अमेरिका के ओरेगॉन प्रांत की जेल में बंद 53 भारतीय अप्रवासियों से खूंखार अपराधियों जैसा सलूक दुनिया के सबसे ताकतवर और लोकतांत्रिक मुल्क को षोभा नहीं देता है। इन मेंसे अधिकतर सिख हैं और इनका कसूर इतना भर है कि उन्होंने अमेरिका में शरण लेने के लिए गैर-कानूनी तरीके से प्रवेश किया है। इन कैदियों को चारों पहर (24 घंटे) जंजीरों में जकडकर रखा जा रहा है। खाना भी जंजीरों में बांध कर दिया जा रहा है। अधिकांश कैदियों की आयु 18 से 25 साल है। पंजाब में विदेश जाकर पैसा कमाने का जनून है। विदेश जाने के लिए लोग-बाग अपनी जमीन जायदाद तक बेच देते हैं। अमेरिका में गैर कानूनी प्रवेश कोई संगीन अपराध नहीं है। फेडेरल लॉ के तहत पहली बार अमेरिका के आव्रजन नियमों के तहत गैर-कानूनी तरीके (इंप्रॉपर एंट्री) पर ज्यादा से ज्यादा जुर्माना अथवा छह माह की कैद या दोनों की सजा दी जाती है। निर्वासन (डिपोर्टेशन) के बाद दूसरी बार गैर-कानूनी तरीके से प्रवेश पर दो साल की कैद और जुर्माने की सजा का प्रावधान है। अमेरिकी कानून में इस तरह के अपराध लो-लेवल के माने जाते हैं। ओरेगॉन की जेल में बंद सिख तो अभी सजायाफ्ता भी नहीं है। उनसे खूनी, कातिल अथवा बलात्कारी जैसे अपराधियों सरीखा बर्ताव सरासर मानवाधिकारों का उल्लंघन है। पूरी दुनिया को मानवाधिकारों की रक्षा का पाठ पढाने वाला अमेरिका खुद अक्सर इनका घोर उल्लंघन करता है। ओरेगॉन की जेल में बंद अप्रवासियों से अमानवीय व्यवहार ताजा मिसाल है। कैदियों से कैसा सलूक किया जाना चाहिए, इसके लिए संयुक्त राष्ट्र ने न्यूनतम स्टैंटर्ड रूल्स बना रखे हैं और इनके तहत किसी भी कैदी से अमानवीय व्यवहार नहीं किया जा सकता। कैदी के आत्म सम्मान की रक्षा करना और उसकी समुचित देखभाल करन हर प्रशासन की जिम्मेदारी है। इंटरनेशनल ह्यूमन राइटस स्टैंटर्ड (इंटरनेशनल कॉवेनेंट ऑन सिविल एंड पॉलिटिक्ल राइटस) में साफ तौर कहा गया है कि जेल में बंद कैदियों से अमानवीय सलूक नहीं किया जा सकता। अमेरिका समेत 76 मुल्क 1976 से इन नियमों का पालन कर रहे हैं। इन सब के बावजूद अमेरिका के ओरेगॉन जैसे प्रगतिशील राज्य में मानवाधिकारों का उल्लघंन इस मुल्क के लिए बेहद शर्मनाक है। वैसे डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से अमेरिका में अश्वेतों और अप्रवासियों के प्रति “नफरत, भेदभाव और असहिषुणता “ का माहौल पनपा है। ट्रंप का वश चले तो वे किसी भी अप्रवासी को अमेरिका में आने ही न दें। अमेरिका को अमेरीकियों के लिए संरक्षित रखना ट्रंप का लक्ष्य है। इसी सनक में उन्होंने बार्डर् पर सख्ती करके इसी साल दो हजार से ज्यादा अप्रवासी बच्चों को उनके मां-बाप से अलग कर दिया था। इससे अधिक और कोई अमानवीय कदम हो ही नहीं सकता। ट्रंप के इस कदम का अमेरिकी सिविल राइटस बॉ्डी ने भी मुखर विरोध किया था। ट्रंप को यह बात भी अखर रही है कि बाहरी मुल्कों से आकर अप्रवासी अमेरिका का राशन-पानी (सरकारी सुविधाएं) खा-पी रहे हैं। इसीलिए ट्रंप प्रशासन ऐसी आवज्रन नीति बनाने की तैयारी कर रहा है, जिसके तहत उन लोगों को अमेरिका में आने की अनुमति ही न दी जाए जो सरकारी सुविधाओं के लिए इस मुल्क की ओर रुख करते हैं। 2016 में 3.83 लाख अप्रवासियों को अमेरिका की पक्की नागरिकता मिली थी। इसके अलावा विदेशों में रह रहे 6.20 लाख लोगों ने भी अमेरिकी नागरिकता दी गई थी। आप्रवासियों का भारी संख्या में अमेरिका आना ट्रंप प्रशासन को जरा रास नहीं आ रहा है। ट्रंप को लगता है कि अगर अप्रावसियों का आना-जाना इसी तरह झ्सी तरह जारी रहा, उनका “अमेरिका बनाम अमेरिकन“ वाला नारा पिट जाएगा। इसी आशंका से किसी भी अप्रवासी को अमेरिका मे घुसते ही जेल में बंद किया जा रहा है और जेल में बंद करके अमानवीय सलूक से उन्हें हतोत्साहित किया जा रहा है।
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