बुधवार, 31 मई 2017

Why To Protect Traitors?

जम्मू-कश्मीर  के अलगाववादी नेताओं  को पाकिस्तान से तो आर्थिक मदद मिल ही रही है मगर केन्द्र और राज्य की सरकार भी उन्हें भरपूर मदद दे रही है। उन्हें ”चांदी  के चमच” से खिला-पिला कर पाल पोस रही है। दुनिया के किसी भी देश  में  शायद ही कोई सरकार इस तरह से अपने “दुश्मनो “ को खिला-पिला रही हो।   और अब केन्द्र की सुरक्षा जांच एजेंसी (एनआईए) अलगाववदियों को मिल रही बाहरी आार्थिक मदद की जांच कर रही है। एनआईए ने सोमवार को अपनी जांच में खुलासा किया है कि कश्मीर  के अलगाववादी नेताओं को हवाला के जरिए पाकिस्तान से भरपूर मदद मिल रही है। जांच में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि अलगाववादियों को पाकिस्तान के अलावा सउदी अरब, बांग्लादेश  और श्रीलंका के रास्ते भी आर्थिक मदद मिल रही है। इस खुलासे से किसी को आश्चर्य   नहीं होना चाहिए। इससे पहले भी इस बात का खुलासा हो चुका है। पूरी दुनिया इस सच्चाई को जानती है कि जम्मू-कश्मीर  अलगाववादी नेता सांस भारत की खुली हवा में लेते हैं मगर गीत पाकिस्तान के गाते है। रोटी भारत की खाते हैं, पर अहसान पाकिस्तान का जताते है। राज्य सरकार आतंकियों से अलगाववादी नेताओं को बचाने के लिए उनकी सुरक्षा और यात्रा पर हर साल लगभग  110 करोड रु खर्च  करती है। जम्मू-कश्मीर  सरकार ने 2001 से 2012 तक 12 साल में अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा पर लगभग एक हजार करोड रु खर्च किए थे। राज्य विधानसभा में सरकार ने इस बात की जानकारी दी थी। सरकार अलगाववादी नेताओं को सुरक्षा तो मुहैया कराती ही है, उनकी आरामदेह यात्रा और उनके आलीशान होटलों में ठहरने, खाने-पीने की व्यवस्था भी करती है। केद्रीय गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार 2010 से 2015 में पांच साल के दौरान कश्मीर  के अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा व्यवस्था, यात्रा और बोर्डिंग-लॉजिंग पर 560 करोड रु  से भी अधिक की राशि   खर्च की गई। राज्य के लगभग 600 अलगावादियों की सुरक्षा के लिए जम्मू-कश्मीर  पुलिस के 500 पीएसओ और 950 सिक्योरिटी गार्ड तैनात हैं। जिन अलगाववादियों को पुलिस सुरक्षा मिली हुई है, उनमें 1971 में इंडियन एयरलाइंस का हवाई जहाज पाकिस्तान को हाईजेक करने वाले हाशिम कुरैशी  भी  शामिल है। अलगाववादी नेता भारत से सुरक्षा पाते हैं मगर गुणगान पाकिस्तान का करते है और भारत को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोडते। हाल ही में अलगाववादियों नेताओं को  हिजबुल मुजाहिद्दीन कमांडर जाकिर मुसा की धमकियों के बाद राज्य सरकार ने उन्हें माकूल सुरक्षा मुहैया कराने का आश्वासन  दिया है।  अलगावादी यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि उन्हें सुरक्षित रखना  केन्द्र और राज्य सरकार की विवशता है। इन सब बातों से आजिज आकर जम्मू के एक वकील ने सुप्रीम कोर्ट  में जनहित याचिका दायर कर अदालत से अलगाववादियों को सरकारी मदद एव सुविधाएं बंद कराने का आग्रह किया था। न्यायालय ने सितंबर, 2016 में याचिका को निरस्त करते हुए व्यवस्था दी कि किसकी मदद की जानी चाहिए और किसकी नहीं, यह केन्द्र और राज्य सरकार का विशेषाधिकार है और इसे चुनौती नहीं दी जा सकती। इतना ही नहीं, न्यायालय ने कश्मीरी  नेताओं को “अलगाववादी“ कहने पर भी ऐतराज जताया था । बहरहाल, मु्द्दा  यह है कि केन्द्रीय जांच एजेंसी अलगाववादी नेताओं के फडिंग की जांच करने के बावजूद उनकी बाहरी और भीतरी मदद रोक नहीं सकती। सरकार तो खुद अलगाववादी नेताओं को पाल-पोस रही है और उनकी हर तरह से मदद कर रही है। इस बात के  दृष्टिगत  सरकार किस मुंह से बाहर के मुल्कों को अलगाववादी नेताओं को दी जा रहई मदद रोकने की बात करती है। सरकार को पहले अपनी कश्मीर  नीति स्पष्ट  तौर पर रेखांकित करनी चाहिए। देशद्रोहियों  को कैसी सुरक्षा और किस बात की मदद?

मंगलवार, 30 मई 2017

वेल डन गर्ल्स

महिला सशक्तिकरण के जमाने में लडकियों का लडकों को पछाडना अच्छा लगता है।  बेट्टियां अगर आगे बढती हैं, तो समझ लीजिए देश  वाकई ही तरक्की कर रहा है। इतिहास इस बात का गवाह है कि जिस समाज  में बेट्टियों का सम्मान  होता  रहा  है, वह तेजी से आगे बढा है। आए दिन महिलाओं से बलात्कार, छेडखानी, सामाजिक शोषण  और तिरस्कार के खबरें पढते-सुनते कान पक जाते हैम, आँखे दुखती है  ।  बहरहाल सीबीएसई एवं सीआईएससई की परीक्षा परिणामों में बेट्टियों की अभूतपूर्व सफलता से देश  गोरवान्वित हुआ है। रविवार को सीबीएसई की बाहरवीं परीक्षा का परिणाम निकला, तो सोमवार को काउंसिल फॉर दी इंडियन स्कूल सर्टिफेक्ट एग्जामिनेशन ( सीआईएससई) ने दसवीं (आईसीएसई) और  बाहरवीं (आईएसई) के रिजल्ट का ऐलान किया। सीबीएसई में पहले तीन स्थान पर बेट्टियां अव्वल रहीं और  सीआईएससई की दसवीं और बाहरवीं परीक्षा में लडकियों ने पहला स्थान हासिल करके लडको को पीछे छोड दिया। सीबीएसई बाहरवीं परीक्षा की टॉपर नोएडा की रक्षा गोपाल ने तो कमाल ही कर दिया।  आटर्स के तीन विषयों  में सौ-सौ अंक और दो  में 99.2 फीसदी अंक। 15 साल में पहली बार आटर्स का स्टूडेंट  सीबीएसई परीक्षा में पूरे देश  में टॉपर रहा है।  कुल  मिलाकर 500 मेंसे  498 अथवा 99.6 फीसदी अंक। यानी परफेक्ट सौ फीसदी  से मात्र दो  अंक कम।  आटर्स स्ट्रीम में सौ मेंसे सौ अंक हासिल करना बेहद चुनौतीपूर्ण  है मगर नोएडा की बेटी ने यह  कमाल  भी कर दिखाया है। रक्षा गोपाल ने यह भी दिखाया है कि टॉपर बनने के लिए स्ट्रीम की कोई दीवार नहीं होती। टॉपर किसी भी स्ट्रीम का हो सकता है। इस तरह के रिजल्ट लाना वास्तव में बेमिसाल है। दूसरा स्थान पाने वाली चंडीगढ की साइंस स्ट्रीम की छात्रा  भूमि सांवत ने 99.4 फीसदी और तीसरा स्थान पाने वाली चंडीगढ की ही कॉमर्स स्ट्रीम की मन्नत लूथरा ने 99.2 फीसदी लेकर भी कम कमाल नहीं किया है। सोमवार को सीआईएससई की बाहरवीं  परीक्षा की टॉपर कोलकता की अनन्य मैती ने 99.5 फीसदी अंक लेकर और दसवीं की परीक्षा में  पुणे की मुस्कान ने 99.4 फीसदी अंक लेकर लडकियों का जलवा दिखाया। ज्यादा से ज्यादा अंक पाने के लिए छात्रों को वाकई ही कडी मेहनत करनी पडती है। और देश  की बेट्टियों ने साबित कर दिया है कि वे परिश्रम करने में लडकों से कम नहीं हैं, अलबत्ता उनसे आगे ही हैं। देस  के लिए यह गर्व  की बात है कि अब लडकियां हर क्षेत्र में लडकों का मुकाबला कर रही हैं और पढाई के मामले में तो उनसे आगे हैं। इससे पता चलता है कि देश  तेजी से आगे बढ रहा है। विभिन्न अध्ययन बताते हैं कि परीक्षा में अव्वल आने के लिए आत्म-अनुशासन (सेल्फ डिसिपलिन), रेगुलेशन और एकाग्रता बहुत जरुरी है। सीबीएसई की बाहरवीं की टॉपर रक्षा ने भी छात्रों को अव्वल आने का यही मूल-मंत्र दिया है। उनका कहना है कि एकाग्रता से पढो और सोशल मीडिया से दूर रहो। पढाई के समय किताब और अध्ययनकर्ता  के बीच कोई नहीं आना चाहिए। लडकियों के आगे रहने की एक वजह यह भी है कि वे लडकों की अपेक्षा वे जल्द ही परिपक्व हो जाती हैं और भारतीय परिवेश  में अपने तथा परिवार के प्रति जिम्मेदारियों से ज्यादा सजग रहती हैं।  लडकों की अपेक्षा  लडकियों का आत्म-नियंत्रण भी कहीं अच्छा होता है। समाजशास्त्रियों का आकलन है कि स्कूलों का समकालीन पाठयक्रम लडकियों को लडकों की अपेक्षा ज्यादा कुशाग्र बनाता है। अध्ययन से यह भी पता चलता है कि लडकिया बालवाडी (किंडरगार्टन) से लेकर कॉलेज की पढाई तक लडकों की अपेक्षा ज्यादा आत्म-नियंत्रित होती हैं। निर्देशों  को अच्छी तरह से सुनना, उनका पालन करना और कडा परिश्रम करना लडकियों के लालन-पालन का अहम हिस्सा होता है। इन्ही सब गुणों के कारण लडकियां, लडकों की अपेक्षा बेहतर परिणाम लाने में सक्षम होती हैं। बेट्टियों का आगे रहना देश  की खुशाहली को और अधिक मजबूत करता है।                  

गुरुवार, 25 मई 2017

बधाई! सेना का माकूल जवाब

 पाकिस्तान चौकियों  पर  22 सेकेंड में 21 वार की  भारतीय सैन्य कार्रवाई से देशवासियों का सीना फूलकर “56 इंच“ का हो गया है। यही तो देश  चाहता है। भारतीय सैनिकों से बर्बरता और बार-बार सीजफायर का उल्लंघन कर रहे पाकिस्तान को धूल चटाने का यही सही समय है। सेना की अब तक की यह सबसे बडी कार्रवाई है। इस कार्रवाई में दस से ज्यादा पाकिस्तान सैनिक भी मारे गए। सेना ने जम्मू-कश्मीर  के नौशहरा सेक्टर में नियंत्रण रेखा पास पाकिस्तानी सेना की  छह चौकियों को मिसाइलों से ध्वस्त कर दिया। पाकिस्तान सेना की इन चौकियों को आतंकियों ने भारत में घुसपैठ का लांचिंग पैड बना रखा था। पाकिस्तान बार-बार नौशहरा सेक्टर में सीज फायर का उल्लघंन कर रहा है। आतंकियों की भारत में घुसपैठ कराने के लिए ऐसा किया जा रहा था। गर्मियों में बर्फ पिघलते ही नियंत्रण रेखा से आतंकियों की घुसपैठ बढ जाती है। बर्फ पिघलने  से  घुसपैठ के पारंपरिक रास्ते भी खुल जाते हैं। पहली बार सेना ने देशवासियों को इस ऑपरेशन का वीडियो भी दिखाया। इस ऑपरेशन की सबसे बडी विशेषता  भी यह रही कि तोपखानों से गोलीबारी की बजाए मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया। अब तक आम तौर पर तोपखानों से गोलीबारी की जाती रही है। मिसाइलों से गोलीबारी की रेंज तोपखाने से काफी ज्यादा होती है और एक सेंकेड में चार गोले गिराए जा सकते हैं। बहरहाल, देश  को इस बात का सुकून है कि सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक के बाद सबसे बडी कार्रवाई की है। सितंबर, 2016 में सर्जिकल स्ट्राइक के लगभग आठ माह ही सही मगर सेना ने कार्रवाई की  तो सही । आठ माह लंबी अवधि होती है और अब  लोगों के सब्र का बांध टूटने की कगार पर था। मगर जिस तरह से इस कार्रवाई को दिखाया गया, उस पर सवाल उठाया जा रहा है। इस माह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल के तीन साल पूरे हो रहे है। 26 मई 2014 को उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। कांग्रेस का आरोप है कि मोदी सरकार सर्जिक्ल स्ट्राइक की तरह सेना की ताजा कार्रवाई को भी राजनीतिक फायदे के लिए भुनाना चाहती है। पाकिस्तान के प्रति सरकार की नर्म  नीति से जनमानस में आक्रोश  बढ रहा था। इसी आक्रोश  को  शांत  करने के लिए सेना की ताजा कार्रवाई का वीडियो तक दिखाया गया जबकि अब तक सैन्य ऑपरेशन का प्रचार नहीं किए जाने की रिवायत रही है। देेशवासियों को प्रधानमंत्री से बडी उम्मीदें हैं और विभिन्न सर्वेक्षण बता रहे है कि 61 फीसदी से ज्यादा जनमानस उनके कामकाज से संतुष्ट  है हालांकि इस तरह के सर्वेक्षणों पर अब ज्यादा भरोसा नहीं किया जा सकता। मगर पाकिस्तान को करारा जवाब नहीं देने के लिए जनमानस प्रधानमंत्री से भी संतुष्ट  नहीं है। संप्रग सरकार के समय नरेन्द्र मोदी और भाजपा  पाकिस्तान के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं करने के लिए  तत्कालीन प्रधानमंत्री को “नपुंसक“ बताया करते थे और अब यही आरोप कांग्रेस  प्रधानमंत्री पर लगा रही  है। सच्चाई यह है कि जनमानस के तुष्टिकरण  के लिए देश  को युद्ध  मेँ  नहीं झोंका जा सकता। युद्ध किसी समस्या का हल नहीं है। भारत और पाकिस्तान का तीन बार जंग के मैदान में आमना-सामना हो चुका है मगर इनसे कोई भी द्धिपक्षीय विवाद सुलझ नहीं पाया है। भारत से कहीं ज्यादा पाकिस्तान इस कडवी सच्चाई को जानता है। इसीलिए वह भारत के खिलाफ छदम युद्ध छेडे हुए है। भारत के समक्ष इस छदम युद्ध के चक्रब्यूह को तोडने की चुनौती है। इस स्थिति के दृष्टिगत  को सीमा पार आतंकियों के ठिकानों को एक-एक करके ध्वस्त करने की कारगर  नीति बनानी चाहिए। कश्मीर  में आतंकियों और अलगाववादियों का मजबूत गठजोड तोडना पडेगा। युवकों को अधिकाधिक रोजगार मुहैया कराकर उन्हें  राष्ट्रीय  मुख्यधारा से जोडना होगा।  की कोई भी मां कश्मीर अपने लाल को आतंकियों और अलगवादियों के “निहित स्वार्थी एवं सत्ता लोलुपता“ के लिए  बलि चढते नहीं देख सकती।

बुधवार, 24 मई 2017

तीन तलाक पर “यू टर्न“

तीन तलाक के मुद्दे पर आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड  (एआईएमपीबी) का नया पैंतरा काबिलेगौर है। अब तक तीन तलाक को मुसलमानों की आस्था का विषय बताने वाले मुस्लिम बोर्ड  ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट  में यह कह कर अदालत को भी चौंका दिया कि शरीयत में एक साथ तीन तलाक कहकर वैवाहिक संबंधों को विच्छेद करना अमान्य है। इससे पहले  मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड  सुप्रीम कोर्ट में ही कह चुका है कि तीन तलाक की प्रथा भारत में चौदह सालों से जारी है और शरीयत में बाकायदा इसकी अनुमति है। अब वही बोर्ड कह रहा है कि तीन तलाक अवांछनीय प्रथा है और  शरीयत इसकी अनुमति नहीं देता है। बोर्ड ने अदालत में यह भी कहा है कि महिलाओं को तीन तलाक न मानने का अधिकार दिया जाएगा और दुल्हन निकाहनामे में अपनी  शर्त को भी जुडवाने के लिए स्वतंत्र होगी।  मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इसके लिए जागरुकता अभियान भी चलाएगा। काजियों और मौलवियों को इस बारे एडवाजरी जारी की जाएगी। इस प्रथा का पालन करने वालों का सामाजिक बॉयकॉट  किया जाएगा। यह सब सुनकर मुस्लिम समाज को निसंदेह अच्छा लगा होगा। देर से ही सही मगर गनीमत है मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को महिलाओं के भले की तो सूझी। तथापि, तीन तलाक के खिलाफ अदालती लडाई लडने वाली महिलाएं  मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की इन बातों पर सहज से भरोसा करने के लिए तैयार होंगी, इस पर संदेह है। कारण साफ है।  मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में पुरुषो  का दबदबा है और महिलाओं के लिए इसमें कोई नुमाइंदगी नहीं दी गई है। जब तक बोर्ड  का कायाकल्प नहीं हो जाता, इससे क्रांतिकारी सुधारों की उम्मीद नहीं की जा सकती। कहावत है “हांथी के दांत, खाने के और, दिखाने के और“।  यही स्थिति  मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड  की है। बोर्ड  को डर है कि देश  की सर्वोच्च  अदालत ने अगर तीन तलाक को असामाजिक और गैर-शरीयत प्रथा ठहरा दिया तो बोर्ड की मुस्लिम समाज में खासी भद्द पिटेगी। मुस्लिम समाज मेँ  शिक्षित पुरुष  और महिलाएं पहले ही बोर्ड की सामंती  कार्यशैली  की मुखर विरोधी हैं और अक्सर इसे कटटरपंथियों की बपौती करार दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट तीन तलाक पर सुनवाई के दौरान इस प्रथा को “वैवाहिक संबंध विच्छेद की बदतर प्रथा“ करार दे चुका है। सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक की प्रथा को चुनौती देने वाली याची ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एपलिकेशन एक्ट 1937 के  सेक्शन -2 को संविधान के चौंदहवें अनुच्छेद का घोर उल्लघंन बताया है।  चौंदहवें अनुच्छेद के तहत देश  का  हर नागरिक कानून की नजर में बराबर है। इस अधिकार को संजीदगी से लागू करने के लिए ही समान आचार संहिता (यूनिफॉर्म  सिविल कोड) की मांग की जा रही है। याची का कहना है कि  शरीयत मुस्लिम महिलाओं को कानून में एकसमान हक नहीं देता है। यह कैसा इंसाफ है कि शरीयत में तीन तलाक का हक पुरुष  को तो है मगर महिलाओं को नहीं? आश्चर्य  इस बात पर है कि कट्टर इस्लामिक देश  पाकिस्तान में तीन तलाक पर पूरी तरह से प्रतिबंध है। इस्लामिक देश  अफगानिस्तान, सउदी अरब और मोरक्को ने भी इस प्रथा को प्रतिबंधित कर रखा है। आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पास भी इस बात का कोई जबाव नही है कि अगर पाकिस्तान और अन्य इस्लामिक देश  इस प्रथा को प्रतिबंधित कर सकते हैं, तो भारत में इसे अब तक क्यों नहीं रोका गया? दिसंबर, 2016 में इलाहाबाद हाई कोर्ट अपने फैसले में तीन तलाक को असंवैधानिक और मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकारों का हनन करने वाला बता चुका है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीष जस्टिस जेएस केहर की अगुवाई वाली  पांच  सदस्यीय संवैधानिक पीठ जल्द ही तीन तलाक पर अपना फैसला सुना सकती है। जिरह पूरी होते ही 18 मई को अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रखा है।

मंगलवार, 23 मई 2017

ऐसे तो हादसे कम नहीं होंगे

भारत में सडक दुर्घटनाएं आतंकी घटनाओं से भी अधिक जानलेवा साबित हो रही हैं। आए दिन हो रही सडक दुर्घटनाओं में औसतन प्रतिदिन 425 अथवा सालाना लगभग डेढ लाख लोग मारे जाते हैं। देश  की राजधानी दिल्ली में ही प्रतिदिन पांच लोग और सोलह बच्चे सडक दुर्घटनाओं का  शिकार होते हैं। पंजाब में हर रोज 10 लोग, हरियाणा में 11 और हिमाचल प्रदेश  में 4 लोग सडक दुर्घटनाओं का  शिकार हो रहे हैं। 2015 में पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश  और जम्मू-कश्मीर  में 11,000 लोग विभिन्न सडक दुर्घटनाओं में मारे गए थे। देश में कुल सडक दुर्घटनाओं में मरने वालों मेंसे  8.3 फीसदी इन चार राज्यों  से होते हैं।  हरियाणा और पंजाब सडक हादसों के मामलों में  शीर्ष  पर हैं।  पंजाब रोड सिविरिटी ( सौ में 73) में मिजोरम के बाद दूसरे टॉप  स्थान पर है। सडक हादसों में तमिल नाडु शीर्ष   पर है मगर  पंजाब और हरियाणा भी पीछे नहीं है। पंजाब में हर साल पांच हजार, हरियाणा में चार हजार और हिमाचल में एक हजार लोग सडक हादसों में मारे जाते हैं। रविवार को पंजाब में 11 लोग, हिमाचल और हरियाणा में 3-3 और जम्मू-कश्मीर  में दो लोग सडक हाद्सों में मारे गए। ज्यादातर हादसे तेज गति (ओवर-स्पीडिंग) और चालक की लापरवाही से होते हैं। रविवार को पंजाब के ब्यास में एक तेज गति वाहन ने रिक्शा  और खडी कार को टक्कर मार कर सात लोगों को बेमौत मार डाला। एक अन्य हादसे में तेज गति के दो वाहनों में भिडंत होने से चार लोग मारे गए। पंजाब और हरियाणा में तेज गति सडक दुर्घटनाओं का प्रमुख कारण  हैं। देश  में  राष्ट्रीय  उच्च मार्गों अथवा अन्य सडकों पर गति की अधिकतम सीमा निर्धारित है मगर अमल में इनका पालन कम, उल्लघंन ज्यादा किया जाता है। यातायात नियमों की धज्जियां उडाने में वीवीआईपीज और उनके परिजन सबसे आगे रहते हैं। सडक हादसों के तुरंत बाद सरकार इन्हें कम करने के लिए अविलंब कारगर उपाय उठाने का संकल्प दोहराती है। आजादी के बाद से यही हो रहा है मगर न तो सडक हादसे कम हुए और न ही तेज गति और लापरवाह ड्राइविंग। केद्रीय भूतल परिवहन मंत्रालय अपनी तरफ से सडक दुर्घटनाओं को टालने के लिए हर मुमकिन प्रयास कर रहा है। देश  के  राष्ट्रीय  उच्च मार्गों पर कुल मिलाकर 726 “ब्लैक स्पॉट“ चिंहित किए गए हैं जो सडक हादसों के लिए जाने जाते हैं। इनमें दस दिल्ली में है, 350 पंजाब में और  157  हरियाणा में हैं। चंडीगढ पुलिस ने 15 और मोहाली में 40 सडक हादसों को न्यौता देने वाले स्पॉट माना हैं।  केद्रीय भूतल परिवहन मंत्रालय  ने इन खतरनाक स्पॉटस को चुस्त-दुरुस्त करने के लिए अगले पांच सालों के लिए 11,000 करोड रु का बजट आवंटित कर रखा है। सडक सुरक्षा सप्ताह नियमित रुप से चलाया जा रहा है। रोड सेफ्टी जागरुकता अभियान चलाने के लिए स्वंयसेवी (एनजीओ) की मदद ली जा रही है। सरकार  रोड सेफ्टी नीति को भी संजीदगी से लागू कर रही है। केन्द्र सरकार अपनी तरफ से पूरी कोशिश  कर रही है मगर भ्रष्ट  सरकारी तंत्र, कानून असम्मत जनमानस और कुछ हद तक राज्यों की रोड सेफ्टी के प्रति उदासनीता के कारण सडक हादसे कम होने की बजाए बढते ही जा रहे हैं। केन्द्र राज्यों को रोड सेफ्टी काउंसिल और जिला रोड सेफ्टी कमेटियां गठित करने को कई बार कह चुका है मगर अधिकतर राज्य ऐसा अभी तक ऐसा नहीं कर पाएं हैं। तेज गति पर अंकुष लगाने के कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है और न ही सीट बेल्ट और हेलमेट लगाने के प्रति सख्ती बरती जा रही है। इन हालात में सडक हादसे तो होंगे ही। सडक हादसों से बचना है तो प्रषासन के साथ-साथ लोगों को खुद भी सजग होना चाहिए।

सोमवार, 22 मई 2017

मुबारक हो! जीएसटी लागू हो रहा है , खुशियां मनाओ

आतंक और अलगाववाद की भीषण आग में जल रही  कश्मीर  घाटी की राजधानी ने लंबे समय बाद देश  को बहुत बडी खुशखबरी दी है।  श्रीनगर में चली जीएसटी परिषद की दो-दिवसीय बैठक ने अततः गुडस और सर्विसिस की सभी श्रेणियों की प्रस्तावित टैक्स दरें तय कर ली । परिषद ने 1205 वस्तुओं पर लगने वाले जीएसटी की सूची गत  वीरवार रात को जारी कर दी  और पांच श्रेणियों पर जीएसटी दरों को को  शुक्रवार  को अंतिम रुप दिया गया। सिर्फ सोना एकमात्र ऐसी वस्तु है, जिस पर सहमति नहीं बन पाई और फैसला परिषद की अगली बैठक के लिए छोड दिया गया है।    जीएसटी परिषद ने इससे संबंधित सात नियमों को को भी अंतिम रुप दे दिया है और दो नियमों को लीगल कमेटी के सुपुर्द  कर दिया ।  यही बहुत बडी बात है कि आजादी के बाद देश के सबसे महत्वाकांक्षी  कर सुधार (टैक्स रिफॉर्म) को अब पहली जुलाई से अमली जामा पहना दिया जाएगा। लंबे समय से जीएसटी को लेकर देश  के लॉमेकर्स संसद के भीतर और बाहर माथा-पच्ची कर रहे थे। सरकार कांग्रेस नीत संप्रग की रही हो अथवा भाजपा की अगुवाई वाली राजग की, राजनीतिक दलों में जीएसटी को लेकर खूब “तू-तू, मैं-मैं“ होती रही है। इससे देश  को कितना नुकसान हुआ, इसकी किसी को परवाह नहीं रही। मोदी सरकार इस बात के लिए बधाई की पात्र है कि आखिरकार, जीएसटी को संसद से भी पारित करवा लिया गया और  जीएसटी परिषद से विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं पर लगने वाली दरें भी निर्धारित करवा लीं गईं । परिषद ने 5 से 28 फीसदी टैक्स की अलग-अलग श्रेणियां बनाई हैं।  19 फीसदी वस्तुओं पर  28 प्रतिशत जीएसटी लगेगा। 43 फीसदी पर 18 प्रतिशत, 17 फीसदी वस्तुओं पर  12 प्रतिशत,  और 14 फीसदी वस्तुओं पर 5 प्रतिशत टैक्स लगाया जाएगा। 7 फीसदी वस्तुओं को जीएसटी से मुक्त रखा गया है। इनमें अनाज, दूध-दही, फल-सब्जी जैसी  रोजमर्रा  की जरुरी  चीजें  शामिल हैं। इन पर अभी भी कोई टैक्स नहीं है मगर कुछ राज्य  गेंहूं  और चावल पर वैट लगाते हैं। अब यह भी खत्म जो जाएगा।  शिक्षा और हैल्थकेयर को भी जीएसटी से मुक्त रखा गया है। केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने परिषद की बैठक के बाद  शुक्रवार को इस आशय  की घोषणा की। इससे यूनिवर्सल  शिक्षा को बढावा मिलेगा। पेट्रोल और डीजल को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया है क्योंकि फ्यूल प्राइस अंतराष्ट्रीय  तेल कीमतों ले अनुसार निर्धारित की जाती हैं। अभी भी पेट्रोल-डीजल पर वैट नहीं लगाया जाता मगर केन्द्र सरकार को इन पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी को एडजस्ट करना पडेगा।  पैट्रोलियम उत्पादों को लेकर डयूल जीएसटी नीति से काफी असुविधा हो सकती है। कस्टम डयूटी का जारी रखा जाना तो समझ में आता है मगर लोकल बॉडीज के करों के जारी रहने से “ एक देश , एक समान कर“ जैसी स्थिति नहीं रह पाएगी। बहरहाल, विशेषज्ञों  का आकलन है कि  जीएसटी के लागू होने से देश  के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में खासा इजाफा हो सकता है। पूरी दुनिया में लगभग 160 देश  जीएसटी अथवा वैट जैसी एकीकृत टैक्स व्यवस्था लागू कर चुके हैं। और अधिकांश  देशों  को इसका फायदा भी हुआ है। कनाडा एकमात्र ऐसा देश  है, जहा डयूल जीएसटी मॉडल लागू है और इसके लागू होने से इस देश  की जीडीपी ग्रोथ में एक फीसदी की गिरावट आई थी। कनाडा के अलावा जापान, सिंगापुर, मलेशिया  और आस्ट्रेलिया में भी जीएसटी जैसी कर व्यवस्था लागू होते ही इनकी जीडीपी ग्रोथ गिरी थी। सिंगापुर की जीडीपी में सबसे ज्यादा तीन फीसदी की गिरावट आई थी।  1954 में फ्रांस ने सबसे पहले जीएसटी (वैट) जैसी कर व्यवस्था लागू की थी। और इसके उत्साहवर्धक परिणाम सामने आए थे। भारत को भी यही उम्मीद है।

शुक्रवार, 19 मई 2017

“स्पाई“ पर लडाई

अंतरराष्ट्रीय  अदालत ने  पाकिस्तानी जेल में बंद  भारत के पूर्व नौसेना अधिकारी कुलभूषण जाधव की फांसी को फिलहाल रोक दिया है। नीदरलैंड में हेग स्थित इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस की 11 जजों की पंचाट ने पाकिस्तान से कहा है कि वह अदालत का अंतिम फैसला आने तक जाधव को फांसी न दे। अदालत ने पाकिस्तान की इस दलील को नहीं माना कि यह मामला उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है। अदालत ने कहा है कि कुलभूषण यादव को काउंसलर मदद मिलनी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा है कि पाकिस्तान ने जिन  हालात में कुलभूषण जाधव को गिरफ्तार किया था, उन पर अभी विवाद है। वर्ल्ड  अदालत का फैसला भारत के लिए बडी कूटनीतिक  जीत है। पाकिस्तान के लिए अब जाधव को सूली पर लटकाना इतना आसान नहीं होगा हालांकि भारत को आशंका है कि इस्लामाबाद जाधव को जल्द से जल्द फांसी देने पर आमादा है। दस अगस्त को कुलभूषण को मिली राहत की मियाद खत्म हो रही है। कुलभूषण जादव को भारत की विदेशी  स्पाई एजेंसी रॉ (रिसर्च एंड एनालेसिस) का जासूस बताते हुए पाकिस्तान ने ईरान में गिरफ्तार किया था। पाकिस्तान की दलील है कि जाधव ने अपने कबूलनामे में माना है कि वह 2013 से रॉ के लिए काम रहा था और पाकिस्तान में विध्वंसक गतिविधियों में संलिप्त था। इस साल दस अप्रैल को पाकिस्तान की सैन्य अदालत ने कुलभूषण यादव को जासूसी के आरोप में फांसी की सजा सुनाई थी। भारत ने इस फैसले के खिलाफ  इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस का दरवाजा खटखटाया था। इससे पहले भारत और पाकिस्तान 1999 में भी वर्ल्ड  कोर्ट मेें भिड चुके हैं। तब पाकिस्तान ने भारत पर पाकिस्तान नौसेना के हवाईजहाज को मार गिराने का आरोप लगाया था। इस हादसे में 16 लोगों की मौत हो गई थी। अदालत ने तब पाकिस्तान की याचिका को इस बिला पर खारिज कर दिया था कि यह मामला उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है। पाकिस्तान को उम्मीद थी कि हेग  अदालत इस बार भारत की याचिका को भी इसी बिला पर खारिज कर देगी। मगर ऐसा हुआ नहीं। अदालत ने भारत और पाकिस्तान के बीच हुई विभिन्न संधियों का हवाला देते हुए कहा है कि 1977 से दोनों देश  वियना संधि का हिस्सा है और इसे लागू करना दोनों  मुल्कों की जिम्मेवारी है। विएना संधि के आर्टिकल 36 में साफ-साफ कहा गया है कि किसी भी विदेशी  को आपराधिक अथवा अवैध प्रवेश  के लिए गिरफ्तार किए जाने पर उसे काउंसर मदद दी जानी चाहिए। पाकिस्तान ने जाधव को यह कहकर  काउंसर मदद  नहीं दी कि आतंकी गतिविधियों में संलिप्तता के लिए गिरफ्तार व्यक्ति विएना संधि के तहत नहीं आता है। मगर अदालत ने पाकिस्तान की इस दलील को भी नहीं माना। बहरहाल, पाकिस्तान के लिए कुलभूषण जाधव को आतंकी साबित करना उसकी नाक बचाने का सवाल  है। इसीलिए, इस्लामाबाद विएना संधि को भी तोड-मरोड कर पेश  कर रहा है। पाकिस्तान का आरोप है कि जाधव को भारत ने बलूचिस्तान में बगावत फैलाने के लिए भेज रखा था। यह पाकिस्तान का नया पैंतरा है। इस्लामाबाद भारत में विध्वंसक कार्रवाइयां करने वाले पाकिस्तानी आतंकी संगठनों के खिलाफ ठोस सबूतों को भी नाकाफी बताता है मगर कुलभूषण जाधव को जबरी कबूलनामे पर भी आतंकी ठहरा रहा है। भारत में आतंक को फैलाने के लिए दुनिया भर में बदनाम पाकिस्तान लंबे समय से  बलूचिस्तान मे बगावत के लिए नई दिल्ली को जिम्मेवार ठहराने की साजिश  रचने में लगा हुआ है। कुलभूषण जाधव प्रकरण भी इसी साजिश  का हिस्सा है। जाधव प्रकरण से दोनों देशों  के संबंधों पर कोई असर नहीं होने वाला है। इस समय द्धिपक्षीय संबंध पहले ही इतने खराब हैं कि इससे ज्यादा खराब होने की कोई गुजाइंश ही  नहीं बची है।

गुरुवार, 18 मई 2017

छापों की राजनीति

लोक नायक जयप्रकाश  नारायण (जेपी) आंदोलन (“सम्पूृर्ण क्रांति“) की उपज बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव समकालीन राजनीति के दोगले आचरण की नुमाइंदगी करते हैं। बाहर से कुछ और अंदर से कुछ और। सामाजिक न्याय के नाम पर काली कमाई करने की “राजनीति“ ज्यादा देर तक नहीं चलती। अततः, कानून अपना काम करता है।  देश  की यह सबसे बडी त्रासदी है कि कांग्रेस के “परिवारवाद“ के खिलाफ संघर्ष   करने का संकल्प लेकर राजनीतिक अखाडे में उतरे  क्षत्रप इस मामले में ग्रांड ओल्ड  परिवार से भी बदतर निकले। वह चाहे बिहार में लालू परिवार हो, या उत्तर प्रदेश  में मुलायम सिंह परिवार अथवा पंजाब में बादल परिवार या महाराष्ट्र  में  बाल ठाकरे परिवार। सभी एक ही थैली के चटटे-बट्टे हैं। सत्तर के दशक में कांग्रेस के  कुशासन के खिलाफ  “जेपी“ आंदोलन को पूरे देश  में जबरदस्त रिस्पांस मिला था।  कांग्रेस के   भ्रष्ट  शासन से आजिज बेरोजगार युवाओं ने इस आंदोलन में बढ-चढ कर भाग लिया था। 1974 में इस आंदोलन की  शुरुआत बिहार से हुई थी मगर जल्द ही यह आंदोलन पूरे देश  में फैल गया था। लालू प्रसाद यादव तब बिहार छात्र संघर्ष  समिति के मुखिया थे और तब वे राजनीति को  भ्रष्ट लोगों  से मुक्त करने की बडी-बडी बातें किया करते थे। विडबना देखिए कि उसी लालू प्रसाद यादव परिवार को आज अवैध तरीके से अकूत संपति अर्जित करने का केन्द्रबिंदु माना जा रहा है। मंगलवार को लालू प्रसाद की बेटी मीसा और दामाद की बेनामी संपत्ति की जांच के लिए  आयकर विभाग के छापे पडे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी के समय वायदा किया था कि अगली कार्रवाई “ बेनामी संपत्ति के खिलाफ की जाएगी। समाचारों के अनुसार आयकर विभाग को दिल्ली से सटे गुरुग्राम (गुडगांव) में लालू परिवार की हजार करोड रु की संपत्ति का पता चला है। इन्हे लालू की बेटी और दामाद ने कौडियों के भाव तब खरीदा था जब लालू प्रसाद संप्रग सरकार में रेल मंत्री थे। लालू प्रसाद के  अलावा कांग्रेस के  सीनियर  नेता पी चिदंबरम  के पुत्र कार्ति के घर और व्यवसायिक ठिकानों पर भी आयकर के छापे पडे। आयकर छापों पर लालू प्रसाद और कांग्रेस का क्षुब्ध होना स्वभाविक है। मगर कानून किसी को नहीं बख्शता । यह बात कांग्रेस और लालू दोनों ही भली-भांति समझते हैं। अगर लालू और चिदंबरम निर्दोष  हैं, तो उन्हें किस बात का डर है? राजनीतक विद्धेष  अथवा:बदले की कार्रवाई“ के डर से कानून को काम करने से नहीं रोका जा सकता। लालू प्रसाद दूध के धुले नही हैं। चारा घोटाले में लालू प्रसाद पहले ही सजायाफ्ता हैं और अब सुप्रीम कोर्ट ने उन पर इस मामले में और आपराधिक मुकदमें दर्ज करने के आदेश दे रखे  हैं। देश  में सियासी नेता अब तक कानून को तोड-मरोड कर बचते रहे हैं पर मोदी सरकार ने इच्छाशक्ति दिखाई है। बहरहाल, लालू प्रसाद के खिलाफ आयकर विणाग की ताजा कार्रवाई से देश , खासकर, बिहार की राजनीति पर दूरगामी प्रभाव पड सकता है। लालू प्रसाद ने यह कहकर कि बीजेपी को नया एलायंस पार्टनर मुबारक हो, इस ओर इशारा भी कर दिया है। उनका इशारा बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश  कुमार की तरफ था। नीतिश  कुमार हालिया कह चुके हैं कि प्रधानमंत्री को बेनामी संपत्ति के खिलाफ अविलंब कार्रवाई करनी चाहिए। इससे पहले नीतिश  नोटबंदी के लिए प्रधानमंत्री की तारीफ कर चुके हैं। बिहार में  राष्ट्रीय  जनता दल और जनता दल (यू) का महागठबंधन सत्ता में है। लालू प्रसाद और नीतिश  कुमार ने भगवा पार्टी को धूल चटाने के लिए मिलकर चुनाव लडा  था। बिहार के दोनों क्षत्रप नदी के दो किनारे हैं। कभी एक नहीं हो सकते, फिर भी पॉवर के लिए एक मंच पर हैं। सत्ता का यह महागठबंधन देर-सबेर “अनैतिकता“ के बोझ से गिरना तय है। बहरहाल, देश  यह जरुर चाहता है कि बेनामी संपत्ति के खिलाफ जारी मुहिम में ऊंच-नीच नहीं होनी चाहिए।

बुधवार, 17 मई 2017

प्रधानमंत्री मोदी के तीन साल

 भारत की जनता ने तीन साल पहले कांग्रेस नीत संप्रग सरकार के “मौन प्रधानमंत्री“ डाक्टर मनमोहन सिंह की जगह  शेर की गर्जना करने वाले नरेन्द्र मोदी को बडी-बडी उम्मीदों और आकांक्षाओं को लेकर देश  का प्रधानमंत्री चुना था। पााकिस्तान की खडमस्तियों से आजिज आ चुके भारतीय जनमानस को पूरा भरोसा था कि अगर पाकिस्तान कोई भी गुस्ताखी करेगा, शेर  की तरह दहाडने वाला प्रधानमंत्री  दुश्मन  पर इस तरह टूट पडेगा कि दुनिया की बोलती बंद हो जाएगी। मगर इन तीन सालों में सर्जिक्ल स्ट्राइक के सिवा ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जिससे जनता को लगे दुश्मन  के दांत खटे हुए हैं। देश  का प्रधानमंत्री बनने से पहले  नरेन्द्र मोदी अपने पूर्वाधिकारी डाक्टर मनमोहन सिंह और संप्रग सरकार को पाकिस्तान को “मुंह तोड“ जबाव न देने पर तंज कसा करते थे। तीन सालों में न तो पाकिस्तान की बोलती बंद हुई और न ही आम आदमी के अभी तक अच्छे दिन आए हैं। कर चोरों द्वारा विदेशों  में जमा किया गया कितना काला धन भारत लाया गया, इसका भी कोई लेखा-जोखा नहीं है। और सच यह है कि आम आदमी को इससे ज्यादा सरोकार भी नहीं है। वह तो वायदे मुताबिक अपने खाते में विदेशों  से भारत लाए गए काले धन मेंसे अपने हिस्से में आने वाले धन का आज भी बेसब्री से इंतजार कर रहा है।  तीन सालों में  असहिष्णुता  बढी है। यहां तक कि स्वतंत्र, निर्भीक अभिव्यक्ति और दोतरफा संवाद के सभी  द्धार   बंद कर दिए गए हैं। प्रधानमंत्री अब पत्रकारों को विदेशी  दौरे पर नहीं ले जाते हैं। पत्रकारों को अपने खर्चे पर प्रधानमंत्री को कवर करने के लिए विदेश  जाना पडता है। इसमें कोई बुराई नही है मगर स्वस्थ लोकतंत्र के लिए फ्री-प्रेस और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के रास्ते बंद नहीं होने चाहिए। अमेरिका में राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप और मीडिया के बीच बढते तनाव के बावजूद व्हाइट हाउस ने अपनी नियमित साप्ताहिक प्रेस ब्रीफिंग जारी रखी है। ट्रप से पहले  राष्ट्रपति  लगातार प्रेस  से मुखातिब होते रहे हैं। इग्लैंड में संसद सत्र के दौरान प्रधानमंत्री को प्रत्येक बुधवार को पत्रकारों से मुखातिब होने के लिए उपस्थित रहना पडता है। भारत में ऐसी कोई परंपरा नहीं है  हालाँकि  हमने वहां का लोकतांत्रिक मॉडल अपना रखा है। तीन साल में प्रधानमंत्री मोदी ने  बमुश्किल  एक-आध बार पत्रकारों से बातचीत की है। नियमित प्रेस कॉफ्रेंस तो आज तक नहीं हो पाई है। एक बार चुनिंदा पत्रकारों को “सेल्फी विद पीएम“ के लिए बुलाया गया था। पत्रकारों को सवाल पूछने का आज तक कोई मौका नहीं दिया गया है। संसद में उपस्थित रहने और सांसदों का सवाल-जवाब देने से भी प्रधानमंत्री बचते रहे हैं। मगर लोगों से उनका सीधा संवाद है। जहं सवाल न पूछे जा सकें, ऐसे मंचों पर बोलने में प्रधानमंत्री सहज महसूस करते है। जनता से अपनी “मन की बात“ नियमित रुप से करते हैं मगर लोगों के “मन की बात“ को जानने के लिए  शायद ही प्रयास नहीं किए जाते हैं। तीन साल में कई ऐसी घटनाएं हुई हैं जिन पर देष प्रधानमंत्री को सुनना चाहता था मगर हर बार मोदी भी मनमोहन सिंह की तरह “ मौन“ ही रहे । इससे  लोकतंत्र कमजोर ही हुआ है। देश  की अखंडता से जुडे कई मसले अभी भी सुलझ नहीं पाएं है। कश्मीर  सुलग रहा है मगर इस मुस्लिम बहुल आबादी वाले राज्य की अलगाववादी सोच के लिए मोदी के पास कोई हल नही है। नक्सल समस्या चरम पर है। समान आचार संहिता का वायदा भी पूरा नहीं हुआ है। प्रधानमंत्री मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में है मगर “तीन तलाक“ का स्थायी हल समान आचार संहिता लागू होने पर ही निकल सकता है। गो-रक्षा के नाम पर जातीय हिंसा फैलाई जा रही है। तथापि प्रधानमंत्री सबसे ज्यादा लोकप्रिय नेता है। और-तो-और अब बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश  कुमार भी मान रहे हैं। अरे भई, यही तो लोकतंत्र है?

मंगलवार, 16 मई 2017

गुरु थोडी तो शर्म करो !

पंजाब के लोक्ल बॉडीज मिनिस्टर नवजोत सिंह सिद्धू का टीवी पर प्रसारित कॉमेडी शो  में जज बने रहना अपने आप में “राजनीतिक कॉमेडी“ शो  बनता जा रहा है। क्रिकेटर से राजनेता बने  सिद्धू  पंजाब में मंत्री बनने के बावजूद “ कॉमेडी  शो “ में बतौर जज काम करना जारी रखे हुए हैं। मामला अदालत में पहुंच गया है। यह स्थिति  काफी  रोचक है कि मंत्रियों के सार्वजनिक आचरण को भी अब न्यायपालिका को तय करना पड रहा है। इसके यह अभिप्राय भी निकाले जा सकते हैं कि देश  के सियासी नेता अपने सार्वजनिक आचरण जैसे जाती मुद्दे  को भी तय नहीं कर सकते हैं । वीरवार को इस मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में  सुनवाई हुई। मामले की सुनवाई कर रही खंडपीठ ने कहा “ मिनिस्टर अपनी कार्यशैली से जो भी मिसाल पेश  करते हैं, लोग उन्हें फॉलो करते हैं। इस बात के दृष्टिगत  क्या किसी मंत्री को ऐसा कुछ करना चाहिए, जो उनके काम और इमेज से मेल नहीं खाता हो“?  जाहिर है अदालत ने मंत्री नवजोत  सिद्ध और उनकी बिरादरी को यह नसीहत दी है कि उन्हें ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए, जो मंत्री की छवि से मेल न खाता हो। पंजाब के एडवोकेट जनरल ने सवाल उठाया था कि मंत्रियों के लिए  आचार संहिता को लागू करवाना न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है, इसलिए इस पर सुनवाई नहीं हो सकती। हाई कोर्ट  का कहना था कि मामला जनहित से जुडा है। इसे इस बिला पर खारिज नहीं किया जा सकता कि यह न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है। अब मामला अदालत के फैसले पर टिका है।  अगली सुनवाई दो अगस्त को होगी।  तब तक नवजोत सिंह सिद्धू को टीवी शो  पर काम करने और कमाई करने की पूरी छूट होगी। बहरहाल,  सिद्धू  के मामले ने मंत्रियों के आचरण से जुडे कई अहम सवाल खडे किए हैं। और सबसे बडा अहम सवाल है,“ भारत में सियासत जनसेवा है या  पेशा  “। आजादी से पहले राजनीति को विशुद्ध जनसेवा माना जाता था। सच्ची जनसेवा की भावना वाले ही राजनीति में प्रवेश  करते थे। जनसेवा के लिए महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरु ने अपनी जमी-जमाई वकालत तक छोड दी थी। और भी अनेक उदाहरण है। भूदान आंदोलन के प्रणेता आचार्य  विनोबा भावे और जय प्रकाश  नारायण ने जनसेवा के लिए खुशाहल जीवन त्याग दिया था। ब्रिटिश  सैन्य अधिकारी की बेटी मैडलिन स्लेड, जो बाद में मीरा बेन के नाम से विख्यात हुईं, ने महात्मा गांधी का अनुयायी बनने के लिए सब कुछ त्याग दिया था। भगत सिंह, राजगुरु और उनके जैसे कई युवक भरी जवानी में देश  के लिए खुशी -खुशी  फांसी पर चढ गए थे। मगर आजादी के बाद उतरोत्तर यह भावना काफूर हो गई। राज नेताओं ने जन सेवा को  पैसा कमाने का जरिया बना लिया। एक बार सांसद अथवा विधायक बनने पर उमर भर के लिए मोटी पेंशन। आयकर मुक्त तनख्वाह, भत्ते और हर तरह की सुविधा। केन्द्र और राज्यों ने अपने कर्मचारियों के लिए रिटायरमेंट के बाद पेंशन देनी बंद कर दी है मगर पूर्व सांसदों और विधायकों को मिल रही है। इन वित्तीय सुविधाओं ने राजनीति को जनसेवा की जगह पेशा  बना दिया है।  जाहिर है लोग-बाग पेंशन अथवा पैसा कमाने के लिए  ही राजनीति में आ रहे हैं।  अगर सरकार आज मंत्रियों, सांसदों, विधायकों को पेंशन और मोटी तनख्वाह और भत्ते देना बंद कर दें , तो  अधिकतर नेता “जनसेवा“ से तौबा कर लेंगे। कोई भी जनसेवा पैसे कमाने  के आकर्षण  से फल-फूल नहीं सकती। इसलिए न कोई संहिता है और न ही आर्दष। इस मामले में नवजोत सिंह सिद्धू अपवाद नहीं है। मंत्री रहते हुए भी उन्हे पैसा कमाने की भूख “कॉमेडी शो “ की ओर खीच रही है। आदर्श  आचार  संहिता का तकाजा है कि उन्हे मंत्री पद और टीवी  शो  मेंसे एक को चुनना चाहिए। दोहरा आचरण देर-सबेर उनकी छवि को खराब कर सकता है।

शुक्रवार, 12 मई 2017

कश्मीर की दास्तां

कश्मीर  के होनहार आर्मी अफसर लेफ्टिनेंट उमर फैयाज  की बर्बरतापूर्ण हत्या ने घाटी में व्याप्त असुरक्षा के माहौल को उजागर किया है।  छुट्टी पर अपने रिश्तेदार  की  शादी में  शरीक होने आए युवा फौजी अफसर को  आतंकियों ने पहले समारोह से अगवा किया, फिर उन्हें तडपा-तडपा कर मार डाला। युवा लेफ्टिनेंट  पिछले साल दिसंबर में ही सेना में  शामिल हुआ था। 27 साल के अरसे में पहली बार आतंकियों ने घर में घुसकर  कश्मीरी  अफसर को अगवा करके उसकी  बर्बरतापूर्ण हत्या करने का दुस्साहस किया है।  कश्मीर  में आतंकी और अलगाववादी युवाओं को सेना में भर्ती नहीं होने देने की धमकियां देते रहे हैं। तेईस  वर्षीय  फैयाज ने आतंकियों की नहीं सुनी, और वे सेना में भर्ती हो गए। इसीलिए आतंकियों ने उन्हें मार डाला।  कश्मीरी  युवाओं को डराने के लिए ही  आतंकियों ने यह कायराना हरकत की है। युवा सैनिक अफसर की जघन्य हत्या से   राष्ट्रीय    मुख्यधारा में  शामिल होने वाले युवाओं का हत्तोसाहित होना स्वभाविक है। इस घटना से यह संदेश  भी जाता है कि हिंसा की धू-धू करती लपटों से सुरक्षा बल अगर अपने अफसर तक को बचा नहीं पाए, आम आदमी की सुरक्षा तो भगवान भरोसे ही रहेगी। कश्मीरी  में लंबे समय से भारी तादाद में सुरक्षा बलों की तैनाती की गई है। इसके बावजूद आतंक और हिंसा का ताडंव बदस्तूर जारी है और हालात दिन-ब-दिन बद से बदतर होते जा रहे है। आम लोगों की मौत, गोलीबारी, प्रदर्शन , बंद और पत्थरबाजी रोजमर्रा की बात हो गई है। एक तरफ सुरक्षा बल गोलियां बरसाते हैं तो दूसरी तरफ नौजवान पत्थरबाजी करते हैं। और इसमें आम आदमी बुरी तरह से पीस रहा है। स्कूल और कालेज साल में आधे समय से भी ज्यादा समय तक बंद रहते है। राज्य आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार पिछले  शैक्षणिक सत्र में स्कूलों में दसवीं और बाहरवीं कक्षाओं का बमुश्किल  पचास फीसदी सिलेबस पूरा हो पाया। पूरे साल घाटी में स्कूल चार माह तक ही भी पढाई नहीं करा पाए। आए  रोज  के  बंद के कारण हस्तशिल्प उधोग, पर्यटन पूरी तरह चौपट हो चुका है। आम आदमी को भुखमरी की नौबत आ चुकी है।  जुलाई में आतंकी बुरहान वानी के सुरक्षा बलों की मुठभेड में मारे जाने के बाद  कश्मीर  घाटी आधी साल तक भीषण  हिंसा में सुलगती रही। इस दौरान न तो स्कूल-कालेज खुल पाए और न ही आईआईटी, एनआईटी जैसे उच्च षैक्षणिक संस्थान। इस दौरान 90 से अधिक लोग मारे गए और 15, 000 जख्मी हो गए। सुरक्षा बलों के  4000 जवान भी घायल हुए थे । 53 दिन तक कश्मीर  घाटी में कर्फ्यू लगा रहा। इसके बावजूद भी हालात सामान्य तो क्या, लेशमात्र भी सुधर नहीं पाए हैं। केन्द्र और राज्य सरकार दोनों ही  कश्मीर  की समस्या का कोई फौरी हल तक नहीं ढूंढ पाई है। यहीं नहीं केन्द्र और राज्य सरकार कश्मीर  की जमीनी सच्चाई से भी आंख मूंद रही है। सच यह है कि भारत को मुस्लिम बाहुल आबादी वाले राज्य को  राष्ट्रीय   मुख्यधारा में जोडे रखने के लिए देश  को बहुत बडी कीमत चुकानी पड रही है। कश्मीर  घाटी के लोग अलगाववादी और आतंकियों को भले ही समर्थन न करें मगर वे अपने बच्चों को आतंक और हिंसा की आग मे जलता नही देख सकते। और कश्मीर  की सबसे बडी त्रासदी यही है कि आतंकियों और सुरक्षा बलों के बीच जारी संघर्ष   की चपेट में स्कूली बच्चे, छात्र और नौजवान भी आ रहे हैं। इससे युवाओं का भडकना स्वभाविक है। कश्मीर  में लंबे समय से सेना तैनात है। कश्मीर  की अवाम को यह बात जरा भी पसंद नहीं है। सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी की बढती घटनाएं यही  दर्शाती  है। लंबे समय तक आंतरिक मामलों में सेना की तैनाती के गंभीर परिणाम हो सकते है। युवा अफसर उमर फैयाज की हत्या से  सरकार को अब तो संभल जाना चाहिए।

गुरुवार, 11 मई 2017

गडबडी में “गडबडी“

राजधानी दिल्ली में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन  (ईएमवी) में छेडछाड प्रमाणित काने के लिए विधानसभा का सहारा लिया है। मंगलवार को सदन की बैठक जीएसटी (गुडस एंड सर्विसिस टैक्स) बिल को अनुमोदित करने के लिए बुलाई गई थी मगर केजरीवाल  एंड पार्टी ने सदन में   ईएमवी में छेडछाड का लाइव डेमो  पेश  कर देश  के निर्वाचन आयोग और चुनाव प्रकिया में तैनात लाखों कर्मचारियों की निष्पक्षता  और  विश्सनीयता  को खुली चुनौती दी है। आप के सोफ्टवेयर इंजीनियर विधायक सौरभ भारद्धाज ने विधानसभा में  नकली इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग  मशीन  लाकर यह प्रमाणित करने की कोशिश  की कि इसके साथ आसानी से छेडछाड की जा सकती है।  सौरभ भारद्धाज ने यह दावा भी किया है कि अगर उन्हें निर्वाचन आयोग असली ईवीएम दे दें तो वे नब्बे सेकेंड (यानी डेढ मिनट) में इसका मदर बोर्ड बदलकर परिणाम हैक करके दिखा सकते हैं। कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए “आप“ ने विधानसभा के भीतर डेमो दिया। बाहर देते तो लपेटे जाते। सदन में लॉमेकर्स कुछ भी कर सकते हैं। किसी की भी छीछालेदारी कर सकते हैं। संवैधानिक बॉडी की  विश्वसनीयता  को भी तार-तार कर सकते है, जैसा कि मंगलवार को विधानसभा में किया गया। सब कुछ पहले से तय था। ईवीएम से छेडछाड का मुद्दा उछाल कर  केजरीवाल ने पार्टी के बर्खास्त मंत्री कपिल मिश्रा द्वारा लगाए गए घूसखोरी के गंभीर आरोपों से देश  का ध्यान बंटाने की कोशिश  की है। अरविंद केजरीवाल ने मंगलवार सुबह ही टवीट कर दिया था “ देश  में चल रहे एक बडे षडयंत्र का सच आज सदन में सौरभ  भारद्धाज देश  के सामने रखेंगे। उन्हें जरुर सुनिएगा। सत्यमेव जयते“। आम आदमी पार्टी की सदन में भी केजरीवाल ने मिश्रा के आरोपों का कोई जवाब नहीं दिया। अगर तोडा बहुत बोले तो सिर्फ ईएवीएम से छेडछाड पर बोले। मौजूदा परिवेश  में यह अप्रासंगिक था।  मगर जनता बहुत सयानी है। वह सब जानती है। टवीटर पर भी इस डेमो की खिल्ली उडाई जा रह है। एक काबिलेगौर  प्रतिक्रिया है “सौरभ  भारद्धाज  ने साबित कर दिया है कि पार्टी ने दिल्ली में 70 मेंसे 67 सीटें कैसे जीतीं“। वैसे आप की इस बात पर  विश्वास  नहीं किया जा सकता कि जिस पार्टी को दो साल पहले इन्हीं मशीनों के दम पर प्रचंड जनादेश  मिला हो, वही पार्टी अब उस सिस्टम में खोट निकाल रही है। इस समय पूरा देश  उस  शख्स से दो करोड रु की कथित घूसखोरी का सच जानना चाहती है, जो खुद तीन साल पहले  शीर्ष  उधोगपतियों और राजनेताओं पर संगीन आरोप लगाकर उनसे तत्काल जवाब मांगा करता था। और अब वही  शख्स अपने ऊपर लगाए गए गंभीर आरोपों पर बगले झांक रहा है। आरोप लगाने वाला कोई विपक्षी दल का नेता या राजनीतिक विरोधी नहीं है, बल्कि उनकी पार्टी का  वरिष्ठ  नेता है। माना, कपिल मिश्रा मंत्री पद से हटाए जाने से क्षुब्ध होकर बदले की भावना से काम कर रहे हैं और विरोधी दल उन्हें उकसा रहे हैं मगर देश  को आरोपों का जवाब मिलना चाहिए। बहरहाल, सौरभ भारद्धाज के डेमो को भी सहज में दरकिनार नहीं किया जा सकता है । निर्वाचन आयोग भी इस बात को जानता है और इसी सिलसिले में 12 मई को सर्वदलीय बैठक बुलाई गई है और आम आदमौ पार्टी को इसमें  विशेष  तौर पर आमंत्रित किया गया है। बैठक में आम आदमी पार्टी को मशीनों में गडबडी साबित करने का मौका दिया जा सकता है। निर्वाचन आयोग ने साफ-साफ कहा है कि चुनाव में इस्तेमाल की जा रही मशीनों से किसी भी सूरत में छेडछाड नहीं की जा सकती। इस मामले में दूध का दूध और पानी का पानी होना चाहिए। आप के डेमो ने देश  की  निष्पक्ष  चुनाव प्रकिया की  विश्वसनीयता  और लोकतंत्र की प्रासंगिकता  पर सवाल उठाया है। इसका हर हाल में माकूल जवाब मिलना चाहिए।

बुधवार, 10 मई 2017

चारे की राजनीतिक जुगाली

चारा घोटाले का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर निकल आया है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने चारा घोटाले पर हाई कोर्ट के इस फैसले को पलट दिया है कि एक अपराध के लिए बार-बार मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। चाईबासा मामले में झारखंड के हाई कोर्ट से पांच साल की सजा पाने के बाद बिहार के पूर्व  मुख्य मंत्री एवं राश्ट्रीय जनता दल के मुखिया  लालू प्रसाद यादव अन्य मामलों में राहत पाकर चैन की सांस ले रहे थे मगर देश  की  शीर्ष  अदालत ने उन्हें तगडा झटका दिया है। हाई कोर्ट के फैसले को बदलते हुए  सुप्रीम कोर्ट ने लालू प्रसाद यादव और अन्य आरोपियों पर अलग-अलग मामलों में मुकदमा चलाने के आदेश  दिए हैं। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को इस मामले में देर से अपील करने के लिए फटकार भी लगाई है। 1990 से 1997 के दरम्यान मुख्यमंत्री रहते हुए  बिहार में पशुओं के लिए चारा मुहैया कराने की आड में सरकारी ट्रेजरी से बार-बार भारी रकम निकाली गई थी और इसे डकार लिया गया था। रहस्समयी चारा घोटाले का जाल बेहद जटिल है और इसे तोडते-तोडते जांच एजेंसियों के भी पसीने छूट गए थे। लालू प्रसाद यादव के अलावा बिहार के पूर्व  मुख्यमंत्री जगननाथ मिश्र भी चारा घोटाले में आरोपी हैं। मामले की जांच कर रहे सीबीआई के तत्कालीन संयुक्त निदेशक यूएन विश्वास  की भी यही राय थी कि सरकारी ट्रैजरी से बार-बार पैसा निकालना अलग-अलग अपराध है और इसके लिए अलग-अलग आपराधिक मामले चलाए जाने चाहिए। बिहार में चारा घोटला  1973 से बदस्तूर चल रहा था। 1985 में बिहार वेटनरी एसोसिएशन ने पत्रकार सम्मेलन बुलाकर पहली बार “ चारा घोटाले“ चलाने वाले माफिया का सार्वजनिक भांडाफोड किया था। 1990 में माफिया ने  बिहार वेटनरी एसोसिएशन  पर ही कब्जा कर लिया। इससे क्षुब्ध एसोसिएशन के पूर्व पदाधिकारियों ने घोटाले से जुडे दस्तावेज जुटाकर भाजपा नेता सुशील  कुमार मोदी समेत राज्य के  टॉप   नेताओं क सामने  प्रस्तुत किए। इस दौरान मामला मीडिया में उछला और बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव इसकी लपेटे में आ गए। अतंतः उन्हें इस्तीफा देना पडा। चारा घोटाले ने लालू प्रसाद के राजनीतिक कैरियर को खासा बाधित किया है। इसी के कारण उन्हें जेल जाना पडा। पांच साल की सजा भी हुई। इसी वजह उन्हें अपने सबसे बडे प्रतिस्पर्धक नीतिश  कुमार से समझौता करने पडा और विधानसभा चुनाव में महागठबंधन बनाना पडा। चारा घोटाले ने बिहार की राजनीति को भी खासा प्रभावित किया है। नीतिश  कुमार से गठबंधन टूट जाने के बाद  भाजपा राज्य में कमजोर हुई है और वह फिर से जनता दल (यू) को “चारा“ डाल रही है। महागठबंधन की सरकार बनने के बावजूद नीतिश  कुमार  लालू प्रसाद के बीच सब कुछ सामान्य नहीं है। नोटबंदी पर प्रधानमंत्री की प्रशंसा और पटना प्रकाशोत्सव समारोह के दौरान मंच पर स्थान नहीं मिलने से लालू प्रसाद  नीतिश  से क्षुब्ध हैं तो राजद के पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन द्वारा नीतिश  कुमार को “परिस्थितियों का मुख्यमंत्री“ बताए जाने से दोनों दलों के  रिश्ते  तल्ख हुए हैंे। भाजपा नीतिष कुमार और लालू प्रसाद के महागठबंधन को अवसरवादी, विवशता का  महागठबंधन बताकर इसे तोडने की हर संभव कोशिश  कर रही है। सच यह है कि सता में आने के लिए नीतिश  कुमार ने लालू प्रसाद से गठबंधन तो कर लिया है मगर वे आज तक इसको लेकर सहज नहीं हो पाए हैं। मन से वे अभी भी भाजपा के ज्यादा करीब हैं। और उन्हें राजद और भाजपा मेंसे एक को चुनने को कहा जाए, वे भगवा पार्टी को ही चुनेगे।   लालू प्रसाद न केवल सजायाफ्ता नेता है, अलबत्ता परिवारवाद को बढाने में सबसे आगे है। नीतिश  कुमार परिवारवाद के सख्त विरोधी है। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट  के ताजा फैसले से महागठबंधन पर फिलहाल कोई फर्क न पडे मगर देर-सबेर इसका टूटना तय माना जा रहा है। अवसरवादी राजनीति की  जुगाली ज्यादा देर तक नहीं चलती।

मंगलवार, 9 मई 2017

फिर अनाप-शाप

देश  में “ अलग राजनीति“ करने का दम भरने वाली आम आदमी पार्टी (आप) अपने अस्तित्व के मात्र पांच साल से भी कम समय में बिखराव के मुहाने पर खडी है। नेताओं की अति राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और वैचारिक मार्ग दर्शन  से वंचित “आप“ का बिखराव आश्चर्यजनक  नहीं है। पिछली सदी में अस्सी के दशक मेँ  भी इसी तरह का “ प्रयोग“ बुरी तरह से विफल रहा था और तब जनता पार्टी के नाम से बनाया गया कांग्रेस का विकल्प अढाई साल में  ही धराशायी हो गया था। तब भी नेताओं की सियासी महत्वाकांक्षाएं, वैचारिक मार्ग दर्शन  का अभाव और सत्ता लोलुपता जनसेवा पर भारी पडी थी । सत्ता लोलुप नेता लोकनायक जय प्रकाश  नारायण का मार्ग  दर्शन  और जनसेवा का सार्वजनिक संकल्प भी भूल गए थे। बिहार के दो दिग्गज नेता -नीतिश  कुमार और लालू प्रसाद यादव- जय प्रकाश  नारायण के नेतृत्व में  भ्रष्टाचार   के खिलाफ लडे गए जन  आंदोलन  की ही उपज है। विडबंना देखिए वही लालू प्रसाद यादव सत्ता के लिए उसी “  भ्रष्ट“ कांग्रेस के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर चल रहे है। चारा घोटाले में लालू सजायाफ्ता हैं और छह साल तक चुनाव नहीं लड सकते हैं। बिहार में परिवारवाद फैलाने में  लालू की कोई सानी नही है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट द्वारा चारा घोटाले में लालू प्रसाद यादव पर आपराधिक मामला चलाए जाने के फैसले के बाद लालू प्रसाद की  मुश्किलें   और बढ गई हैं। जनता पार्टी और तदुपरांत अस्सी के उतरार्ध में  विश्व  प्रताप सिंह के मोर्चे की सरकार की विफलता के बाद अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी से कुछ उम्मीदें जगी थी। सबसे बडी उम्मीद थीः सच्ची और ईमानदार राजनीति की मगर यह थोडे ही समय बाद लुप्त हो गई। जनमानस को केजरीवाल से सुशासन और ”अलग सियासत“ की उम्मीद थी मगर आप के विधायक भी औरों की ही तरह  निकले और सत्ता के लिए मर-मिटने में मशगूल हैं। मोदी लहर के बावजूद दिल्ली विधानसभा चुनाव में केजरीवाल की प्रचंड लहर ने भाजपा और कांग्रेस का जिस तरह से सफाया किया था, उससे जनमानस में देश  में मोदी को चुनौती देने वाला विकल्प की उम्मीद जगी थी। अब यह भी काफूर हो गई है। आम आदमी पार्टी के इन आरोपों में काफी वजन है कि सत्ताधारी भाजपा हर तरह के जायज-नाजायज और वाजिब-गैर वाजिब हथकंडे अपना कर “आप“ को खत्म करने पर आमादा है। इस बात से “आप“ के नेताओं को एकजुट होकर इसका विरोध करना चाहिए था मगर  ऐसा करने की बजाए आप नेता एक-दूसरे को बर्बाद करने पर आमादा है। सत्ता पाने के लिए राजनीतिक दलों को लंबे समय तक पापड बेलने पडते है। सडकों पर लडते-लडते पांव में छाले पड जाते हैं। लंबी राजनीतिक लडाइयां लडनी पडती हैं। अरविंद केजरीवाल इस मामले में भाग्यशाली रहे हैं। अन्ना हजारे के लोकपाल आंदोलन में  शरीक होकर अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी ने इसे राजनीतिक तौर पर खूब भुनाया। आंदोलन में  शरीक होने वाले नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हिलोरे मारने लग पडी। दिल्ली विधानसभा चुनाव से थोडे समय पहले पार्टी बना ली। कांग्रेस और भाजपा के कुशासन से त्रस्त दिल्ली की जनता की दुखती नब्ज पकड ली और पहले ही झटके में बहुमत तो नहीं मिला मगर जैसे-तैसे सता हथिया ली। किसी ने सोचा भी नहीं था, आप ऐसा करिश्मा  कर पाएगा। भारत तो  करिश्माई   देश  है। यहां लोकतांत्रिक करिश्मे  भी होते रहते है। कांग्रेस और भाजपा की रस्साकशी  में फंसी आप सरकार की सरकार पचास दिन में चलती बनी। जनता से ताजा जनादेश  मांगा और इस बार जनता ने दिल खोलकर जनादेश  दिया। जितना प्रचंड जनादेश , उतनी ही बडी जनाकांक्षाएं। केजरीवाल एंड पार्टी इस कसौटी पर जरा भी खरा उतर नहीं पाए है। और अब “आप“ “बदले की गंदी राजनीति“ से पीडित है। बर्खास्त मंत्री कपिल मिश्रा के आरोप इसी गंदी रिवायत का हिस्सा है। बगैर प्रमाण के आरोप लगाना भारतीय सियासत का संस्कार बन गया है। इससे कोई नहीं बच सकता ।   

अन-कलीन मानदंड

केन्द्र सरकार द्वारा वीरवार को जारी स्वच्छता सर्वेक्षण रिपोर्ट की प्रामणिकता पर सवाल खडे किए जा रहे हैं। भारत सरकार के शहरी विकास मंत्रालय ने जनवरी-फरवरी 2017 में देश  के 434 शहरों में करवाए गए स्वच्छता सर्वेक्षण में जो मानदंड अपनाए गए हैं, उन्हें न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। इस सर्वेक्षण के अनुसार इस बार मध्य प्रदेश  का इंदौर शहर पहले और राज्य की राजधानी भोपाल दूसरे स्थान पर रहा है। हरियाणा के करनाल को देश  का स्वच्छतम मेडीकम सिटी और फरीदाबाद को “सबसे तेज मूवर“  बताया गया है। हरियाणा के लिए यह बडी उपलब्धि है। करनाल हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का पैतृक शहर है। पंजाब के लिए सर्वेक्षण बुरी खबर लेकर आया है। इसके 16 मेंसे 7  शहर सबसे गंदे शहरों की श्रेणी में  दर्शाए  गए हैं। पंजाब का “पवित्र“ शहर मुक्तसर और  अबोहर भी सबसे निचले स्थान पर है। जम्मू एवं कश्मीर  का लेह देश  के लघु शहरों में स्वच्छतम बताया गया है और हिमाचल प्रदेश  की राजधानी  शिमला सबसे स्वच्छ पहाडी शहर है। स्मार्ट  सिटीज की दौड में पिछडने के बाद  सही शिमला के लिए यह सुखद स्थिति है। देेश  का सबसे खूबसूरत शहर चंडीगढ इस बार 11वें स्थान पर है तो कर्नाटक का मैसूर  शहर  पांचवें स्थान पर । मैसूर पिछले दो सर्वेक्षणों में लगातार पहला स्थान हासिल करता रहा है। चंडीगढ पिछले सर्वेक्षण में दूसरे स्थान पर था। इन दोनों  शहरों का काफी नीचे  फिसलना यह  दर्शाता  है कि सर्वेक्षण के मानदंडो में कुछ तो गडबड है।  वैसे भी सरकारी मानदंडों को सौ फीसदी  विश्वनीय  नही माना जा सकता। स्वच्छता सर्वेक्षण की विधि (मैथडॉलॉजी) को सटीक नहीं माना जा सकता। सर्वे में साढे सात लाख लोग  शामिल हुए, 12000 स्थानों का सर्वे किया गया और 2600  शौचालय का निरीक्षण किया गया। मंत्रालय ने  जनता से छह  प्रश्न   भी किए थे। इनमें खुले में षौच, सोलिड बेस्ट मैनेजमेंट जैसे सवाल  शामिल थे।  इसके प्रत्युतर में 37 लाख लोगों ने अपने जवाब भेजे।  निर्धारित  मानदंडों पर स्वच्छता परखने के लिए कुल किलाकर 2000 अंक रखे गए थे। इन मेंसे 600 अंक जनता की फीडबैक के लिए थे। जाहिर है जिन  शहरों के लोगों ने ज्यादा फीडबैक भेजा, वे बाजी मार गए। चंडीगढ  इसीलिए पिछड गया क्योंकि इस  शहर के लोगों ने बहुत कम फीडबैक भेजा जबकि सोलिड बेस्ट मैनेजेमेंट में शहर को इंदौर और भोपाल से ज्यादा अंक मिले थे। ऑब्जरवेशन के आधार पर भी चंडीगढ,  इंदौर और भोपाल से कहीं आगे था मगर नागरिकों के फीडबैक में चंडीगढ, इंदौर और भोपाल से काफी पिछड गया। पिछले दो सर्वेक्षणों में पहले नंबर पर आने वाले मैसृर को भी इसी कारण पिछडना पडा। सर्वेक्षण के इन मानदंडों से साफ है कि अगर सोलिड वेस्ट मैनेजमेंट और डायरेक्ट ऑब्जरवेशन के दम पर चयन होता तो चंडीगढ इंदौर और भोपाल को पछाड कर पहले नंबर पर आता। इस बात के  दृश्टिगत , सरकार की रैकिंग को न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।  शहरों की स्वच्छता को परखने के लिए साफ-सफाई वाले मानदंड ही पर्याप्त होने चाहिए। लोगों के फीडबैक इसमें जोड्ने से छोटे षहरों से अन्याय हो सकता है। अमूमन, सर्क्षेक्षण में हर चयनित  शहर को हर लिहाज से बराबर होना चाहिए। देश  के 434 शहर आबादी और नागरिक फीडबैक के मामले में एक समान नहीं हो सकते। मुंबई, दिल्ली, चैन्नई, इंदौर  जैसे महानगरों की  चंडीगढ,  शिमला और करनाल से तुलना नहीं की जा सकती। ्बहरहाल, देश  को स्वच्छ और स्मार्ट बनाने के लिए मोदी सरकार के प्रयास सराहनीय है। मौजूदा परिवेश  में यही बहुत बडी बात है कि छोटे-बडे सभी शहर स्वच्छता अभियान में बढ-चढ कर भाग ले रहे हैं। देश  को “खुले में शौच  करने की गंदी आदत से निजात दिलाने में मोदी सरकार का बडा हाथ है। घर-घर, गली-गली स्वच्छता फैले, देश  का हर नागरिक सेहतमंद हो, हर बालक-बालिका को अच्छी  शिक्षा मिले और प्रत्येक वयोवृद्ध को सामाजिक सुरक्षा मिले, लोकप्रिय सरकार का यही एजेंडा होता है। मोदी सरकार इस मामल में अच्छा काम कर रही है।

शुक्रवार, 5 मई 2017

आधार पर बेआधार तर्क

भारतवासियों को इस महान देश  में रहते हुए  अगर अपने शरीर पर भी मुकम्म्मल अधिकार न हो तो यह बेहद चिंता की बात है। लोगों को इस बात पर गुस्सा आना अथवा चितिंत होना स्वभाविक है क्योंकि यह उनकी निजता (प्राईवेसी) और नागरिक अधिकारों से जुडा मामला है । और अगर इस तरह की बात भारत सरकार के अटार्नी जरनल सुप्रीम कोर्ट में कहें तो मामला और भी ज्यादा गंभीर बन जाता है। बुधवार को  अटार्नी जरनल मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट  में आाधार को अनिवार्य बनाए जाने की सरकार की पहल पर  जिरह करते हुए कहा कि देश  में किसी भी व्यक्ति को  अपने शरीर पर मुकम्मल अधिकार नहीं है। सरकार आपको अपने किसी अंग को बेचने से रोक सकती है। यानी सरकार आपके शरीर पर नियंत्रण करने की कोशिश  कर सकती है। देश  के अटार्नी जरनल की इस बात को हल्के में नहीं लिया जा सकता।  बायोमेट्रिक डाटाबेस के लिए एकत्रित की जा रही जानकारी को लेकर कुछ लोग इन्हीं मुददों पर बेहद चिंतित है। आधार को पैन के लिए अनिवार्य किए जाने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में जिरह के दौरान एक वकील का कहना था कि “मेरी अंगुलियों और आंखों की पुतलियों पर किसी और का कोई अधिकार नहीं हो सकता है। सरकार इन्हें मुझसे अलग नहीं कर सकती “। आधार कार्ड  बनाते समय आवेदक की आंखों की पुतलियों और अंगुलियों के प्रिंट लिए जाते हैं। वकील के इसी कथन पर ही अटार्नी जरनल मुकुल रोहतगी ने सरकार का यह पक्ष पेश  किया था। देश  में इस समय आधार को लेकर जबरदस्त बहस छिडी हुई है। मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। सरकार ने हाल ही में आधार कार्ड को पैन (परमानेंट अकाउंट नंबर) से जोडा है। आलोचक कह रहे हैं कि पैन कार्ड  का आधार कार्ड  से जोडना गलत है क्योंकि आधार अनिवार्य  नहीं है मगर पैन कार्ड  टैक्स रिटर्न करने के लिए अनिवार्य  है। आधार के मूल एक्ट (यूनिक आईडेंटिफिकेशन  ऑथारिटी ऑफ इंडिया -यूआईडीएआई) के तहत भी  स्पष्ट कहा  गया है कि  आधार कार्ड  स्वैच्छिक होगा, अनिवार्य  नहीं। भारत के सिवा दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक मुल्क में आधार जैसी कोई सिस्टम लागू नहीं किया गया है। अमेरिका, इंग्लैंड़  और यूरोप के किसी भी देश  में आधार जैसा कोई सिस्टम नहीं है जबकि अमेरिका और यूरोप बहु-नस्लीय (मल्टी-रेसियल) देश  हैं। भारत का बायोमेट्रिक डाटाबेस दुनिया का सबसे बडा डेटा संग्रह है। अभी तक भारत सरकार एक अरब (सौ करोड) से ज्यादा नागरिकों की  आंखों की पुतलियों और अंगुलियों के निशान आधार कार्ड  के लिए जुटा चुकी है। सवा करोड आबादी वाले जिस देश  में मात्र साढे छह करोड लोगों के पास पासपोर्ट  और 20 करोड के पास ही ड्राइविंग लाइसेंस हों, वहां आधार कार्ड लोगों की पहचान का पुख्ता साधन बन सकता है। इससे लोगों को काफी सुविधाएं स्वतः मिल सकती हैं। इस बाते के  मद्देनजऱ   आधार को लेकर व्यक्त की जा रही आषंकाएं निर्मूल नहीं हैं। भारत का भ्रष्ट  तंत्र और लोगों में रातोंरात पैसा कमाने की तेज भूख के चलते  इतने विशाल  डेटाबेस को देखकर किसी के भी मुंह में पानी आ सकता है। इस बायोमेट्रिक डाटाबेस संग्रह के दुरुपयोग की पूरी संभावना है। इस स्थिति में यह डाटाबेस नागरिकों की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों पर प्रहार कर सकता है। दुनिया की गोपनीय से गोपनीय जानकारी को भी हैक करके उसका दुरुपयोग किया जा रहा है। इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि बायोमेट्रिक डाटाबेस संग्रह को हैक नहीं किया जा सकता। समकालीन व्यवस्था  की  विश्वसनीयता  पर कई बार  प्रश्नचिन्ह  लगता रहा है। वैसे भी इंटरनेट के आने के बाद दुनिया में कोई भी जानकारी गोपनीय नहीं रह गई है। आधार कार्ड पैन के लिए अनिवार्य होना चाहिए या नहीं, इसका फैसला देश  की  शीर्ष   अदालत करेगी। फिलहाल, सरकार को आम आदमी की आशंकाएं दूर करनी चाहिए।

गुरुवार, 4 मई 2017

ट्रंप का देसी विजन

इंटरनेट, विज्ञान एवं उन्नत प्रौद्योगिकी ने भले ही पूरी दुनिया को ग्लोबल विलेज बना दिया हो मगर “ खालिस  देसी जज्बा“ आज भी दुनिया में सर चढ कर बोल रहा है। भारत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के “मेक इन इंडिया“ का जोर है तो अमेरिका में  राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप का “बी अमेरिका, हायर अमेरिकन“ के विजन का दबदबा है। ट्रंप ने  राष्ट्रपति  चुनाव भी इसी वायदे पर जीता था। और अपने वायदे को अमली जामा देने के लिए  उन्होंने  सबसे पहले अमेरिकन और विदेशी  कंपनियों के लिए “ बी अमेरिकन, हायर अमेरिकन” को अनिवार्य किया। ट्रंप की इसी नीति का परिणाम है कि भारत की अग्रणी आईटी कंपनी इंफोसिस ने मंगलवार को ऐलान किया कि वह अपने अमेरिकन कारोबार के लिए अगले दो साल 10,000 अमेरिकन को हायर करेगी। इंफोसिस दुनिया की अग्रणी आउटसोर्सिंग कंपनियों मेंसे एक है और इसके बाद भारत की अन्य  आउटसोर्सिंग कारोबारी भी यही नीति अपनाने के लिए बाध्य हों सकती हैं । भारतीय आउटसोर्सिंस कंपनियों का 60 फीसदी से ज्यादा का राजस्व अमेरिका से अर्जित किया जाता है। अमेरिका में  इंफोसिस के प्रतिष्ठित  आईबीएम, टैक-30 और लॉकहीड मार्टीन जैसे क्लाइंट है। जाहिर है  ट्रंप की नीतियों के कारण ही विदेशी  कंपनियों को अमेरिकन को हायर करना पडा रहा है हालांकि अब तक अमेरिका के उद्यमी, उधोगपति, कारोबारी और व्यवसायी स्वदेशी -बाहरी जेसे दकियानूसी सोच को दरकिनार कर केवल प्रतिभा को ही तरजीह दिया करते थे। अमेरिका ने इंफोसिस के इस पहल का स्वागत करते हुए इसे  राष्ट्रपति  ट्रंप की जीत करार दिया है। इंफोसिस के विदेशों  में लगभग 24,000 कर्मचारी है और इन मेंसे 15,000 अमेरिका में एच-1 बी वीजा पर काम कर रहे हैं। जनवरी में  राष्ट्रपति पदभार संभालते ही  ट्रंप ने पहली अप्रैल सेे एच-1बी के तहत प्रीमियम प्रोसिंसग आवेदन लेने बंद कर दिए । इसके तहत अमेरिकन कंपनियां किसी भी विदेशी को 1225 डॉलर की फीस चुका कर 15 दिन में अपने यहां बुला सकती है। अन्यथा रुटीन प्रकिया में कम-से-कम छह माह और इससे ज्यादा का समय लग जाता है। मगर ट्रंप प्रशासन ने इस सुविधा को बंद कर दिया है। इस साल लगभग 85,000 विदेशियों को इसी सुविधा के तहत अमेरिका लाया जाना था। ताजा स्थिति में यह मुमकिन नहीं है। कोई भी कंपनी इतने लंबे समय तक प्रतीक्षा नहीं कर सकती और इस स्थिति में उसके पास स्थानीय को रोजगार देने के सिवा कोई चारा नहीं रह जाता है। यही ट्रंप भी चाहते हैं। ट्रंप अमेरिकी कंपनियों पर एच-1बी सुविधा का दुरुपयोग करने का आरोप लगाते रहे हैं। उनका कहना है कि अमेरिकन कंपनियां  गैर-अमेरिकी विदेशियों  को इसलिए हायर करती है क्योंकि वे सस्ते में मिल जाते हैं। इससे स्थानीय लोगों से अन्याय हो रहा था। और अब अमेरिका की देखा-देखी आस्ट्रेलिया ने भी अपने वीजा कानून कडे कर दिए हैं और हाल ही में 200 के करीब व्यवसाय तुरंत प्रभाव से स्कील्ड लिस्ट से निकाल दिए  हैं । आस्ट्रेलिया के इस कदम से विदेशियों, खासकर भारतीयों को अब वहां जाना मुश्किल  हो जाएगा। हाल ही के कुछ सालों में आस्ट्रेलिया भारतीयों का पसंदीदा देश  बन चुका था। इग्लैंड ने हालांकि अभी वीजा नियम ज्यादा कडे नहीं किए हैं मगर यूरोपियन यूनियन से बाहर आने पर अलग-थलग पडी ब्रितानवी सरकार फिलहाल  प्रतिभा को रोककर अपना नुकसान नहीं करना चाहेगी। बहरहाल, ट्रंप की “बी अमेरिकन, हायर अमेरिकन“ की नीति से  प्रतिभा से कहीं ज्यादा नुकसान अमेरिकी अर्थव्यवस्था को होने जा रहा है। अर्थशास्त्रियों का ही आकलन है कि अमेरिका को विज्ञान और प्रौद्योगिकी, तकनीक, अर्थ और यापार में सर्वोच्च बनाने में प्रतिभा के सम्मान वाली नीति का बहुत बडा हाथ है। प्रतिभा किसी देश  तक सीमित होकर नहीं रह सकती, अब तक अमेरिका इस नीति को अपनाता रहा है। ट्रंप अगर अमेरिका को महान (ग्रेट) बनाने चाहते हैं तो उन्हें भी प्रतिभा की कद्र करनी होगी।  

बुधवार, 3 मई 2017

अमानवीयता की इंतहा

पाकिस्तानी  सेना द्वारा  भारतीय सैनिकों के शवों को क्षत-विक्षत किए जाने के कृत्य पर पूरे देश  में जबरदस्त गुस्सा है। यह तो अमानवीयता की इंतहा है और केवल जंगली जानवरों ही इस तरह का कृत्य करते हैं। पाकिस्तान के इस कृत्य ने सभ्यता के सारे मानदंड लांघ दिए हैं। पाकिस्तान सेना ने भारत की सीमा में 200 मीटर अंदर घुसकर यह कृत्य किया। यह भारत के लिए और भी  शर्मनाक बात है कि पाकिस्तानी सेना भारत की सीमा में घुसकर उसके जवानों को मारकर  शवों को क्षत-विक्षत कर जाए और सेना देखती रह जाए। क्या यह  पाकिस्तान की सर्जिक्ल स्ट्राइक जैसी कार्रवाई नही है?  पहली बार भारत ने पाकिस्तान की बार्डर एक्शन   फोर्स  का नाम लिया है। इससे साफ है कि भारत के खिलाफ  पाकिस्तान की यह सुनियोजित साजिश  थी। ताजा सूचना यह भी है कि सेना ने  आतंकी संगठन  लश्कर  के साथ यह कृत्य किया है। देश  को सबसे ज्यादा इसी बात का गुस्सा है। पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक जैसी कार्रवाई के लिए देश  भर में जगह-जगह प्रदर्शन  किए जा रहे हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले भी पाकिस्तान ऐसा अमानवीय कृत्य कर चुका है। 2013 में पाकिस्तान ने भारत के सैनिक लायंस नाइक हेम राज के  शव के साथ बर्बरता की थी और उसका सिर धड से अलग कर दिया था। पिछले साल नवंबर में पाकिस्तान ने भारत के तीन सैनिकों को मार डाला था और एक सैनिक के  शव को भी क्षत-विक्षत कर डाला था। कारगिल युद्ध के दौरान भी सैनिकों के शवों से भारी छेडछाड की गई थी। अंतरराष्ट्रीय  कानून के अनुसार  शवों से किसी भी तरह की छेडखानी नहीं की जा सकती। इस बारे में  स्पष्ट  दिशा -निर्देश  जारी किए गए हैं। जेनेवा कन्वेंशन  से लेकर ऑक्सफोर्ड मैनुअल तक में साफ-साफ कहा गया है कि सैनिकों के शवों  से किसी भी तरह की बदसलूकी नहीं की जा सकती है। सैनिकों के  शवों  के साथ किसी भी तरह की छेडखानी नहीं हो, इसके लिए काफी पहले 1907 में हेग कनवेन्शन  अपना लिया गया था। बाद में इसे जेनेवा  कनवेन्शन   में  शामिल  कर  लिया  गया। जेनेवा   कनवेन्शन में साफ हिदायत दी गई है कि सैनिक अथवा किसी भी मानव शव से छेडछाड नहीं की जा सकती। युद्ध के दौरान सैनिकों का मारा जाना स्वभाविक है और एक-दूसरे को पराजित करने के लिए हर तरह की रणनीति भी अपनाई जाती है मगर मानवीय मूल्यों को दरकिनार कर जानवरों जैसा सलूक करने की कतई अनुमति नहीं होती है। इस्लाम में भी  शवों से छेडछाड जैसे कृत्य को  नापाक माना गया है। बहरहाल, पाकिस्तान की सेना को न तो मानवीय मूल्यों से सरोकार है और न ही ध्रर्म-ईमान से। पाकिस्तान को इस तरह का कृत्य करके नाक कटने के अपमान की भी परवाह नहीं है।  पूरा देश  अब इस सवाल का जवाब चाहता है कि सरकार कब तक पाकिस्तान की अमानवीय कृत्यों को सहन करती रहेगी? 2013 में जब सैनिक हेमराज का शव  क्षत-विक्षत किया गया था, तब भी यही कहा गया था कि पाकिस्तान को इस कृत्य का माकूल जवाब दिय जाएगा और चार साल बाद  अब वही कहा जा रहा है। आखिर यह माकूल जवाब दिया कब जाएगा? जनमानस पाकिस्तान और भारत के बीच इस कृत्य को लेकर डीजीएमओ स्तर की वार्ता से  जनता को संतुष्ट  नहीं  किया जा सकता । पाकिस्तान सफेद झूठ बोल रहा है कि उसकी सेना ने ऐसा कोई कृत्य नहीं किया है। वह पहले भी यही कह चुका है। पाकिस्तान के ताजा कृत्य से डीजीएमओ तो क्या किसी भी स्तर की वार्ता के कोई औचित्य नहीं है। सैनिक भी यही चाहते हैं कि बार-बार बेमौत मरने की बजाए, देष के लिए एक बार शहादत पाना कहीं ज्यादा बेहतर है। भारतीय सेना को पाकिस्तान से निपटने के लिए खुली छूट मिलनी चाहिए। भाजपा जब विपक्ष में थी, तब इस बात को पुरजोर उठाया करती थी। मोदी सरकार को अब इसे पूरा करना चाहिए।

मंगलवार, 2 मई 2017

रेरा कितना प्रभावी

पहली मई से देश  में रीयल एस्टेट एक्ट ( रीयल एस्टेट रेगुलेशन एंड डवलपमेंट एक्ट-रेरा) के लागू होते ही “सपनों” का घर खरीदने वालों को  राहत मिलने की उम्मीद की जा सकती है। लिखा-पढी के बावजूद बिल्डरों की मनमानी पर अब तक कोई अंकुश  नहीं लग पाया है।  गृह निर्माण में अनावश्यक  बिलंब और तय समय पर घर का कब्जा नहीं देने की  शिकायतें आम हैं। कई बार बिल्डर पूरा पैसा लेकर भी तय समय पर घर को तैयार नहीं करते हैं। घर खरीदने वालों को इससे दोहरी मार पडती है। घर खरीदने के लिए उपभोक्ता बैंक से लोन लेता है और अगर उसे समय पर कब्जा नहीं मिले तो उसे दोहरा वित्तीय बोझ उठाना पडता है। बैक ऋण की  किश्त  भी देनी पडती है और साथ में किराए के घर में रहने के लिए रेंट भी देना पडता है। इसे दोहरे वित्तीय बोझ से अक्सर उपभोक्ता टूट जाता है। देश  की कानून प्रकिया बेहद खर्चीली, लंबी और “अंधी“ होती है और इसमें आम आदमी को तुरंत न्याय नहीं मिल पाता है। बिल्डर इसी स्थिति का फायदा उठाते हैं। रीयल एस्टेट एक्ट  के लागू होने से पहली बार घर खरीदने वालों को कानूनी ताकत मिली है।  लेकिन अभी भी इस एक्ट की राह में कई अवरोधक है। रीयल एस्टेट एक्ट एक तरह से मॉडल एक्ट है और केन्द्र द्वारा पारित एक्ट को लागू करना है या न करना , इसका पूरा दारोमदार राज्यों पर है। इसकी सबसे प्रमुख वजह यह है कि भूमि (लैंड) राज्य के अधिकार क्षेत्र (स्टेट सब्जेक्ट) में है और इसको लेकर किसी भी कानून के लिए राज्य की स्वीकृति अथवा सहमति अनिवार्य है। अब तक केवल सात राज्य- उत्तर प्रदेश , ओडीशा , गुजरात, बिहार, आंध्र प्रदेश , महाराष्ट्र  और मध्य प्रदेश - ही इस एक्ट को अधिसूचित कर पाएं हैं। केन्द्र चंडीगढ समेत पांच केन्द्र  शासित और  राष्ट्रीय  राजधानी क्षेत्र दिल्ली के लिए एक्ट को अधिसूचित कर चुका है। इस स्थिति के  दृष्टिगत  जाहिर है जिन राज्यों (22) ने अभी तक इस एक्ट को अधिसूचित नहीं किया है, वहां के उपभोक्ताओं को इस कानून का कोई लाभ नहीं मिल पाएगा। इतना ही नहीं कुछ राज्यों ने बिल्डरों की मदद करने की गर्ज से इस एक्ट के कुछ प्रावधानों को ही नरम कर दिया है। इस तरह अगर रीयल स्टेट एक्ट को सम्रग रुप में लागू नहीं किया जाता है ,तो इसकी कोई उपयोगिता नहीं रह जाएगी। एक्ट के तहत घर के खरीदार, बिल्डर और एस्टेट एजेंट के लिए  स्पष्ट  नियम बनाए गए हैं। प्रत्येक बिल्डर और प्रापॅटी एजेंट को राज्य रेगुलेटरी ऑथारिटी के पास 30 जुलाई तक पंजीकरण करवाना अनिवार्य  है। बिल्डर को  खरीदार से ली गई रकम का 70 फीसदी एक अलग खाते में जमा कराना होगा और इस पैसे को केवल निर्माण के लिए ही इस्तेमाल किया जा सकेगा। एक्ट के तहत सबसे बडी राहत वाला प्रावधान यह है कि बिल्डर को प्रोजेक्ट में किसी भी तरह का बदलाव (यूनिट बढाने-घटाने) करने के लिए 70 फीसदी खरीदारों की सहमति जरुरी होगी। एक्ट के तहत  दोषी  बिल्डर को 3 साल की कैद और जुर्माना की सजा हो सकती है। घर खरीदने के बाद पांच साल में किसी भी तरह की स्ट्रक्चरल खामी को दुरुस्त करना भी कानूनन अनिवार्य है। एक्ट के लागू होने के बाद बिल्डर को कारपेट एरिया के हिसाब से ही खरीदार को बेच पाएंगें। बहरहाल, एक्ट की सीरत और नीयत निसंदेह नेक है मगर अभी तक यह  स्पष्ट  नहीं है कि जिन बिल्डरों ने पहले से ही लोगों को चूना लगा रखा है, उनका क्या होगा। एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। इसके अलावा अगर को बिल्डर बीच में ही प्रोजेक्ट को छोड देता है या भाग जाता है, पीडितों को कौन राहत देगा और उन्हें किस तरह से कंपन्सेट किया जाएगा? खरीदार की तुलना में बिल्डर ज्यादा ताकतवर होता है। कानून में खरीदार के हितों के लिए रेगुलेटरी कदम का न होना इस एक्ट को अप्रभावी (दंतहीन) बना सकता है।

सोमवार, 1 मई 2017

कश्मीर में बद-से-बदतर हालात

कश्मीर   की पर्वत श्रृंखलाओं पर से बर्फ पिघलते ही घाटी में हिंसा का तांडव  शुरु हो गया है। हालात बद-से-बदतर हो रहे हैं। वीरवार को कुपवाडा जिले में नियंत्रण रेखा के समीप भारतीय सैन्य कैंप पर फियादीन हमला केन्द्र सरकार के लिए गंभीर चिंता का सबब होना चाहिए। 1999 में सैनिकों पर हमले  शुरु होने के बाद  यह सैन्य ठिकाने पर फियादीन का पहला आत्मघाती हमला है। और सबसे ज्यादा चिंता वाली बात यह है कि पहली बार स्थानीय लोगों ने फियादीनों के शवों को पाने के लिए सैन्य कैंप का घेराव तक किया। इसके  अर्थ हैं कि कश्मीर  की अवाम भी अब चरमपंथियों के साथ हो ली है। कश्मीर  के अवाम का चरमपंथियों के संग लडाकू रोल में शरीक होना आगे चलकर सरकार और सुरक्षाकर्मियों को गंभीर चुनौती पेश  कर सकती है। वीरवार को फियादीन के शवों के लिए सैन्य कैंप का घेराव इस बात की ओर इशारा कर रहा है कि स्थानीय लोग फियादीनों की पहचान को छिपाना  और सैन्य  शिविर पर हमले की जांच को बाधित करना चाहते थे।  पाकिस्तान की संलिप्तता साबित करने के लिए सेना आतंकियों के डीएनए टेस्ट कराती रही है।  अब तक लोग-बाग सुरक्षाकर्मियों पर पत्थरबाजी करके अथवा सुरक्षाकर्मियों को बाधित करके आतंकियों को भगाने में मदद किया करते थे। यह सिलसिला लंबे समय से चल रहा था।  आतंकियों के  शवों को पाने के लिए  सैन्य कैंप का घेराव पहली बार किया गया। यह सुरक्षाकर्मियों के लिए नई मुसीबत खडी कर सकता है। पत्थरबाजी की बढती घटनाओं ने इस भ्रम को भी तोड डाला है कि नोटबंदी ने इन पर रोक लगा दी थी। मोदी सरकार अब तक इस मुगालते में थी कि नोटबंदी के कारण नवंबर के बाद से घाटी में पत्थरबाजी की घटनाएं लगभग बंद हो चुकी थीं जबकि असलियत यह है कि सर्दियों में बर्फबारी के कारण अक्सर पत्थरबाजी की घटनाएं कम हो जाया करती हैं। महिलाओं, खासकर छात्रों  की पत्थरबाजी में बढती भागीदार से सरकार का यह भ्रम भी टूट जाना चाहिए कि कश्मीर  की अवाम केवल पैसों के लालच में सुरक्षाकर्मियों पर पत्थर फेंकती है। कश्मीर  में 9 अप्रैल को श्रीनगर लोकसभाई सीट के लिए कराए गए उपचुनाव के बाद से भडकी हिंसा और तल्ख हो गई है। पत्थरबाजी की घटनाएं बढती जा रही हैं और अब महिलाएं भी भारी संख्या  में सुरक्षाकर्मियों पर पत्थर फेंकने में आगे आ रही हैं। यह स्थिति बेहद खतरनाक है। केन्द्र द्वारा 80,000 करोड़  रु का  विशेष आर्थिक पैकेज दिए जाने के बावजूद भी अगर अवाम राष्ट्रीय  मुख्यधारा से नहीं जुड पा रहा है, तो हालात अत्याधिक गंभीर है और मोदी सरकार को स्थिति पर काबू पाने के लिए अविलंब ठोस कदम उठाने की जरुरत है। सेना को भी फियादीन हमलों के प्रति अपनी सुरक्षा व्यवस्था और चाक-चौबंद करनी पडेगी। सुरक्षाकर्मियों पर लगातार आतंकी हमले हो रहे हैं। सर्जिकल स्ट्राइक के बावजूद आतंकी हमले जारी हैं। यह बात भी चिंता का विषय  है कि एक ओर हम पाकिस्तान को सबक सिखाने का दम भरते हैं मगर दुनिया की पांचवे सबसे बडी सैन्य हथियार खरीद करने वाली भारतीय सेना आतंकी हमलों से सैनिकों को सुरक्षित रखने के लिए नए सुरक्षा कवच तक खरीद नहीं पाई है। अगर अमेरिका और चीन की सेना के पास अत्याधुनिक सुरक्षा कवच हो सकते हैं, भारतीय सेना के पास क्यों नहीं? कष्मीर को लेकर मोदी सरकार की  अभी भी कोई कारगर नीति नहीं है। यह बात कई बार प्रमाणित हो चुकी है कि आार्थिक पैकेज देकर  कश्मीर की जनता को लुभाया नहीं जा सकता है। आजादी के बाद से आज तक केन्द्र  कश्मीर  को जितना कुछ दे चुकी है, उतना अन्य किसी भी राज्य को नहीं दिया गया है। जमीनी सच्चाई यह है कि कोई भी पैकेज आम आदमी तक पहुंचता ही नहीं है। अधिकतर मदद  बिचौलिए, भ्रष्ट  नौकरशाही और सियासी तंत्र हडप जाते हैं। इससे कश्मीर  की अवाम के घाव और गहरे होते रहे हैं। इन पर अब मरहम-पट्टी करने की जरुरत है।