चाई यह है कि 21 विधायकों को संसदीय सचिव बनाकर  पार्टी ने “ पद लोलुपता“ और “सत्ता की भूख“ का नंगा  प्रदर्शन  किया है। फिर आम आदमी पार्टी और अन्य “सत्ता लोलुप“ राजनीतिक दलों में क्या फर्क रह जाता है और जनता असली की जगह  मुखोटों को क्यों चुने? आम आदमी पार्टी ने दिल्ली के बाद अन्य राज्यों में मिली चुनावी हार से भी कोई सबक नहीं सीखा है   

शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

Shamed And Be Shamed

दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र भारत  में हो क्या रहा है? क्या लिखा जाए, क्या खाया-पिया जाए, क्या पहना जाए और कैसी फिल्म बनाए जाए, यह सब समाज के कथित ठेकेदारों से पूछ कर किया जाना चाहिए। पूरी दुनिया में  भारत की जगहंसाई हो रही है। पूछा जा रहा है अरे भाई, यह कैसा लोकतंत्र है?  सच और केवल सत्य बो्लने वाले की दिन-दहाडे सरेआम हत्या कर दी जाती है। मनमर्जी से खाने-पीने वाले को जिंदा जलाया जाता है। गोरक्षा और  राष्ट्रवाद   के नाम पर कमजोर और असहायों को पिटा जाता है। ऐतिहासिक विषय  पर फिल्म बनाने पर भी बवाल खडा किया जाता है और  फिल्म की नायिका के नाक काटने की धमकी तक दी जाती है। और सबसे बडी त्रासदी यह है कि संबंधित राज्य की सरकार “राज धर्म“ निभाने की बजाए धमकाने वालों की पीठ थपथपाती है। आजादी के सात दशक के बाद का यह मंजर किसी इंटरनेट और उच्च प्रोद्योगिकी सपन्न सभ्य समाज का नहीं हो सकता, अलबत्ता पुरातन कबायली समाज जैसा लगता है। नामचीन संजय लीला भंसाली द्वारा निर्देशित फिल्म पद्मावत  को लेकर पिछले कुछ समय से देश  भर में जबरदस्त विरोध  प्रदर्शन  किया जा रहा है। राजपूतो के मान-सम्मान की “संरक्षक“ करणी सेना ने फिल्म की नायिका का नाक काटने से लेक पद्मावत फिल्म  को सिनेमा घरों से उतारने की धमकी दे रखी है। और भाजपा  शासित राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और मध्य प्रदेश  ने करणी सेना के आगे नतमस्तक होते हुए इस फिल्म को रिलीज होने से पहले ही प्रतिबंधित कर दिया है। करणी सेना के विरोध के कारंण फिल्म एक दिसंबर को रिलीज नहीं हो पाई। करणी सेना के साथ-साथ भाजपा और हिंदूवादी संगठनों ने भी  फिल्म में ऐतिहासिक घटनाओं से छेडछाड का आरोप लगाया है।  वीरवार को सुप्रीम कोर्ट  ने फिल्म पर लगे सभी प्रतिबंध हटाते हुए इसे हरी झंडी दे दी । अब फिल्म देश  भर में 25 जनवरी को रिलीज होगी। सुप्रीम कोर्ट  ने इस फिल्म पर चार राज्यो द्वारा लगाए गए प्रतिबंध पर भी रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से चार राज्यों के “विवेकहीन“ फैसले पर भी सवाल उठाया गया है। कोर्ट  में कहा गया कि सेंसर बोर्ड द्वारा फिल्म को रिलीज के लिए सर्टिफेकेशन दिए जाने के बाद किसी भी राज्य को इस पर प्रतिबंध लगाने का कोई अधिकार नहीं है। यह संघीय ढांचे का सरासर उल्लघंन है। फिल्म निर्माता के वकील ने इसे गंभीर मामला बताया। किस वर्ग  विशेष   की अहं तुष्टि  के लिए राज्य की सरकारें संविधान की मूल भावना को नष्ट नहीं  कर सकती। संविधान ने हर नागरिक को अपने खुले और सुपष्ट  आचार-विचार रखने और  देश  के समक्ष लाने का पूरा अधिकार दे रखा है। किसी को फिल्म पसंद नहीं है, तो वह इसे न देखे मगर दूसरों को फिल्म देखने से रोकना कानूनन अपराध है। अगर किसी को इस फिल्म से दिक्कत है तो वह ट्रिब्यूनल से राहत की अपील कर सकता है। मगर राज्य फिल्म के सब्जेक्ट से छेडछाड नहीं कर सकते हैं। बहरहाल, शीर्ष   अदालत के आदेश  के बावजूद फिल्म का विरोध थम जाएगा, इस पर संदेह है। करणी सेना ने फिर धमकी दी है कि अब जनता इस फिल्म को चलने नहीं देगी। वीरवार को बिहार के मुजफ्फरपुर में करणी सेना के वर्कर्स ने सिनेमा घर में तोडफोड भी की। जिस तरह से भाजपा शासित कुछ राज्यों ने  फिल्म को प्रतिबंधित करने में जल्दबाजी दिखाई है, उसके  मद्देनजर  लगता नहीं है कि फिल्म का विरोध सख्ती से रोका जाएगा। अगर सरकारी तंत्र ही अराजक तत्च का साथ दें,  तो हो ली लोकतंत्र की रक्षा। सरकारी तंत्र में इच्छा शक्ति का अभाव और निहित “राजनीतिक स्वार्थ“  अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में सबसे बडे अवरोधक हैं। मौजूदा माहौल में न केवल “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता“ पर गंभीर खतर मंडरा रहा है, बल्कि लोकतंत्र  भी खतरे में है। सुप्रीम कोर्ट  के चार सीनियर  योग्य जज भी यह बात कह चुके हैं। 

गुरुवार, 18 जनवरी 2018

हज सब्सिडी पर राजनीति?

 हज सब्सिडी को खत्म करना मोदी सरकार का प्रषंनीय कदम है बशर्ते इसे मुसलमानों के खिलाफ राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल न किया जाए। सरकार के ताजा फैसले  से मुसलमान भी खुश  हैं। देश  में संभवतय पहली बार ऐसा हो रहा है कि सरकारी रियायत बंद किए जाने का हर तरफ स्वागत हो रहा है। मुस्लिम नेता खुद लंबे समय से लगातार हज सब्सिडी को बंद करने की मांग करते रहे हैं। हज सब्सिडी शुरु होने से आज तक यह विशुद्ध राजनीतिक मुददा बनकर रह गया है। दक्षिणपंथी विचारधारा वाले सियासी लोग अब तक हज सब्सिडी को मुसलमानों के खिलाफ राजनीतिक मुद्दा बनाकर पेश  करते रहे हैं। भारत के मुसलमानों ने हज के लिए सरकार से कभी सब्सिडी नहीं मांगी । हज मुसलमानों की अटूट धार्मिक आस्था का प्रतीक है। हज इबादत का पवित्र कार्य  है और  आर्थिक और शारीरिक रुप से सक्षम मुसलमान के लिए जीवन में एक बार अनिवार्य  है। हज करने वाले को सारा खर्चा अपनी खून-पसीने की कमाई से वहन करना पडता है।  इतना ही नहीं हज पर जाने वाले मुसलमान को यह सुनिष्चित करना पडता है कि यात्रा पर खर्च किया जा रहा  पैसा किसी से उधार लेकर अथवा ब्याज चुका कर नहीं  लिया गया है और पूरा खर्चा  अपनी गाढी कमाई का है।  2006 में जमाते उलेमा-ए- हिंद ने फतवा जारी किया था कि “हज करते हुए किसी की मदद लेना शरीयत के खिलाफ है“। कुरान के मुताबिक केवल वही मुसलमान हज की यात्रा पर जा सकते हैं जो आर्थिक रुप से सबल, स्वस्थ और व्यस्क हों।  इन सारी परिस्थितियों में हज के लिए किसी भी तरह की सरकारी या गैर-सरकारी मदद के लिए कोई गुंजाइश  नहीं रह जाती  है। इन बातों के मद्देनजर  असदुद्यीन औवेसी से लेकर मौलाना महमूद मदनी तक सभी मुस्लिम नेता और मौलवी लगातार हज सबसिडी को खत्म करने की मांग करते रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि सरकार जबरदस्ती मुसलमानों को अब तक हज सब्सिडी क्यों दे रही है? सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी की काग्रेस सरकार ने मुसलमानों को खुश  करने के लिए हज सब्सिडी  शुरु की थी। और यह सब्सिडी हज यात्रियों को सीधे तौर पर नहीं दी जाती। हज यात्रियों की एयर टिकट पर दस हजार की सरकारी सब्सिडी दी जाती है और यह रकम सीधे तौर पर एयर एंडिया के खाते में चली जाती है। व्यवहारिक तौर पर मुसलमानों को कोई सबसिडी नहीं मिलती है, अलबत्ता घाटे में चल रही एयर इंडिया की मदद के लिए अब तक इस सब्सिडी का इस्तेमाल किया जा रहा है। तथापि,  आज तक हज सब्सिडी को इस तरह से पेश  किया जाता रहा है जैसे मुसलमानों पर सरकार ने बहुत बडी मेहरबानी की है और सरकारी खजाने को उन पर लुटाया जा रहा है। सच्चाई यह भी है कि हिंदू तीर्थ यात्रियों को भी सब्सिडी दी जाती है। कैलाश  मानसरोवर यात्रा के लिए हिंदू तीर्थ यात्रियों को केन्द्र और कई राज्यों से आर्थिक मदद मिलती है। कुंभ और अर्ध-कुंभ जैसे धार्मिक आयोजनों पर भी खुलकर सरकारी पैसा खर्च  किया जाता है।  वामपंथी अक्सर इस बात को उठाते है कि दक्षिणपंथी अल्पसंख्यकों से जुडी रियायतों को तो खूब उछालते हैं और  राष्ट्रहित  के खिलाफ पेश  करते हैं मगर दूसरे समुदायों को मिल रही रियायतो पर कभी एक  शब्द नहीं बोला जाता। बहरहाल, मोदी सरकार ने हज सब्सिडी बंद करके सुप्रीम कोर्ट के आदेशों  का अनुपालन किया है। 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार से हज सब्सिडी को 2022 तक पूरी तरह से बंद करने के आदेश  दिए थे। तब कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि साल-दर-साल हज सब्सिडी की रकम बढती जा रही है मगर इससे मुसलमानों का कोई भला नहीं हो रहा है। 1994 में सब्सिडी की रकम 10 करोड 51 लाख रु थी और अब यह बढकर 450 करोड रु हो गई है। इस रकम को गरीब मुसलमानों के आर्थिक उत्थान पर खर्च किया जा सकता है।

बुधवार, 17 जनवरी 2018

न्याय ही कसौटी पर

सुप्रीम कोर्ट के चार  वरिष्ठतम  जजों की बगावत की  चिंगारियां भले ही फिलहाल बुझा दी गईं हों मगर अभी तक मूल समस्या का कोई स्थाई समाधान सामने नहीं आया है। यह स्थिति बेहद दुखद है कि देश  में पहली बार खुद न्याय कसौटी पर है। मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश  जटिस दीपक मिश्रा की चार “बगावती“ जजों से मुलाकात के बाद दावा किया जा रहा है कि “मतभेद सुलझा लिए गए हैं और सब कुछ पहले जैसा हो गया है़“। इससे पहले सोमवार को खबर आई थी कि मुख्य न्यायाधीश  ने महत्वपूर्ण  मामलों की सुनवाई के लिए गठित संवैधानिक पीठ में चारों वरिष्ठतम जजों  को  शामिल नही किया है। सोमवार को जारी सूची में सात महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई करने वाली  संवैधानिक पीठ में एक भी “बगावती“  वरिष्ठ  जज नहीं है। काबिले गौर है कि भारत की न्यायिक व्यवस्था में सुप्रीम कोर्ट के सभी जज एक बराबर का दर्जा रखते हैं और चीफ जस्टिस “फर्स्ट अमंग इकवल्स“ हैं। मुख्य न्यायाधीश  केवल मात्र प्रशासनिक प्रभारी होते हैं मगर उन्हें  वरिष्ठतम जजों  को दरकिनार करने का भी अधिकार नहीं है। तथपि चीफ जस्टिस को किसी विशेष  मामले को किसी भी बेंच को आवंटित करने का अधिकार है। इस व्यवस्था में अब तक  वरिष्ठ  जजों को अधिमान दिए जाने की परंपरा रही है और मौजूदा मुख्य न्यायाधीश  से भी स्थापित परपंराओं और मर्यादाओं के अक्षरश  पालन की  उम्मीद की जाती है। मुख्य न्यायाधीश  के खिलाफ बगावत करने वाले चार जजों मेंसे जस्टिस रंजन गोगोई इस साल अक्टूबर में जस्टिस दीपक मिश्रा के रिटायर होने पर अगले मुख्य न्यायाधीश  हो सकते है। जस्टिस जे  चेलमेश्वर  मुख्य न्यायाधीश  मिश्रा के बाद दूसरे  वरिष्ठतम  जज हैं मगर वे इस साल जून में रिटायर हो जाएंगें। जस्टिस मदन बी लोकुर और कूरियन जोसेफ भी इस साल के अंत में रिटायर हो जाएंगें। मौजूदा जजों की सूची में जस्टिस डी वाई  चन्द्राचूड सबसे युवा हैं और वे नवंबर, 2024 में रिटायर होंगे। बहरहाल, वरिष्ठतम जजों  में मतभेदों की मूल वजह महत्वपूृर्ण मामलों के आवंटन को लेकर है। चार वरिष्ठतम जजों की शिकायत है कि मुख्य न्यायाधीश  महत्वपूर्ण मामलों को सुनवाई पंसदीदा जजों को आवंटित कर रहे हैं। इस मामले में जजों ने सोहराबुद्दीन शेख  की मौत की सुनवाई कर रहे जज लोया की रहस्यमय मौत के मामले की सुनवाई  का हवाला दिया है।  भाजपा अध्यक्ष अमित शाह  भी इस मामले में आरोपी है। लोया से पहले वाले जज ने अमित शाह  को सभी आरोपों से बरी कर दिया था। जज लोया की नागपुर में एक समारोह के दौरान दिल का दौरा पडने से मौत हो गई थी। लोया मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस अरुण मेहरा वरिष्ठता    में दसवें क्रम पर हैं और उनसे  वरिष्ठ जजों को  शिकायत है कि इस मामले में उनकी उपेक्षा की गई है। बहरहाल, मुख्य न्यायाधीश  और “बगावती“ जजों में सुलह-सफाई होने से मूल समस्या खत्म होने से रही। मूल समस्या मुख्य न्यायाधीश  की कार्यशैली को लेकर है। न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार चार सीटिंग जजों ने अपने वरिष्ठ  सहयोगी के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए हैं और देश  की  शीर्ष   अदालत की स्वत्रंतता और  निष्पक्षता  पर सवाल उठाते हुए इसे लोकतंत्र के लिए बडा खतरा बताया है। इस तरह के गंभीर आरोपों को सुलह-सफाई से निपटाकर मूल मुद्दे से पल्ला नहीं झाडा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर जज समेत चार पूर्व  जजों ने भी “बगावती“ जजों से सहमति जताते हुए विवादास्पद मुद्दों को “ न्यायिक व्यवस्था“ की भीतर सुलझाने की पैरवी की है। न्याय का तकाजा है कि योग्य एवं विद्धान न्यायाधीशों  द्वारा देश  के समक्ष उठाए गए मुद्दों के समाधान को भी  अवाम के समक्ष रखा जाना चाहिए। “ज्युडिशियल लॉकजा“ अपनी जगह सही मगर लोकतंत्र में न्यायपालिका को और अधिक पारदर्शी  बनाए जाने में कोई हर्ज नहीं है।

मंगलवार, 16 जनवरी 2018

इसरायल-भारत की दोस्ती

अठारह साल पहले 2000 में भारत के तत्कालीन गृहमंत्री लाल कृष्ण  आडवाणी जब इसराइल के दौरे पर गए थे, तब चरमपंथी विरोधी रक्षा विशेषज्ञ  रेवेन पेज ने टिप्पणी की थी कि वे सभी देश  जो फलीस्तीनी फ्रीडम फाइडर्स के खिलाफ इसराइली कार्रवाई की निंदा किया करते थे, वे अब अपने-अपने देश  में आतिकयों से निपटने के लिए इसराइल से ही सीख ले रहे हैं। भारत भी अब कई मामलों मे इसरायल  सीख  ले  रहा है। 2014 से भारत  कश्मीर  में पाकिस्तान प्रायोजित आतंक के लिए वही नीति अपना रहा है, जो इसरायल ने फलीस्तीनी आजादी अमर्थकों के खिलाफ अपनाई थी। भाजपा नेता राम माधव ने मई 2017 में एक न्यूज चैनल से कहा भी था कि जम्मू-कश्मीर  में हर आतंकी को खत्म कर देंगे और सीमा पर दंडात्मक हमले भी किए जाएंगे। उनका इशारा सर्जिकल स्ट्राइक जैसी सैन्य कार्रवाई की तरफ था। केन्द्र में भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद से भारत की इसरायल के बीच संबंध और प्रगाढ हुए हैं। एक जमाने में भारत फलीस्तीनी की आजादी समर्थकों का सच्चा दोस्त हुआ करता था। तब फलीस्तीनी नेता यासिर अराफात भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को अपनी बहन मानते थे। इससे भारत और फलीस्तीनियों के बीच गहरो संबंधों का पता चलता है। उस समय  यासिर अराफात  इसराइल और पश्चिम  देशों   की आंखों की सबसे बडी किरकिरी हुआ करते थे। दिसंबर, 2017 में  अमेरिका द्वारा यरूशलम को इसराइल की राजधानी बनाने के सयुंक्त राष्ट्र  प्रस्ताव का जब भारत ने विरोध किया, तब इसराइल मीडिया भडक उठा। इसराइल के एक प्रमुख समाचार पत्र ने तो यहां तक कह दिया कि “भारत इसराइल के साथ गंभीर रिश्ते  चाहता ही नहीं । ” आकर्षण  से  शुरु हुए  रिश्ते , प्रेम तक पहुंच गए और अब इसराइल विरोध तक आ गए हैं। मगर भारत की 6-दिन की यात्रा पर आए इसराइल के प्र्धानमंत्री ने यह कर रिश्तों  में आई खटास को दूर कर दिया कि “ मैरिज मेड इन हैवन, यूएन वोट से  रिश्तों  पर कोई फर्क  नहीं पडेगा“। 15 साल बाद इसरायल के प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतान्याहू भारत की यात्रा पर आए हैं। निसंदेह, भारत को अरब और मुस्लिम देशों  के साथ संतुलन स्थापित करने की जरुरत है। इसके साथ ही भगवा पार्टी  को देश  में मुस्लिमों का भरोसा जीतने की भी जरुरत है। 25 साल से  भारत और इसरायल के बीच कूटनीतिक संबंध हैं मगर रिश्तों   में  गर्माहट 2014 के बाद केन्द्र में मोदी सरकार बनने के बाद आई है। भारत और इसरायल में कई समानताएं हैं। इसरायल की तरह भारत भी  दुश्मनो  से घिरा हुआ है। इसरायल के पास रक्षा और कृषि  की उन्नत और बेह्तरीन तकनीक है। भारत को दोनों क्षेत्रों के लिए इन तकनीक की अविलंब जरुरत है। अभी भी भारत इन तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है और आगे भी जारी रखना चाहेगा। भारत, इसरायल के सहयोग से उन्नत रक्षा उत्पाद स्वदेश  में ही करने के पक्ष में है। इसरायल के पास उम्दा तकनीक है मगर मानव श्रम की कमी है। भारत के पास मानव श्रम की कोई कमी नहीं है। इस बात के  मद्देनजर  तकनीक सहयोग दोनों देशों  के लिए लाभदायक हो सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इसरायल दौरे के समय दोनों  के बीच विज्ञान और तकनीक समेत सात क्षेत्रों में सहयोग के समझौते हुए थे। अब इन्हें आगे बढाया जाएगा। बहरहाल, इसराइल और भारत के बीच एक और समानता है। इसरायल यहूदी बहुल देश  है और भारत हिंदू बहुल। इसरायल को यहूदी राष्ट्र  बनाने और भारत को हिंदू  राष्ट्र  बनाने की मुहिंम  तेज हो गई है। इसरायल में तो यह मुहिम पहले से चल रही है मगर भारत में मोदी सरकार के केन्द्र में सत्ता में आने के बाद यह मुहिम तेज हुई है। यही समानता मोदी और  नेतान्याहू को और करीब ला रही है। मगर यह  निकटता मुस्लिम देशों  से संबंधों की कीमत पर नहीं होनी चाहिए।   

सोमवार, 15 जनवरी 2018

न्यायपालिका में “सुनामी“

पिछले शुक्रवार को देश  की न्यायपालिका के इतिहास में कुछ ऐसा हुआ आज तक कहीं भी नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट  के चार सीनियर जजों के आरोपों से  देश  में जैसे सुनामी आ गई है। देश  इस अभूतपूर्व घटना से स्तब्ध और चिंतित है।  सीनियरों जजों ने बाकायदा पत्रकार सम्मलेन बुलाकर भारत के मुख्य न्यायाधीश  जस्टिस दीपक मिश्रा की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट  को बचाया नहीं गया तो लोकतंत्र जिंदा नहीं रह पाएगा। सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठता   में दूसरे क्रम के जज जस्टिस जे चेलमेश्वर  ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक  न्यायपालिका ही स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है। जाहिर है देश  के चार वरिष्ठ  जज अवाम को संदेश  देना चाहते हैं कि न्यायपालिका में सब ठीकठाक नहीं है और  न ही न्यायपालिका निष्पक्ष  रह गई है। पहली बार सुप्रीम कोर्ट के जजों ने देष के मुख्य न्यायाधीश  का मीडिया ट्रायल किया है। जस्टिस चेलमेश्वर  के अलावा जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ भी पत्रकार सम्मेलन में मौजूद थे।  देश  की न्यायपालिका के लिए यह बहुत ही गंभीर मामला है। यह “ज्यूडिशियल लॉकजॉ“ का खुलमखुला उल्लंघन है। भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि देश  के मुख्य न्यायाधीश  के खिलाफ उनके ही सहयोगियों ने सार्वजनिक तौर पर बगावत की हो। सामान्य स्थिति में निचली अदालत के न्यायाधीश  की कार्यशैली पर सवाल उठाए जाने पर भी संबंधित व्यक्ति को अदालत की अवमानना में दंडित किया जाता है। अब सवाल यह है कि क्या सुप्रीम कोर्ट अपने चार सीनियर जजों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई करेगा? अपना पक्ष रखने के लिए मीडिया के सामने आने के सवाल पर जस्टिस  चेलमेश्वर  ने  स्स्पष्टीकरण दिया कि उनके सारे प्रयास बेकार हो जाने के बाद ही उन्हें यह कदम उठाने पर विवश  होना पडा। जस्टिस  चेलमेश्वर  के अनुसार पत्रकार सम्मेलन बुलाने से पहले आज सुबह ही चारों जजों ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा से मुलाकात की थी और उनसे विवादस्पद मुद्दे  सुलझाने का आग्रह किया मगर बात नहीं बनी। उनके पास देश  के समक्ष अपना पक्ष रखने के अलावा और कोई भी विकल्प नहीं बचा था। और जिन मुद्दों पर वरिष्ठ  सहयोगियों और मुख्य न्यायाधीश  के बीच गंभीर मतभेद हैं, उनमे   पंसदीदा जजों को महत्वपूर्ण  मामले सौंपना, नियमों की अनदेखी और मामले को अदालत से वापस बुला लेना शामिल हैं। बहरहाल, देश  के चार सीनियर जजों ने देश  के मुख्य न्यायाधीश  का ओपन मीडिया ट्रायल करके न्यायपालिका की  विश्वसनीयता  पर कडा प्रहार किया है। अब तक अवाम न्यायपालिका पर आंख मूंद कर भरोसा करती है। पर अगर सुप्रीम कोर्ट  के सीनियर जजों को भी न्यायपालिका की  निष्पक्षता    और स्वतंत्रता पर  विश्वास   न हो और वे सार्वजनिक तौर पर अपनी हताशा  को जाहिर करें, तो कौन भरोसा करेगा न्यायपालिका पर। “ज्यूडिशियल  लॉकजॉ“ न्यायपालिका की आचार संहिता का अंतरंग हिस्सा होता है और इसका हर हाल में सम्मान किया जाना चाहिए।  भारत में न्यायपालिका अब तक बडी शिद्दत से इसका पालन करती रही है।  अमेरिका के जाने-मान न्यायविद जस्टिस फेलिक्स फ्रैंकफॉटर ने लगभग सात दशक पहले 1948 में कहा था,“ न्यायालय  के फैसले खुद अपनी  निष्पक्षता  और  विश्वसनीयता  का व्याख्यान करते हैं। अगर जज इन्हें सार्वजनिक तौर पर जस्टिफाई करने लग जाएं, तो उनमें और सियासी नेताओं में क्या फर्क रह जाएगा? कोलकता हाई कोर्ट के सजायाफ्ता  जज जस्टिस सीएन करनन भी सुप्रीम कोर्ट  के जजों के आचरण पर सवाल उठा चुके हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री को खत लिखकर जजों पर  भ्रष्टाचार   के आरोप लगाए थे। और अब सीनियर कोर्ट  के चार जजों के आरोपों का निचोड भी यही है।  सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को “फर्स्ट अमंग इक्वलस“ माना जाता है। सीनियर जजों से आचार संहिता का अक्षरश  पालन करने की अम्मीद की जाती है। ताजा आरोपों से देश  की न्यायपालिका की छवि को गहरा धक्का लगा है।

शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

रिटेल कारोबार का “विदेशीकरण "

मोदी सरकार ने देश  में सिंगल  ब्रांड  रिटेल कारोबार में सौ फीसदी विदेशी  निवेश  (एफडीआई) की अनुमति देकर साहसिक कदम उठाया है। साहसिक इसलिए कि भाजपा स्वंय रिटेल कारोबार को विदेशीकरण के खिलाफ रही है।  बुधवार को केन्द्र सरकार ने सिंगल ब्रांड रिटेल में 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी  निवेश  की अनुमति देने के साथ-साथ विदेशी   निवेश  नीति में भी कुछ अहम बदलाव किए। इनमें रिटेल में कारोबार करने वाली विदेशी  ब्रांडों को घरेलू बाजार से 30 फीसदी कंपोनेंट खरीद वाले प्रावधान में भी ढिलाई दी गई है। भारी घाटे में चल रही एयर इंडिया में 49 फीसदी एफडीआई की अनुमति दी गई है। सरकार के ताजा फैसले से देश  में विदेशी   निवेशी  बढने से रोजगार के और ज्यादा अवसर सृजित हो सकते हैं। रोजगार के मामले में तीन साल के कर्यकाल में भी अपना चुनावी वायदा पूरा नहीं करने के लिए मोदी सरकार को विपक्ष के तीखे हमले झेलने पड रहे हैं। ताजा हमले में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने खाडी देश  बहरीन में प्रवासी भारतीयों को संबोधित करते हुए मोदी सरकार को माकूल राजगार नहीं देने पर फिर घेरा। राहुल गांधी ने रोजगार सृजन में चीन और भारत की तुलना की। काग्रेस अध्यक्ष के अनुसार चीन में जहां हर तोज 50,000 लोगों को रोजगार मिलता है, वहीं भारत में ”मेक इन इंडिया” और ”स्टार्ट  अप/स्टैंड अप इंडिया” से मात्र रोजाना 450 लोगों को रोजगार मिल रहा है। गुजरात के विधानसभा  चुनाव में भी राहुल ने रोजगार के मुद्दे को खूब भुनाया था। भारतीय जनता पार्टी ने 2014 में लोकसभा चुनाव घोषणा पत्र में हर साल अढाई करोड रोजगार सृजित करने का वायदा कर रखा है। इस मामले में मोदी सरकार अब बचाव की मुद्रा में है। रिटेल बिजनेस को बहुराष्ट्रीय  कंपनियों (एमएनसी) के लिए खोलने से हर साल 50 लाख (5 मिलियन) लोगों को रोजगार मिल सकता है। मगर इसका नकारात्मक पहलू भी है। भारत में अधिकतर रिटेल कारोबार छोटे व्यापारियों के हाथ में है। नोटबंदी ने पहले ही छोटे व्यापारियों को खासा नुकसान पहुंचाया है और अब एमएनसी और  बडे विदेशी  घरानों के रिटेल में आने से छोटे व्यापारियों को कारोबार में बने रहना भी मुश्किल  हो सकता है। कान्फेडेरषन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडरस (सीएआईटी) ने सरकार के ताजा फैसले का कडा विरोध किया है। सीएअईटी ने भाजपा पर वायदा खिलाफी का भी आरोप लगाया है।  ट्रेडरस बॉडी का कहना है कि भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में छोटे व्यापारियों के हितों की रक्षा करने का वायदा कर रखा है।  व्यापारियों को भाजपा का कट्टर समर्थक माना जाता है। 2012 में बतौर गुजरात मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खुद रिटेल में 100 फीसदी एपडीआई का कडा विरोध किया था। तब मोदी ने कहा था,“ रिटेल में एफडीआई से छोटे व्यापारियों की दुकानों में ताला लग जाएगा। रिटेल में ऐसा मार्केट शुरु होगा तो हिंदुस्तान के छोटे व्यापारियों के पास कौन खरीदारी करने आएगा“। मगर मार्केट एक्सपर्ट  भी मानते हैं कि बडी दुकान खुलने से छोटी बंद नहीं होती और न ही ग्राहकी कम होती है। इसके विपरीत इससे प्रतिस्पर्धा बढती है और उपभोक्ताओं को और ज्यादा विकल्प मिलते हैं। रिटेल कारोबार में स्वदेशी  बडे घरानों की एंट्री से छोटे दुकानदारों को कोई फर्क नहीं पडा है। भारत में रिटेल का बहुत बडा कारोबार है और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का दस फीसदी कारोबार रिटेल में किया जाता है।  भारत में 600 अरब डॉलर से भी अधिक का रिटेल कारोबार किया जाता है।  भारतीय रिटेल दुनिया में सबसे तेज गति से बढने वाला कारोबार है और मार्केट वैल्यू के लिहाज से दुनिया के  शीर्ष   पांच कारोबार में शुमार है। 2003 तक  समस्त रिटेल कारोबार छोटे दुकानदारों के हाथ में था। 2010 तक इसमें मात्र 4 फीसदी कारोबार ही सुपरमार्केटस और बडे स्टोर्स  के हाथ में था। इस कारोबार से लगभग चार करोड (40 मिलियन) लोगों की रोजी रोटी चलती है। सरकार के ताजा फैसले से यह स्थिति बदल सकती है। 

गुरुवार, 11 जनवरी 2018

तिरंगा ऊंचा रहे हमारा

1948 की फिल्म:“आजादी की राह पर“ का लोकप्रिय गीत “ विश्व  विजयी तिरंगा प्यारा, झंडा ऊचा रहे हमारा; सदा शक्ति बरसाने वाला, प्रेम सुधा सरसानेेवाला, वीरों को  हर्षानेवाला , मातृभूमि का तन-मन सारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा“। इस गीत को श्याम  लाल गुप्त ने लिखा था। और तब यह गीत इतना लोकप्रिय हुआ था कि घर-घर में इसके बोल सुनाए देते थे।  स्कूलों में बच्चों को आज भी यही गीत रटाया जाता है। तिरंगा हमारी  राष्ट्रीय   अस्मिता है, हमारी आन-बान और शान है। और इस तिरंगे में लिपटकर वीरगति प्राप्त करना स्वर्ग   पा लेने  जैसा है। तिरंगे के साथ ही  राष्टगान का भी उतना ही महत्व है।  राष्ट्रगान  के बगैर तिरंगा फहराया जाना ठीक उसी तरह है जैसे  आत्मा के बगैर बेजान  शरीर । फिर इस  राष्ट्रगान  को लेकर किंतु-परंतु क्यों? सिनेमा थियटरों में तिरंगा फहराने ओर राष्ट्रगान  पर भी ऐतराज। मदरसों में भी राष्ट्रगान  का विरोध। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट  ने राष्ट्रगान  पर अपना ही फैसला पलटते हुए सिनेमा घरों में  इसकी अनिवार्यता को खत्म कर दिया। न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि सिनेमाघर स्वेच्छा से चाहें तो फिल्म दिखाने से पहले राष्ट्रगान  प्ले कर सकते हैं मगर हर हाल में इसका सम्मान किया जाना चाहिए। इससे पहले 30 नवंबर, 2016 को सुप्रीम कोर्ट  ने देश  के सभी सिनेमा घरों में फिल्म दिखाने से पहले राष्ट्रगान प्ले करना अनिवार्य  कर दिया था। अदालत ने तब  इसके किसी भी तरीके से प्रकाशन पर भी प्रतिबंध लगा दिया था। इस फैसले को सुनाने वाली पीठ के जज जस्टिस डीवाई चन्द्रचूड ने इसका इस बिला पर विरोध किया था कि सुप्रीम कोर्ट की यह व्यवस्था “मॉरल पुलिसिंग“ जैसा कदम है। योग्य न्यायाधीष का कहना था कि “क्या लोगों को अपनी देशभक्ति का प्रमाण छाती पर लटका कर देना पडेगा? अब हमारा अगला कदम यह होगा कि लोगों को सिनेमाघरों में टी-शर्ट  और शॉर्ट्स  पहनने पर भी प्रतिबंध लगाया जाए क्योंकि इससे राष्ट्रगान  का अपमान होता है। सोमवार को केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अपने 30 नवंबर, 2016 के फैसले को रोकने का आग्रह किया था। संभवतय, अदालत ने देश  का  मूड भांप लिया था। भगवा पार्टी ने राष्ट्रगान  तिरंगे और वंदेमातरम को उत्तर प्रदेश  विधानसभा चुनाव  में  राष्ट्रीय  अस्मिता का  प्रश्न बनाकर   वोट के लिए खूब भुनाया था। वैसे भी राष्ट्रगान  भाजपा की जननी राश्ट्रीय स्वंय सेवक के सांस्कृतिक (कल्चर)  राष्ट्रवाद   का अहम हिस्सा है।  मोदी सरकार का अपने ही फैसले से पीछे हटने की  पृष्ठभूमि  में गहन अर्थ निकाले जा रहे हैं। इस साल कर्नाटक, मध्य प्रदेश , राजस्थान और छतीसगढ समेत आठ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। कर्नाटक में भाजपा आरएसएस के  सांस्कृतिक राष्ट्रवाद  को बखूबी उछाल रही है और उत्तर प्रदेश  के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इसके ब्रांड अबेंसडर हैं। गुजरात में योगी ने इस राष्ट्रवाद  को खूब भुनाया था। जरुरत पडने पर भाजपा  राष्ट्रगान  के मुद्दे को फिर भुनाएगी। बहरहाल, राष्ट्रगान   और तिरंगे को राजनीतिक हितों के लिए भुनाना न तो  राष्ट्रवाद  के हित में और न ही राष्टहित  में। इससे देश  की अखंडता को चुनौती मिल रही है। इससे अधिक मह्त्वपूर्ण  मुददे तिरंगे और राष्ट्रगान   के सम्मान से जुडे हैं। अक्सर सियासी नेता कई बार राष्ट्रगान   का सम्मान करने में चूके जाते हैं। तिरंगे को गलत तरीके से फहराया जाता है और इसका अपमान किया जाता है। प्लास्टिक  के झंडे बनाकर  अच्छा-खासा मुनाफा कमाया जा रहा है। सरकार ने ताजा एडवाइजरी में राज्यों से प्लास्टिक झंडों के इस्तेमाल को अविलंब रोकने को कहा है। अक्सर लोग-बाग प्लास्टिक झंडे इधर-उधर फेंक कर तिरंगे का घोर अपमान करते हैं। 2002 में बनाए गए “फ्लैग कोड ऑफ“ इंडिया में स्पष्ट  किया गया है कि तिरंगे को इस तरह से फेंकना अपराध है। राष्ट्रगान   गाया जाए या नहीं, यह किसी पर थोपा नहीं जा सकता मगर तिरंगे का अपमान भी सहन नहीं किया जा सकता। जो लोग तिरंगे का सम्मान नहीं कर सकते, उन्हें इसे फहराने का भी कोई अधिकार नहीं है। 

 

बुधवार, 10 जनवरी 2018

भय मुक्त समाज

भारतीय दंड संहिता (इंडियन पेनल कोड) की धारा 377 को लेकर अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की व्यवस्था देकर देश  की  शीर्ष  अदालत सुप्रीम कोर्ट ने अवाम को फिर आश्वस्त किया  है कि न्यायपालिका के रहते देश  के किसी भी वर्ग से अन्याय नहीं किया जा सकता और किसी भी नागरिक को भय और सामाजिक रुप से  बहिष्कृत   माहौल में रहने दिया जाएगा। देश  में समलैंगिक और “राइट टू सेक्सुअल्टी“ के पैरवीकार आज भी समाज में हीन और बहिष्कृत   माने जाते है। भारतीय दंड संहिता के  सेक्शन  377 के तहत  किसी भी तरह का “अप्राकृ्तिक  सेक्स (अननेचुरल सेक्स) गंभीर अपराध है और दोषी  पाए जाने पर आरोपी  को दस साल से आजीवन कारावस तक की सजा हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में अपनी व्यवस्था में “राइट टू सेक्सुअल्टी“ को सिरे से खारिज करते हुए “समलैंगिक सेक्स“ अथवा “अप्राकृतिक सेक्स“ को स्थापित सामाजिक परंपराओं और मान्यताओं के खिलाफ बताते हुए आईपीसी की धारा 377 को खारिज करने से इंकार कर दिया था। तब  शीर्ष  अदालत ने व्यवस्था दी थी कि भारतीय दंड संहिता में बदलाव करना विधायिका का काम है और वह चाहे तो नया कानून बना सकती है।  सुुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का  “राइट टू सेक्सुअल्टी“ के पैरवीकार और समलैंगिक वर्ग (एलएसबीटी) ने  कडा विरोध किया था और सुप्रीम कोर्ट  में इस व्यवस्था के खिलाफ फिर से  याचिका दायर की थी। सोमवार को भारत के मुख्य न्यायाधीश  की पीठ ने याचिका की सुनवाई करते हुए  इसे  बडी खंडपीठ के सुपुर्द करते हुए कहा कि समय के साथ-साथ सामाजिक नैतिकता के मानदंड भी बदल जाते हैं। समाज के उस तबके को भी सम्मान और भय मुक्त माहौल में जीने का पूरा अधिकार है, जो सेक्स के मामले में अपनी अलग मान्यता रखता है। मगर न तो कानून और न ही समाज इसके इजाजत देता है। मगर न्यायपालिका इन सबसे से सर्वोपरि है और यही समलैंगिकों को न्याय दे सकता है। भारत में सेक्स  आज भी बेहद निजी और सामाजिक नियमों के दायरे में बंधा हुआ है और यहां सेक्स के मामले में पष्चिम देशों  की तरह उदारता और आजादी नहीं है। समलैगिंक संबंधों को “अप्राकृतिक और हीन “ मानते हुए इसे सामाजिक मान्यता नहीं दी जाती। यही कारण है कि सियासी दल और नेता  समलैंगिकों के पक्ष में आने से डरते हैं। बहरहाल, इस बात में दो राय नहीं है कि परिवर्तन समय का दूसरा नाम है और समय के साथ-साथ सामाजिक मान्यताएं, रिवायतें और सोच भी बदल लाती है। इंटरनेट और उन्नत आईटी प्राधौगिकी के जमाने में समाज का कोई तबका भय और अपमान से जीने पर विवश  हो जाए, यह भी सभ्य समाज को सुहाता नहीं है। मगर सामाजिक नियमों और मर्यादाओं और कानून की अवधारणाओं को भी नहीं तोडा जा सकता। जरुरी नहीं है कि समाज के कुछ लोगों को जो अच्छा लगता हो वही अन्य को भी भा जाए। भारत की सबसे बडी खासियत “विविधता में एकता“ है। देश  के हर नागरिक को अपने तरीके से जीने, खाने-पीने और रहने का अधिकार है। संविधान के अनच्छेद 21 में ऐसी व्यवस्था की गई है। मगर इस व्यवस्था को भारतीय दंड संहिता की कई ऐसी धाराएं हैं, जो नागरिक को उसके सतत मौलिक अधिकारों में बाधाएं खडी करती हैं। मसलन किसी भी नागरिक को बगैर अधिकृत वारंट के गिरफ्तार नहीं किया जा सकता मगर पुलिस जब चाहे किसी को भी उठा लेती है। गिरफ्तारी से पहले मामले की पूरी जांच भी जरुरी है मगर पुलिस यह भी करती नहीं है। क्या पहनना  और क्या खाना, इस पर भी फतवे जारी किए जाते हैं। तीन बार तलाक कहकर बीवी को सडक पर फेंक दिया जाता है। कानूनन प्रतिबंधित होने के बावजूद अबोध बालिकाओं का ब्याह रचाया जाता है। समाज को इन बातों की चिंता नहीं है। समलैगिकों को भी उनके रहम पर छोड देना जाना चाहिए।       

मंगलवार, 9 जनवरी 2018

“उल्टा चोर कोतवाल को डांटे“

आधार कार्ड  की जानकारियां लीक होने से संबंधित खबर पर यूआईडीएआई (यूनिक आईडेटिफिकेशन ऑफ इंडिया) द्वारा खोजी पत्रकार के खिलाफ एफआईआर दर्ज  कराया जाना “अभिव्यक्ति की आजादी“ पर कडा प्रहार है।  यूआईडीएआई के एक अधिकारी ने भारतीय दंड संहिता की धारा 419 (गलत पहचान देकर धोखाधडी), धारा 420 (धोखाधडी), 468 (जालसाजी) और 471(नकली दस्तावेज को सही बताकर इस्तेमाल करना)  के तहत एफआईआर दर्ज  करने की शिकायत दर्ज  की है। अमूमन,  जालसाजी और धोखाधडी से जुडी धाराएं शातिर अपराधियों  पर लगाई जाती हैं। इनके अलावा पत्रकार के खिलाफ आधार अधिनियन की 36/37 के तहत भी मामला दर्ज  किया गया है। यह बात तो और भी ज्यादा चिंताजनक है। आधार के नियम इससे जुडी जानकारियों को सुरक्षित रखने के लिए बनाए गए हैं।  इन जानकारियों के लीक होने की खोजी खबर को अपराध कैसे माना जा सकता है़? इन् धाराओं के तहत अपराध साबित होने पर तीन साल की सजा को सकती है। जाहिर है  यूआईडीएआई की यह कार्रवाई मीडिया को डराने-धमकाने की मंशा   से की गई है और  “उल्टा चोर कोतवाल को डांटे“ जैसी है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया का काम व्यवस्था में व्याप्त खामियों  को उजागर करना है। देश  का इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया इस काम को बखूबी निभा रहा है। इसकी स्वतंत्र और निष्पक्ष  आवाज को दबाने के प्रयास जब-तब होते रहे हैं। सतहर के दशक में आपातकाल के दौृरान मीडिया को दबाने की  जीतोड़ कोशीश  की गई थी । तत्कालीन शासक दल को इसका गंभीर खमियाजा भुगतना पडा था। खोजी पत्रकारिता पूरी दुनिया में मीडिया की सबसे बडी ताकत रही है और इसी के दमखम पर पत्रकारिता फलती-फूलती रही है। आधार कार्ड की जानकारियां लीक होती रही हैं, यह सच्चाई पहले भी उजागर हो चुकी है। पिछले साल 2017 में टीम इंडिया के पूर्व  कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की आधार कार्ड से जुडी व्यक्तिगत जानकारी लीक हो गई थी। धोनी की पत्नी साक्षी ने मार्च, 2017 में आईटी एवं कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद से  शिकायत की थी कि कॉमन सर्विस सेंटर नाम की एजेंसी ने धोनी की आधार कार्ड  बनाने वाली जानकारियां  को सार्वजनिक  कर दिया था।  यूआईडीएआई ने एनरोलमेंट की प्रकिया को निजी कंपनियों को सौंप रखा है और आईटी से जुडी स्वंयसेवी संस्थाओं ने इसका कडा विरोध भी किया था। पिछले साल नवंबर माह में लगभग 200 सरकारी विभागों की वेबसाइटस पर आधार से जुडी जानकारियां सार्वजनिक किए जाने पर भी खासा बवाल मचा था। नियमानुसार लोगों की बायोमेट्रिक जानकारियों को सार्वजनिक नही किया जा सकता है। बंगलुरु स्थित सेंटर फॉर इंटनेनेट एंड सोसायटी (सीआईएस) ने मई, 2017 में अपनी रिपोर्ट  में बताया था कि चार सरकारी वेबसाइटस से लगभग 13 करोड लोगों की आधार से जुडी जानकारियां लीक हुईं थी । और सबसे खतरनाक बात यह है कि बायोमेट्रिक जानकारियों के अलावा लोगों के बेंक अकांउट तक लीक किए गए । इस रिपोर्ट  में यह भी कहा गया था कि सरकारी एजेंसियां आधार के बायोमेट्रिक डेटा को पूरी संजीदगी से संभाल नहीं पा रहे हैं। आधार की बायोमेट्रिक डेटा में कुछ ऐसी संवेदनशील जानकारियां हैं, जो लोगों की निजता में द्खल माना जाता है। आधार कार्ड  बनाने के लिए लोगों की उगुंलियों के निशान और आंखों की पुतलियों को भी आईडेटिफिकेशन के लिए लिया जाता है । और दोनों ही पूरी तरह से निजी है। इस साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट में एक याची ने कहा था“ उंगुलियों और पुतलियों पर किसी का हक नहीं हो सकता“। सरकार इन्हें मेरे शरीर से अलग नहीं कर सकती। अदालत भी इस पर सहमत थी। आंखों की पुतलियों और उंगुलियों के निशान जैसी निजता की जानकारियों को सार्वजनिक तौर पर लीक करना संगीन अपराध है।  यूआईडीएआई को व्हिस्लब्लोअर की बजाए उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए जो लोगों की निजता का सौदा कर रहे हैं। 

सोमवार, 8 जनवरी 2018

पारदर्शिता का आडंबर !

पारदर्शिता राजनीतिक फंडिंग को साफ-सुथरा और  पारदर्शी  बनाने  के लिए सरकार ने चुनावी बांडस जारी करने का महत्वपूर्ण फैसला उठाया है। मगर मोदी सरकार की इस पहल ने राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता  की बहस को और तल्ख कर दिया है।   मंगलवार (2 जनवरी) को सरकार ने चुनावी फंडस जारी करने की बाकायदा  अधिसूचना भी जारी कर दी । स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की 53 अधिसूचित  शाखाओं को एक हजार, दस हजार, एक लाख, दस लाख और एक करोड के बांडस जारी करने के लिए अधिकृत किया गया है। कोई भी व्यक्ति अपना केवाईसी (नॉ युअर कस्टमर) भरकर इन बांडस को खरीद सकता है और  राजनीतिक दलों को बतौर चंदा दे सकता है। चंदा निर्वाचन आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त उन राजनीतिक दलों को ही दिया जा सकता है  जिन्हे  पिछले लोकसभा अथवा विधानसभा चुनाव में कम-से-कम एक फीसदी वोट मिले हों। हर साल जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्टूबर में चुनावी बांडस जारी होंगे और इन्हें दस दिन तक खरीदा जा सकता है। बांडस जारी होने के 15 दिन के भीतर उन्हें अधिकृत शाखा में जमा करना होगा। अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो बांडस की राशि  प्रधानमंत्री राहत कोष  में चली जाएगी। वित्त मंत्री अरुण जेटली के मुताबिक इन बांडस से चुनावी चंदे में पारदर्शिता आएगी। चंदा देने वाली कंपनियां अपनी बैंलेंस शीट्स  में बताएगी उन्होंने कितने बांडस खरीदे। राजनीतिक दल निर्वाचन आयोग को चंदे में मिले बांडस का ब्यौरे  देंगे। यही इस योजना की  पारदर्शिता है।  मगर एक लोचा यह भी है कि खरीदार का नाम गुप्त रखा जाएगा। यह कैसी पारदर्शिता ? बांडस किसने खरीदे अगर यह जानकारी गुप्त रखी जाएगी, तो यह कैसे सुनिष्चित किया जाएगा कि काले धन से लेन-देन नहीं हुआ है। राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता  तभी आ सकती है जब चंदा देने वाले और लेने वाले दोनों के बारे सुस्पष्ट  जानकारी सामने आए। 2017-18 के बजट में वित्त मंत्री ने चुनावी बांडस लाने का ऐलान किया था। निर्वाचन आयुक्त ओपी रावत ने एसोसिएशन फॉर डेमोक्रटिक रिफॉर्म  के सम्मेलन में इस बात पर हैरानी व्यक्त की थी कि चुनाव और आयकर संबंधी नियमों ( फाइनेंस एक्ट-2017) में बदलाव करके सरकार ने चुनावी बांडस को निर्वाचन आयोग में दाखिल की जानी वाली कॉन्ट्रीब्यूशन रिपोर्ट के दायरे से बाहर रखा है। इससे पारदर्शिता कहां रह जाती है? निर्वाचन आयोग ने 26 मई, 2017 को  फाइनेंस एक्ट-2017 में चुनाव से जुडे नियमों को बदलने पर सरकार से अपनी सख्त नाराजगी जताई थी। चुनावी बांडस लाने के लिए सरकार ने फाइनेंस एक्ट 2017 के जरिए जन प्रतिनिधि एक्ट 1951, इंकम टैक्स एकट, 1961 और कंपनी एक्ट, 2013 में कुछ बदलाव किए थे। निर्वाचन आयोग को  जन प्रतिनिधि एक्ट 1951 में चुनावी बांडस को  कॉन्ट्रीब्यूशन रिपोर्ट  के दायरे से बाहर करने पर सख्त ऐतराज है। सरकार ने बडी चतुराई से राजनीतिक चंदे को निर्वाचन आयोग की निगरानी से बाहर कर दिया है। नियम बदलने से अब  राजनीतिक दलों को जन प्रतिनिधि कानून, 1951 के  सेक्शन  29 बी का उल्लंघन करके चंदा लेने पर भी  दोषी  नहीं माना जाएगा। अब तक निर्चाचन आयोग को इस सेक्शन  का उल्लंघन करने पर दोषियों को  दंडित करने का अधिकार था। निर्वाचन आयोग को कंपनी एक्ट 2013, में संशोधन पर भी ऐतराज है। मोदी सरकार ने राजनीतिक चंदे के लिए कंपनियों के 7.5 फीसदी प्रॉफिट वाले प्रावधान को भी हटा दिया है। इसका मतलब है कि अब फर्जी कंपनियां बनाकर काले धन को राजनीतिक चंदा देने के लिए आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है। निष्कर्ष  यह है कि सरकार का राजनीतिक फंडिंग को पारदर्षी बनाने का दावा खोखला है। सरकार के फैसले से अगर  देश  का निर्वाचन आयोग ही संतुष्ट  नहीं है, ऐसी पारदर्शिता  के कोई मतलब नहीं रह जाते हैं।     

शुक्रवार, 5 जनवरी 2018

आम आदमी से “खास“ की पार्टी

दिल्ली में सतारूढ अरविंद केजरीवल की आम आदमी पार्टी अब “खास“ लोगों की पार्टी बन गई है। दिल्ली की तीन राज्यसभा सीटों के लिए आम आदमौ पार्टी ने जिन तीन लोगों को चुना है, उन मेंसे दो का पार्टी के सिद्धांतों , संघर्ष और राजनीतिक दर्शन  से दूर-दूर तक का कोई  सरोकार नहीं है। राज्यसभा टिकट आवंटन ने फिर  जता  दिया है कि  अपने गठन के समय  आम आदमी पार्टी ने राजनैतिक-सांगठनिक सुचिता और उच्च आदर्षों  के जो संकल्प लिए थे, वे सब कबके  ध्वस्त हो चुके हैं। टिकट पाने वाले एक सज्जन हाल ही तक कांग्रेस में थे और 2013 में कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव भी लडा था। पार्टी के वरिष्ठ  नेता कुमार विश्वास  को अरविंद केजरीवाल ने राज्यसभा भेजना मुनासिब नहीं समझा जबकि वे उनके सबसे पुराने साथी हैं। पार्टी के ही कई वरिष्ठ  कार्यकर्ता राज्यसभा टिकट के दावेदार थे मगर केजरीवाल ने किसी को इस योग्य नहीं समझा। पार्टी के सीनियर  नेता संजय सिंह को राज्यसभा का टिकट मिलना समझ में आता है मगर अपने पुराने  सहयोगी कुमार विश्वास  और आशुतोष  को दर किनार कर दो “बाहरी“ व्यक्तियों को टिकट देकर अरविंद केजरीवाल ने तरह-तरह के कयासों को जन्म दिया है। एक कयास यह है कि राज्यसभा टिकट आवंटन में पार्टी के प्रति निष्ठा , योगदान और वरिष्ठता    के अलावा लेन-देन ने भी अहम भूमिका निभाई है। जिन दो को राज्यसभा का टिकट दिया गया है, उनका पार्टी को खडा करने में कोई योगदान नहीं है। पार्टी के अंदर और बाहर से सवाल उठ रहे हैं कि राज्यसभा के टिकट देने में किस तरह के मानदंड अपनाए गए। पहली बार पार्टी संसद के उच्च सदन में अपनी उपस्थिति दर्ज करने जा रही है। इस मौके पर ऐसे व्यक्तियों को पार्टी का राज्यसभा टिकट  थमा गया है, जिनका  पार्टी के किसी भी संघर्ष  अथवा अभियान में कोई योगदान नहीं रहा है। यह बात सब जानते हैं कि आम आदमी पार्टी में सिर्फ  अरविंद केजरीवाल की ही चलती है। इस बात के दृष्टिगत  जाहिर है टिकट का आवंटन केजरीवाल के कहने पर ही हुआ है। केजरीवाल के विरोधी उन पर संगीन आरोप लगा रहे हैं। टिकट आवंटन के तुरंत बाद से ही पार्टी को अपना बचाव करना पड रहा है। यह स्थिति और भी हास्यास्पद है कि केजरीवाल एंड कंपनी को राज्यसभा के लिए नामांकित व्यक्तियों के परिचय के बडे-बडे ब्योरे देने पड रहे हों। पार्टी ने अपने बचाव में यह दलील भी दी है कि राज्यसभा नामांकन के लिए नामी-गिरामी और काबिल लोगों से संपर्क साधा गया मगर कोई भी पार्टी का टिकट लेने के लिए राजी नहीं था। इसके यही मायने निकाले जा सकते हैं कि आम आदमी पार्टी में कोई काबिल है ही नहीं। न तो कुमार विश्वास  और न ही पत्रकार से नेता बने आशुतोष । अगर ये दोनों  अरविंद केजरीवाल की नजर में काबिल नहीं है, तो वे पार्टी में रहकर कर क्या रहे हैं़़? एक-एक करके केजरीवाल के आंदोलनकारी सहयोगी उनका साथ छोडते जा रहे हैं अथवा साथ छोडने के लिए विवश  किए गए । सबसे पहले उनके मेंटर अन्ना हजारे ने केजरीवाल से किनारा कर लिया। फिर पार्टी के संस्थापक योगेन्द्र यादव, प्रशांत  भूषण और प्रो आनंद कुमार अलग हो गए। कपिल मिश्रा पहले से बागी बने हुए हैं और अब कुमार विश्वास  अपमानित करके उन्हें भी  अलग राह चलने पर विवश  किया गया है। अपनी इस  दशा   पर कुमार विश्वास  की ये पक्तियां उनका दर्द बयां करती है“ सबको लडने ही पडे अपने-अपने युद्ध, चाहे राजा राम हो चाहे गौतम बुद्ध; सबकी लडाईयां अकेली हैं, मैं अपनी लड रहा हूं, आप अपनी लड रहे हैं“। बहरहाल, लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक दल को  प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनाकर ज्यादा देर तक नही चलाया  जा सकता। जनता को केजरीवाल से बहुत उम्मीदें थी। उन्होंने अवाम को बुरी  तरह से निराश  किया है।    

गुरुवार, 4 जनवरी 2018

कब खत्म होगा यह सिला

जात-पात, ऊंच-नीच और साम्प्रदायिकता की आड में  सियासी लोग अपने राजनीतिक हित साधने का कोई मौका नहीं चूकते हैं। इससे देश  और समाज को कितना नुकसान होता है, इसकी उन्हें जरा भी परवाह नहीं है। महाराष्ट्र  में दलितों और मराठों के बीच पिछले तीन दिन से जारी  जातीय संघर्ष  इसकी ताजा मिसाल है। इतिहास में  मराठों और दलितों के बीच किसी भी तरह के टकराव का कोई उल्लेख नहीं है। पहली बार महाराष्ट्र में मराठा और दलितों में किसी ऐतिहासिक घटना पर टकराव सामने आया है और यह देश  की अखंडता के लिए खतरनाक है। महाराष्ट्र  के कोरेगांव भीमा, पाबल और शिरकापुर से  शुरु हुई हिंसक झडपों की लपटों अब राज्य के अलावा दूसरे क्षेत्रों में भी पहुंच गई है। बुधवार को दलितों द्वारा आहुत महाराष्ट्र  बंद का व्यापक असर देखा गया। इस बंद का आहवान दलितों के महानायक डाक्टर भीमराव अंबेडकर के पौत्र प्रकाश  अंबेडकर ने किया था और करीब 250 दलित संगठनों ने इसका समर्थन किया था। दलित संगठनो की इतनी बडी संख्या राज्य में उनकी सक्रिय भागीदारी का सबूत है।  हिंसक संघर्ष   की  शुरुआत पहली जनवरी को 1818 के कोरेगांव भीमा में पेशवा बाजीराव पर ब्रिटिश  सैनिकों की जीत की 200वीं सालगिरह को लेकर हुई। दलित (महार समुदाय) एक जनवरी 1818 की ऐतिहासिक घटना की सालगिरह मना रहे थे। मराठों को महारों की यह हिमाकत गवारा नहीं गुजरी और इस पर दोनों पक्षों में हिंसक झडपें हो गई। दलितों को 1818 का मराठा बनाम ब्रिटिश  फौजियों के बीच का युद्ध उनकी अस्मिता का सवाल है तो मराठां को भी यही लगता है। इस युद्ध को हुए 200 साल हो गए हैं मगर इसकी पृष्ठभूमि  में आज भी जात-पात और ऊंच-नीच वाली मानसिकता काम कर रही है। 1881 के इस युद्ध में ब्रिटिश  फौज में महार भी लडे थे। महारों को तब भी अछूत माना जाता है और आज भी। 1 जनवरी, 1818 के ईस्ट इंडिया कंपनी की फौज, जिसमें ज्यादातर महार थे,  ने कोरेगांव भीमा के युद्ध में पेशवा बाजीराव द्धितीय को हराया था। इसी जीत की 200वीं सालगिरह को पुणे जिले के कोरेगांव भीमा में मनाया जा रहा था। महाराष्ट्र  के दलित इस घटना को दलित इतिहास का अहम हिस्सा मानते हैं। दलित इतिहास में इस बात का उल्लेख है कि किस तरह तब महारों को “अपवित्र“ और अछूत माना जाता था। महारों को चलते समय अपनी कमर में झाड लगाकर चलना पडता था ताकि  जहां-जहां भी  उनके कदम पडे झाड से  साफ होते रहें। इतना ही नहीं, महारों को थूकने के लिए अपने गले में एक बर्तन भी लटकाना पडता था ताकि स्वर्ण अपवित्र और अशुद्ध न हो पाएं। तब दलित स्वर्णों के कुएं अथवा पोखर से पानी लेने के बारे तो सोच भी नहीं सकते थे। दलितों का इतिहास इस तरह की अपमानित एवं अमानवीय घटनाओं से भरा पडा है। इतिहासकार यह भी कहते हैं कि दरअसल कोरेगांव भीमा के युद्ध में महारों ने मराठों को नहीं, अलबत्ता बाहृमणों को हराया था। तब  बाहृमणों ने दलितों पर जबरन छुआछूत थोपा था। दलितों ने  बाहृमणों से  छुआछूत को खत्म करने के लिए कहा मगर वे नहीं माने। इससे नाराज महार ईस्ट इंडिया कंपनी से मिलकर  बाहृमणों को सबक सिखाने चाहते थे।  बाहृमणों ने मराठों से पेशवाई भी छीनी थी। ईस्ट इंडिया कंपनी भी पेशवाई को खत्म करना चाहती थी और इसलिए महारों को बाहृमणों के खिलाफ खडा किया गया और फिरंगियों ने पेशवाई को खत्म करके ही छोडा। बाहृमण अगर छुआछूत खत्म कर देते तो शायद 1818 का युद्ध होता ही नहीं। बहरहाल, महाराष्ट्र  में मराठा और दलितों के बीच का टकराव भाजपा और शिव  सेना के लिए अशुभ है। दोनों ही समुदाय हिंदू हैं। महाराष्ट्र में दलितों की नुमाइंदगी करने वाली रिपब्लिकन पार्टी (आठवाले) मोदी सरकार के मंत्री है। जात-पात और ऊंच-नीच की राजनीति ने देश  को पहले ही खासा नुकसान पहुंचाया है। अब यह सिला बंद हो जाना चाहिए। 

बुधवार, 3 जनवरी 2018

बेचारा भारत-पाक क्रिकेट !

एक जमाना था जब क्रिकेट को पूरी तरह भद्रों (जैंटलमैन गेम) का खेल माना जाता था।  समय के साथ-साथ सब कुछ बदल गया। क्रिकेट अब भद्रों का खेल नहीं रहा, अलबता उग्रता, “बदले की भावना“ और बाउंसर से विरोधी को छकाने  का खेल बन कर रह गया है। हार-जीत, रैंकिग सुधार, पैसा, शोहरत एवं कूटनीति खेल भावना पर भारी पडती जा रही हैं। फिर भी कुछ ऐसे किस्से हैं जिनसे  आज भी किक्रेट को “भद्र लोगों“ का खेल माना जा सकता है।  2011 में इग्लैंड और भारत टेस्ट सीरीज  के दौरान एक पारी में इयान बेल ने गेंद को बांउड्री के बाहर भेजने के लिए शॉट  लगाया और यह सोचकर वे दौडे ही नही।  गेंद बीच में रोक दी गई और बेल रन आउट हो गए। भारत इस भारत  श्रंृखला में बुरी तरह से हार रहा था मगर कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी ने बेल को वापस बुला लिया। धोनी इस तरह का रन आउट नहीं चाहते थे। धोनी ने कई बार ऐसी मिसालें पेश  की हैं जिससे क्रिकेट में उनकी “भद्रता“ झलकती है। मगर मौजूदा भारतीय कप्तान विराट कोहली “मिस्टर कूल “ से एकदम विपरीत है। जब तक बल्लेबाज मामूली से “निक“ पर अंपायर की अंगुली उठने से पहले पैवलियन लौटते रहेंगे , क्रिकेट तब तक  “भद्रों“ की गेम बनी रहेगी। बहरहाल, पाकिस्तान में क्रिकेट को “भद्रो“ की गेम नहीं माना जाता। और भारत और पाकिस्तान के बीच का क्रिकेट मैच तो कतई इस श्रेणी में नहीं आता है। दोनों देशों  के बीच   क्रिकेट मैच लगभग “युद्ध“ जैसे लगते हैं और ऐसे मैचों की दुनिया भर में सबसे ज्यादा देखा जाता है। मगर चैंपियन ट्राफी और वर्ल्ड कप के अलावा भारत और पाकिस्तान के बीच द्धिपक्षीय सीरीज पूरी तरह से बंद है।  सोमवार को विदेश  मंत्री सुषमा स्वराज ने फिर कहा कि जब तक पाकिस्तान आतंकियों को पालना-पोसना बंद नहीं करता, भारत और पाकिस्तान के बीच कोई भी श्रंृखला खेली नहीं जा सकती। पाकिस्तान आतंक को पालने से पल्ला झाड लेगा, इसकी निकट भविष्य  में कोई संभावना नहीं दिखती है। इस बात के  मद्देनजर  भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट सीरीज की कोई संभावना नहीं बनती है। देश  की सामरिक नीति के लिए भारत का यह स्टैंड भले ही तर्कसंगत हो मगर इससे क्रिकेट का सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है। खेल में किसी भी तरह की दीवार खडी करना अच्छा नहीं माना जाता। माना पाकिस्तान फितरती है और वह भारत को अस्थिर करने का कोई मौका नहीं चुकता पर इसमें क्रिकेट और खिलाडियों का क्या कसूर है ? भारत को इस मामले में उदार  दृष्टिकोण  अपनाने की जरुरत है। पाकिस्तान को आतंकियों को पालने-पोसने से रोकने के लिए क्रिकेट को बलि का बकरा बनाने की जरुरत नहीं है। पाकिस्तान को अगर “आतंकी  राष्ट्र “ बनने से रोकना है तो उसे अंतरराष्ट्रीय   मंच पर अलग-थलग करना होगा और ऐसा तब तक मुमकिन नहीं है, जब तक चीन इस्लामाबाद की पीठ थपथपाता रहेगा। भारत के लिए सुखद स्थिति यह है कि डोनाल्ड ट्रंप के  राष्ट्रपति  बनने के बाद पाकिस्तान पर अमेरिकी द्बाव बढा है। सोमवार को अमेरिका ने पाकिस्तान को 255 मिलियन डॉलर की मदद रोक दी। इससे पहले  राष्ट्रपति  ट्रंप ने अपने टवीट में पाकिस्तान पर अमेरिका को मूर्ख  बनाने का आरोप लगाया। ट्रंप के अनुसार अमेरिका 15 साल में पाकिस्तान को 33 अरब डॉलर की मदद कर चुका है मगर इस्लामाबाद ने बदले में छल-कपट के सिवा कुछ नहीं दिया। अमेरिका  इस बात पर बेहद खफा है कि पाकिस्तान समर्थित हक्कानी नेटवर्क अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों पर लगातार  हमले कर रहा है।  छल-कपट पाकिस्तान की फितरत है और भारत शुरु से यही कह रहा है। अमेरिका का ताजा फैसला भारत के स्टैंड पर मोहर लगा रहा है। लगता है अमेरिका पाकिस्तान से उब गया है । भारत के लिए यह अच्छी खबर है। 

मंगलवार, 2 जनवरी 2018

2018 की चुनौतियां

जो गुजर गया सो बीत गया, आने वाले कल की चिंता करें तो भविष्य  सुखद रहेगा, बडे-बुजुर्गों की यह सीख हमें नए साल की नई चुनौतियों और संकल्पों का सामना करने की प्रेरणा देती है। पुरानी गलतियों से सबक लेते हुए, नए संकल्पों को बगैर किसी बाधा के पूरा किया जा सकता है। और सफलता का यही मूल मंत्र है। दस साल पहले 2008 में पूरी दुनिया को मंदी ने जकड लिया था और वह भी ऐसी कि रुस और ब्राजील जैसी तेजी से बढती अर्थव्यवस्थाएं आज तक इससे उभर नही पाई है। दुखद स्थिति यह है कि दुनिया ने इससे कोई सबक नहीं सीखा है और आज भी मानवीय सरोकारों को प्राथमिकत देने की बजाए, अधिकतर देश  आतंक, हिंसा और यु्द्ध विभीषका  पर अपने संसाधन और समय जाया कर रहे हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था के मजबूत फंडामेंटल्स ने हालांकि मंदी का असर ज्यादा देर तक रहने नहीं दिया मगर पिछले दस साल में इसके फिर से लौटने की आशंका बराबर बनी रही। 2017 की पहली छमाही  में नोटबंदी से यह और बलवित हुई पर दूसरी छमाही में अर्थव्यवस्था ने गति पकड ली थी। अब अंतरराष्ट्रीय  एजेंसियों का  आकलन है कि साल 2018 में ग्रोथ और रफ्तार पकडेगी। नोटबंदी का असर पूरी तरह से खत्म हो चुका है और गुडस एंड सर्विसिस टैक्स (जीएसटी)  भी काफी हद तक स्थापित हो चुका है। अच्छी खबर यह है कि 2018 में वैश्विक  ग्रोथ भी रफ्तार पकडेगी और  वैश्विक  जीडीपी 4 फीसदी की दर से बढेगी। 2017 में यह 3.7 फीसदी थी। अमेरिकी राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप ने अब तक के सबस बडे कर सुधार को लागू करके ग्लोबल इकॉनमी को नई गति प्रदान की है। कॉर्पोरेट टैक्स में 14 फीसदी की कटौती से अमेरिका में निवेश  बढेगा और अर्थव्यवस्था में और ज्यादा पैसा आएगा। अमेरिकी आर्थिक नीतियों का पूरी दिनिया  अर्थव्यवस्था पर हमेषा व्यापक असर पडता है। कहते हैं कि अगर अमेरिका को छींक भी आती है, पूरी  दुनिया  को जुकाम हो जाता है।  अमेरिका के अलावा दुनिया के दूसरी बडी अर्थव्यवस्था चीन ने भी आज (पहली जनवरी) से विदेशी  कंपनियों को टैक्स  में  छूट देने की घोषणा की है। इससे भी इस मुल्क में निवेश  बढेगा और ग्रोथ को गति मिलेगी।  कच्चे तेल की बढती कीमतें चिंताजनक हो सकती हैं मगर विशेषज्ञों   का आकलन है कि कीमतें 60 से 70 डॉलर प्रति बैरल के बीच स्थिर रहेगी। वैसे भी दुनिया इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर तेजी से अग्रसर हो रहा है और साल 2018 इस दिशा   में क्रांतिकारी बदलाव लाने जा रहा है। 2018 को  इलेक्ट्रिक कार का साल माना जा रहा है। अमेरिका में अभी कुल ऑटो सेल्स का  इलेक्ट्रिक कार का हिस्सा मात्र 1.5 फीसदी है मगर 2018 में स्थिति एकदम बदल जाएगी। बडी कंपनिया नए-नए मॉडल लाकर पेट्रोल-डीजल वाहनों के समक्ष कडी चुनौती पेश  कर रही हैं। भारत में भी  इलेक्ट्रिक वाहनों के प्रति मोह बढता जा रहा है। 2018 में भारत इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए मजबूत इंफरास्ट्रक्चर तैयार करने की ओर अग्रसर है। दस जनवरी भारत के लिए खास रहेगा। इसरो इस दिन एक साथ 31 उपग्रहों का एक साथ प्रक्षेपण करेगा। स्टॉक मार्केट इस साल नई बुलंदियां को छू सकता है मगर सरकार का बढता राजस्व घाटा और निर्यात एवं   कृषि सेक्टर की सुस्त चाल कुछ अवरोधक खडे कर सकती है। और भी कई ऐसी बातें जो 2018 में हमे निराश  कर सकती  हैं। मोदी सरकार का “ स्मार्ट सिटी“ मिशन तीन साल बाद भी  शिथिल पडा हुआ है। सरकार  दस हजार करोड (9860) मेंसे अब तक मात्र 7 फीसदी ही खर्च कर पाई है। गंगा स्वच्छता योजना पर भी धीमी गति से काम हो रहा है जबकि प्रधानमंत्री ने इसे उच्च प्राथमिकता दे रखी है। इन मामलों से यही संदेश  मिलता है कि नौकरशाही और लालफीताशाही अभी भी चरम पर है और प्रगति को  गति देने  की  बजाए इसे  रोकने में ज्यादा सहायक है।