Its yet an another case of 'intolerance". A woman cop is merely punished with transfer order as she dared to speak before a minister. Haryana health minister Anil Vij is known for his "intolerance". He has been in news for " terrorizing'" employees to fall in submission. Its good to be a revolutionary while in opposition but as a minister Vij is expected to show good conduct. He know represents the state, not just a constituency. Sadly, in contemporary India our ministers are more confined to their constituency people and supporters than encompassing the state This is the third case of 'harassment' of woman officer in state in present BJP govt tenure. Earlier, chief medical officer of Kurukshetra Dr. Vandna Bhatia was punished with transfer this year in January after she had a spat with Minister of State for Social Justice and Empowerment Krishan Bedi over the phone. Another IPS offcer Bharti Arora was also punished with transfer early this year. Fatehabad SP Sangeeta Kalia was transferred a day after she had an argument with BJP’s Haryana health minister Anil Vij in a meeting. Both had locked horns over the issue of illicit liquor smuggling in Ratia. Vij wanted to know from district police chief why and how the liquor smuggling was going unabated in the district. When SP replied the police cannot kill smugglers, the minister accused the police of being hand-in-glove with the smugglers. He lost his cool and asked the police officer to leave the meeting. And when woman cop refused, Vij himself left the meeting with his supporters in a huff. All these developments have been widely reported in media and haven't done any good to the saffron govt riding high on " Beti Bachao Beti Padhao (Save Daughter, Educate Her). The Khattar government’s image has taken a hit and the campaign is bound to suffer,” Interestingly, the 2010 batch IPS woman cop, Sangeeta Kalia hailing from Bhiwani has a humble background. Her father retired as a painter from the police in 2010. The same year, his daughter made him proud to join state police as n IPS officer. He hadn't imagined in his wildest dreams that his daughter would become the police chief of the district where he once served. Sangeeta Kalia is an inspiration to all budding girls of this skewed sex ration hit state. As a school-going girl, Sangeeta was smitten by actor Kavita Chaudhary, who played the role of an IPS officer in the popular TV serial Udaan in the 90s. Sangeeta aspired to be like her reel idol in real life and realized her dream. By any stretch of imagination, its an outstanding achievement. Her service record as district police chief shows that she was doing excellent work. Apart from nailing down criminals, she was imparting self-defense training to young girls every Saturday-Sunday. Its a pity that such an brilliant officer has become victim of political maneuvering. As a district police chief, she was, undoubtedly, expected to satisfy the minister heading the district grievances panel. As per the details as emerged in media, she tried her level best but then it seemed minister wanted to prove himself supreme. This is the common practice with Indian ruling class, often , characterized with a sense of 'arrogance' and superiority complex. Three decades back, we (journalists) were witnesses to the similar public humiliation of a a senior IFS officer at a Press Conference as he wanted to correct his minister on certain points. Annoyed over this, minister ordered him to "get out", the same rough and arrogant utterances, Vij had used for a woman cop. Its the bloated ego of our politicians that they expect pliable officers for total submission. This explains why, over the years, most of our strong institutions have been defiled. By punishing an upright cop, the BJP govt has only harmed itself. Such an "vindictive act" only harms the bureaucracy. Sangeeta Kalia's is another case of damaging the executive, the most important pillar of democracy.
रविवार, 29 नवंबर 2015
Sangeeta Kalia Trasnfer: Another Case of 'Intolerance"
Posted on 11:08 am by mnfaindia.blogspot.com/
शनिवार, 28 नवंबर 2015
Let Cricket Diplomacy Play Its Role
Posted on 9:46 am by mnfaindia.blogspot.com/
क्रिकेट डिप्लोमेसी
भारत और पकिस्तान के बीच दिसंबर में क्रिकेट श्रृंखला शुरु होने के साथ ही शुक्रवार को दो अच्छी खबरें मिलीं। विराट कोहली के नेतृत्व में टीम इंडिया ने पहली बार होम पिच पर टेस्ट सीरीज जीत ली। आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच डे-नाइट टेस्ट मैच आरंभ होना दूसरी महत्वपूर्ण घटना है। अब तक टेस्ट मैच दिन के समय ही होते रहे हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच पिछले लगभग चार साल में कोई क्रिकेट मैच नहीं हुआ है। 2012-13 में दोनों देशों ने आखिरी द्धिपक्षीय मैच खेला था। तब पाकिस्तान पांच साल बाद भारत के दौरे पर आया था। पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड कई दिनों से भारत में द्धिपक्षीय क्रिकेट श्रृंखला की पेशकश कर रहा था मगर कुछ कट्टरवादी धार्मिक संगठन के मुखर विरोध के कारण बीसीसीआई मामले को टाल रहा था। भारत और पाकिस्तान के बीच मौजूदा तनावपूर्ण संबंधों के दृष्टिगत पाकिस्तानी खिलाडियों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता व्यक्त की जा रही थी। पाकिस्तान में व्याप्त खराब हालात में तो इस मुल्क में भारत के साथ द्धिपक्षीय श्रृंखला की कल्पना तक नहीं की जा सकती। छह साल बाद जिंबाम्वे इस साल पाकिस्तान का दौरा करने वाली पाली टेस्ट टीम थी। 2009 में लाहौर में श्रीलंका टीम पर आतंकी हमले के बाद कोई भी क्रिकेट प्लेइंग मुल्क पाकिस्तान का दौरा करने के लिए तैयार नहीं है। तब श्रीलंका टीम पर आतंकी हमले में आठ लोगों मारे गए थे और श्रीलंका के खिलाडी भी जख्मी हो गए थे। इस घटना ने क्रिकेट जगत को स्तब्ध कर दिया था। घरेलू खराब हालात के कारण पाकिस्तान को भी मुल्क से बाहर क्रिकेट खेलना पड रहा है। इस समय वह इंग्लैंड के साथ दुबई में द्धिपक्षीय श्रृंखला खेल रहा है। इन हालात में भारत और पाकिस्तान के बीच द्धिपक्षीय क्रिकेट श्रृंखला के लिए तटस्थ देश की तलाश थी। बहरहाल, टी-20 और एक दिवसीय मैचों के लिए श्रीलंका और टेस्ट सीरीज के लिए इग्लैंड को चुना गया है। वीरवार को 26/11 की बरसी पर बीसीसीआई ने द्धिपक्षीय श्रृंखला का ऐलान किया। 26/11 नरसंहार के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच द्धिपक्षीय संबंध बिगड गए थे और तब से बिगडते ही जा रहे हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच द्धिपक्षीय संबंध बिगडने से इसका सीधा असर क्रिकेट पर पडता रहा है। 1971में भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध के बाद सात साल तक दोनों देशों ने क्रिकेट नहीं खेला। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पांच साल तक, 1999 कारगिल युद्ध के बाद चार साल तक और फिर 2008 में मुंबई आतंकी हमले के बाद चार साल तक भारत और पाकिस्तान ने कोई द्विपक्षीय सीरीज नहीं खेली। तथापि बार-बार बाधित होने के बावजूद दोनों देशों में द्धिपक्षीय क्रिकेट सीरीज की जबरदस्त लोकप्रियता है। फैंस इसे एक तरह से “ क्रिकेट वार“ मानते हैं। इसीलिए दोनों देश द्धिपक्षीय क्रिकेट श्रृखला को शुरू करने पर जोर देते रहे हैं। श्रीलंका और इंग्लैंड में प्रस्तावित द्धिपक्षीय क्रिकेट सीरीज दोनों देशों के संबंधों को भी पटरी पर ला सकती है। कम-से-कम एक शुरुआत तो हुई है। अगले साल 2016 में 11मार्च से 3 अप्रैल तक भारत टवेंटी-20 वर्ल्ड टूर्नामेंट की मेजबानी कर रहा है। पाकिस्तान ने भारत को धमकी दी थी कि अगर वह उसके साथ द्धिपक्षीय क्रिकेट नहीं खेलता है तो पाकिस्तान इस टूर्नामेंट का बहिष्कार कर सकता है। इससे भारत की जगहंसाई होती। इस धमकी के दृष्टिगत भी भारत को पाकिस्तान के साथ द्धिपक्षीय क्रिकेट खेलना पड रहा है। क्रिकेट को भद्र पुरूषों का खेल माना जाता है और भद्र लोग कूटनीति में माहिर होते हैं। टवेंटी-20 वर्ल्ड टूर्नामेंट के माध्यम से भारत और पाकिस्तान के बीच संवाद शुरु होने की उम्मीद की जा सकती है। मेजबान भारत इस टूर्नामेंट में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को आंमत्रित कर सकता है। क्रिकेट डिप्लोमेसी से ही सही, भारत और पाकिस्तान के बीच संवाद स्थापित हो सकता है। इस्लामिक स्टेट के विश्व -व्यापी आतंकी खतरे के दृष्टिगत भारत का पाकिस्तान को इंगेज रखना उसके हित में है।
शुक्रवार, 27 नवंबर 2015
Sink Political Differences And Let Parliament Pass GST Bill
Posted on 9:16 am by mnfaindia.blogspot.com/
जीएसटी बिल को पारित होने दें
संसद के शीतकालीन सत्र में क्या विपक्ष सरकारी कामकाज के निपटान में मदद करेगी? असहिष्णुता को लेकर देश में सत्तारूढ और विपक्ष के बीच टकराव एवं अविष्वास के माहौल में यह बहुत बडा सवाल है। राज्यसभा में गुडस एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) बिल को पारित करवाना मोदी सरकार के समक्ष सबसे बडी चुनौती है। लोकसभा तो इस बिल को पारित कर चुकी है मगर राज्यसभा में स्पष्ट बहुमत नहीं होने की वजह से जीएसटी बिल अब तक पारित नहीं हो पाया है। जीएसटी संवैधानिक संशोधन बिल है, इसलिए इस बिल को पारित करवाने के लिए सरकार को राज्यसभा में भी दो-तिहाई बहुमत की जरूरत है। कांग्रेस के समर्थन बगैर जीएसटी बिल राज्यसभा में पारित नहीं हो सकता। और अगर यह बिल मौजूदा सत्र में परित नहीं होता है, अप्रैल, 2016 से इसे लागू करना संभव नहीं हो पाएगा। जीएसटी बिल के पारित होने से केन्द्र और राज्यों द्वारा लगाए जा रहे विभिन्न कर और शुल्क निरस्त होकर इनका जीएसटी में समावेश हो जाएगा। इससे देश में कॉमन मार्केट अस्तित्व में आ जाएगी। जीएसटी के अस्तित्व में आने से केन्द्र और राज्यों के राजस्व में खासा इजाफा होगा। अनुमान है कि जीएसटी के लागू होने से अन्तोगत्वा देश का सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) 2 फीसदी से भी ज्यादा बढ सकता है। कांग्रेस इस स्थिति से बखूबी परिचित है, इसलिए भाव दिखा रही है। भूमि अधिग्रहण बिल पर कांग्रेस से मुंह की खाने के बाद मोदी सरकार के लिए जीएसटी बिल पारित करवाना प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। देश में विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए उधोग फ्रेंडली भूमि अधिग्रहण व्यवस्था की आज भी दरकार है। 2013 में मनमोहन सिंह सरकार द्वारा संशोधित भूमि अधिग्रहण बिल के कारण बडे उधोग स्थापित करने के लिए भूमि का अधिग्रहण करना अथवा खरीदना लगभग असंभव हो गया है। मौजूदा कानून में प्रावधान है कि जब तक कम-से-कम अस्सी फीसदी किसान अथवा भूमि मालिक अधिग्रहण अथवा जमीन बेचने के लिए राजी नहीं हो जाते, तब तक भूमि खरीदी या अधिग्रहीत नहीं की जा सकती। मोदी सरकार इस कानून में कुछ बदलाव करके इसे उधोग फ्रेंडली बनाना चाहती थी मगर कांग्रेस समेत विपक्ष और भाजपा के सहयोगी दलों ने ऐसा नहीं होना दिया। भूमि अधिग्रहण पर तीन बार अध्यादेश जारी होने के बावजूद मोदी सरकार को अततः इसे वापस लेना पडा। भूमि अधिग्रहण बिल की ही तरह कांग्रेस जीएसटी बिल से भी अपनी “राजनीतिक रोटियां“ सेंकना चाहती हैं। इसलिए, पार्टी मोदी सरकार पर इस बिल को पारित करवाने में मदद के लिए मोल-तोल कर रही है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इस बिल पर पार्टी के समर्थन के लिए मोदी सरकार के समक्ष तीन शर्तें रखी हैं। पहली और सबसे महत्वपूृर्ण शर्त है कि मैन्युफेक्चर्र (उत्पादकों) पर एक फीसदी कर न लगाया जाए। जीएसटी बिल में अंतरराज्यीय (इंटर-स्टेट) गुडस और सर्विस पर एक फीसदी अतिरिक्त कर लगाने का प्रस्ताव है। देश का उधोग और व्यापार जगत इसका पहले ही मुखर विरोध कर रहा है। अब कांग्रेस उनकी पैरवी कर रही है। उधोग एवं व्यापार जगत का कहना है कि अगर जीएसटी में भी अतिरिक्त कर लगाना है, तो इस व्यवस्था का क्या मतलब? कांग्रेस जीएसटी रेट की अधिकतम सीमा 18 फीसदी की संवैधानिक व्यवस्था के पक्ष में है। पार्टी जीएसटी से संबंधित मामलों के निपटान के लिए स्वायत व्यवस्था की भी मांग कर रही है। कांग्रेस की तीनों मांगें पूरा करना मोदी सरकार के लिए मुश्किल नहीं है। ताजा संकेत यही है कि सरकार इन मांगों पर विचार कर सकती है। वैसे जीएसटी बिल पर कांग्रेस अलग-थलग पड चुकी है। अधिकतर विपक्षी दल बिल को मौजूदा सत्र में ही पारित होने देने के पक्ष में है। इस मामले में पहले ही बहुत देर हो चुकी है। अब और ज्यादा नहीं। जीएसटी बिल को पारित करवाना देश हित में है।
संसद के शीतकालीन सत्र में क्या विपक्ष सरकारी कामकाज के निपटान में मदद करेगी? असहिष्णुता को लेकर देश में सत्तारूढ और विपक्ष के बीच टकराव एवं अविष्वास के माहौल में यह बहुत बडा सवाल है। राज्यसभा में गुडस एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) बिल को पारित करवाना मोदी सरकार के समक्ष सबसे बडी चुनौती है। लोकसभा तो इस बिल को पारित कर चुकी है मगर राज्यसभा में स्पष्ट बहुमत नहीं होने की वजह से जीएसटी बिल अब तक पारित नहीं हो पाया है। जीएसटी संवैधानिक संशोधन बिल है, इसलिए इस बिल को पारित करवाने के लिए सरकार को राज्यसभा में भी दो-तिहाई बहुमत की जरूरत है। कांग्रेस के समर्थन बगैर जीएसटी बिल राज्यसभा में पारित नहीं हो सकता। और अगर यह बिल मौजूदा सत्र में परित नहीं होता है, अप्रैल, 2016 से इसे लागू करना संभव नहीं हो पाएगा। जीएसटी बिल के पारित होने से केन्द्र और राज्यों द्वारा लगाए जा रहे विभिन्न कर और शुल्क निरस्त होकर इनका जीएसटी में समावेश हो जाएगा। इससे देश में कॉमन मार्केट अस्तित्व में आ जाएगी। जीएसटी के अस्तित्व में आने से केन्द्र और राज्यों के राजस्व में खासा इजाफा होगा। अनुमान है कि जीएसटी के लागू होने से अन्तोगत्वा देश का सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) 2 फीसदी से भी ज्यादा बढ सकता है। कांग्रेस इस स्थिति से बखूबी परिचित है, इसलिए भाव दिखा रही है। भूमि अधिग्रहण बिल पर कांग्रेस से मुंह की खाने के बाद मोदी सरकार के लिए जीएसटी बिल पारित करवाना प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। देश में विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए उधोग फ्रेंडली भूमि अधिग्रहण व्यवस्था की आज भी दरकार है। 2013 में मनमोहन सिंह सरकार द्वारा संशोधित भूमि अधिग्रहण बिल के कारण बडे उधोग स्थापित करने के लिए भूमि का अधिग्रहण करना अथवा खरीदना लगभग असंभव हो गया है। मौजूदा कानून में प्रावधान है कि जब तक कम-से-कम अस्सी फीसदी किसान अथवा भूमि मालिक अधिग्रहण अथवा जमीन बेचने के लिए राजी नहीं हो जाते, तब तक भूमि खरीदी या अधिग्रहीत नहीं की जा सकती। मोदी सरकार इस कानून में कुछ बदलाव करके इसे उधोग फ्रेंडली बनाना चाहती थी मगर कांग्रेस समेत विपक्ष और भाजपा के सहयोगी दलों ने ऐसा नहीं होना दिया। भूमि अधिग्रहण पर तीन बार अध्यादेश जारी होने के बावजूद मोदी सरकार को अततः इसे वापस लेना पडा। भूमि अधिग्रहण बिल की ही तरह कांग्रेस जीएसटी बिल से भी अपनी “राजनीतिक रोटियां“ सेंकना चाहती हैं। इसलिए, पार्टी मोदी सरकार पर इस बिल को पारित करवाने में मदद के लिए मोल-तोल कर रही है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इस बिल पर पार्टी के समर्थन के लिए मोदी सरकार के समक्ष तीन शर्तें रखी हैं। पहली और सबसे महत्वपूृर्ण शर्त है कि मैन्युफेक्चर्र (उत्पादकों) पर एक फीसदी कर न लगाया जाए। जीएसटी बिल में अंतरराज्यीय (इंटर-स्टेट) गुडस और सर्विस पर एक फीसदी अतिरिक्त कर लगाने का प्रस्ताव है। देश का उधोग और व्यापार जगत इसका पहले ही मुखर विरोध कर रहा है। अब कांग्रेस उनकी पैरवी कर रही है। उधोग एवं व्यापार जगत का कहना है कि अगर जीएसटी में भी अतिरिक्त कर लगाना है, तो इस व्यवस्था का क्या मतलब? कांग्रेस जीएसटी रेट की अधिकतम सीमा 18 फीसदी की संवैधानिक व्यवस्था के पक्ष में है। पार्टी जीएसटी से संबंधित मामलों के निपटान के लिए स्वायत व्यवस्था की भी मांग कर रही है। कांग्रेस की तीनों मांगें पूरा करना मोदी सरकार के लिए मुश्किल नहीं है। ताजा संकेत यही है कि सरकार इन मांगों पर विचार कर सकती है। वैसे जीएसटी बिल पर कांग्रेस अलग-थलग पड चुकी है। अधिकतर विपक्षी दल बिल को मौजूदा सत्र में ही पारित होने देने के पक्ष में है। इस मामले में पहले ही बहुत देर हो चुकी है। अब और ज्यादा नहीं। जीएसटी बिल को पारित करवाना देश हित में है।
गुरुवार, 26 नवंबर 2015
Row Over Aamir Khan's Utterances : Isn't it Intolerance?
Posted on 9:03 am by mnfaindia.blogspot.com/
यह असहिष्णुता नहीं तो और क्या ?
बालीवुड अभिनेता “मिस्टर परफेक्शनिस्ट “ आमिर खान ने असहिष्णुता पर अपने विचार व्यक्त क्या किए, मानो जैसे मुसीबत मोल ले ली । भााजपाइयों ने उन पर दुश्मन की तरह हमले बोल दिए हैं। भगवा पार्टी के कुछ नेता तो आमिर को पाकिस्तान चले जाने को कह चुके हैं। पार्टी के प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने यहां तक कह दिया है कि आमिर खान "डर नहीं रहे, बल्कि डरा रहे हैं“। हिंदू सेना के कार्यकर्ताओं ने मंगलवार को उनके घर पर प्रदर्शन किया। इसे क्या कहा जाए? लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी अगर “अभिव्यक्ति की स्वत्रंत्रता न हो, तो यह किस काम की? आमिर खान ने सोमवार को दिल्ली के एक कार्यक्रम में सिर्फ इतना कहा कि देश में पिछले छह-सात महीने से डर का माहौल है और इससे भयभीत मेरी पत्नी किरण ने देश छोडकर जाने की बात भी कही थी। आमिर खान की पत्नी किरण हिंदू हैं और मुमकिन है भगवा पार्टी के लोगों को यही बात रास नहीं आ रही है। देश छोडने की बात किरण ने कही है, आमिर ने नहीं मगर भाजपा आमिर को ही निशाना बना रही है। माना आमिर ने मियां-बीवी की अंतरंग बातों को सार्वजनिक करके गलती की है मगर विचार व्यक्त करना कोई गुनाह नहीं है। आमिर खान मुस्लिम है, इसलिए भगवा पार्टी को उनके विचार नागवार गुजरे। आमिर खान को बालीवुड में सुघड और नपी-तुली बातें करने वाले अभिनेता माना जाता है। वे कम बोलते हैं और काम ज्यादा करते हैं। ऐसा कहने वाले आमिर खान पहले व्यक्ति नहीं है। असहिष्णुता को लेकर देश की कई नामी-गिरामी हस्तियां अपने मुक्त विचार व्यक्त कर चुकी है। यहां तक कि कई कलाकार, साहित्यकार-लेखक, इतिहासकार और बुद्धिजीवी विरोधस्वरुप अपने-अपने सम्मान तक लौटा चुके हैं। और यह पहला वाक्या भी नहीं है जब असहिष्णुता पर किसी ने कुछ कहा हो और भगवा पार्टी के लोग उसके पीछे हाथ धोकर न पडे हों। हर बार जब भी असहिष्णुता का मुखर विरोध किया जाता है, भगवा पार्टी इसे मोदी विरोध का ठप्पा लगा देते हैं। यानी मोदी राज में किसी ज्वलंत मुद्दे पर भी लोगों को अपने स्वतंत्र विचार व्यक्त करने का कोई अधिकार नहीं है। बकौल भगवा पार्टी ऐसा करने वाले या तो कांग्रेस के एजेंट हैं अथवा पाकिस्तान के मित्र। आजाद भारत में हर देशवासी को अपने विचार व्यक्त करने की छूट है और अपनी पसंद का खाना, पहनना और रहने की स्वंत्रतता। यह सब उनका संवैधानिक अधिकार है। संकीर्ण विचारधारा से ग्रस्त चंद लोग देशवासियों के मौलिक अधिकारों को छीन नहीं सकते। गोमांस सेवन के संदेहमात्र पर किसी की हत्या कर देना, रूढिवादी धार्मिक मान्यताओं और अंध-विश्वास के खिलाफ शाब्दिक अभिव्यक्ति के लिए लेखक की हत्या कर देना अथवा डराना-धमकाना, मुक्त विचार व्यक्त करने वालों को देशद्रोही बताना, इस तरह के माहौल को क्या माना जाए? यही असहिष्णुता का माहौल है और भगवा पार्टी के लोग इस तरह मे माहौल को बनाने में कोई कसर नहीं छौड रहे है। आमिर खान ने सत्य बोलकर कोई गुनाह नहीं किया है। सच्चाई हमेशा कडवी होती है। बुधवार को आमिर खान ने फिर दोहराया कि उन्होंने अपनी पत्नी के हवाले से सोमवार को जो कुछ भी कहा था, वह अक्षरश: सच है। उन्होंने यह भी कहा कि देश छोडकर जाने का कोई सवाल ही नहीं उठता। आमिर खान की इस बात में काफी वजन है कि उन पर हमला बोलने वाले यही प्रमाणित कर रहे हैं कि इस समय देश में असहिष्णुता का माहौल चरम पर है। आमिर खान को उनके फैन्स हीरो नंबर वन मानते हैं और वे वास्तव में हीरो हैं। भाजपाई उन्हें खलनायक साबित करने की लाख कोशिशें करे लें मगर हीरो हमेशा हीरो ही रहेगा। केवल हीरो ही असहिष्णुत के तल्ख माहौल में मुक्त विचार करने का मादा रख सकता है। आमिर खान अथवा असहिष्णुता के खिलाफ बोलने वाले का विरोध करके भाजपाई सिर्फ अपने “असहिष्णु" आचरण को उजागर कर रहे हैं। इससे पार्टी की लुटिया तो डुबोगी ही, प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी की छवि भी खराब हो सकती है। जनता सब देख रही है और समय आने पर माकूल जबाव भी देती है।
बुधवार, 25 नवंबर 2015
Dress Code in God House ? Isn't It An Insult To Almighty
Posted on 9:32 am by mnfaindia.blogspot.com/
मंदिर में ड्रेस कोड
काशी के नाम से विख्यात वाराणसी के विश्व विख्यात विश्व्नाथ मंदिर में ड्रेस कोड के क्या अभिप्राय निकाले जाएं? असहिष्णुता के मौजूदा माहौल में विश्व्नाथ मंदिर की इस कवायद से भारत को विदेशों में फिर धार्मिक असहिष्णुता का प्रतीक माना जा सकता है। सबसे बडी बात यह है कि सिर्फ महिलाओं के लिए ड्रेस कोड लागू किया गया है हालांकि मंदिर प्रशासन कह रहा है कि पुरूषों के लिए भी जल्द ही धोती-कुर्ता ड्रेस कोड लागू किया जाएगा। काशी का विश्व्नाथ मंदिर बारह ज्योतिर्लिगों मेंसे एक है और देश -विदेश से श्रद्धालुओं के अलावा पर्यटक भी मंदिर में दर्शनार्थ आते हैं। जाहिर है ड्रेस कोड लागू होने से मंदिर में महिलाओं, विशेषकर विदेशियों का आना रुक सकता है । विश्व्नाथ मंदिर में हर रोज लगभग 60,000 श्रद्धालू आते हैं। इनमें से करीब 5 फीसदी विदेशी पर्यटक होते हैं। विदेशी महिलाओं के तंग और छोटे परिधान (शॉर्ट ड्रेसिस) पर कुछ लोगों द्वारा ऐतराज जताए जाने पर मंदिर प्रषाासन ने यह कदम उठाया है। मंदिर प्रबंधन के अनुसार विदेशी महिलाओं के तडक-भडक वाले परिधान पर दक्षिण भारत से आने वाले श्रद्धालुओं को ऐतराज होता था। उनका मानना है कि तंग और शॉर्ट परिधान मंदिर की पवित्रता को प्रदूषित करते हैं। विश्व्नाथ मंदिर प्रशासन को महिलाओं के जीन्स अथवा शॉर्ट पहने पर ऐतराज है मगर पुरूषों को जीन्स अथवा पैंट पहनने की छूट है। स्पष्ट है ड्रेस कोड फिलहाल महिलाओं के लिए ही है। दक्षिण के कुछ मंदिरों ने श्रद्धालुओं के लिए ड्रेस कोड लागू कर रखा है मगर यह पुरूष और महिला दोनों के लिए है। दक्षिण में आंध्र प्रदेश के तिरुमला स्थित तिरुपति देवस्थली में भी 2013 से श्रदालुओं के लिए ड्रेस कोड लागू है। मंदिर में महिलाओं के लिए साडी अथवा चुन्नी के साथ चुडीधार परिधान निर्धारित किया गया है। कोई भी महिला जीन , शॉर्ट अथवा पश्चिम स्टाइल के वस्त्र पहनकर मंदिर नहीं आ सकती। पुरूषों के लिए लुंगी अथवा धोती-कुर्ता निर्धारित किया गया है। विदेशी पर्यटकों को भी यही ड्रेस पहनकर मंदिर में प्रवेश करने दिया जाता है। दक्षिण के कुछ और मंदिरों में भी इसी तरह का ड्रेस कोड लागू है। दक्षिण भारत में साडी और धोती-कुर्ता बहुत ज्यादा प्रचलित है। इस बात के दृष्टिगत मंदिरों में स्थानीय ड्रेस कोड का अपना महत्व है। काशी विश्वनाथ मंदिर प्रबंधन ने दक्षिण भारत के श्रद्धालुओं की भावनाओं का सम्मान रखने की खातिर महिलाओं के लिए ड्रेस कोड लागू किया है, यह बात सहज में गले नहीं उतरती है। फिर महिलाओं के लिए ही ड्रैस कोड क्यों? पुरूषों के लिए भी साथ-साथ ड्रेस कोड क्यों लागू नहीं किया गया? तडक-भडक वाले परिधान विदेशी महिलाएं ही नहीं पुरूष भी पहनते है। और भारत में तो नगा साधु नंगे घूमते हैं और कुंभ में बाकायदा अपनी शोभायात्रा निकालते हैं। कहीं, यह भगवा एजेंडे का हिस्सा तो नहीं है़? वाराणसी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का हलका है। यहां भगवा पार्टी का ज्यादा बोलबाला है। बहरहाल, सहिष्णुताऔर धार्मिक विविधता भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रही है। भगवान के घर में कैसा ड्रेस कोड और कैसी तडक-भडक। सच यह है कि धर्म के ठेकेदारों को आज भी महिलाओं की आजादी रास नहीं आ रही है। इसलिए महिलाओं को सम्मान देने की बजाय पुरुष प्रधान भारतीय समाज आज भी उन्हें सेक्स की ही नजर से देखता है। भला, यह भी कोई बात हुई कि भगवान के घर में महिलाओं की ताक-झांक की जाए और यह देखा जाए कि वे क्या पहन कर मंदिर आती हैं। पश्चिम में महिलाओं को पूरी आजादी है और शॉर्ट ड्रेस पहनना उनकी पहचान है। भारतीय युवा पीढी भी उदारख्याली है और उन पर धार्मिक बंदिशें नहीं चल सकती। काशी विश्व्नाथ मंदिर प्रशासन ने ड्रेस कोड निर्धारित कर फिर यही प्रमाणित किया है देवस्थल भी धार्मिक असहिष्णुता से पीडित हैं। असहिष्णुता भारतीय समाज और सस्कृति की “अनेकता (विविधता) में एकता“ की मूल भावना को नष्ट कर सकती है।
काशी के नाम से विख्यात वाराणसी के विश्व विख्यात विश्व्नाथ मंदिर में ड्रेस कोड के क्या अभिप्राय निकाले जाएं? असहिष्णुता के मौजूदा माहौल में विश्व्नाथ मंदिर की इस कवायद से भारत को विदेशों में फिर धार्मिक असहिष्णुता का प्रतीक माना जा सकता है। सबसे बडी बात यह है कि सिर्फ महिलाओं के लिए ड्रेस कोड लागू किया गया है हालांकि मंदिर प्रशासन कह रहा है कि पुरूषों के लिए भी जल्द ही धोती-कुर्ता ड्रेस कोड लागू किया जाएगा। काशी का विश्व्नाथ मंदिर बारह ज्योतिर्लिगों मेंसे एक है और देश -विदेश से श्रद्धालुओं के अलावा पर्यटक भी मंदिर में दर्शनार्थ आते हैं। जाहिर है ड्रेस कोड लागू होने से मंदिर में महिलाओं, विशेषकर विदेशियों का आना रुक सकता है । विश्व्नाथ मंदिर में हर रोज लगभग 60,000 श्रद्धालू आते हैं। इनमें से करीब 5 फीसदी विदेशी पर्यटक होते हैं। विदेशी महिलाओं के तंग और छोटे परिधान (शॉर्ट ड्रेसिस) पर कुछ लोगों द्वारा ऐतराज जताए जाने पर मंदिर प्रषाासन ने यह कदम उठाया है। मंदिर प्रबंधन के अनुसार विदेशी महिलाओं के तडक-भडक वाले परिधान पर दक्षिण भारत से आने वाले श्रद्धालुओं को ऐतराज होता था। उनका मानना है कि तंग और शॉर्ट परिधान मंदिर की पवित्रता को प्रदूषित करते हैं। विश्व्नाथ मंदिर प्रशासन को महिलाओं के जीन्स अथवा शॉर्ट पहने पर ऐतराज है मगर पुरूषों को जीन्स अथवा पैंट पहनने की छूट है। स्पष्ट है ड्रेस कोड फिलहाल महिलाओं के लिए ही है। दक्षिण के कुछ मंदिरों ने श्रद्धालुओं के लिए ड्रेस कोड लागू कर रखा है मगर यह पुरूष और महिला दोनों के लिए है। दक्षिण में आंध्र प्रदेश के तिरुमला स्थित तिरुपति देवस्थली में भी 2013 से श्रदालुओं के लिए ड्रेस कोड लागू है। मंदिर में महिलाओं के लिए साडी अथवा चुन्नी के साथ चुडीधार परिधान निर्धारित किया गया है। कोई भी महिला जीन , शॉर्ट अथवा पश्चिम स्टाइल के वस्त्र पहनकर मंदिर नहीं आ सकती। पुरूषों के लिए लुंगी अथवा धोती-कुर्ता निर्धारित किया गया है। विदेशी पर्यटकों को भी यही ड्रेस पहनकर मंदिर में प्रवेश करने दिया जाता है। दक्षिण के कुछ और मंदिरों में भी इसी तरह का ड्रेस कोड लागू है। दक्षिण भारत में साडी और धोती-कुर्ता बहुत ज्यादा प्रचलित है। इस बात के दृष्टिगत मंदिरों में स्थानीय ड्रेस कोड का अपना महत्व है। काशी विश्वनाथ मंदिर प्रबंधन ने दक्षिण भारत के श्रद्धालुओं की भावनाओं का सम्मान रखने की खातिर महिलाओं के लिए ड्रेस कोड लागू किया है, यह बात सहज में गले नहीं उतरती है। फिर महिलाओं के लिए ही ड्रैस कोड क्यों? पुरूषों के लिए भी साथ-साथ ड्रेस कोड क्यों लागू नहीं किया गया? तडक-भडक वाले परिधान विदेशी महिलाएं ही नहीं पुरूष भी पहनते है। और भारत में तो नगा साधु नंगे घूमते हैं और कुंभ में बाकायदा अपनी शोभायात्रा निकालते हैं। कहीं, यह भगवा एजेंडे का हिस्सा तो नहीं है़? वाराणसी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का हलका है। यहां भगवा पार्टी का ज्यादा बोलबाला है। बहरहाल, सहिष्णुताऔर धार्मिक विविधता भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रही है। भगवान के घर में कैसा ड्रेस कोड और कैसी तडक-भडक। सच यह है कि धर्म के ठेकेदारों को आज भी महिलाओं की आजादी रास नहीं आ रही है। इसलिए महिलाओं को सम्मान देने की बजाय पुरुष प्रधान भारतीय समाज आज भी उन्हें सेक्स की ही नजर से देखता है। भला, यह भी कोई बात हुई कि भगवान के घर में महिलाओं की ताक-झांक की जाए और यह देखा जाए कि वे क्या पहन कर मंदिर आती हैं। पश्चिम में महिलाओं को पूरी आजादी है और शॉर्ट ड्रेस पहनना उनकी पहचान है। भारतीय युवा पीढी भी उदारख्याली है और उन पर धार्मिक बंदिशें नहीं चल सकती। काशी विश्व्नाथ मंदिर प्रशासन ने ड्रेस कोड निर्धारित कर फिर यही प्रमाणित किया है देवस्थल भी धार्मिक असहिष्णुता से पीडित हैं। असहिष्णुता भारतीय समाज और सस्कृति की “अनेकता (विविधता) में एकता“ की मूल भावना को नष्ट कर सकती है।
मंगलवार, 24 नवंबर 2015
ASEAN: The New Economic Power
Posted on 12:40 pm by mnfaindia.blogspot.com/
आसियानः नई आथिक शक्ति
मलेशिया की राजधानी कुआला लुम्पर में यूरो जोन की तर्ज पर आसियान आर्थिक समूह (आसियान इकनोमिक कम्युनिटी) का गठन इस सम्मेलन की सबसे बडी उपलब्धि है। एशिया के दस देशों की 62.50 करोड आबादी वाले आसियान का सकल उत्पादन लगभग 2.6 खरब डॉलर के करीब है। यद्यपि चीन के 9.24 खरब डालर (2013) की तुलना में यह काफी कम लगता है मगर भारत के 1.87 खरब डालर से आसियान का सकल उत्पादन अधिक है जबकि आबादी भारत से आधी है। क्षेत्रफल के लिहाज से 44 लाख वर्ग किलोमीटर कें फैले आसियान देश चीन के 96 लाख वर्ग किलोमीटर से आधा भी नहीं है मगर भारत के 32.87 लाख वर्ग किलोमीटर से थोडा अधिक है। विएतनाम, मलेशिया, फिलिपींस, बरुनी, म्यांमार, इंडोनेशिया, सिंगापुर, लाओस, थाईलैंड और कंबोडिया आसियान के सदस्य हें। 1967 में मलेशिया, इंडोनेशिया, फिलिपींस, थाईलैंड और सिगांपुर ने इसकी नींव रखी थी। बाकी पांच देश बाद में शामिल हुए थे । आसियान इकनोमिक कम्युनिटी के गठन से यह दुनिया की सातवीं बडी आर्थिक शक्ति बन जाएगी। यही आसियान का मूल मकसद है। चीन की तुलना में आसियान देश बौने नजर आते हैं और वे मिलकर भी चीन का मुकाबला नहीं कर सकते। इसी बात के दृष्टिगत आसियान देशों को अमेरिका की मदद लेनी पडती है। अमेरिका इस स्थिति को अपने फायदे के लिए भुनाता है। चीन आबादी के लिहाज से दुनिया का पहला और क्षेत्रफल के लिहाज से तीसरा सबसे विशालतम देश है। चीन की बढती आर्थिक और भौगोलिक (टेरिटोरियल) महत्वाकांक्षाओं से विएतनाम और आसियान के अन्य सदस्य काफी चिंतित है। दक्षिण चाइना महासागर में चीन के ताजा दखल से आसियान के सदस्य विएतनाम, बरूनी, मलेशिया और फिलिपींस डरे हुए हैं। चीन पूरे महासागर को हथियाने की फिराक में है। बहरहाल, कहावत है “ अकेला चना भाड नही फोड सकता“। इसलिए आसियान मिलकर आगे बढना चाहते हैं। इस साल के अंत तक आसियान सदस्य देशों के लिए साझा मार्केट तैयार करने का लक्ष्य है। अब तक तमाम टैरिफ बाधाएं दूर की जा चुकी हैं और मुक्त व्यापार के लिए रास्ता साफ हो गया है। आसियान देशों के बीच अभी इंटरा- आसियान व्यापार बहुत ज्यादा नहीं था मगर ताजा स्थिति में इसमें खासा इजाफा होने की उम्मीद है। तथापि आसियान के समक्ष भी सार्क की तरह सबसे बडी चुनौती यह है कि बडी और छोटी अर्थव्यवस्थाओं के बीच के फासले को कैसे कम किया जाए? आसियान में इंडोनेशि या, मलेशिया, फिलिपींस, विएतनाम, थाईलैंड और सिगांपुर अपेक्षाकृत ज्यादा विकसित और समृद्ध हैं जबकि म्यांमार, लाओस, बरुनी और कंबोडिया कम समृद्ध। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लिहाज से इंडोनेशिया 915 अरब डालर के साथ सबसे ऊपर है मगर प्रति व्यक्ति आय (पर केपिटा इंकम) में 84, 821 डालर के साथ सिंगापुर सबसे आगे है। इंडोनेशिया की प्रति व्यक्ति आय 10, 758 डालर और विएतनाम की मात्र 5,983 डालर है। मलेशिया 25, 833 प्रति व्यक्ति आय के साथ इंडोनेशिया, विएतनाम, फिलिपींस और थाईलैंड से आगे है। नब्बे के दशक में विएतनाम, लाओस, म्यांमार और कंबोडिया को जब आसियान में शामिल किया गया, तब भी बडी और छोटी अर्थववस्थाओं के बीच ब्याप्त विशाल फासले को लेकर नए देशों को कई आशंकाएं थीं। उस समय भी पुराने और नए सदस्य के बीच प्रति व्यक्ति आय का बडा फासला था और आज भी वही फासला कायम है। इस स्थिति में अक्सर सवाल उठाया जाता है कि अगर आसियान देशों के बीच आर्थिक फासले को पाटा नहीं गया तो आर्थिक सहयोग का क्या फायदा? यही चुनौती आज भी खडी है। गरीब देशों को आशंका है कि आसियान के नए आर्थिक कम्युनिटी का फायदा बडी अर्थव्यवस्थाओं को ज्यादा हो सकता है। नए मंच से लेवल प्लेइंग फील्ड सुनिश्चित करना होगा। अगर गरीब सदस्य देशों को नए मंच से बराबर का फायदा नहीं मिलता है तो इसकी प्रासंगिकता ही ध्वस्त हो जाएगी। इसके अलावा राजनीतिक-सामाजिक विविधताएं भी मुक्त व्यापार को प्रभावित कर सकती है। इस तरह के मंच का तभी फायदा हो सकता है जब बडे-छोटे सबको बराबर आगे बढने का मौका मिले।
मलेशिया की राजधानी कुआला लुम्पर में यूरो जोन की तर्ज पर आसियान आर्थिक समूह (आसियान इकनोमिक कम्युनिटी) का गठन इस सम्मेलन की सबसे बडी उपलब्धि है। एशिया के दस देशों की 62.50 करोड आबादी वाले आसियान का सकल उत्पादन लगभग 2.6 खरब डॉलर के करीब है। यद्यपि चीन के 9.24 खरब डालर (2013) की तुलना में यह काफी कम लगता है मगर भारत के 1.87 खरब डालर से आसियान का सकल उत्पादन अधिक है जबकि आबादी भारत से आधी है। क्षेत्रफल के लिहाज से 44 लाख वर्ग किलोमीटर कें फैले आसियान देश चीन के 96 लाख वर्ग किलोमीटर से आधा भी नहीं है मगर भारत के 32.87 लाख वर्ग किलोमीटर से थोडा अधिक है। विएतनाम, मलेशिया, फिलिपींस, बरुनी, म्यांमार, इंडोनेशिया, सिंगापुर, लाओस, थाईलैंड और कंबोडिया आसियान के सदस्य हें। 1967 में मलेशिया, इंडोनेशिया, फिलिपींस, थाईलैंड और सिगांपुर ने इसकी नींव रखी थी। बाकी पांच देश बाद में शामिल हुए थे । आसियान इकनोमिक कम्युनिटी के गठन से यह दुनिया की सातवीं बडी आर्थिक शक्ति बन जाएगी। यही आसियान का मूल मकसद है। चीन की तुलना में आसियान देश बौने नजर आते हैं और वे मिलकर भी चीन का मुकाबला नहीं कर सकते। इसी बात के दृष्टिगत आसियान देशों को अमेरिका की मदद लेनी पडती है। अमेरिका इस स्थिति को अपने फायदे के लिए भुनाता है। चीन आबादी के लिहाज से दुनिया का पहला और क्षेत्रफल के लिहाज से तीसरा सबसे विशालतम देश है। चीन की बढती आर्थिक और भौगोलिक (टेरिटोरियल) महत्वाकांक्षाओं से विएतनाम और आसियान के अन्य सदस्य काफी चिंतित है। दक्षिण चाइना महासागर में चीन के ताजा दखल से आसियान के सदस्य विएतनाम, बरूनी, मलेशिया और फिलिपींस डरे हुए हैं। चीन पूरे महासागर को हथियाने की फिराक में है। बहरहाल, कहावत है “ अकेला चना भाड नही फोड सकता“। इसलिए आसियान मिलकर आगे बढना चाहते हैं। इस साल के अंत तक आसियान सदस्य देशों के लिए साझा मार्केट तैयार करने का लक्ष्य है। अब तक तमाम टैरिफ बाधाएं दूर की जा चुकी हैं और मुक्त व्यापार के लिए रास्ता साफ हो गया है। आसियान देशों के बीच अभी इंटरा- आसियान व्यापार बहुत ज्यादा नहीं था मगर ताजा स्थिति में इसमें खासा इजाफा होने की उम्मीद है। तथापि आसियान के समक्ष भी सार्क की तरह सबसे बडी चुनौती यह है कि बडी और छोटी अर्थव्यवस्थाओं के बीच के फासले को कैसे कम किया जाए? आसियान में इंडोनेशि या, मलेशिया, फिलिपींस, विएतनाम, थाईलैंड और सिगांपुर अपेक्षाकृत ज्यादा विकसित और समृद्ध हैं जबकि म्यांमार, लाओस, बरुनी और कंबोडिया कम समृद्ध। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लिहाज से इंडोनेशिया 915 अरब डालर के साथ सबसे ऊपर है मगर प्रति व्यक्ति आय (पर केपिटा इंकम) में 84, 821 डालर के साथ सिंगापुर सबसे आगे है। इंडोनेशिया की प्रति व्यक्ति आय 10, 758 डालर और विएतनाम की मात्र 5,983 डालर है। मलेशिया 25, 833 प्रति व्यक्ति आय के साथ इंडोनेशिया, विएतनाम, फिलिपींस और थाईलैंड से आगे है। नब्बे के दशक में विएतनाम, लाओस, म्यांमार और कंबोडिया को जब आसियान में शामिल किया गया, तब भी बडी और छोटी अर्थववस्थाओं के बीच ब्याप्त विशाल फासले को लेकर नए देशों को कई आशंकाएं थीं। उस समय भी पुराने और नए सदस्य के बीच प्रति व्यक्ति आय का बडा फासला था और आज भी वही फासला कायम है। इस स्थिति में अक्सर सवाल उठाया जाता है कि अगर आसियान देशों के बीच आर्थिक फासले को पाटा नहीं गया तो आर्थिक सहयोग का क्या फायदा? यही चुनौती आज भी खडी है। गरीब देशों को आशंका है कि आसियान के नए आर्थिक कम्युनिटी का फायदा बडी अर्थव्यवस्थाओं को ज्यादा हो सकता है। नए मंच से लेवल प्लेइंग फील्ड सुनिश्चित करना होगा। अगर गरीब सदस्य देशों को नए मंच से बराबर का फायदा नहीं मिलता है तो इसकी प्रासंगिकता ही ध्वस्त हो जाएगी। इसके अलावा राजनीतिक-सामाजिक विविधताएं भी मुक्त व्यापार को प्रभावित कर सकती है। इस तरह के मंच का तभी फायदा हो सकता है जब बडे-छोटे सबको बराबर आगे बढने का मौका मिले।
रविवार, 22 नवंबर 2015
Try Carom-seeds; It Can Cure Your Acidity Problem
Posted on 3:11 pm by mnfaindia.blogspot.com/
Acidity or gastric is a common problem of almost every individual. In contemporary world of junk and unhealthy food, the problem is more severe. Even children now suffer from acidity. There are a hosts of medicine available in the market but none of them is as effective as Ajwain or carom-seeds. Chewing a tea spoon of carom-seeds with lukewarm water used to be the potent desi formula in our village. My wife, a allopathic doctor herself is great votary of carom-seeds for treating the acidity. She has been suffering from acidity since long and Ajwain or carom seeds has been her best friend. Apart from treating an upset stomach, it also has many other health benefits. It can either be consumed raw or in powdered form and if. included in your daily diet plan , it can work wonderful. Carom seeds are also known as Bishop’s weed, Thymol seeds or ‘Ajwain‘ in Hindi and called omam in the southern part of India. They belong to the same family as fennel, anise, dill, and caraway . The carom seeds contain high nutritional value. It contains per 100 gms: Protein 17.1% Fat 21.8% Minerals.7.9% Fiber 21.2% Carbohydrates24.6% It also contains calcium, thiamine, riboflavin, phosphorus, iron and niacin. Carom oil is obtained from its seeds that contain 2.5% to 5% of essential oil. Their leaves and flowers are also used to extract oil that contains 35-60% of thymol. This oil is either colourless or pale brown in colour. Carom oil is widely used as germicide and fungicide. The health benefits of carom seeds are huge and see how it can solve your daily health problems.
Acidity: Mix one table spoon of carom seeds with one table spoon of cumin seeds. Consume them on a daily basis with some ginger powder. This natural remedy is a best way to cure indigestion problems . It is also useful in treating acidity and acid reflux problem.
Constipation: Carom seeds are the best remedy to cure digestion related problems . Hence, it can also help you to get rid of constipation. Carom seeds don’t have any side effects.
Kidney disorder: Carom seeds are very essential to cure kidney stones. They can also be useful to treat and reduce the pain due to kidney disorders .
Asthma: Consuming carom seeds with warm water give instant relief from cold and expel cough and mucus from the body. It is also useful for treating bronchitis and asthma. It can be consumed with jaggery twice a day.
Liver and kidney: Drink ajwain water for curing intestinal pain caused because of indigestion and infection. This herb is also very beneficial for curing liver and kidney malfunctions (6).
Mouth problems: Carom seeds have been proven to cure tooth pain. Floss your mouth with one part of clove oil, one part of carom oil and water for treating tooth ache, bad odor (7) and decay. It is the best and effective way to maintain oral hygiene.
Cold: This seed is the best natural way to cure cold symptoms such as a blocked nose. Take a steam from ajwain seeds infused in hot water for best relief (8).
Itching, Boils & Eczema: Grind ajwain seeds with lukewarm water to make its paste. Apply this paste on any affected part of the face or body. Also, try washing the affected part with the ajwain water for best results. In case of swelling due to boils, pimples or eczema (9), make the paste of ground carom seeds with lemon juice. It will be helpful in removing the swelling.
Excessive bleeding and irregular menses: Women with this problem can drink ajwain water. Soak handful of carom seeds in earthen vessel filled with water at night. Grind them and drink it in the morning
Arthritis:
Carom seed oil is a very useful method to cure arthritis pain. Massage on affected joints regularly with carom seed oil to get relief from rheumatic pain .
Diarrhea: Carom seed is a natural remedy to cure dysentery or diarrhea. Boil a handful of carom seeds in one glass of water. Cool and strain this to consume twice a day. This is an orthodox remedy to cure indigestion and dysentery .
Viral Infections: Combine yogurt with carom seeds powder. Applying this paste on face for a whole night can help to lighten acne scars . Wash it with lukewarm water in the morning for best results.
No allopathic medicine has so much of cure power as is the carom-seeds.
Acidity: Mix one table spoon of carom seeds with one table spoon of cumin seeds. Consume them on a daily basis with some ginger powder. This natural remedy is a best way to cure indigestion problems . It is also useful in treating acidity and acid reflux problem.
Constipation: Carom seeds are the best remedy to cure digestion related problems . Hence, it can also help you to get rid of constipation. Carom seeds don’t have any side effects.
Kidney disorder: Carom seeds are very essential to cure kidney stones. They can also be useful to treat and reduce the pain due to kidney disorders .
Asthma: Consuming carom seeds with warm water give instant relief from cold and expel cough and mucus from the body. It is also useful for treating bronchitis and asthma. It can be consumed with jaggery twice a day.
Liver and kidney: Drink ajwain water for curing intestinal pain caused because of indigestion and infection. This herb is also very beneficial for curing liver and kidney malfunctions (6).
Mouth problems: Carom seeds have been proven to cure tooth pain. Floss your mouth with one part of clove oil, one part of carom oil and water for treating tooth ache, bad odor (7) and decay. It is the best and effective way to maintain oral hygiene.
Cold: This seed is the best natural way to cure cold symptoms such as a blocked nose. Take a steam from ajwain seeds infused in hot water for best relief (8).
Itching, Boils & Eczema: Grind ajwain seeds with lukewarm water to make its paste. Apply this paste on any affected part of the face or body. Also, try washing the affected part with the ajwain water for best results. In case of swelling due to boils, pimples or eczema (9), make the paste of ground carom seeds with lemon juice. It will be helpful in removing the swelling.
Excessive bleeding and irregular menses: Women with this problem can drink ajwain water. Soak handful of carom seeds in earthen vessel filled with water at night. Grind them and drink it in the morning
Arthritis:
Carom seed oil is a very useful method to cure arthritis pain. Massage on affected joints regularly with carom seed oil to get relief from rheumatic pain .
Diarrhea: Carom seed is a natural remedy to cure dysentery or diarrhea. Boil a handful of carom seeds in one glass of water. Cool and strain this to consume twice a day. This is an orthodox remedy to cure indigestion and dysentery .
Viral Infections: Combine yogurt with carom seeds powder. Applying this paste on face for a whole night can help to lighten acne scars . Wash it with lukewarm water in the morning for best results.
No allopathic medicine has so much of cure power as is the carom-seeds.
शनिवार, 21 नवंबर 2015
Higher Salary May Lead to Bankruptcy of States
Posted on 2:12 pm by mnfaindia.blogspot.com/
How long a govt facing huge fiscal deficit can afford to pay higher salaries to its employees? The question assumes significance after the report of seventh finance commission. With a 25 percent hike in salaries of over 50 lakh central govt employees and equal number of about 54 lakh pensioners, the financial burden on union govt is likely to be over 1.05 lakh core. And this burden is likely to substantially up after states pay enhanced salaries to its employees. Overall, the multiplier effect of the babus' salary hike will be colossal and even may lead to " financial bankruptcy" of cash-strapped states. Punjab has yet not released the full and final arrears of sixth pay commission to its employees. It is even finding it hard to pay the retirement benefits and granting extension in service to retiring babus. Moreover, the higher wages of govt employees may boost the conspicuous consumption.The middle classes are considered more spend thrift than thrift saving. This may put pressure on prices. Prices of food grains are already sky-rocketing. Even the prices of seasonal vegetables and fruits haven't come down despite low fuel prices. There is an old saying that "cut your coat, according to cloth". This proverb aptly describes the reckless policies of Indian ruling class. The govt of the day has, practically, been buying elections by increasing wages and, in the process, overburdening the country with debt. Most of the states are paying the salary and pensions by raising public debt. Almost none of this money is going to growth and development. Soon after the acceptance of sixth Pay Commission recommendations, a study by CRISIL pointed out that state governments found it difficult to bear the financial burden of Sixth Pay Commission. The CRISIL estimated that after implementing the sixth Pay Commission recommendations, the aggregate primary deficit levels of 21 large states increased as much as 3.1 per cent of their aggregate gross state domestic product (GSDP). This level was higher than the 2.6 per cent recorded in 1999-2000, the first year in which the full impact of salary and pension hikes was felt in the wake of the Fifth Pay Commission. This was also more than thrice the figure of 1 per cent targeted by the Twelfth Finance Commission (TFC). Fitch Ratings has warmed that hiked wages could hurt the country's finances and underscore the weakness in its sovereign credit profile. Most of the states, usually, follow central norms in fixing pay scales for their employees. As such, States have been demanding centre to compensate them for implementing pay scales as recommended by the central pay panel. Congress-ruled state governments such as Assam, Karnataka, Manipur and Himachal Pradesh had sought from 14th Finance Commission to adequately compensate those state governments which wished to implement the recommendations of the seventh pay commission. However, Commission didn't compensate them. The end-game will be States will be overburdened with debt or at times may find it hard to release salary and pensions in time. Punjab is already passing through this critical situation. Mind you, such a situation can't save the state from being bankrupt.
Rahul Gandhi's Aggressiveness: Offense is Best Defence
Posted on 12:19 pm by mnfaindia.blogspot.com/
पुरानी कहावत है“ आक्रमण सबसे अच्छा बचाव है (आफेंस इज बेस्ट डिफेंस)“। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के मौजूदा आक्रामक तेवरों पर यह कहावत सौ फीसदी मौजूं होती है। कांग्रेस के विपक्ष में आते ही राहुल गांधी के सुर और चाल दोनों ही बदल गए हैं। अब वे मौके की नजाकत को बखूबी पहचानने लग पडे हैं। वीरवार को अपनी दादी इंदिरा गांधी की जयंती के मौके पर यूथ कांग्रेस के मंच से कांग्रेस उपाध्यक्ष ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा पर जबरदस्त हमला बोला। उन्होंने राष्ट्रीय स्वंय सेवक को भी नहीं बख्शा । बोले “ मोदी अपना 56 इंच का सीना दिखाएं और अगर किसी भी मामले में मुझे दोषी पाते हैं तो जेल में डाल दें“। सदंर्भ था भाजपा के बडबोले वरिष्ठ नेता डाक्टर सुब्रमण्यम स्वामी के इस आरोप का कि राहुल गांधी ने भारत के साथ-साथ ब्रिटेन की नागरिकता भी ले रखी है। पिछले सोमवार को भाजपा नेता ने दोहरी नागरिकता के लिए राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता और भारतीय नागरिकता दोनों को निरस्त करने की मांग की थी। डाक्टर स्वामी द्वारा दस्तावेजों के साथ पेश किए गए दोहरी नागरिकता के आरोप बेहद गंभीर हैं। देश का सांसद दोहरी नागरिकता नहीं रख सकता। ब्रिटेन में दोहरी नागरिकता वैध है मगर भारत में नहीं। राहुल गांधी और कांग्रेस का इन आरोपों पर तिलमिलाना स्वभाविक है। वैसे न तो कांग्रेस ने और न ही राहुल गांधी ने खुद इस मामले में अभी तक कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण दिया है। कांग्रेस ने सिर्फ इतना कहा है कि स्वामी सुर्खियां बटोरने के लिए ऐसा कर रहे हैं। सुब्रमण्यम स्वामी इससे पहले 1996 में तमिल नाडु की मुख्यमंत्री जयललिता के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने का मामला भी लड चुके हैं। इस साल मई माह में कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा जयललिता को इस मामले में बरी किए जाने पर स्वामी ने ऐलान किया था कि वे इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएंगें मगर गए नहीं। संभवतय पार्टी ने उन्हें ऐसा करने से रोक लिया। बहरहाल, राहुल गांधी और उनकी पार्टी यह बात भली-भांति जानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार ऐसा कभी नहीं करेगी। 1977 में जनता पार्टी सरकार ने इंदिरा गांधी को गिरफ्तार करके जो गलती की थी, मोदी सरकार उस तरह की गलती कभी नहीं दोहराएगी । तब भाजपाई (जनसंघी ) सरकार का हिस्सा थे। भारतीय मतदाताओं में प्रताडित के खिलाफ जबरदस्त सहानुभूति पाई जाती है। हाल ही के बिहार चुनाव ने फिर यह बात साबित कर दी है। भारतीय जनमानस खुद सदियों से प्रताडित रहा है, इसलिए ताकतवर और साधन संपन्न शासक वर्ग के प्रति उसकी सहानुभूति नहीं रहती। भाजपा और उसके नेता कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर बार-बार प्रहार करके उन्हें प्रताडितों की श्रेणी में ला रहे हैं। गांधी परिवार (सोनिया और राहुल) के खिलाफ भाजपा लंबे समय से दोहरी नागरिकता का आरोप लगाती रही है। पहले इटली की नागरिकता के आरोप लगाए जाते थे। मगर आज तक यह साबित नहीं कर पाए हैं कि सोनिया और राहुल के पास इटली की नागरिकता है। दरअसल, आरोप लगाकर सुर्खियां बटोरना सियासी नेताओं की फितरत है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लोकसभा चुनाव से पहले बेहद आक्रामक हुआ करते थे और अक्सर यह कहते थे कि भाजपा के केन्द्र में सत्तारूढ होते ही सोनिया गांधी और राहुल गांधी इटली भाग जाएंगें। लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद राहुल जब कुछ दिन के लिए अवकाष पर गए, तब भी यही प्रचारित किया गया। विपक्ष में रहकर आक्रामक तेवर अपनाना बहुत आसान है मगर सत्ता में रहते हुए आक्रामक होकर दिखाएं, तब माना जाए। अरविंद केजरीवाल अपवाद हैं। ऐसा वही सियासी नेता कर सकता है जिसके पास खोने के लिए कुछ भी न हो। प्रधानमंत्री बनने से पहले मोदी बेहद आक्रामक हुआ करते थे मगर अब वे संयत और धैर्य के साथ नपी-तुली बाते करते हैं। संप्रग सरकार के समय राहुल गांधी के तेवर रक्षात्मक हुआ करते थे। उन्हें घोटाले से पीडित मनमोहन सरकार का बचाव करना पडता था। अब राहुल आक्रामक हो गए हैं क्योंकि उनके पास खोने को कुछ नहीं है। केन्द्र में सतारूढ भाजपा को यह बात गांठ में बांध लेनी चाहिए कि सोनिया गांधी और राहुल को प्रताडित बनाने से पार्टी का ही नुकसान होगा।
शुक्रवार, 20 नवंबर 2015
Jan Lokpal Bill: Kejriwal Scores Over Modi Govt
Posted on 8:47 am by mnfaindia.blogspot.com/
जनलोकपाल बिल
दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ने अततः जनलोकपाल बिल को मजूंरी देकर अपना चुनावी वायदा पूरा किया है। 2014 में त्रिशंकू जनादेश से सत्ता में आई आप' सरकार जनलोकपाल बिल को विधानसभा से पारित नहीं करवा पाई थी और इसमें विफल रहने पर केजरीवाल सरकार ने इस्तीफा दे दिया था। उस वक्त अरविंद केजरीवाल सरकार के पास विधानसभा में स्पष्ट बहुमत नहीं था और सरकार कांग्रेसी मदद की बैसाखियों के सहारे चल रही थी़। कांग्रेस ने विधानसभा में जनलोकपाल बिल विधेयक को पारित नहीं होने दिया। इस साल फरवरी में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में तूफानी बहुमत से सत्ता में आई अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली “आप“ सरकार 2014 का अधूरा काम पूरा करने जा रही है। जनलोकपाल बिल को जल्द ही विधानसभा में पेश किया जाएगा। इस बार कांग्रेस का दिल्ली विधानसभा में वजूद तक नहीं है। 70 सदस्यीय विधानसभा में केजरीवाल के पास 67 सदस्यों का प्रचंड बहुमत है। इस स्थिति में बिल को विधानसभा से पारित करवाने में कोई अडचन नहीं है। दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया का दावा है कि मौजूदा बिल हूबहू 2011 में अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले आंदोलन के दौरान तैयार किए गए मसौदे जैसा है । जनलोकपाल की मांग को लेकर गांधीवादी अन्ना हजारे की अगुवाई में 2011 में आंदोलन शुरु किया गया था। अरविंद केजरीवाल और उनकी “आम आदमी पार्टी” इसी आंदोलन की उपज है। जनलोकपाल की स्थापना आम आदमी पार्टी का प्रमुख चुनावी वायदा था। बिल में मुख्यमंत्री को भी जनलोकपाल के दायरे में लाया गया है। बिल में प्रावधान है कि भ्रष्टाचार मामलों की जांच छह माह के भीतर पूरी करनी होगी और मामले की सुनवाई भी छह माह के भीतर पूरी कर ली जाएगी। इस दौरान सरकार भ्रष्टाचारी की संपति जब्त कर सकती है। लोकपाल की नियुक्ति में भी दिल्ली सरकार का कोई दखल नहीं होगा। बाकी सारे प्रावधान वही हैं, जो उतराखंड जनलोकपाल बिल में हैं। उतराखंड की ही तरह दिल्ली जनलोकपाल बिल में भी शिकायतकर्ता की पहचान गुप्त रखे जाने का प्रावधान है मगर गुमनाम शिकायत का संज्ञान नहीं लिया जाएगा। लोकपाल को आरोपी के घर-कार्यालय पर छापा मारने और घर की तलाशी लेने का भी अधिकार होगा। कुल मिलाकर, केजरीवाल सरकार का जनलोकपाल सख्त प्रावधानों के साथ संसद द्वारा पारित लोकपाल बिल से कहीं ज्यादा असरदार है। लोकपाल की स्थापना का मामला लगभग साढे चार दशक से भी ज्यादा समय से लटका पडा है। 1963 में नामचीन वकील और तत्कालीन संसद सदस्य एल एम सिंघवी ने संसद में चर्चा के दौरान लोकपाल की परिकल्पना रखी थी। 1968 में पहली बार शांति भूषण ने लोकसभा में लोकपाल बिल रखा था और 1969 में इसे सदन द्वारा पारित भी किया गया। शांति भूषण और उनके सुपुत्र प्रशांत भूषण अन्ना हजारे के आंदोलन से जुडे रहे हैं और आप में भी थे। अन्ना हजारे के जनलोकपाल बिल को तैयार करने में शांति भूषण की अग्रणी भूमिका रही है। विडंबना है कि अब शांति भूषण और प्रशांत भूषण “आप“ से बाहर हैं। 1969 में इससे पहले कि बिल राज्यसभा में पारित होता, लोकसभा भंग कर दी गई। तब से ससद में 11 बार लोकपाल बिल रखा गया और 2013 में कहीं जाकर लोकपाल बिल पारित हो पाया। एक जववरी, 2014 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के बाद 16 जनवरी, 2014 से लोकपाल अस्तित्व में आ चुका है। मगर अभी तक लोकपाल की नियुक्ति नहीं हो पाई है। लोकपाल की नियुक्ति में बिलंब के लिए संसदीय समिति ने मोदी सरकार को फटकार भी लगाई है। लोकपाल पर गठित संसदीय समिति को तीन बार एक्सटेंशन भी मिल चुकी है। 15 नवंबर तक इसकी रिपोर्ट आनी थी, मगर आई नहीं। बहरहाल, अरविंद केजरीवाल का जनलोकपाल बिल केन्द्र के लोकपाल से कहीं ज्यादा सख्त है। केजरीवाल ने अपना वायदा निभाया है।
दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ने अततः जनलोकपाल बिल को मजूंरी देकर अपना चुनावी वायदा पूरा किया है। 2014 में त्रिशंकू जनादेश से सत्ता में आई आप' सरकार जनलोकपाल बिल को विधानसभा से पारित नहीं करवा पाई थी और इसमें विफल रहने पर केजरीवाल सरकार ने इस्तीफा दे दिया था। उस वक्त अरविंद केजरीवाल सरकार के पास विधानसभा में स्पष्ट बहुमत नहीं था और सरकार कांग्रेसी मदद की बैसाखियों के सहारे चल रही थी़। कांग्रेस ने विधानसभा में जनलोकपाल बिल विधेयक को पारित नहीं होने दिया। इस साल फरवरी में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में तूफानी बहुमत से सत्ता में आई अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली “आप“ सरकार 2014 का अधूरा काम पूरा करने जा रही है। जनलोकपाल बिल को जल्द ही विधानसभा में पेश किया जाएगा। इस बार कांग्रेस का दिल्ली विधानसभा में वजूद तक नहीं है। 70 सदस्यीय विधानसभा में केजरीवाल के पास 67 सदस्यों का प्रचंड बहुमत है। इस स्थिति में बिल को विधानसभा से पारित करवाने में कोई अडचन नहीं है। दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया का दावा है कि मौजूदा बिल हूबहू 2011 में अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले आंदोलन के दौरान तैयार किए गए मसौदे जैसा है । जनलोकपाल की मांग को लेकर गांधीवादी अन्ना हजारे की अगुवाई में 2011 में आंदोलन शुरु किया गया था। अरविंद केजरीवाल और उनकी “आम आदमी पार्टी” इसी आंदोलन की उपज है। जनलोकपाल की स्थापना आम आदमी पार्टी का प्रमुख चुनावी वायदा था। बिल में मुख्यमंत्री को भी जनलोकपाल के दायरे में लाया गया है। बिल में प्रावधान है कि भ्रष्टाचार मामलों की जांच छह माह के भीतर पूरी करनी होगी और मामले की सुनवाई भी छह माह के भीतर पूरी कर ली जाएगी। इस दौरान सरकार भ्रष्टाचारी की संपति जब्त कर सकती है। लोकपाल की नियुक्ति में भी दिल्ली सरकार का कोई दखल नहीं होगा। बाकी सारे प्रावधान वही हैं, जो उतराखंड जनलोकपाल बिल में हैं। उतराखंड की ही तरह दिल्ली जनलोकपाल बिल में भी शिकायतकर्ता की पहचान गुप्त रखे जाने का प्रावधान है मगर गुमनाम शिकायत का संज्ञान नहीं लिया जाएगा। लोकपाल को आरोपी के घर-कार्यालय पर छापा मारने और घर की तलाशी लेने का भी अधिकार होगा। कुल मिलाकर, केजरीवाल सरकार का जनलोकपाल सख्त प्रावधानों के साथ संसद द्वारा पारित लोकपाल बिल से कहीं ज्यादा असरदार है। लोकपाल की स्थापना का मामला लगभग साढे चार दशक से भी ज्यादा समय से लटका पडा है। 1963 में नामचीन वकील और तत्कालीन संसद सदस्य एल एम सिंघवी ने संसद में चर्चा के दौरान लोकपाल की परिकल्पना रखी थी। 1968 में पहली बार शांति भूषण ने लोकसभा में लोकपाल बिल रखा था और 1969 में इसे सदन द्वारा पारित भी किया गया। शांति भूषण और उनके सुपुत्र प्रशांत भूषण अन्ना हजारे के आंदोलन से जुडे रहे हैं और आप में भी थे। अन्ना हजारे के जनलोकपाल बिल को तैयार करने में शांति भूषण की अग्रणी भूमिका रही है। विडंबना है कि अब शांति भूषण और प्रशांत भूषण “आप“ से बाहर हैं। 1969 में इससे पहले कि बिल राज्यसभा में पारित होता, लोकसभा भंग कर दी गई। तब से ससद में 11 बार लोकपाल बिल रखा गया और 2013 में कहीं जाकर लोकपाल बिल पारित हो पाया। एक जववरी, 2014 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के बाद 16 जनवरी, 2014 से लोकपाल अस्तित्व में आ चुका है। मगर अभी तक लोकपाल की नियुक्ति नहीं हो पाई है। लोकपाल की नियुक्ति में बिलंब के लिए संसदीय समिति ने मोदी सरकार को फटकार भी लगाई है। लोकपाल पर गठित संसदीय समिति को तीन बार एक्सटेंशन भी मिल चुकी है। 15 नवंबर तक इसकी रिपोर्ट आनी थी, मगर आई नहीं। बहरहाल, अरविंद केजरीवाल का जनलोकपाल बिल केन्द्र के लोकपाल से कहीं ज्यादा सख्त है। केजरीवाल ने अपना वायदा निभाया है।
गुरुवार, 19 नवंबर 2015
How Funny? Peace Talks Amid Airstrikes in Syria
Posted on 9:00 am by mnfaindia.blogspot.com/
इधर शांति वार्ता, उधर बमबारी
आतंक से कैसे निपटा जाए? क्या सीरिया और इराक में इस्लामिक स्टेट के प्रमुख ठिकानों को तहस-नहस करके दुनिया से आतंक का खात्मा किया जा सकता है? या आतंकियों के वित्तीय साधनों और मदद को जैसे-तैसे बंद करवाकर आतंकियों की कमर तोड दी जाए? विश्व नेताओं के समक्ष यह सबसे बडा सवाल है। पेरिस हमलों के बाद से दुनिया के ताकतवर अमेरिका और उसके मित्र देश भी सहमे हुए हैं। बम के डर से हवाई उडानें रद्द कर दी गई हैं। फ्रांस में तीन महीने के लिए इमरजेंसी लगा दी गई है। मंगलवार को जर्मनी और हालैंड के बीच फुटबाल मैच बम के डर से रद्द कर दिया गया। जर्मनी की चासंलर इस मैच को देखने आने वाली थी। फ्रांस में भी सभी स्पोर्टस आयोजनों को स्थगित कर दिया गया। आतंकियों को यह दिखाने के लिए कि विकसित देश पेरिस हमले डरे नहीं है, इग्लैंड और फ्रांस के बीव फ्रेंडली फुटबाल मैच भारी सुरक्षा बंदोबस्त में इग्लैंड में करवा गया। बदले की भावना से ग्रस्त फ्रांस सीरिया में आईएस के रक्का स्थित मुख्यालय के ठिकानों पर जबरदस्त बमबारी कर रहा है। ताजा सूचना के मुताबिक इन हमलों में 33 से ज्यादा आईएस आतंकी मारे जा चुके है। रुस ने भी सीरिया में बमबारी तेज कर दी है हालांकि वह सीरियाई सेना और राष्ट्रपति बसर-अल असद की पहले से ही मदद कर रहा है। सीरिया रुस की मदद के कारण ही पूरी तरह से इस्लामिक स्टेट के कब्जे में आने से बचा हुआ है। अमेरिका और उसके मित्र देश तो अब तक सीरिया में असद विरोधी ताकतों की मदद कर रहे हैं। और सच्चाई यह है कि दुनिया में आतंक और आतंकी संगठन अगर फले-फूले हैं , तो सिर्फ अमेरिका और उसके मित्र देशों की दोगली नीति से। अमेरिका यह जानते हुए भी कि पाकिस्तान दुनिया में आतंकियों का सबसे बडा केन्द्र है, सालों तक खुले हाथ से उसकी मदद करता रहा है। इसी तरह यह बात आज तक रहस्य बनी हुई है कि सीरिया में अमेरिका और उसके मित्र देश इस्लामिक स्टेट के आर्थिक ठिकानों को अब तक क्यों तहस-नहस कर नहीं कर पाए जबकि वे जानते हैं कि ऐसा करने से आईएस बेअसर हो सकता है। अमेरिका और उसके मित्र देश आतंकवाद को आज तक निहित राजनीतिक हितों के तराजू में तोलते रहे हैं। वर्ल्ड ट्रैड सेंटर पर अल कायदा के हमले से पहले तक अमेरिका आतंकियों की भी अप्रत्यक्ष तौर पर मदद करता रहा है और तब तक दुनिया का सबसे खूंखार आतंकी ओसामा बिन लादेन अमेरिका के लिए इतना खतरनाक नहीं था। 11 सितंबर, 2001 (9/11) को वर्ल्ड ट्रैड सेंटर पर हमले के बाद अमेरिका लादेन के पीछे पड गया और उसे पाकिस्तान में उसके घर में घुस कर मार डाला। तब से अमेरिका आतंक के खिलाफ लडने की बातें कर रहा है मगर जमीनी हकीकत यह है कि आतंक पर खाली बातें ही हो रही है, किसी ठोस कार्रवाई का खाका आज तक तैयार नहीं किया जा सका है। पेरिस हमले के तुरंत बाद जी-20 देशों के शिखर सम्मेलन में भी आतंक पर व्यापक चर्चा हुई। भारत ने आतंक पर वैश्वनिक रणनीति बनाने पर जोर दिया। विश्व नेताओं ने यह बात मानी भी कि आतंक से एकजुट होकर ही निपटा जा सकता है । इस पृष्ठभूमि में पहली बार अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और रुस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन ने गुफ्तगू भी की। मगर एक-दूसरे के प्रति अविश्वाश अभी भी कायम है। अमेरिका आईएस से मिलकर लडने के रुस के प्रस्ताव को पहले ही अस्वीकार कर चुका है। दुनिया से आतंक का खात्मा करना है तो सबसे पहले आतंकी संगठनों को वित्तीय मदद रोकनी होगी। बगैर वित्तीय साधन के आतंकी अमेरिका और फ्रांस पर हमले नहीं कर सकते। आईएस को लगभग 40 देशों से वित्तीय मदद मिलती है और इनमें कई जी-20 देश भी शामिल है। ताजा जानकारी के अनुसार आईएस के पास 13 खरब पाउंड के विशाल वित्तीय संसाधन उपलब्ध हैं और इसकी मदद से वह पश्चिम पर जब चाहे हमले कर सकता है। इनमें हर रोज एक अरब पाउंड तेल से आय और सालाना 30 अरब पाउंड की फिरौती शामिल है। अल कायदा के पास भी धन की कोई कमी नहीं है। आतंक के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र संघ संधि पत्र को अविलंब बनाने की जरुरत है। दुनिया से अगर आतंक का खात्मा करना है तो यह सब करना होगा। पर सवाल यही है कि क्या एक-दूसरे की काट करने वाले विश्व नेता ऐसा कर पाएंगें?
आतंक से कैसे निपटा जाए? क्या सीरिया और इराक में इस्लामिक स्टेट के प्रमुख ठिकानों को तहस-नहस करके दुनिया से आतंक का खात्मा किया जा सकता है? या आतंकियों के वित्तीय साधनों और मदद को जैसे-तैसे बंद करवाकर आतंकियों की कमर तोड दी जाए? विश्व नेताओं के समक्ष यह सबसे बडा सवाल है। पेरिस हमलों के बाद से दुनिया के ताकतवर अमेरिका और उसके मित्र देश भी सहमे हुए हैं। बम के डर से हवाई उडानें रद्द कर दी गई हैं। फ्रांस में तीन महीने के लिए इमरजेंसी लगा दी गई है। मंगलवार को जर्मनी और हालैंड के बीच फुटबाल मैच बम के डर से रद्द कर दिया गया। जर्मनी की चासंलर इस मैच को देखने आने वाली थी। फ्रांस में भी सभी स्पोर्टस आयोजनों को स्थगित कर दिया गया। आतंकियों को यह दिखाने के लिए कि विकसित देश पेरिस हमले डरे नहीं है, इग्लैंड और फ्रांस के बीव फ्रेंडली फुटबाल मैच भारी सुरक्षा बंदोबस्त में इग्लैंड में करवा गया। बदले की भावना से ग्रस्त फ्रांस सीरिया में आईएस के रक्का स्थित मुख्यालय के ठिकानों पर जबरदस्त बमबारी कर रहा है। ताजा सूचना के मुताबिक इन हमलों में 33 से ज्यादा आईएस आतंकी मारे जा चुके है। रुस ने भी सीरिया में बमबारी तेज कर दी है हालांकि वह सीरियाई सेना और राष्ट्रपति बसर-अल असद की पहले से ही मदद कर रहा है। सीरिया रुस की मदद के कारण ही पूरी तरह से इस्लामिक स्टेट के कब्जे में आने से बचा हुआ है। अमेरिका और उसके मित्र देश तो अब तक सीरिया में असद विरोधी ताकतों की मदद कर रहे हैं। और सच्चाई यह है कि दुनिया में आतंक और आतंकी संगठन अगर फले-फूले हैं , तो सिर्फ अमेरिका और उसके मित्र देशों की दोगली नीति से। अमेरिका यह जानते हुए भी कि पाकिस्तान दुनिया में आतंकियों का सबसे बडा केन्द्र है, सालों तक खुले हाथ से उसकी मदद करता रहा है। इसी तरह यह बात आज तक रहस्य बनी हुई है कि सीरिया में अमेरिका और उसके मित्र देश इस्लामिक स्टेट के आर्थिक ठिकानों को अब तक क्यों तहस-नहस कर नहीं कर पाए जबकि वे जानते हैं कि ऐसा करने से आईएस बेअसर हो सकता है। अमेरिका और उसके मित्र देश आतंकवाद को आज तक निहित राजनीतिक हितों के तराजू में तोलते रहे हैं। वर्ल्ड ट्रैड सेंटर पर अल कायदा के हमले से पहले तक अमेरिका आतंकियों की भी अप्रत्यक्ष तौर पर मदद करता रहा है और तब तक दुनिया का सबसे खूंखार आतंकी ओसामा बिन लादेन अमेरिका के लिए इतना खतरनाक नहीं था। 11 सितंबर, 2001 (9/11) को वर्ल्ड ट्रैड सेंटर पर हमले के बाद अमेरिका लादेन के पीछे पड गया और उसे पाकिस्तान में उसके घर में घुस कर मार डाला। तब से अमेरिका आतंक के खिलाफ लडने की बातें कर रहा है मगर जमीनी हकीकत यह है कि आतंक पर खाली बातें ही हो रही है, किसी ठोस कार्रवाई का खाका आज तक तैयार नहीं किया जा सका है। पेरिस हमले के तुरंत बाद जी-20 देशों के शिखर सम्मेलन में भी आतंक पर व्यापक चर्चा हुई। भारत ने आतंक पर वैश्वनिक रणनीति बनाने पर जोर दिया। विश्व नेताओं ने यह बात मानी भी कि आतंक से एकजुट होकर ही निपटा जा सकता है । इस पृष्ठभूमि में पहली बार अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और रुस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन ने गुफ्तगू भी की। मगर एक-दूसरे के प्रति अविश्वाश अभी भी कायम है। अमेरिका आईएस से मिलकर लडने के रुस के प्रस्ताव को पहले ही अस्वीकार कर चुका है। दुनिया से आतंक का खात्मा करना है तो सबसे पहले आतंकी संगठनों को वित्तीय मदद रोकनी होगी। बगैर वित्तीय साधन के आतंकी अमेरिका और फ्रांस पर हमले नहीं कर सकते। आईएस को लगभग 40 देशों से वित्तीय मदद मिलती है और इनमें कई जी-20 देश भी शामिल है। ताजा जानकारी के अनुसार आईएस के पास 13 खरब पाउंड के विशाल वित्तीय संसाधन उपलब्ध हैं और इसकी मदद से वह पश्चिम पर जब चाहे हमले कर सकता है। इनमें हर रोज एक अरब पाउंड तेल से आय और सालाना 30 अरब पाउंड की फिरौती शामिल है। अल कायदा के पास भी धन की कोई कमी नहीं है। आतंक के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र संघ संधि पत्र को अविलंब बनाने की जरुरत है। दुनिया से अगर आतंक का खात्मा करना है तो यह सब करना होगा। पर सवाल यही है कि क्या एक-दूसरे की काट करने वाले विश्व नेता ऐसा कर पाएंगें?
बुधवार, 18 नवंबर 2015
Returning Awards No Solution to Fight Intolerance
Posted on 8:49 am by mnfaindia.blogspot.com/
राष्ट्रपति की नसीहत
बढती असहिष्णुता के विरोध में कलाकारों, साहित्यकारों, वैज्ञानियों और शिक्षाशास्त्रियों की “सम्मान वापसी“ पर देश के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का चिंतित होना स्वभाविक है। भारत में भेड चाल की बुरी रिवायत है। बस एक शुरु किया तो उसकी देखा-देखी कई लोग पीछे चल पडेंगे। बढती असहिष्णुता का विरोध जताने के लिए सम्मान वापसी के मामले में भी यही हो रहा है। राष्ट्रपति ने विरोध करने वालों को नसीहत दी है कि सम्मान अथवा पुरस्कार लौटाने की बजाय वे “असहमति“ पर चर्चा करे। आजादी से जुडे मुद्दों पर संवेदनशील व्यक्ति का विचलित होना स्वभाविक है मगर यह बात भी सच है कि बुद्धिजीवी भावनाओं में बहकर फैसले नहीं लेते हैं। नेशनल प्रेस दिवस पर प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के कार्यक्रम मेंराष्ट्रपति ने इस बात पर खास जोर दिया कि “भावनाओं को तर्क पर हावी नहीं होन्र् देना चाहिए“। देश बुद्धिजीवियों से यही उम्मीद रखता है कि वे भावनाओं में न बहें और अपने फैसले तर्क पर लें। “प्रेस दिवस“ देश में “अभिव्यक्ति की आजादी“ को परिलक्षित करता है और अगर इस अवसर पर देश का प्रथम नागरिक बढती असहिष्णुता का उल्लेख करता है, तो इसे हलके में नहीं लिया जा सकता। इस बात में दो राय नहीं हो सकती कि सम्मान लौटाने की बजाय बुद्धिजीवियों को “ बढती“ असहिष्णुता पर देश व्यापी चर्चा शुरु करनी चाहिए। सम्मान अथवा पुरुस्कार लौटाने से मूल मुद्दा पीछे छूट रहा है। सम्मान-पुरुस्कार शीर्षस्थ लोगों को उनकी योग्यता, प्रतिभा और समाज और देश के प्रति उल्लेखनीय योगदान के लिए दिए जाते हैं। ये किसी सरकार अथवा व्यक्ति विशेष द्वारा नहीं दिए जाते हैं, अलबत्ता देश की ओर से दिए जाते हैं। इस स्थिति में सम्मान लौटाने से विरोध प्रदर्शन की जगह देश का अपमान ज्यादा हो रहा है। राष्ट्र द्वारा दिए गए सम्मान अथवा पुरुस्कार को कुछ “सिरफिरों“ की अनर्गल बातों से नहीं जोडा जा सकता। कुल मिलाकर राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में स्पष्ट संकेत दिए हैं कि “असहिष्णुता “ का हर सूरत में विरोध किया जाना चाहिए मगर इस तरह से कि विरोध का असर दिखे और जो लोग देश का माहौल खराब कर रहे हैं, उन्हें भी अपने किए पर शर्मिदंगी महसूस हो। विख्यात फिल्मकार श्याम बेनेगल ने भी “सम्मान वापसी” को अनुचित बताया है। बेनेगल ने माना कि धार्मिक असहिष्णुता के खिलाफ आवाज बुलंद की जानी चाहिए मगर इसके लिए राजनीतिक विकल्प ज्यादा असरदार हो सकता है। निसंदेह, चर्चा और बहस से “असहिष्णुता “ फैलाने वालों के खिलाफ जनमत तैयार करके काफी हद तक इसे रोका जा सकता है। लोकतंत्र की यही विशेषता है कि जनमत से बडे से बडे तानाशाह और शक्तिशाली को भी पस्त किया जा सकता है। बुद्धिजीवियों के साथ-साथ सियासी नेताओं को भी सकारात्मक आलोचना को खुले दिमाग से सराहना और स्वीकारना चाहिए। देश की यही स्वस्थ परंपरा रही है। केन्द्र में भाजपा नीत राजग सरकार के सत्ता संभालने के बाद से देश में “असहिष्णुता “ बढी है और मोदी सरकार इसे रोकने में विफल रही है। विपक्ष के इन आरोपों में वजन है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विदेशों में अपनी उदार छवि बनाने के लिए “असहिष्णुता “ की भर्त्सना करते हैं मगर स्वदेश में इस विषय पर मौन हो जाते हैं। यह जरुरी नहीं है कि देश में हर समस्या का समाधान सरकार ही निकाले। “असहिष्णुता “ पूरे समाज को प्रभावित करती है और इसे बढाने वालों का सामाजिक स्तर पर मुकाबला किया जाना चाहिए। कलाकार, साहित्कार और शिक्षक इस मामले में सरकार से कहीं ज्यादा अहम भूमिका निभा सकते हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी “असहिष्णुता “ को सामाजिक चेतना से पस्त करने का विकल्प चुना था। राष्ट्रपति यही संदेश देना चाहते थे। कटटरपंथियों ने भारत में ही नहीं, बल्कि समूचे विश्व में “असहिष्णुता “ से अशांति फैला रखी है। इसका मुकाबला हिंसक और उग्रता से नहीं किया जा सकता।
बढती असहिष्णुता के विरोध में कलाकारों, साहित्यकारों, वैज्ञानियों और शिक्षाशास्त्रियों की “सम्मान वापसी“ पर देश के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का चिंतित होना स्वभाविक है। भारत में भेड चाल की बुरी रिवायत है। बस एक शुरु किया तो उसकी देखा-देखी कई लोग पीछे चल पडेंगे। बढती असहिष्णुता का विरोध जताने के लिए सम्मान वापसी के मामले में भी यही हो रहा है। राष्ट्रपति ने विरोध करने वालों को नसीहत दी है कि सम्मान अथवा पुरस्कार लौटाने की बजाय वे “असहमति“ पर चर्चा करे। आजादी से जुडे मुद्दों पर संवेदनशील व्यक्ति का विचलित होना स्वभाविक है मगर यह बात भी सच है कि बुद्धिजीवी भावनाओं में बहकर फैसले नहीं लेते हैं। नेशनल प्रेस दिवस पर प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के कार्यक्रम मेंराष्ट्रपति ने इस बात पर खास जोर दिया कि “भावनाओं को तर्क पर हावी नहीं होन्र् देना चाहिए“। देश बुद्धिजीवियों से यही उम्मीद रखता है कि वे भावनाओं में न बहें और अपने फैसले तर्क पर लें। “प्रेस दिवस“ देश में “अभिव्यक्ति की आजादी“ को परिलक्षित करता है और अगर इस अवसर पर देश का प्रथम नागरिक बढती असहिष्णुता का उल्लेख करता है, तो इसे हलके में नहीं लिया जा सकता। इस बात में दो राय नहीं हो सकती कि सम्मान लौटाने की बजाय बुद्धिजीवियों को “ बढती“ असहिष्णुता पर देश व्यापी चर्चा शुरु करनी चाहिए। सम्मान अथवा पुरुस्कार लौटाने से मूल मुद्दा पीछे छूट रहा है। सम्मान-पुरुस्कार शीर्षस्थ लोगों को उनकी योग्यता, प्रतिभा और समाज और देश के प्रति उल्लेखनीय योगदान के लिए दिए जाते हैं। ये किसी सरकार अथवा व्यक्ति विशेष द्वारा नहीं दिए जाते हैं, अलबत्ता देश की ओर से दिए जाते हैं। इस स्थिति में सम्मान लौटाने से विरोध प्रदर्शन की जगह देश का अपमान ज्यादा हो रहा है। राष्ट्र द्वारा दिए गए सम्मान अथवा पुरुस्कार को कुछ “सिरफिरों“ की अनर्गल बातों से नहीं जोडा जा सकता। कुल मिलाकर राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में स्पष्ट संकेत दिए हैं कि “असहिष्णुता “ का हर सूरत में विरोध किया जाना चाहिए मगर इस तरह से कि विरोध का असर दिखे और जो लोग देश का माहौल खराब कर रहे हैं, उन्हें भी अपने किए पर शर्मिदंगी महसूस हो। विख्यात फिल्मकार श्याम बेनेगल ने भी “सम्मान वापसी” को अनुचित बताया है। बेनेगल ने माना कि धार्मिक असहिष्णुता के खिलाफ आवाज बुलंद की जानी चाहिए मगर इसके लिए राजनीतिक विकल्प ज्यादा असरदार हो सकता है। निसंदेह, चर्चा और बहस से “असहिष्णुता “ फैलाने वालों के खिलाफ जनमत तैयार करके काफी हद तक इसे रोका जा सकता है। लोकतंत्र की यही विशेषता है कि जनमत से बडे से बडे तानाशाह और शक्तिशाली को भी पस्त किया जा सकता है। बुद्धिजीवियों के साथ-साथ सियासी नेताओं को भी सकारात्मक आलोचना को खुले दिमाग से सराहना और स्वीकारना चाहिए। देश की यही स्वस्थ परंपरा रही है। केन्द्र में भाजपा नीत राजग सरकार के सत्ता संभालने के बाद से देश में “असहिष्णुता “ बढी है और मोदी सरकार इसे रोकने में विफल रही है। विपक्ष के इन आरोपों में वजन है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विदेशों में अपनी उदार छवि बनाने के लिए “असहिष्णुता “ की भर्त्सना करते हैं मगर स्वदेश में इस विषय पर मौन हो जाते हैं। यह जरुरी नहीं है कि देश में हर समस्या का समाधान सरकार ही निकाले। “असहिष्णुता “ पूरे समाज को प्रभावित करती है और इसे बढाने वालों का सामाजिक स्तर पर मुकाबला किया जाना चाहिए। कलाकार, साहित्कार और शिक्षक इस मामले में सरकार से कहीं ज्यादा अहम भूमिका निभा सकते हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी “असहिष्णुता “ को सामाजिक चेतना से पस्त करने का विकल्प चुना था। राष्ट्रपति यही संदेश देना चाहते थे। कटटरपंथियों ने भारत में ही नहीं, बल्कि समूचे विश्व में “असहिष्णुता “ से अशांति फैला रखी है। इसका मुकाबला हिंसक और उग्रता से नहीं किया जा सकता।
मंगलवार, 17 नवंबर 2015
ISI Sponsored Terrorists Outfit More Dangerous To Indian Than IS
Posted on 8:21 am by mnfaindia.blogspot.com/
आतंक का विकृत चेहरा
ंपिछले शुक्रवार को फ्रांस की राजधानी पेरिस पर आतंकी हमले ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है। पेरिस में श्रृंखलाबद्ध हमलों में 127 लोग मारे गए हैं ओर 300 से ज्यादा जख्मी हुई है। इन हमलों के समय राष्ट्र्पति ओलांद पेरिस के नेशनल फुटबाल स्टेडियम में मैच देख रहे थे। आशंका है कि आतंकी उन्हें निशाना बनाने चाहते थे। इस स्टेडियम के बाहर आत्मघाती आतंकियों के हमलों में चार लोग मारे गए हैं। स्टेडियम के साथ सटे रेस्ट्रां पर हुए हमले में 18 लोग मारे गए। आतंकी हमले करते रहे और पुलिस देखती ही रह गई। 2008 के मुंबई हमले, इस वर्ष अप्रैल में केन्या के गरिसा यूनिवर्सिटी हमले और 31 अक्टूबर को मिस्त्र के सिनाई क्षेत्र में रुसी विमान हादसे ने विकसित देशों को इतना विचलित नहीं किया था जितना पेरिस हमले ने किया है। 11 सितंबर 2001 में अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर अल-कायदा आतंकियों के हमले के 14 वर्ष बाद पेरिस पर हमले करके इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने फ्रांस समेत अमेरिका और उसके मित्र देशों को ललकारा है। इससे पश्चिम देशों का तिलमिलाना स्वभाविक है। द्धितीय विश्व युद्ध के बाद फ्रांस ने पहली बार देश में आपातकाल लगाया है। इससे पता चलता है कि फ्रांस ताजा हमले से किस कद्र विचलित है। इस साल जनवरी माह में साप्ताहिक चार्ली हब्दो पत्रिका के कार्यालय पर यमन स्थित अल-कायदा के आतंकियों के हमले के बाद फ्रांस की राजधानी पेरिस में यह दूसरा आतंकी हमला है। चार्ली हब्दो हमले में 11 लोग मारे गए थे। यही फ्रांस की सबसे बडी चिंता हे। आईएस आतंकियों ने धमकी दी है कि अभी तो बस शुरुआत है, और हमले होते रहेंगे । सीरिया में अमेरिका के साथ मिलकर आईएस ठिकानों पर बार-बार हमला करने के लिए अमेरिका का साथ देने पर आतंकी फ्रांस को अपना निशाना बनाए हुए हैं। इन हमलों के बाद अमेरिका और फ्रांस बदले की कार्रवाई कर सकते हैं। मंगलवार को फ्रांस ने अमेरिका के सहयोग से सीरिया में इस्लामिक स्टेट के गढ रक्का पर भारी हवाई हमले किए। यूनाइटेड अरब अमीरात और जोर्डन से एक साथ दस विमानों से रक्का स्थित आईएस के दो जेहादी ठिकानों को तहस-नहस कर दिया गया। अभी और हमले हो सकते हैं। इस स्थिति के दृष्टिगत आईएस भी बदले की कार्रवाई कर सकता है। यानी फ्रांस पर फिर हमले हो सकते हैं। हिंसा का हिंसा से जवाब देना कतई उचित नहीं है। इससे सिर्फ हिंसा बढ्ती है। सोमवार को तुर्की के अंतालिया में जिस समय जी-20 शिखर सम्मेलन में दुनिया के शीर्ष नेता आतंक पर एकजुटता का संकल्प ले रहे थे, उसी दौरान राजधानी अंकारा में अईएस के एक आत्मघाती जेहादी ने गिरफ्तारी से बचने के लिए चार पुलिसकर्मियों को जख्मी कर डाला। यह आतंकी सम्मेलन को निशाना बनाने की फिराक में था। इंटेलीजेंस एजेंसियों ने आगाह किया है कि सीरिया से यूरोप पहुंच रहे लाखों शरणार्थियों में आईएस आतंकियों ने जबरदस्त घुसपैठ कर रखी है और हजारों आतंकी पूरे यूरोप और अमेरिका में फैल चुके हैं। पेरिस हमले ने पूरे विश्व को साफ-साफ षब्दों में चेतावनी दी है कि इस्लामिक आतंक इस समय सबसे बडी चुनौती है और इससे शिखर सम्मलेनों में बडी-बडी बातें करके नहीं निपटा जा सकता। भारत लंबे समय से आतंक का दंश झेल रहा है और पश्चिम आतंक के विश्व व्यापी खतरे से आगाह करता रहा है। बहरहाल, सीरिया और इराक में इस्लामिक स्टेट और अमेरिका एवं उसके मित्र देशों के साथ जारी युद्ध के चलते फिलहाल भारत आईएस की जद से बाहर है। सीरिया और इराक के युद्ध मे चूंकि भारत की कोई भूमिका नहीं है, इसलिए आईएस का सारा ध्यान अमेरिका और उसके मित्र देशों पर केन्द्रित है। भारत को अल कायदा अथवा आईएस से कहीं ज्यादा लश्कर जैसे पाकिस्तान आइएसआई के पिठठू आतंकी संगठनों से खतरा है। इन आतंकी संगठनों के ट्रेनिंग ठिकानों को कैसे ध्वस्त किया जाए, भारत की यही प्राथमिकता होनी चाहिए।
ंपिछले शुक्रवार को फ्रांस की राजधानी पेरिस पर आतंकी हमले ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है। पेरिस में श्रृंखलाबद्ध हमलों में 127 लोग मारे गए हैं ओर 300 से ज्यादा जख्मी हुई है। इन हमलों के समय राष्ट्र्पति ओलांद पेरिस के नेशनल फुटबाल स्टेडियम में मैच देख रहे थे। आशंका है कि आतंकी उन्हें निशाना बनाने चाहते थे। इस स्टेडियम के बाहर आत्मघाती आतंकियों के हमलों में चार लोग मारे गए हैं। स्टेडियम के साथ सटे रेस्ट्रां पर हुए हमले में 18 लोग मारे गए। आतंकी हमले करते रहे और पुलिस देखती ही रह गई। 2008 के मुंबई हमले, इस वर्ष अप्रैल में केन्या के गरिसा यूनिवर्सिटी हमले और 31 अक्टूबर को मिस्त्र के सिनाई क्षेत्र में रुसी विमान हादसे ने विकसित देशों को इतना विचलित नहीं किया था जितना पेरिस हमले ने किया है। 11 सितंबर 2001 में अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर अल-कायदा आतंकियों के हमले के 14 वर्ष बाद पेरिस पर हमले करके इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने फ्रांस समेत अमेरिका और उसके मित्र देशों को ललकारा है। इससे पश्चिम देशों का तिलमिलाना स्वभाविक है। द्धितीय विश्व युद्ध के बाद फ्रांस ने पहली बार देश में आपातकाल लगाया है। इससे पता चलता है कि फ्रांस ताजा हमले से किस कद्र विचलित है। इस साल जनवरी माह में साप्ताहिक चार्ली हब्दो पत्रिका के कार्यालय पर यमन स्थित अल-कायदा के आतंकियों के हमले के बाद फ्रांस की राजधानी पेरिस में यह दूसरा आतंकी हमला है। चार्ली हब्दो हमले में 11 लोग मारे गए थे। यही फ्रांस की सबसे बडी चिंता हे। आईएस आतंकियों ने धमकी दी है कि अभी तो बस शुरुआत है, और हमले होते रहेंगे । सीरिया में अमेरिका के साथ मिलकर आईएस ठिकानों पर बार-बार हमला करने के लिए अमेरिका का साथ देने पर आतंकी फ्रांस को अपना निशाना बनाए हुए हैं। इन हमलों के बाद अमेरिका और फ्रांस बदले की कार्रवाई कर सकते हैं। मंगलवार को फ्रांस ने अमेरिका के सहयोग से सीरिया में इस्लामिक स्टेट के गढ रक्का पर भारी हवाई हमले किए। यूनाइटेड अरब अमीरात और जोर्डन से एक साथ दस विमानों से रक्का स्थित आईएस के दो जेहादी ठिकानों को तहस-नहस कर दिया गया। अभी और हमले हो सकते हैं। इस स्थिति के दृष्टिगत आईएस भी बदले की कार्रवाई कर सकता है। यानी फ्रांस पर फिर हमले हो सकते हैं। हिंसा का हिंसा से जवाब देना कतई उचित नहीं है। इससे सिर्फ हिंसा बढ्ती है। सोमवार को तुर्की के अंतालिया में जिस समय जी-20 शिखर सम्मेलन में दुनिया के शीर्ष नेता आतंक पर एकजुटता का संकल्प ले रहे थे, उसी दौरान राजधानी अंकारा में अईएस के एक आत्मघाती जेहादी ने गिरफ्तारी से बचने के लिए चार पुलिसकर्मियों को जख्मी कर डाला। यह आतंकी सम्मेलन को निशाना बनाने की फिराक में था। इंटेलीजेंस एजेंसियों ने आगाह किया है कि सीरिया से यूरोप पहुंच रहे लाखों शरणार्थियों में आईएस आतंकियों ने जबरदस्त घुसपैठ कर रखी है और हजारों आतंकी पूरे यूरोप और अमेरिका में फैल चुके हैं। पेरिस हमले ने पूरे विश्व को साफ-साफ षब्दों में चेतावनी दी है कि इस्लामिक आतंक इस समय सबसे बडी चुनौती है और इससे शिखर सम्मलेनों में बडी-बडी बातें करके नहीं निपटा जा सकता। भारत लंबे समय से आतंक का दंश झेल रहा है और पश्चिम आतंक के विश्व व्यापी खतरे से आगाह करता रहा है। बहरहाल, सीरिया और इराक में इस्लामिक स्टेट और अमेरिका एवं उसके मित्र देशों के साथ जारी युद्ध के चलते फिलहाल भारत आईएस की जद से बाहर है। सीरिया और इराक के युद्ध मे चूंकि भारत की कोई भूमिका नहीं है, इसलिए आईएस का सारा ध्यान अमेरिका और उसके मित्र देशों पर केन्द्रित है। भारत को अल कायदा अथवा आईएस से कहीं ज्यादा लश्कर जैसे पाकिस्तान आइएसआई के पिठठू आतंकी संगठनों से खतरा है। इन आतंकी संगठनों के ट्रेनिंग ठिकानों को कैसे ध्वस्त किया जाए, भारत की यही प्राथमिकता होनी चाहिए।
सोमवार, 16 नवंबर 2015
A Tribute to Gurujee" Ram Dayal Neeraj"
Posted on 3:24 pm by mnfaindia.blogspot.com/
The demise of Ram Dayal Neeraj has left a void in Himachali folk theatre. The folk theatre in Himachal has almost, been lost and new generation are not even aware of it. Gurujee- as was Neeraj known in his circle-was a votary of the Himchali folk art, especially, the Kariyala and Banthada. the popular folk theatre forms of the state. These folks threatre once used to be an inevitable part of entertainment and community life staged regularly in upper Himachali villages. The Kariyala and Banthada are the local version of dramas usually built around certain typical character-types. Any available space in the middle of a field marked by two or three feet high poles with cords tied round them, could provide the stage for the folk-drama. Audience used to sir around such a stage. All these descriptions were told to me by Gurujee with whom I had worked in Himachal Public Relations Department. Apart from literary luminary like Ram Dayal Neeraj, the department then had leading writers like Zia Siddique, Sriniwas Srikant, Kisore Lal Vaidya and later Keshan Narain, besides two department jewels- SK Bedi and HL Vaidya. The presence of scholarly men in the department had then earned it a special place in the IAS dominated bureaucracy. Dr. YS Parmar, the first chief minister of the sate and the architect of Himachal state had great admiration for Neeaj and it was he who brought him to the state PR department. Neeraj was responsible for bringing out the popular literary magazine-Himprastha. Normally, a govt-run magazine rarely used to be popular among writers and intellectuals. But "Himprastha" was exception and till today, it is quite popular with them. Neeraj's love for local folk theatre was immense and he used to discuss the subject for hours together. He also loved photography and had a collections of some rare photographs. Later when I started MNFA, he shared some of his photographs with me. Even professional photographs were amazed to see his mastery in photography. He lived life in its elementary forms, had a rustic sense of humour and remained down-to-the earth till the end. It was after about two decades in 2003-04 when I met Neeraj. Despite his advanced age, his love for folk theatre didn't diminish an inch. Whenever we met, discussed the folk theatre for hours and I got some space in the newspaper I worked for arranged for the Himahali folk art. Neeraj was the avid reader and widely traveledconfessed to me once alas he could script travelogues like Pandit Rahul Sankrityayan did. Life had taught him hard lessons. In his youthful days, he once wandered to Karachi , had no money and survived on fig, leaves and water. He joined Niranjani Akara, shorn off head, abandoned rich food but became plumper . Akhara named him Ramchandra Giri. However, Neeraj had to run away from akhara as he was being forced to convert to naga sadhu. He went to Mumbai and joined a Ramlila company and later got an opportunity of act in films ‘Zingaro’ and ‘Fashionable India’, 'Bambai ki Billi’ and child Tulsidas in ‘Sant Tulsidas’ movie. However, charm of tinsel world couldn't tie him down to film line. He came back to Delhi, did his matriculation and later Prabhakar (literary exam) and pen-named himself as "Neeraj". Henceforth, he was known as Ram Dayal Neeraj. Ultimately. Neeraj returned to his native town Nahan and took up a teaching job and later joined Praja Mandal- the freedom movement of hills. After Himachal came into existence in 1948, Neeraj joined PR department ad retired from their as Deputy Director. After retirement, he worked for Hindi Tribune as its Shimla reporter. He was a true human being, very helpful, full of virtues and never harboured any illwill. Will miss yu "Gurujee".
शनिवार, 14 नवंबर 2015
Modi's UK Visit: Diplomacy vs Human Rights
Posted on 9:23 am by mnfaindia.blogspot.com/
अब हम अगेंजों से बडे
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तीन दिवसीय इग्लैंड यात्रा कई अर्थों में अहम है। गुजरात दंगों के चलते ब्रिटेन ने मानवाधिकारों के हनन का हवाला देकर एक दशक से अधिक समय तक नरेन्द्र मोदी को “अछूत“ मान रखा था और उनका बहिश्कार कर रखा था। और अब वही अग्रेंज उन्हें सिर -आंखों पर बिठा रहे हैं। वैसे लोकसभा चुनाव से कुछ समय पहले जैसे ही ब्रिटेन को लगने लगा कि नरेन्द्र मोदी भारत के अगले प्रधानमंत्री बन सकते हैं, अग्रेजों ने अक्टूबर 2012 से ही मोदी के दरबार में हाजिरी लगानी शुरु कर दी थी। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी अभी तक 30 से ज्यादा देशों की यात्रा कर चुके हैं मगर ब्रिटेन की यह उनकी पहली यात्रा है जबकि अंग्रेजों से भारत के बहुत पुराने रिश्ते हैं। ब्रिटेन में भारतीय मूल के 15 लाख से ज्यादा लोग है और इनमेंसे 10 सांसद है और 24 हाउस ऑफ लार्ड के सदस्य। भारत की टाटा मोटर्स ब्रिटेन की सबसे बडी रोजगार देने वाली कंपनी है। मोदी अपनी यात्रा के दौरान इस फैक्टरी का दौरा भी करेंगे। टाटा स्टील भी ब्रिटेन की बडी कंपनियों में शुमार है। कैमरून प्रधानमंत्री बनने के बाद अब तक तीन बार भारत की यात्रा कर चुके हैं। इन सब तथ्यों के दृषिगत अग्रेंजों को लग रहा था कि मोदी की उपेक्षा करके उन्होंने उनका जो अपमान किया था, प्रधानमंत्री संभवतय उसे भूल नहीं पाए हैं। इसी भूल को सुधारने के लिए ब्रितानवी की कंजरवेटिव पार्टी सरकार ने मोदी के सम्मान में कोई कसर नहीं छोडी है। इस तथ्य के बावजूद कि ब्रिटेन का उदारख्याली एवं मानवाधिकारी उन्मुख समाज मोदी को आज भी संदेह की दृष्टि से देखता है। भारत में हाल ही की असहिष्णुता की घटनाओं ने मानवाधिकार के लिए लडने वाले ब्रितानवी समाज को और ज्यादा विचलित किया है। इन घटनाओं से प्रधानमंत्री की छवि भी प्रभावित हुई है। मोदी की तीन दिवसीय यात्रा के पहले ही दिन उनके खिलाफ प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन भी किए गए और “ असहिष्णु भारत“ और प्रधानमंत्री के खिलाफ नारे भी लगाए गए। बुद्धिजीवियों और शिक्षाशास्त्रियों ने मोदी के खिलाफ मुहिम छेड रखी है। पत्रकारों ने उनसे “असहिष्णुता “ और दंगों को लेकर कई असहज सवाल भी किए मगर मोदी विचलित नहीं हुए और बडी निपुणता से हर सवाल का सटीक जबाव दिया। यह सब उनकी अमेरिका की पहली यात्रा के दौरान भी हुआ था। प्रधानमंत्री डैविड कैमरून इस सच्चाई से बखूबी वाकिफ हैं कि भारत से कहीं ज्यादा ब्रिटेन को दुनिया की इमरजिंग एवं विशाल भारतीय मार्केट की जरुरत है। भारत भी ब्रिटेन के साथ अंतरंग संबंध चाहता है। भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी यह बात भली-भांति जानते हैं कि अगर दुनिया को फतेह करना है, तो भारत को भी पश्चिम की तरह उदार और मानवाधिकार फ्रेंडली बनना होगा। इसीलिए, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यात्रा के पहले ही दिन “असहिष्णुता" पर देश की गहरी चिंता जताते हुए दुनिया को आश्वस्त किया कि उनकी सरकार हर व्यक्ति की आजादी की पूरी तरह से रक्षा करेगी। यात्रा के दूसरे दिन शुक्रवार को ब्रिटेन और भारत के बीच न्यूक्लियर संधि के अलावा, रक्षा और साइबर सिक्युरिटी पर नौ अरब पाउंड ( 92 हजार करोड रुपए) के करार हुए। प्रधानमंत्री ने लंदन की स्टॉक मार्केट में भारतीय मुद्रा में रेलवे बांड भी जारी किया। अमूमन, न्यूक्लियर बगैर दांव-पेच भिडाए और शर्तों के संभव नहीं हो पाता है। मगर सिविल न्यूक्लियर करार करके भारत और इग्ंलैड ने एक-दूसरे के प्रति गहरा विश्वास व्यक्त किया है। मोदी ने कैमरून से ब्रिटेन स्थित कुछ गुरुद्वारो में सिख खाडकूओं को भारत में आतंक फैलाने के लिए वित्तीय मदद देने का मुद्दा भी उठाया। कडे आव्रजन (इमीग्रेषन) कानून के चलते ब्रिटेन में भारतीय छात्रो की गिरती संख्या पर भी प्रधानमंत्री ने चिंता जताई। इंग्लैड सदियो से भारतीय छात्रों की पहली पसंद रहा है। मोदी के साथ सयुंक्त पत्रकार सम्मेलन में ब्रिटिश प्रधानमत्री ने सुरक्षा परिशद में भारत की स्थाई सदस्यता को भरपूर समर्थन देने का आश्वाशन दिया। शनिवार को यात्रा के समापन से कुछ और करार हो सकते हैं। प्रधानमंत्री की ब्रिटेन यात्रा से ब्रितानवी समाज में भी उनके बारे फैली भ्रांतियां दूर् हो सकती हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तीन दिवसीय इग्लैंड यात्रा कई अर्थों में अहम है। गुजरात दंगों के चलते ब्रिटेन ने मानवाधिकारों के हनन का हवाला देकर एक दशक से अधिक समय तक नरेन्द्र मोदी को “अछूत“ मान रखा था और उनका बहिश्कार कर रखा था। और अब वही अग्रेंज उन्हें सिर -आंखों पर बिठा रहे हैं। वैसे लोकसभा चुनाव से कुछ समय पहले जैसे ही ब्रिटेन को लगने लगा कि नरेन्द्र मोदी भारत के अगले प्रधानमंत्री बन सकते हैं, अग्रेजों ने अक्टूबर 2012 से ही मोदी के दरबार में हाजिरी लगानी शुरु कर दी थी। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी अभी तक 30 से ज्यादा देशों की यात्रा कर चुके हैं मगर ब्रिटेन की यह उनकी पहली यात्रा है जबकि अंग्रेजों से भारत के बहुत पुराने रिश्ते हैं। ब्रिटेन में भारतीय मूल के 15 लाख से ज्यादा लोग है और इनमेंसे 10 सांसद है और 24 हाउस ऑफ लार्ड के सदस्य। भारत की टाटा मोटर्स ब्रिटेन की सबसे बडी रोजगार देने वाली कंपनी है। मोदी अपनी यात्रा के दौरान इस फैक्टरी का दौरा भी करेंगे। टाटा स्टील भी ब्रिटेन की बडी कंपनियों में शुमार है। कैमरून प्रधानमंत्री बनने के बाद अब तक तीन बार भारत की यात्रा कर चुके हैं। इन सब तथ्यों के दृषिगत अग्रेंजों को लग रहा था कि मोदी की उपेक्षा करके उन्होंने उनका जो अपमान किया था, प्रधानमंत्री संभवतय उसे भूल नहीं पाए हैं। इसी भूल को सुधारने के लिए ब्रितानवी की कंजरवेटिव पार्टी सरकार ने मोदी के सम्मान में कोई कसर नहीं छोडी है। इस तथ्य के बावजूद कि ब्रिटेन का उदारख्याली एवं मानवाधिकारी उन्मुख समाज मोदी को आज भी संदेह की दृष्टि से देखता है। भारत में हाल ही की असहिष्णुता की घटनाओं ने मानवाधिकार के लिए लडने वाले ब्रितानवी समाज को और ज्यादा विचलित किया है। इन घटनाओं से प्रधानमंत्री की छवि भी प्रभावित हुई है। मोदी की तीन दिवसीय यात्रा के पहले ही दिन उनके खिलाफ प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन भी किए गए और “ असहिष्णु भारत“ और प्रधानमंत्री के खिलाफ नारे भी लगाए गए। बुद्धिजीवियों और शिक्षाशास्त्रियों ने मोदी के खिलाफ मुहिम छेड रखी है। पत्रकारों ने उनसे “असहिष्णुता “ और दंगों को लेकर कई असहज सवाल भी किए मगर मोदी विचलित नहीं हुए और बडी निपुणता से हर सवाल का सटीक जबाव दिया। यह सब उनकी अमेरिका की पहली यात्रा के दौरान भी हुआ था। प्रधानमंत्री डैविड कैमरून इस सच्चाई से बखूबी वाकिफ हैं कि भारत से कहीं ज्यादा ब्रिटेन को दुनिया की इमरजिंग एवं विशाल भारतीय मार्केट की जरुरत है। भारत भी ब्रिटेन के साथ अंतरंग संबंध चाहता है। भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी यह बात भली-भांति जानते हैं कि अगर दुनिया को फतेह करना है, तो भारत को भी पश्चिम की तरह उदार और मानवाधिकार फ्रेंडली बनना होगा। इसीलिए, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यात्रा के पहले ही दिन “असहिष्णुता" पर देश की गहरी चिंता जताते हुए दुनिया को आश्वस्त किया कि उनकी सरकार हर व्यक्ति की आजादी की पूरी तरह से रक्षा करेगी। यात्रा के दूसरे दिन शुक्रवार को ब्रिटेन और भारत के बीच न्यूक्लियर संधि के अलावा, रक्षा और साइबर सिक्युरिटी पर नौ अरब पाउंड ( 92 हजार करोड रुपए) के करार हुए। प्रधानमंत्री ने लंदन की स्टॉक मार्केट में भारतीय मुद्रा में रेलवे बांड भी जारी किया। अमूमन, न्यूक्लियर बगैर दांव-पेच भिडाए और शर्तों के संभव नहीं हो पाता है। मगर सिविल न्यूक्लियर करार करके भारत और इग्ंलैड ने एक-दूसरे के प्रति गहरा विश्वास व्यक्त किया है। मोदी ने कैमरून से ब्रिटेन स्थित कुछ गुरुद्वारो में सिख खाडकूओं को भारत में आतंक फैलाने के लिए वित्तीय मदद देने का मुद्दा भी उठाया। कडे आव्रजन (इमीग्रेषन) कानून के चलते ब्रिटेन में भारतीय छात्रो की गिरती संख्या पर भी प्रधानमंत्री ने चिंता जताई। इंग्लैड सदियो से भारतीय छात्रों की पहली पसंद रहा है। मोदी के साथ सयुंक्त पत्रकार सम्मेलन में ब्रिटिश प्रधानमत्री ने सुरक्षा परिशद में भारत की स्थाई सदस्यता को भरपूर समर्थन देने का आश्वाशन दिया। शनिवार को यात्रा के समापन से कुछ और करार हो सकते हैं। प्रधानमंत्री की ब्रिटेन यात्रा से ब्रितानवी समाज में भी उनके बारे फैली भ्रांतियां दूर् हो सकती हैं।
शुक्रवार, 13 नवंबर 2015
The Relevance of Sarbat Khalsa ?
Posted on 9:07 am by mnfaindia.blogspot.com/
सरबत खालसा की प्रासंगिकता
पंजाब में गरमपंथी उतरोत्तर नरमपंथियों पर भारी पडते जा रहे हैं। मंगलवार (दस नवंबर) को अमृतसर के निकट चब्बे गांव में आहुत सरबत खालसा में भारी संख्या में सिखों की उपस्थिति यही संकेत दे रही है। गरमपंथी सिख संगठनों द्वारा बुलाए गए इस सरबत खालसा को विफल करने की सारी कोशिशें ओर रुकावटें नाकाम साबित हुईं। सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) ने भी इस सरबत खालसा को अवैध करार दिया। एसजीपीसी का कहना था कि केवल वही सरबत खालसा बुलाने के लिए अधिकृत है। अकाल तख्त के जत्थेदार भी इस सरबत खालसा को नाकाम करने की कोशिश करते रहे। इसके बावजूद देश -विदेश से भारी संख्या से सिखों का सरबत खालसा में भाग लेना साफ-साफ संकेत दे रहा है कि पंजाब में बयार बादल द्वारा नियंत्रित एसजीपीसी के विरुद्ध बह रही है। 29 साल बाद बुलाए गए इस सरबत खालसा की लय पूरी तरह वैसी ही थी, जैसी 1986 में थी। लगभग वही प्रस्ताव पारित किए गए, जो 26 जनवरी 1986 के सरबत खालसा में पारित किए गए थे। 1986 के सरबत खालसा में भी इस बार की तरह तीनों जत्थेदारों को हटाया गया था। तब भी एसजीपीसी को भंग किया गया था। अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी गुरबचन सिंह को हटाकर उनकी जगह पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारे जगतार सिंह हवारा को जत्थेदार नियुक्त करके गरमपंथियों ने साफ कर जताया है कि वे देश के कानून का कितना सम्मान करते हैं। सिखों में सरबत खालसा की अपनी गरिमा है। कौम के ज्वलंत धार्मिक मसलों पर चर्चा के लिए सरबत खालसा बुलाया जाता है ताकि महत्वपूर्ण मसलों पर संगत की राय ली जा सके। छोटे-मोटे मसलों के लिए सरबत खालसा बुलाने की रिवायत नहीं है। इस बात के दृष्टिगत , 10 नवंबर, 2015 को आहुत सरबत खालसा की प्रासंगिकता पर सवाल उठ सकता है। सिख कौम इस समय ऐसे किसी गंभीर धार्मिक संकट से नहीं गुजर रही है कि सरबत खालसा बुलाने की नौबत आ जाए। सरबत खालसा का इतिहास इस बात पर दृष्टि डाल सकता है। अधिकतर सरबत खालसा अठाहरवीं सदी में मुगल काल में आहुत किय गए थे। तब हिन्दू और सिख कौम भारी धार्मिक संकट से झूज रही थी। पहली बार गुरु गोबिंद सिंह जी ने 1708 को सरबत खालसा बुलाया था। उस समय मुगल शासक बहादुर कौम सिखों पर तरह-तरह के जुल्म ढा रहे थे। इनका मुकाबला करने के लिए सरबत खालसा बुलाया गया था। उसके बाद 1723, 1726, 1733, 1745 और 1748 में सरबत खालसा बुलाए गए क्योंकि तब सिख कौम संकटग्रस्त थी। उसके बाद लगभग सवा दो सौ साल बाद 26 जनवरी 1986 को ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार के बाद आजाद भारत में पहली बार सरबत खालसा बुलाया गया था। इस सरबत खालसा में पांच सदस्यीय पंथक कमेटी ने बाकायदा खालिस्तान की घोषणा की थी। आजादी से पहले के हालात और आजादी के बाद के हालात में काफी अंतर है। पंजाब देश का समृद्धतम राज्य है। अस्सी के दशक में आतंक का दंष झेलने से पहले पंजाब खुशाहल और उन्नत प्रांत था और इसकी कोई सानी नहीं थी। आज भी पंजाब अन्न पैदा करने वाला देश का अग्रणी राज्य है। इस स्थिति में गरमपंथियों द्वारा 10 नवंबर को बुलाया गया सरबत खालसा धार्मिक मसलों पर चर्चा की अपेक्षा राजनीतिक ज्यादा लगता है। दरअसल, गरमपंथी लंबे समय से बादल परिवार की पार्टी शिरोमणि अकाली दल के वर्चस्व वाली एसजीपीसी पर कब्जा करने की फिराक में हैं मगर आज तक वे सिखों की इस सर्वोच्च धार्मिक संस्था को हथियाने में कामयाब नहीं हो पाए हैं । कुछ दिन पहले गरमपंथियों ने पंच प्यारों की मदद से एसजीपीसी पर हमला बोला था। इसके फलस्वरुप, एसजीपीसी ने पंच प्यारों को निलंबित भी कर दिया मगर बाद में संगत के दबाव पर उनका निलबंन वापस ले लिया गया। अब गरमपंथी सरबत खालसा के बरास्ता एसजीपीसी पर कब्जा करना चाहते हैं। इससे पंथ में गरमपंथी और नरमपंथियो के बीच टकराव बढने के पूरे आसार हैं। बुधवार दीवाली (बंदी छोड दिवस) पर इस टकराव की झलक भी दिखाई दी। बंदी छोड दिवस पर अकाल तख्त जत्थेदार के परंपरागत संबोधन के समय उनके खिलाफ नारे लगाए गए और उन्हें काले झंडे दिखाए गए। नजरबंद किए जाने के बावजूद सरबत खासला द्वारा नियुक्त्त कार्यकारी जत्थेदार पूर्व सांसद ध्यान सिंह मंड ने स्वर्ण मंदिर पहुंच कर अलग से अपना संबोधन पढा। तमाम परिस्थितियां पंजाब को और ज्यादा अशांत करने की तरफ इशारा कर रही है।
पंजाब में गरमपंथी उतरोत्तर नरमपंथियों पर भारी पडते जा रहे हैं। मंगलवार (दस नवंबर) को अमृतसर के निकट चब्बे गांव में आहुत सरबत खालसा में भारी संख्या में सिखों की उपस्थिति यही संकेत दे रही है। गरमपंथी सिख संगठनों द्वारा बुलाए गए इस सरबत खालसा को विफल करने की सारी कोशिशें ओर रुकावटें नाकाम साबित हुईं। सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) ने भी इस सरबत खालसा को अवैध करार दिया। एसजीपीसी का कहना था कि केवल वही सरबत खालसा बुलाने के लिए अधिकृत है। अकाल तख्त के जत्थेदार भी इस सरबत खालसा को नाकाम करने की कोशिश करते रहे। इसके बावजूद देश -विदेश से भारी संख्या से सिखों का सरबत खालसा में भाग लेना साफ-साफ संकेत दे रहा है कि पंजाब में बयार बादल द्वारा नियंत्रित एसजीपीसी के विरुद्ध बह रही है। 29 साल बाद बुलाए गए इस सरबत खालसा की लय पूरी तरह वैसी ही थी, जैसी 1986 में थी। लगभग वही प्रस्ताव पारित किए गए, जो 26 जनवरी 1986 के सरबत खालसा में पारित किए गए थे। 1986 के सरबत खालसा में भी इस बार की तरह तीनों जत्थेदारों को हटाया गया था। तब भी एसजीपीसी को भंग किया गया था। अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी गुरबचन सिंह को हटाकर उनकी जगह पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारे जगतार सिंह हवारा को जत्थेदार नियुक्त करके गरमपंथियों ने साफ कर जताया है कि वे देश के कानून का कितना सम्मान करते हैं। सिखों में सरबत खालसा की अपनी गरिमा है। कौम के ज्वलंत धार्मिक मसलों पर चर्चा के लिए सरबत खालसा बुलाया जाता है ताकि महत्वपूर्ण मसलों पर संगत की राय ली जा सके। छोटे-मोटे मसलों के लिए सरबत खालसा बुलाने की रिवायत नहीं है। इस बात के दृष्टिगत , 10 नवंबर, 2015 को आहुत सरबत खालसा की प्रासंगिकता पर सवाल उठ सकता है। सिख कौम इस समय ऐसे किसी गंभीर धार्मिक संकट से नहीं गुजर रही है कि सरबत खालसा बुलाने की नौबत आ जाए। सरबत खालसा का इतिहास इस बात पर दृष्टि डाल सकता है। अधिकतर सरबत खालसा अठाहरवीं सदी में मुगल काल में आहुत किय गए थे। तब हिन्दू और सिख कौम भारी धार्मिक संकट से झूज रही थी। पहली बार गुरु गोबिंद सिंह जी ने 1708 को सरबत खालसा बुलाया था। उस समय मुगल शासक बहादुर कौम सिखों पर तरह-तरह के जुल्म ढा रहे थे। इनका मुकाबला करने के लिए सरबत खालसा बुलाया गया था। उसके बाद 1723, 1726, 1733, 1745 और 1748 में सरबत खालसा बुलाए गए क्योंकि तब सिख कौम संकटग्रस्त थी। उसके बाद लगभग सवा दो सौ साल बाद 26 जनवरी 1986 को ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार के बाद आजाद भारत में पहली बार सरबत खालसा बुलाया गया था। इस सरबत खालसा में पांच सदस्यीय पंथक कमेटी ने बाकायदा खालिस्तान की घोषणा की थी। आजादी से पहले के हालात और आजादी के बाद के हालात में काफी अंतर है। पंजाब देश का समृद्धतम राज्य है। अस्सी के दशक में आतंक का दंष झेलने से पहले पंजाब खुशाहल और उन्नत प्रांत था और इसकी कोई सानी नहीं थी। आज भी पंजाब अन्न पैदा करने वाला देश का अग्रणी राज्य है। इस स्थिति में गरमपंथियों द्वारा 10 नवंबर को बुलाया गया सरबत खालसा धार्मिक मसलों पर चर्चा की अपेक्षा राजनीतिक ज्यादा लगता है। दरअसल, गरमपंथी लंबे समय से बादल परिवार की पार्टी शिरोमणि अकाली दल के वर्चस्व वाली एसजीपीसी पर कब्जा करने की फिराक में हैं मगर आज तक वे सिखों की इस सर्वोच्च धार्मिक संस्था को हथियाने में कामयाब नहीं हो पाए हैं । कुछ दिन पहले गरमपंथियों ने पंच प्यारों की मदद से एसजीपीसी पर हमला बोला था। इसके फलस्वरुप, एसजीपीसी ने पंच प्यारों को निलंबित भी कर दिया मगर बाद में संगत के दबाव पर उनका निलबंन वापस ले लिया गया। अब गरमपंथी सरबत खालसा के बरास्ता एसजीपीसी पर कब्जा करना चाहते हैं। इससे पंथ में गरमपंथी और नरमपंथियो के बीच टकराव बढने के पूरे आसार हैं। बुधवार दीवाली (बंदी छोड दिवस) पर इस टकराव की झलक भी दिखाई दी। बंदी छोड दिवस पर अकाल तख्त जत्थेदार के परंपरागत संबोधन के समय उनके खिलाफ नारे लगाए गए और उन्हें काले झंडे दिखाए गए। नजरबंद किए जाने के बावजूद सरबत खासला द्वारा नियुक्त्त कार्यकारी जत्थेदार पूर्व सांसद ध्यान सिंह मंड ने स्वर्ण मंदिर पहुंच कर अलग से अपना संबोधन पढा। तमाम परिस्थितियां पंजाब को और ज्यादा अशांत करने की तरफ इशारा कर रही है।
गुरुवार, 12 नवंबर 2015
Try Willow Bark Tea for Headache and Fever
Posted on 7:01 pm by mnfaindia.blogspot.com/
While searching some traditional cure for the sugar related diseases (diabetes), I have come across willow bark tea. I wish to share the the wonderful medical value of this tea. I vividly remember, how my "Nana" (grandy from mom side) used to cure us from such desi medicines and one of these was willow bark tea. he was a desi medical practitioner and did well during his lifetime. It is a potent cure for headache and fever- a common problem with all and sundry. The willow bark contains a form of acetyl salicylic acid, also known as aspirin; duct tape to help with setting broken bones; and duct tape or superglue to treat plantar warts; and Kogel mogel to treat sore throat. It is the bark from several varieties of the willow tree, including white willow or European willow, black willow or pussy willow, crack willow, purple willow, and others. The bark is used to make medicine. Willow bark acts a lot like aspirin, so it is used for pain, including headache, muscle pain, menstrual cramps, rheumatoid arthritis (RA), osteoarthritis, gout, and a disease of the spine called ankylosing spondylitis. Willow bark is also used for fever, the common cold, flu, and weight loss. The use of willow bark dates to the time of Hippocrates (400 BC) when people were advised to chew on the bark to reduce fever and inflammation. Willow bark has been used throughout the centuries in China and Europe, and continues to be used today for the treatment of pain (particularly low back pain and osteoarthritis), headache, and inflammatory conditions, such as bursitis and tendinitis. If combined with the powerful anti-inflammatory herbal plant compounds (called flavonoids), salicin can be pain-relieving and anti-inflammatory effects of the herb. During nineteenth century, salicin was used to develop aspirin. White willow appears to bring pain relief more slowly than aspirin, but its effects may last longer. Some evidence Suggests that it is less likely to cause gastrointestinal side effects than other pain relievers, such as ibuprofen (Advil) and other nonsteroidal anti-inflammatory drugs, do. However, studies have not shown this beyond all doubt, and people who are prone to stomach upset may want to avoid willow bark. Willow bark appears to be effective for back pain. In a well-designed study of nearly 200 people with low back pain, those who received willow bark experienced a significant improvement in pain compared to those who received placebo. People who received higher doses of willow bark (240 mg salicin) had more significant pain relief than those who received low doses (120 mg salicin). Several studies show that willow is more effective at reducing pain from osteoarthritis than placebo. In a small study of people with osteoarthritis of the neck or lower back, those who received willow bark experienced significant improvement in symptoms compared to those who received placebo. A similar study of 78 people hospitalized with osteoarthritis of the knee or hip joint found that people who received willow bark had significant pain relief compared to those who received placebo. Professional herbalists recommend willow bark for the following conditions, however, more research is needed. There is no harm in trying the tea as it has no side effects.
बुधवार, 11 नवंबर 2015
Diwali: Celebration of Life And Its Goodness
Posted on 11:59 am by mnfaindia.blogspot.com/
Today we are celebrating the "festival of lights"-Deepavali. It is celebrated with gusto more in North India. But, I am not as enthusiastic for celebrating the festival as I used to be during my childhood. May because of my age but I find, over the years, youngster have also developed cold feet to the festival. They find internet and whats-app more entertaining than bursting firecrackers. Not surprising that the locality where I live, there were less noise of firecrackers' bursting.The reports in local media suggests even the sale of sweets has come down considerably. the commercialization of this most important Hindu festival has undermined the very spirit of Diwali. Our fair and festivals have rich cultural and social ethos engrossed in their festivity. By converting the festivity into trade and commerce activities, its cultural and social significance is bound to collapse. The new generation hasn't been groomed by our rich cultural ethos. As such, they have no affiliation to the spirit of festivity. It was quite different during my childhood days. The festival enthusiasm used to be at its peak. There were no shopping frenzies , and exchange of costly gifts to promote the business. On the contrary, it was a simple and down-to-the- earth affair. My mother would start the preparations right from the Dussehra- the day effigy of the Ravan is burnt. The entire house would be white-washed and painted fresh. Mother would make Rangoli to welcome Laxmi (Its different matter, she never visited our house). New clothes would be made ready for wearing on Diwali and sweets prepared at home. On Diwali, mother would cook special dishes for us. We used to wait for this festival all over the years. Ours was a traditional hilly village nestled amidst the rocky terrain in inner Himalaya. As the maize crop was just harvested, boys were assigned the duty of removing stubble and collect these for firewood on Diwali. We would religiously do the work. In fact, there used to be a sort of competition among youngster for making the firewood as large. The festival spirit would continue till Baiya-dooj, another occasion for getting sweets. Diwali is the most important festival celebrated in north India, celebrated by all sections of the society. It begins with "Dhanteras" and concludes on "Bhaiya Dooj- the day brother and sister. People buy gold-silver and utensils on "Dhanteras" to lay the foundation of prosperous life. The "Dhanteras" is considered as auspicious for buying. The next day is Chhoti (small) Diwali) or the day of Narak Chatudarshi" meant for worshiping for long life.And On Diwali, the Laxshmi ( Godess of Prosperity) and Ganesh (God of Commerce) are worshiped. Next to Diwali is the "Gowardhan Day" when traders start fresh and farmers and skilled workers worship their skill. And last day of the festival is the day for brother and sister to cement their sibling ties. The five-day celebrations mean a lot of things- from social and economic festivity. all woven in a way of spirituality. The crass commercialization has no space in this traditional festivity. It was this spirituality. of Diwali that US was attracted towards the festival of lights. In 2003, the Diwali was for the first time celebrated in "White House" and in 2007, the festival was officially recognized. In 2009, Barack Obama was the first US president to celebrate Diwali personally. Apart from Hindus, Sikh celebrate the festival as "Bandi Chhod Diwas" and Jain community as "Nirvana" of Mahavir. The bursting of firecrackers is another aspect of Diwali that has gone wrong. It is estimated that every year firecrackers of more than Rs 350 crore are burst in India on Diwali and around 10 percent of people are hurt by burning and firecrackers' bursting related incidences. On an average, 20 people are killed every year in factories of Shivakashi- the country leading firecrackers maker in Tamil Nadu. Over the years the celebrations of Diwali has turned into commercial fiestas. Diwali is a celebration of life, its enjoyment and goodness. If we want to celebrate Diwali in its true spirit, we need to learn the message the festival delivers to us. The festival teaches us the way the dark night of Kartik Month is illuminated with lights, we need to illuminate our society, our people and the country.And all of us know how to illuminate the country.
Happy Diwali: lluminate Light of Knowledge And Love
Posted on 10:29 am by mnfaindia.blogspot.com/
ज्ञान और प्रेम के दीप जलाएं
देश में आज (बुधवार को) दीपावली का पर्व धूमधाम एवं हर्षोल्लास से मनाया जाएगा। भारत में यह सबसे बडा त्यौहार होता है और पूरे पांच दिन चलता है। अंधकार पर रोशनी की विजय के लिए इस त्योहार को मनाया जाता है। देश में मनाए जाने वाले सभी त्योहारों में दीपावली का सामाजिक और आर्थिक विशेष महत्व है। दीपावली स्वच्छता और प्रकाश का पर्व है। उपनिषद् में दीपावली को लेकर कहा गया है “ तमसो मा ज्योतिर्गमय“, अर्थात अंधेरे से प्रकाश की ओर जाएं“। इसी के दृश्टिगत सदियों से अखंड भारत में दीपावली को घर की साफ-सफाई की जाती है, दीए जलाए जाते हैं, रिश्तेदारो -मित्रों और पडोसियों को तोहफे दिए जाते हैं और मिठाइयां बांटी जाती हैं। कार्तिक मास की सघन अमावस्या की रात दीपावली पूरा देश जब रोशनी में जगमगा उठता है, यह आलोकिक छठा देखने लायक होती है । दीपावली के आध्यात्मिक महत्व को देखते हुए 2003 में अमेरिका के राष्ट्र्पति निवास “व्हाइट हाउस“ में इसे धूमधाम से मनाया गया था। 2007 में अमेरिका में दीपावली को अधिकृत दर्जा दिया गया और 2009 में व्हाइट हाउस में व्यक्तिगत रुप से दीपावली मनाने वाले बराक ओबामा पहले अमेरिकी राष्टृपति बने। नेपाल में भी भारत की तरह दीपावली धूमधाम से मनाई जाती है इसी दिन नेपाली संवत वर्ष भी शुरु होता है। फिजी और मारिशस में दीपावली पर बाकायदा सार्वजनिक अवकाश रहता है। भारत में दीपावली पर्वों का समूह है। दशहरे के तुरंत बाद से ही दीपावली की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। घरों-दुकानों में रंग-रोगन किया जाता है। घरों में रंगोलियां बनाई जाती हैं। धनतेरस से शुरु होकर भैया दूज को इस त्योहार का समापन होता है। हर दिन मनाए जाने वाले त्योहार का अपना महत्व है। धनतेरस को सोना-चांदी और बर्तनों की खरीदारी कर हम समृद्धि की नींव रखते हैं। इस दिन की खरीदारी को शुभ माना जाता है। धनतेरस के अगले दिन नरक चतुर्दशी अथवा छोटी दीपावली होती है और इस दिन दीर्घायु के लिए यम की पूजा की जाती है। बडी दीपावली को लक्ष्मी और गणेेश की अराधना की जाती है। दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा की जाती है। इस दिन व्यापारी और व्यवसायी अपने बही-खाते बदलकर नई शुरुआत करते हैं। किसान और कामगार अपने औजारों, खेत-खलिहानों और मषीनरी की पूजा करते हैं। और दीपावली त्योहार के अंतिम दिन भाई-बहन का पर्व मनाया जाता है। देश का हर नागरिक दीपावली के महत्व से बखूबी परिचित है। इस त्योहार की विशेषता को रेखांकित करने का मकसद यह है कि हम सदियों की परिपाटी को बस आंख मूंद कर यूं ही निभा रहे हैं। हम हर दीपावली को अरबों रु की आतिशबाजी करते हैं, पटाखे फोडते हैं। इससे जनमानस को शारीरिक रुप से तो नुकसान होता ही है, साल-दर-साल प्रदूषण बढता जा रहा है और पर्यावरण को खासी क्षति पहुंच रही है। भारत में हर साल 350 करोड रु से भी अधिक के पटाखे फूंके जाते हैं। देश में पटाखे बनाने वाली सबसे बडी नगरी तमिल नाडु स्थित शिवकाशी में ही 275 करोड रु के पटाखे बनाए जाते हैं। इनसे 70,000 लोगों को रोजगार तो मिल रहा है मगर हर साल फैक्ट्रियों में आग लगने के कारण औसतन 20 लोग बेमौत मारे जाते हैं। विभिन्न अध्ययन बताते हैं कि दीपावली के अगले कुछ दिनों तक प्रदूषण का स्तर कहीं ज्यादा बढ जाता है और इससे लोगों, विशेषतय बच्चों और वृद्धों की सेहत पर बुरा असर पड रहा है। ऐसी दीवाली का क्या मतलब जिससे प्रदूषण फैले, लोगों का जीन हराम हो जाए , उनकी जानें जाएं और शारिरिक चोट पहुंचे? क्या हमने कभी यह जानने की कोशिश की है कि दीपावली हमें असल में क्या सिखाती है। अज्ञानता, अहंकार, बैमनस्य, अंधविश्वास और बुराइयों के घनघोर अंधकार को मिटा कर ही हम अपने जीवन को सुखमय बना सकते हैं। अपने जीवन में ज्ञान, विनम्रता, भाईचारे, और अच्छाइयों के दीए जलाएं। दीर्घायु के लिए गंदी आदतों से बचें और जीवन में परोपकार के दीए जलाएं। अपने कौशल और सृजनात्मक शक्ति को व्यर्थ के प्रयोजनों में न गंवाएं, अलबत्ता समाज और राष्ट्र सेवा के दीप जलाएं। और सबसे बढ्कर पर्यावरण फ्रेंडली पटाखे फोडें और ग्रीन दीपावली मनाएं। दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं।
मंगलवार, 10 नवंबर 2015
Bihar Results: A warning To Modi-led NDA
Posted on 8:59 am by mnfaindia.blogspot.com/
शानदार जीत, जबरदस्त डिफ्टि....
बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम अभूतपूर्व और ऐतिहासिक हैं। नीतिश कुमार-लालू प्रसाद यादव के महागठबंधन की “शानदार जीत, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा नीत गठबंधन की जबरदस्त डिफ्टि सिर्फ और सिर्फ एक ही संदेश देती हैः “लोकतंत्र जिंदाबाद“। विधनसभा चुनाव नीतिश कुमार की स्वच्छ छवि और सुशासन के कारण जीते गए अथवा लालू प्रसाद के प्रति “सहानुभूति“ के चलते, कारण कुछ भी रहें हों, एक बात एकदम साफ है कि अन्तोगत्वा बिहार में लोकतंत्र जीता है। विधानसभा चुनाव से कुछ समय पहले अगस्त, 2015 में प्रधानमंत्री द्वारा बिहार को दिया गया 1.25 लाख करोड का विशेष आर्थिक पैकेज भी भाजपा के काम नहीं आया और न ही राजग मुखिया लालू प्रसाद के कार्यकाल को “जंगल राज“ बताने की उग्र बातें। गाय, हिंन्दुत्व और “महागठबंधन जीतेगा तो पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे“ (भाजपा अध्यक्ष अमित षाह के बोल) जैसे नारे भी मतदाताओं का ध्रुवीकरण नहीं करा पाए। प्रधानमंत्री का उग्र प्रचार और तीस जनसभाएं भी नीतिश -लालू के महागठबंधन में सेंध नहीं लगा पाई। 30 केन्द्रीय मंत्री और भारी-भरकम चुनावी लाव-लश्कर भी क्षत्रपों की लोकप्रियता को मात नहीं दे पाए। इसके क्या मायने लगाए जाएं? क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति जनता का मोहभंग हो गया है? अथवा मोदी के पास अब लोक-लुभावनी नारें का टोटा पड गया है। जुमां-जुमां डेढ साल पहले लोकसभा चुनाव में बिहार की जनता ने भाजपा नीत राजग को प्रचंड जनादेश (40 मेंसे 31 सीटें) दिया था। डेढ साल के दौरान ऐसा क्या हो गया कि उसी जनता ने भाजपा का करीब-करीब सुपडा ही साफ कर दिया। चुनाव परिणाम जनता का सुस्पष्ट जनादेश है कि “ अगर आप हमारे लिए अच्छे दिन नहीं ला सकते, तो हम आपके लिए भी नहीं लाएंगे“। प्रधानमंत्री ने बिहार के मतदाताओं को लुभाने के हरसंभव प्रयास की मगर बिहार की जनता बेहद परिपक्व निकली। बिहारियों ने पूरे देश को दिखा दिया है कि विधानसभा चुनाव में जनादेश किन-किन बातों को सामने रखकर दिया जाता है और लोकतंत्र को कैसे मजबूत किया जाता है। बिहार के मतदाताओं ने सभी राजनीतिक दलों को धैर्य से सुना, जांचा-परखा और फिर अपना फैसला सुनाया । और जैसा कि आज तक होता रहा है, जनता ने बलवान और अहंकारी को नकार कर “प्रताडित“ को चुना। इस बार के विधानसभा चुनाव में जनता ने लालू प्रसाद और नीतिश कुमार को प्रताडित माना और मोदी और भाजपा को बलवान। लोकसभा चुनाव में जनता के लिए मोदी और भाजपा प्रताडित थे और नीतिश कुमार बलवान। बार-बार मुंह की खाने के बावजूद समकालीन सियासी दल अक्सर भूल जाते हैं कि देश की जनता हमेशा बलवान को नकारती रही है और प्रताडित को अपना आषीर्वाद देती रही है। लालू प्रसाद यादव के शासन को “जंगल राज“ कहकर प्रधानमंत्री ने पिछडों और गरीब तबकों के अहं को ललकारा था। ये तबके लालू प्रसाद को चारा घोटाले में फंसाना भी एक गहरी साजिश का हिस्सा मानते हैं। विधानसभा चुनाव में लालू पर तीखे आक्रमण करके भाजपा ने लालू को “नायक“ से “महानायक“ बना दिया। यही वजह है कि विधानसभा चुनाव में लालू की पार्टी को सबसे ज्यादा 80 सीटें मिली हैं। कांग्रेस का प्रदर्शन और भी बेहतर रहा है। पार्टी ने नीतिश -लालू के साथ मिलकर 41 सीटें लडीं और 27 पर जीत हासिल की है। लालू का यादव और मुसलमानों और पिछडे तबकों में पक्का जनाधार है। लोकसभा चुनाव में भी लालू के राजद को 20 फीसदी से ज्यादा ज्यादा वोट मिले थे। नीतिश कुमार के जनता दल (यू) को 15.80 फीसदी। भाजपा को लोकसभा चुनाव में 29. 40 फीसदी वोट मिले थे। विधानसभा चुनाव में भाजपा नीत राजग को 34 फीसदी वोट मिले मगर सीटें सिर्फ 58 ही मिल पाईं। नीतिश कुमार और लालू प्रसाद के महागठबंधन को 42 फीसदी वोट से 178 सीटें मिलीं है। चुनावी गणित साफ-साफ बताता है कि एकता ने बहुत बडी भूमिका निभाई है। और यही गणित अब राश्ट्रीय स्तर पर बडा बदलाव ला सकता है।
बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम अभूतपूर्व और ऐतिहासिक हैं। नीतिश कुमार-लालू प्रसाद यादव के महागठबंधन की “शानदार जीत, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा नीत गठबंधन की जबरदस्त डिफ्टि सिर्फ और सिर्फ एक ही संदेश देती हैः “लोकतंत्र जिंदाबाद“। विधनसभा चुनाव नीतिश कुमार की स्वच्छ छवि और सुशासन के कारण जीते गए अथवा लालू प्रसाद के प्रति “सहानुभूति“ के चलते, कारण कुछ भी रहें हों, एक बात एकदम साफ है कि अन्तोगत्वा बिहार में लोकतंत्र जीता है। विधानसभा चुनाव से कुछ समय पहले अगस्त, 2015 में प्रधानमंत्री द्वारा बिहार को दिया गया 1.25 लाख करोड का विशेष आर्थिक पैकेज भी भाजपा के काम नहीं आया और न ही राजग मुखिया लालू प्रसाद के कार्यकाल को “जंगल राज“ बताने की उग्र बातें। गाय, हिंन्दुत्व और “महागठबंधन जीतेगा तो पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे“ (भाजपा अध्यक्ष अमित षाह के बोल) जैसे नारे भी मतदाताओं का ध्रुवीकरण नहीं करा पाए। प्रधानमंत्री का उग्र प्रचार और तीस जनसभाएं भी नीतिश -लालू के महागठबंधन में सेंध नहीं लगा पाई। 30 केन्द्रीय मंत्री और भारी-भरकम चुनावी लाव-लश्कर भी क्षत्रपों की लोकप्रियता को मात नहीं दे पाए। इसके क्या मायने लगाए जाएं? क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति जनता का मोहभंग हो गया है? अथवा मोदी के पास अब लोक-लुभावनी नारें का टोटा पड गया है। जुमां-जुमां डेढ साल पहले लोकसभा चुनाव में बिहार की जनता ने भाजपा नीत राजग को प्रचंड जनादेश (40 मेंसे 31 सीटें) दिया था। डेढ साल के दौरान ऐसा क्या हो गया कि उसी जनता ने भाजपा का करीब-करीब सुपडा ही साफ कर दिया। चुनाव परिणाम जनता का सुस्पष्ट जनादेश है कि “ अगर आप हमारे लिए अच्छे दिन नहीं ला सकते, तो हम आपके लिए भी नहीं लाएंगे“। प्रधानमंत्री ने बिहार के मतदाताओं को लुभाने के हरसंभव प्रयास की मगर बिहार की जनता बेहद परिपक्व निकली। बिहारियों ने पूरे देश को दिखा दिया है कि विधानसभा चुनाव में जनादेश किन-किन बातों को सामने रखकर दिया जाता है और लोकतंत्र को कैसे मजबूत किया जाता है। बिहार के मतदाताओं ने सभी राजनीतिक दलों को धैर्य से सुना, जांचा-परखा और फिर अपना फैसला सुनाया । और जैसा कि आज तक होता रहा है, जनता ने बलवान और अहंकारी को नकार कर “प्रताडित“ को चुना। इस बार के विधानसभा चुनाव में जनता ने लालू प्रसाद और नीतिश कुमार को प्रताडित माना और मोदी और भाजपा को बलवान। लोकसभा चुनाव में जनता के लिए मोदी और भाजपा प्रताडित थे और नीतिश कुमार बलवान। बार-बार मुंह की खाने के बावजूद समकालीन सियासी दल अक्सर भूल जाते हैं कि देश की जनता हमेशा बलवान को नकारती रही है और प्रताडित को अपना आषीर्वाद देती रही है। लालू प्रसाद यादव के शासन को “जंगल राज“ कहकर प्रधानमंत्री ने पिछडों और गरीब तबकों के अहं को ललकारा था। ये तबके लालू प्रसाद को चारा घोटाले में फंसाना भी एक गहरी साजिश का हिस्सा मानते हैं। विधानसभा चुनाव में लालू पर तीखे आक्रमण करके भाजपा ने लालू को “नायक“ से “महानायक“ बना दिया। यही वजह है कि विधानसभा चुनाव में लालू की पार्टी को सबसे ज्यादा 80 सीटें मिली हैं। कांग्रेस का प्रदर्शन और भी बेहतर रहा है। पार्टी ने नीतिश -लालू के साथ मिलकर 41 सीटें लडीं और 27 पर जीत हासिल की है। लालू का यादव और मुसलमानों और पिछडे तबकों में पक्का जनाधार है। लोकसभा चुनाव में भी लालू के राजद को 20 फीसदी से ज्यादा ज्यादा वोट मिले थे। नीतिश कुमार के जनता दल (यू) को 15.80 फीसदी। भाजपा को लोकसभा चुनाव में 29. 40 फीसदी वोट मिले थे। विधानसभा चुनाव में भाजपा नीत राजग को 34 फीसदी वोट मिले मगर सीटें सिर्फ 58 ही मिल पाईं। नीतिश कुमार और लालू प्रसाद के महागठबंधन को 42 फीसदी वोट से 178 सीटें मिलीं है। चुनावी गणित साफ-साफ बताता है कि एकता ने बहुत बडी भूमिका निभाई है। और यही गणित अब राश्ट्रीय स्तर पर बडा बदलाव ला सकता है।
रविवार, 8 नवंबर 2015
Why Exit And Opinion Polls Prove Wrong Every Time?
Posted on 2:21 pm by mnfaindia.blogspot.com/
It was a confusing live coverage of Bihar results. While the national channel were, initially, showing clear lead to BJP-led NDA alliance , the regional channels were flashing Nitish-Lalu led grand alliance's lead. The fact that initial trends are, more often, illusive have been proved many times,. Despite this, panelists and anchors on national channels were congratulating BJP and berating grand alliance. But, it was different on regional channels. By the 10 AM, as more and more trends started trickling in, it was quite clear that grand alliance of Nitish-Lalu was surging ahead. And national channels changed the tone and tenor. Panelists and anchors were full of appreciation for Nitish-Lalu grand alliance. The final results, like Delhi were drastically different from initial trends. It was quite amusing to many of the watchers. How come, two distinct trends showing opposite results emerged. So much so that some anchors moderating various live coverage of news channels were also amused. It could be the initially trends were in favour of BJP led alliance as counting are region and area focused. It happens, more often than not, that a voting pattern of one area is quite different from others. As such, initial trends could favour one party but final results are different. Such trends more conspicuous in local issues driven assembly elections. It had happened in January 2012 Punjab assembly elections, The initial trends favoured Congress but final results were in favour SAD-BJP alliance. However, in such a situation, both national and regional channels had shown the same results. In Bihar case on Saturday, the scenario was different. The counting can't show two different trends. May be that TRP crazy news channels out to outperform each-other were just sensationalizing the results or were just fudging the trends. Unfortunately, media is often influenced by the personal prejudices. The bias is quite discernible not only in electronic media but also in print media. Once again, the coverage of Bihar elections have proved this. The exit polls and opinion polls are wide of the mark. Neither print nor Electronic media could perceive that there was a Lalu-Nitish wave.. Lalu Prasad Yadav's RJD has emerged the largest single party even overtaking Nitish Kumur JD(U). BJP has just finished third while initial trends had placed BJP on top. The verdict in Bhiar is not surprising. Indian voters have given decisive verdict om many occasions, especially when it comes to their pride. This time pride of Biharis was in danger. Lalu and Nitish are the pride of Biharis. Prime Minister Narendra Modi by belittling Lalu and Nitish had hurt the pride. The same thing had happened in Delhi. BJP had hurt the Delhites' pride by belittling the Arvind Kejriwal. And neither ruling party BJP and the pollsters could not even gauge the psyche of the people. No exit poll gave Nitish-Lalu alliance more than 130 sets except News X and Times Now. On the contrary, News24 channel had given BJP led alliance 155 seats. The science of measuring voters' behavior has yet not fully developed in India. Human physiology is one of the toughest science and it requires true representative samples and accurate primary data. Conclusions about caste and community vote patterns in elections are all based on erroneous data. At best, we can only make qualitative assessments. From the last day of polling to the day results are announced, analysis are based on data which are almost never close to being correct. This is understandable. The diversity of India extends to every village, so it is almost impossible to ensure that any sample size is completely representative. And even when through some measure of luck a pollster arrives at a reasonable estimate of vote share, converting this into actual seats is perilous. Thus, the only time exit polls get it right is when they reflect an obvious change in popular mood, or when they are right only because they are wrong. Indian media need to learn from its mistakes.
शनिवार, 7 नवंबर 2015
Can Govt's Gold Schemes Bring Out Hidden Treasures?
Posted on 9:35 am by mnfaindia.blogspot.com/
सोने की चमक-दमक
गोल्ड का आयात रोकने और घरों-मंदिरों में रखे सोने को उपयोगी बनाने के लिए मोदी सरकार ने वीरवार को तीन योजनाएं शुरु कीं जिनसे सोने को नगदी में बदला जा सकता है। घर में पडा-पडा सोना अनुपयोगी होता है। वैसे भी देश में त्योहारों और शादी-ब्याह जैसे समारोहों पर गहने पहनने का रिवाज है। आगे-पीछे सोने के आभूषणों का कोई उपयोग नहीं होता है और गहनों को संभालने की चिंता अलग से रहती है। बैंक लॉकर्स में आभूषण रखने के लिए किराया देना पडता है। लोगों के पास घर में रखे सोने के गहनों से आमदन लेने का चूंकि कोई विकल्प ही नहीं था, लिहाजा मोदी सरकार ने लोगों को सोने से कमाई करने का अवसर दिया है। अनुमान है देश में करीब 52 लाख करोड रु मूल्य का 20 हजार टन से ज्यादा सोना घरों-मंदिरों में सहेज कर रखा गया है। सरकार इस सोने को बाहर निकालना चाहती है। इससे सोना का आयात भी कम होगा और विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ रहा बोझ भी घट जाएगा। दुनिया में सोना आयात करने वाला भारत सबसे बडा देश है। 2013 में सोने का आयात बढने से देश के चालू खाते का घाटा 190 अरब डॉलर (12350 करोड रु) तक पहुंच गया था और सरकार को सोने के आयात पर 10 फीसदी शुल्क लगाना पडा था। अधिकृत आंकडे बताते हैं कि व्यापार घाटे में 30 फीसदी सोने के आयात का हाथ रहता है। वीरवार को ”गोल्ड मॉनेटाइजेशन, गोल्ड कॉइन और गोल्ड सोवरेन बॉड स्कीमें लांच करते समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गोल्ड बॉड की खूबियां गिनाईं। गोल्ड बांड ऐसी स्कीम है जो आदमी के हर आपात स्थिति में काम आ सकती है। सोना आधी रात को नहीं बिकता मगर गोल्ड बांड बेचा जा सकता है। इलाज के लिए अगर आधी रात को पैसे की जरुरत है तो डाक्टर अथवा अस्पताल इसे हाथों -हाथ ले लेगा। चोर इसे कागज का टुकडा समझ कर नहीं ले जाएगा। गोल्ड मॉनेटाइजेशन स्कीम के तहत हर साल 2.5 फीसदी तक ब्याज मिल सकता है। कम-से-कम एक साल के लिए न्यूनतम 30 ग्राम सोना ही जमा कराया जा सकता है। गोल्ड सोवरेन बांड पर 2.75 फीसदी ब्याज मिलेगा. इसके लिए 20 नवंबर तक आवेदन किया जा सकता है। 26 नवंबर से आठ साल के लिए बांड जारी किए जाएंगें। शुरुआती कीमत 2,684 रु प्रति ग्राम रखी गई है। कम-से-कम दो ग्राम और साल में अधिकतम 500 ग्राम (आधा किलो) सोने पर निवेश किया जा सकता है। गोल्ड कॉइन स्कीम के तहत शुरु में 5 से 10 ग्राम के सिक्के और 20 ग्राम का गोल्ड बार जारी किए जाएंगें। शुद्धता की गारंटी होने पर यह स्कीम ज्यादा लोकप्रिय हो सकती है। इन तीनों योजनाएं की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि आम आदमी इन योजनाओं को कैसे लेता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन स्कींमों पर कोई बहुत ज्यादा रिटर्न नहीं है। इससे कहीं ज्यादा ब्याज बैंक फिक्सड डिपॉजिट पर दे रहे हैं। अगर सोने के आभूषणों को बेचने से कमाई ही करनी है, तो इन्हें बेचकर फिक्सड डिपॉजिट अथवा अन्य आकर्षक विक्लपों में निवेश किया जा सकता है। इसके अलावा न्यूनतम 30 ग्राम की शर्त लगाकर सरकार ने निचले तबकों को बाहर कर दिया है। यही वह तबका है जिसे हर स्त्रोत से आय की सबसे ज्यादा जरुरत रहती है। सोने में काला धन लगाने वालों को आयकर विभाग का भय सता सकता है। सरकार की स्वेच्छा से काला धन घोषित करने वाली नीति को भी बहुत ज्यादा रिसपांस नहीं मिला था। इन स्कीमों से सरकार और बैंको को ही ज्यादा फायदा होगा। स्कीम के तहत गहनों को गलाने का खर्चा आवेदक को खुद उठाना पडेगा। जाहिर है , इस स्थिति में गहनों की मात्रा 20 से 30 फीसदी घट सकती है। इससे योजना का लाभ काफी कम हो जाएगा। अधिकतम ब्याज 2.75 फीसदी ही मिलेगा भले ही स्कीम की मैच्युरिटी के समय सोना कितना भी महंगा क्यों न हो। बहरहाल, सरकार का मकसद अगर अनुपयोगी सोने को बाहर निकलना है और आयात को कम करना है, तो लोगों को आकर्षक स्कींमें देनी होंगी जिनसे वास्तव में आम आदमी को ज्यादा से ज्यादा कमाई हो। ग्रामीण क्षेत्रों के घरों और घरों -मदिरों से सोना बाहर तभी निकल सकता है, जब सोने की चमक से ज्यादा ब्याज की दमक हो।
गोल्ड का आयात रोकने और घरों-मंदिरों में रखे सोने को उपयोगी बनाने के लिए मोदी सरकार ने वीरवार को तीन योजनाएं शुरु कीं जिनसे सोने को नगदी में बदला जा सकता है। घर में पडा-पडा सोना अनुपयोगी होता है। वैसे भी देश में त्योहारों और शादी-ब्याह जैसे समारोहों पर गहने पहनने का रिवाज है। आगे-पीछे सोने के आभूषणों का कोई उपयोग नहीं होता है और गहनों को संभालने की चिंता अलग से रहती है। बैंक लॉकर्स में आभूषण रखने के लिए किराया देना पडता है। लोगों के पास घर में रखे सोने के गहनों से आमदन लेने का चूंकि कोई विकल्प ही नहीं था, लिहाजा मोदी सरकार ने लोगों को सोने से कमाई करने का अवसर दिया है। अनुमान है देश में करीब 52 लाख करोड रु मूल्य का 20 हजार टन से ज्यादा सोना घरों-मंदिरों में सहेज कर रखा गया है। सरकार इस सोने को बाहर निकालना चाहती है। इससे सोना का आयात भी कम होगा और विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ रहा बोझ भी घट जाएगा। दुनिया में सोना आयात करने वाला भारत सबसे बडा देश है। 2013 में सोने का आयात बढने से देश के चालू खाते का घाटा 190 अरब डॉलर (12350 करोड रु) तक पहुंच गया था और सरकार को सोने के आयात पर 10 फीसदी शुल्क लगाना पडा था। अधिकृत आंकडे बताते हैं कि व्यापार घाटे में 30 फीसदी सोने के आयात का हाथ रहता है। वीरवार को ”गोल्ड मॉनेटाइजेशन, गोल्ड कॉइन और गोल्ड सोवरेन बॉड स्कीमें लांच करते समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गोल्ड बॉड की खूबियां गिनाईं। गोल्ड बांड ऐसी स्कीम है जो आदमी के हर आपात स्थिति में काम आ सकती है। सोना आधी रात को नहीं बिकता मगर गोल्ड बांड बेचा जा सकता है। इलाज के लिए अगर आधी रात को पैसे की जरुरत है तो डाक्टर अथवा अस्पताल इसे हाथों -हाथ ले लेगा। चोर इसे कागज का टुकडा समझ कर नहीं ले जाएगा। गोल्ड मॉनेटाइजेशन स्कीम के तहत हर साल 2.5 फीसदी तक ब्याज मिल सकता है। कम-से-कम एक साल के लिए न्यूनतम 30 ग्राम सोना ही जमा कराया जा सकता है। गोल्ड सोवरेन बांड पर 2.75 फीसदी ब्याज मिलेगा. इसके लिए 20 नवंबर तक आवेदन किया जा सकता है। 26 नवंबर से आठ साल के लिए बांड जारी किए जाएंगें। शुरुआती कीमत 2,684 रु प्रति ग्राम रखी गई है। कम-से-कम दो ग्राम और साल में अधिकतम 500 ग्राम (आधा किलो) सोने पर निवेश किया जा सकता है। गोल्ड कॉइन स्कीम के तहत शुरु में 5 से 10 ग्राम के सिक्के और 20 ग्राम का गोल्ड बार जारी किए जाएंगें। शुद्धता की गारंटी होने पर यह स्कीम ज्यादा लोकप्रिय हो सकती है। इन तीनों योजनाएं की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि आम आदमी इन योजनाओं को कैसे लेता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन स्कींमों पर कोई बहुत ज्यादा रिटर्न नहीं है। इससे कहीं ज्यादा ब्याज बैंक फिक्सड डिपॉजिट पर दे रहे हैं। अगर सोने के आभूषणों को बेचने से कमाई ही करनी है, तो इन्हें बेचकर फिक्सड डिपॉजिट अथवा अन्य आकर्षक विक्लपों में निवेश किया जा सकता है। इसके अलावा न्यूनतम 30 ग्राम की शर्त लगाकर सरकार ने निचले तबकों को बाहर कर दिया है। यही वह तबका है जिसे हर स्त्रोत से आय की सबसे ज्यादा जरुरत रहती है। सोने में काला धन लगाने वालों को आयकर विभाग का भय सता सकता है। सरकार की स्वेच्छा से काला धन घोषित करने वाली नीति को भी बहुत ज्यादा रिसपांस नहीं मिला था। इन स्कीमों से सरकार और बैंको को ही ज्यादा फायदा होगा। स्कीम के तहत गहनों को गलाने का खर्चा आवेदक को खुद उठाना पडेगा। जाहिर है , इस स्थिति में गहनों की मात्रा 20 से 30 फीसदी घट सकती है। इससे योजना का लाभ काफी कम हो जाएगा। अधिकतम ब्याज 2.75 फीसदी ही मिलेगा भले ही स्कीम की मैच्युरिटी के समय सोना कितना भी महंगा क्यों न हो। बहरहाल, सरकार का मकसद अगर अनुपयोगी सोने को बाहर निकलना है और आयात को कम करना है, तो लोगों को आकर्षक स्कींमें देनी होंगी जिनसे वास्तव में आम आदमी को ज्यादा से ज्यादा कमाई हो। ग्रामीण क्षेत्रों के घरों और घरों -मदिरों से सोना बाहर तभी निकल सकता है, जब सोने की चमक से ज्यादा ब्याज की दमक हो।
शुक्रवार, 6 नवंबर 2015
Stop Hate Brigade, India Need Fast Growth, Not Divisive Agenda
Posted on 9:17 am by mnfaindia.blogspot.com/
चित भी मेरी, पट भी
असहिष्णुता को लेकर न तो भगवा पार्टी के नेताओं का आग उगलना बंद हो रहा है और न ही इसके खिलाफ “सम्मान वापसी" का सिलसिला। असहिष्णुता के माहौल से क्षुब्ध वीरवार को देश के जाने-माने 24 फिल्म निर्माताओं ने अपने पुरुस्कार लौटा दिए। विख्यात लेखक और सोशल एक्टिविस्ट अरुंधति रॉय ने भी यह कहकर अपना अवार्ड लौटा दिया है कि “अगर अब खडे न हुए तो दफना दिए जाएंगे। अब तक 50 से ज्यादा लेखक, कलाकर, और शि क्षाशास्त्री असहिष्णुता के विरोध में अपने अवार्ड लौटा चुके हैं। भगवा पार्टी और उनके समर्थकों का आरोप है कि विरोध करने वाले कट्टर भाजपा विरोधी हैं और मई 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी को मिली चुनावी विजय को आज तक पचा नहीं पाए हैं। भगवा पार्टी इस मामले में अपनी जगह सही हो सकती मगर सत्ता के नशे में चूर भाजपा को अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों का आकलन भी भेदभावपूर्ण नजर आ रहा है। पिछले सप्ताह अंतरराष्ट्रीय रेंटिग एजेंसी मूडी एनेलिटिकल ने मोदी सरकार को चेताया था कि “असहिष्णुता“ के माहौल से भारत की रेटिंग और अंतरराष्ट्रीय क्रेडिबिलिटी खराब हो सकती है। इस रेटिंग एजेंसी ने प्रधानमंत्री को आग उगलने वाले भाजपाइयों पर लगाम लगाने की सलाह दी है। भाजपा और मोदी सरकार को यह बात भी नागवार गुजरी। बुधवार को प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा जारी बयान में मूडी एनेलिटिकल के आकलन को लेकर मीडिया में प्रकाषित समाचारों को गैर-जिम्मेदाराना बताया गया और कहा गया कि तथ्य तोड-मरोड कर पेश किए गए हैं। पीएमओ का स्पष्टीकरण था कि यह आकलन रेटिंग एजेंसी का न होकर मूडी एनेलिटिकल के एक अर्थशास्त्री का व्यक्तिगत है। जबकि सच्चाई यह है कि मूडी का यह अधिकृत आकलन था। यानी “चित भी मेरी और पट भी“। अगर मूडी एनेलिटिकल मोदी सरकार की नीतियों की तारीफ करता है तो आकलन उम्दा है, नहीं तो व्यक्तिगत । असहिष्णुता के मामले में प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की चुप्पी ने उतेेजक बयान देने वाले नेताओं को और ज्यादा शह दी है। यही वजह है कि भगवा वस्त्रधारी अल्पसंख्यकों के खिलाफ बेलगाम आग उगल रहे हैं। बुधवार को भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ ने बालीवुड अभिनेता शाहरुख खान की लश्कर -ए-तैयबा के आतंकी हाफिज सईद से तुलना करके हद कर दी। देश का लॉमेकर अगर इस तरह की अनर्गल शब्दों का प्रयोग करे तो साफ है असहिष्णुता चरम पर है। आदित्यनाथ से पहले भाजपा के महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने किंग खान के खिलाफ इस कद्र आग उगली कि भाजपा को उनके वक्तव्य से किनारा करना पडा। शाहरुख खान के खिलाफ उतेजक बयानों से क्षुब्ध अभिनेता अनुपम खेर ने भाजपाइयों को जुबान पर काबू पाने की नसीहत दी है। अनुपम खेर की पत्नी किरण खेर चंडीगढ से भाजपा सांसद है। असहिष्णुता के खिलाफ खडे होने वाले मोदी और भाजपा विरोधी हो सकते हैं, मगर भाजपा सांसद के पति विरोधियों की भाषा नहीं बोल सकते। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कई बार कह चुके हैं कि देश को आलतु-फालतू बातों और खामख्वाह के मुद्दे उछाल कर समय नहीं गंवाना चाहिए। यह बात सौ फीसदी सच है। पूरी दुनिया मान रही है कि भारत जल्द ही ग्रोथ के मामले में चीन को पीछे छोड देगा। इसकी प्रमुख वजह यह है कि अगले दस वर्षों में भारत दुनिया का युवातम देश बन जाएगा और तब तक चीन की आबादी अपेक्षाकृत बूढी हो जाएगी। इसी युवातम श्रमशक्ति और प्रतियोगी अर्थव्यवस्था के बलबूते भारत चीन की तुलना में तेजी से आगे बढ सकता है। यह तभी संभव है जब देश में माहौल ग्रोथ फ्रेंडली हो और समाज का हर तबका और नागरिक अपनी पूरी क्षमता से काम करें। तेज ग्रोथ के लिए यह भी जरुरी है देश में हर हाथ को सृजनात्मक काम मिले और सभी साथ-साथ मिलकर काम करें। दुखद स्थिति यह है कि भारत में 50 फीसदी से ज्यादा श्रम शक्ति व्यर्थ के प्रयोजनों पर जाया की जाती है। मौजूदा हालात भी यही कह रहै हैं कि भगवा एजेंडे को लागू करने के चक्कर में भाजपाई उभरती श्रमशक्ति को जाया करने पर आमादा है।
असहिष्णुता को लेकर न तो भगवा पार्टी के नेताओं का आग उगलना बंद हो रहा है और न ही इसके खिलाफ “सम्मान वापसी" का सिलसिला। असहिष्णुता के माहौल से क्षुब्ध वीरवार को देश के जाने-माने 24 फिल्म निर्माताओं ने अपने पुरुस्कार लौटा दिए। विख्यात लेखक और सोशल एक्टिविस्ट अरुंधति रॉय ने भी यह कहकर अपना अवार्ड लौटा दिया है कि “अगर अब खडे न हुए तो दफना दिए जाएंगे। अब तक 50 से ज्यादा लेखक, कलाकर, और शि क्षाशास्त्री असहिष्णुता के विरोध में अपने अवार्ड लौटा चुके हैं। भगवा पार्टी और उनके समर्थकों का आरोप है कि विरोध करने वाले कट्टर भाजपा विरोधी हैं और मई 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी को मिली चुनावी विजय को आज तक पचा नहीं पाए हैं। भगवा पार्टी इस मामले में अपनी जगह सही हो सकती मगर सत्ता के नशे में चूर भाजपा को अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों का आकलन भी भेदभावपूर्ण नजर आ रहा है। पिछले सप्ताह अंतरराष्ट्रीय रेंटिग एजेंसी मूडी एनेलिटिकल ने मोदी सरकार को चेताया था कि “असहिष्णुता“ के माहौल से भारत की रेटिंग और अंतरराष्ट्रीय क्रेडिबिलिटी खराब हो सकती है। इस रेटिंग एजेंसी ने प्रधानमंत्री को आग उगलने वाले भाजपाइयों पर लगाम लगाने की सलाह दी है। भाजपा और मोदी सरकार को यह बात भी नागवार गुजरी। बुधवार को प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा जारी बयान में मूडी एनेलिटिकल के आकलन को लेकर मीडिया में प्रकाषित समाचारों को गैर-जिम्मेदाराना बताया गया और कहा गया कि तथ्य तोड-मरोड कर पेश किए गए हैं। पीएमओ का स्पष्टीकरण था कि यह आकलन रेटिंग एजेंसी का न होकर मूडी एनेलिटिकल के एक अर्थशास्त्री का व्यक्तिगत है। जबकि सच्चाई यह है कि मूडी का यह अधिकृत आकलन था। यानी “चित भी मेरी और पट भी“। अगर मूडी एनेलिटिकल मोदी सरकार की नीतियों की तारीफ करता है तो आकलन उम्दा है, नहीं तो व्यक्तिगत । असहिष्णुता के मामले में प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की चुप्पी ने उतेेजक बयान देने वाले नेताओं को और ज्यादा शह दी है। यही वजह है कि भगवा वस्त्रधारी अल्पसंख्यकों के खिलाफ बेलगाम आग उगल रहे हैं। बुधवार को भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ ने बालीवुड अभिनेता शाहरुख खान की लश्कर -ए-तैयबा के आतंकी हाफिज सईद से तुलना करके हद कर दी। देश का लॉमेकर अगर इस तरह की अनर्गल शब्दों का प्रयोग करे तो साफ है असहिष्णुता चरम पर है। आदित्यनाथ से पहले भाजपा के महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने किंग खान के खिलाफ इस कद्र आग उगली कि भाजपा को उनके वक्तव्य से किनारा करना पडा। शाहरुख खान के खिलाफ उतेजक बयानों से क्षुब्ध अभिनेता अनुपम खेर ने भाजपाइयों को जुबान पर काबू पाने की नसीहत दी है। अनुपम खेर की पत्नी किरण खेर चंडीगढ से भाजपा सांसद है। असहिष्णुता के खिलाफ खडे होने वाले मोदी और भाजपा विरोधी हो सकते हैं, मगर भाजपा सांसद के पति विरोधियों की भाषा नहीं बोल सकते। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कई बार कह चुके हैं कि देश को आलतु-फालतू बातों और खामख्वाह के मुद्दे उछाल कर समय नहीं गंवाना चाहिए। यह बात सौ फीसदी सच है। पूरी दुनिया मान रही है कि भारत जल्द ही ग्रोथ के मामले में चीन को पीछे छोड देगा। इसकी प्रमुख वजह यह है कि अगले दस वर्षों में भारत दुनिया का युवातम देश बन जाएगा और तब तक चीन की आबादी अपेक्षाकृत बूढी हो जाएगी। इसी युवातम श्रमशक्ति और प्रतियोगी अर्थव्यवस्था के बलबूते भारत चीन की तुलना में तेजी से आगे बढ सकता है। यह तभी संभव है जब देश में माहौल ग्रोथ फ्रेंडली हो और समाज का हर तबका और नागरिक अपनी पूरी क्षमता से काम करें। तेज ग्रोथ के लिए यह भी जरुरी है देश में हर हाथ को सृजनात्मक काम मिले और सभी साथ-साथ मिलकर काम करें। दुखद स्थिति यह है कि भारत में 50 फीसदी से ज्यादा श्रम शक्ति व्यर्थ के प्रयोजनों पर जाया की जाती है। मौजूदा हालात भी यही कह रहै हैं कि भगवा एजेंडे को लागू करने के चक्कर में भाजपाई उभरती श्रमशक्ति को जाया करने पर आमादा है।
गुरुवार, 5 नवंबर 2015
We Don't Need Political Activist Governors
Posted on 9:07 am by mnfaindia.blogspot.com/
राज्यपाल की सक्रियता
हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने राजभवन में मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति में राज्य के आला अधिकारियों से बैठक करके फिर से नई परंपरा शुरु की है। राज्यपाल ने पांच घंटे तक आला अधिकारियों से राज्य के हालात का जायजा लिया। इस बैठक में राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) एवं अतिरिक्त मुख्य सचिव, विभागाध्यक्षों के अलावा कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे। राज्यपाल ने मंत्रियों को भी बुलाया था मगर षिमला में मौजूद रहने के बावजूद कोई भी मंत्री इस बैठक में नहीं गया। मुख्यमंत्री उस समय दिल्ली में थे। जाहिर है पूरा मामला राजनीतिक था। राज्यपाल की इस शुरुआत से कांग्रेस का लीला-पीला होना स्वभाविक है ।मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति में और उनकी सहमति के बगैर आला अधिकारियों की बैठक बुलाकर आचार्य देवव्रत ने अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं किया है। राज्यपाल राज्य में संवैधानिक मुखिया होता है और वह मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल की सलाह से काम करता है। संविधान के अनुच्छेद 167 में स्पष्ट तौर पर आपातकाल को छोडकर राज्यपाल को मुख्यमंत्री से ही जानकारी लेने की व्यवस्था की गई है। राज्यपाल सीधे तौर पर मंत्रियों अथवा नौकरशाही से जानकारी नहीं ले सकते। संविधान पीठ ने राज्यपाल की भूमिका को तय करते समय इस बात का पूरा ध्यान रखा था कि राज्यपाल अथवा मुख्यमंत्री में किसी भी स्थिति में टकराव न होे। इस टकराव का ख्याल करते हुए निर्वाचित राज्यपाल के विकल्प को सिरे से खारिज कर दिया गया था। संघीय ढांचे के अनुरुप राज्यपाल को केन्द्र में प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल की सलाह पर काम कर रहे राश्ट्रपति की तरह राज्य में संवैधानिक प्रमुख की भूमिका दी गई है। यानी संविधान निर्माताओं ने राज्यपाल को तट्स्थ संवैधानिक प्रमुख माना था। संविधान की रक्षा तथष्ट एवं निष्पक्ष राज्यपाल ही कर सकता है। इसी भूमिका के दृष्टिगत राज्यपाल के पद को गरिमापूर्ण बनाया गया था। देेष में जवाहर लाल नेहरु के कार्यकाल को छोडकर, राज्यपाल की गरिमा में उतरोतर गिरावट आती गई। और अब हालात यह है कि राजनीति में नकारा अथवा सताधारी दल के करीबी लोगों को राज्यपाल जैसे गरिमापूर्ण पद पर नियुक्त किया जाता है। इंदिरा गांधी के समय से शुरु हुई यह रिवायत आज तक बदस्तूर जारी है। इंदिरा गांधी सरकार के समय राज्यपाल केन्द्र का एजेंट बनकर रह गए थे। स्मरण करें 1984 में केन्द्र सरकार के इशारे पर किस तरह आन्ध्र प्रदेश में तत्कालीन राज्यपाल ठाकुर राम लाल ने स्पष्ट बहुमत के बावजूद एनटी रामाराव की सरकार को बर्खास्त कर एन भास्कर राव को मुख्यमंत्री बना दिया था। यह बात दीगर है कि यह सरकार 31 दिन में ही गिर गई और राम लाल को राज्यपाल का पद छोडना पडा था । कांग्रेस के समय ही नहीं राजग सरकार के समय भी यही हाल रहा। 2002-03 में राजस्थान के तत्कालीन राज्यपाल अंशुमन सिंह ने अपने कार्यालय का भगवाकरण करके पद की गरिमा को जबरदस्त ठेस पहुंचाई थी। इसी स्थिति के दृष्टिगत , संविधान में स्पष्ट भूमिका तय होने के बावजूद, राज्यपाल की “सक्रियता“ को लेकर जब-तब चर्चा शुरु हो जाती है। 1971 में राज्यपाल की भूमिका की समीक्षा के लिए गठित भगवान सहाय समिति ने माना था कि राज्यपाल के पद की गरिमा में खासी गिरावट आई है। 1988 में केन्द्र और राज्यों के संबंधों की समीक्षा के लिए गठित सरकारिया आयोग ने कहा था कि संघीय ढांचे को मजबूत करने में राज्यपाल की अहम भूमिका होती है और अगर राज्यपाल अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं करता है तो केन्द्र और राज्यों के संबंध बिगड सकते हैं। इस स्थिति से बचने के लिए सरकारिया आयोग ने सिफारिश की थी कि सत्तारूढ दल से संबंधित व्यक्ति को कदाचित राज्यपाल पद पर नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए। किसी भी दल ने इस सिफारिश को नहीं माना। हिमाचल की ताजा स्थिति इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि राज्यपाल सत्तारूढ दल का नुमाइंदा नहीं होना चाहिए। अब अगर राष्ट्रपति मंत्रियों को तलब करके केन्द्र में प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति में आला अधिकारियों की बैठक करें और उन्हें निर्देश दें, तो मोदी सरकार को कैसा लगेगा?
हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने राजभवन में मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति में राज्य के आला अधिकारियों से बैठक करके फिर से नई परंपरा शुरु की है। राज्यपाल ने पांच घंटे तक आला अधिकारियों से राज्य के हालात का जायजा लिया। इस बैठक में राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) एवं अतिरिक्त मुख्य सचिव, विभागाध्यक्षों के अलावा कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे। राज्यपाल ने मंत्रियों को भी बुलाया था मगर षिमला में मौजूद रहने के बावजूद कोई भी मंत्री इस बैठक में नहीं गया। मुख्यमंत्री उस समय दिल्ली में थे। जाहिर है पूरा मामला राजनीतिक था। राज्यपाल की इस शुरुआत से कांग्रेस का लीला-पीला होना स्वभाविक है ।मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति में और उनकी सहमति के बगैर आला अधिकारियों की बैठक बुलाकर आचार्य देवव्रत ने अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं किया है। राज्यपाल राज्य में संवैधानिक मुखिया होता है और वह मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल की सलाह से काम करता है। संविधान के अनुच्छेद 167 में स्पष्ट तौर पर आपातकाल को छोडकर राज्यपाल को मुख्यमंत्री से ही जानकारी लेने की व्यवस्था की गई है। राज्यपाल सीधे तौर पर मंत्रियों अथवा नौकरशाही से जानकारी नहीं ले सकते। संविधान पीठ ने राज्यपाल की भूमिका को तय करते समय इस बात का पूरा ध्यान रखा था कि राज्यपाल अथवा मुख्यमंत्री में किसी भी स्थिति में टकराव न होे। इस टकराव का ख्याल करते हुए निर्वाचित राज्यपाल के विकल्प को सिरे से खारिज कर दिया गया था। संघीय ढांचे के अनुरुप राज्यपाल को केन्द्र में प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल की सलाह पर काम कर रहे राश्ट्रपति की तरह राज्य में संवैधानिक प्रमुख की भूमिका दी गई है। यानी संविधान निर्माताओं ने राज्यपाल को तट्स्थ संवैधानिक प्रमुख माना था। संविधान की रक्षा तथष्ट एवं निष्पक्ष राज्यपाल ही कर सकता है। इसी भूमिका के दृष्टिगत राज्यपाल के पद को गरिमापूर्ण बनाया गया था। देेष में जवाहर लाल नेहरु के कार्यकाल को छोडकर, राज्यपाल की गरिमा में उतरोतर गिरावट आती गई। और अब हालात यह है कि राजनीति में नकारा अथवा सताधारी दल के करीबी लोगों को राज्यपाल जैसे गरिमापूर्ण पद पर नियुक्त किया जाता है। इंदिरा गांधी के समय से शुरु हुई यह रिवायत आज तक बदस्तूर जारी है। इंदिरा गांधी सरकार के समय राज्यपाल केन्द्र का एजेंट बनकर रह गए थे। स्मरण करें 1984 में केन्द्र सरकार के इशारे पर किस तरह आन्ध्र प्रदेश में तत्कालीन राज्यपाल ठाकुर राम लाल ने स्पष्ट बहुमत के बावजूद एनटी रामाराव की सरकार को बर्खास्त कर एन भास्कर राव को मुख्यमंत्री बना दिया था। यह बात दीगर है कि यह सरकार 31 दिन में ही गिर गई और राम लाल को राज्यपाल का पद छोडना पडा था । कांग्रेस के समय ही नहीं राजग सरकार के समय भी यही हाल रहा। 2002-03 में राजस्थान के तत्कालीन राज्यपाल अंशुमन सिंह ने अपने कार्यालय का भगवाकरण करके पद की गरिमा को जबरदस्त ठेस पहुंचाई थी। इसी स्थिति के दृष्टिगत , संविधान में स्पष्ट भूमिका तय होने के बावजूद, राज्यपाल की “सक्रियता“ को लेकर जब-तब चर्चा शुरु हो जाती है। 1971 में राज्यपाल की भूमिका की समीक्षा के लिए गठित भगवान सहाय समिति ने माना था कि राज्यपाल के पद की गरिमा में खासी गिरावट आई है। 1988 में केन्द्र और राज्यों के संबंधों की समीक्षा के लिए गठित सरकारिया आयोग ने कहा था कि संघीय ढांचे को मजबूत करने में राज्यपाल की अहम भूमिका होती है और अगर राज्यपाल अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं करता है तो केन्द्र और राज्यों के संबंध बिगड सकते हैं। इस स्थिति से बचने के लिए सरकारिया आयोग ने सिफारिश की थी कि सत्तारूढ दल से संबंधित व्यक्ति को कदाचित राज्यपाल पद पर नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए। किसी भी दल ने इस सिफारिश को नहीं माना। हिमाचल की ताजा स्थिति इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि राज्यपाल सत्तारूढ दल का नुमाइंदा नहीं होना चाहिए। अब अगर राष्ट्रपति मंत्रियों को तलब करके केन्द्र में प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति में आला अधिकारियों की बैठक करें और उन्हें निर्देश दें, तो मोदी सरकार को कैसा लगेगा?
बुधवार, 4 नवंबर 2015
A Rapist Can't Be a Juvenile
Posted on 9:10 am by mnfaindia.blogspot.com/
“बलात्कारी“ भी जुवेनाइल होता है क्या?
क्या बलात्कार जैसे जघन्य कृत्य करने वाले बाल अपराधी को उसके संगीन जुर्म केे लिए कडी सजा नहीं दी जानी चाहिए? बलात्कारी तो बलात्कारी ही होता है, फिर कानून उमर का भेदभाव क्यों करता है? बाल अपराधी को सुधार का मौका देकर कानून क्या उसे अपराध करने का अवसर नहीं दे रहा है? देश का जुवेनाइल कानून कितना न्यायसंगत है? दिल्ली में दिसंबर 2012 में निर्भय सामूहिक बलात्कार के संदर्भ में केन्द्रीय मंत्री मेनका गांधी ने इस तरह के कई सवाल उठाए हैं। निर्भय गैंग रेप कांड का नाबालिग आरोपी इस दिसंबर को बाल सुधार गृह से छूटकर बाहर आ रहा है। यह आरोपी बलात्कारी है, अदालत में उसका अपराध सिद्ध हो चुका था मगर नाबालिग होने की वजह से उसे तीन साल तक बाल सुधार गृह में रहने की सजा दी गई। मेनका ने सोमवार को यह कहकर एक नई बहस छेड दी है कि बाल गृह से बाहर आने के बाद उस पर (बलात्कारी) निगरानी रखने की जरुरत है। साफ-साफ कहें तो केन्द्रीय मंत्री को आशंका है कि वह फिर से “बलात्कार“ जैसा संगीन अपराध कर सकता है क्योंकि कानून ने उसे अन्य अपराधियों की तरह कडी सजा नहीं दी है। उनकी यह आशंका निर्मूल भी नहीं है । मेनका गांधी की तरह देश में अधिकांश लोगों का भी यह मानना है कि निर्भय सामूहिक बलात्कार में इंसाफ नहीं हुआ है, भले ही कानून ने अपना काम किया हो। छह लोगों के सामूहिक बलात्कार से 23 वर्षीय निर्भय (असली नाम नहीं) की मौत हो गई थी। इस संगीन जुर्म में नाबालिग “बलात्कारी“ भी उतना ही दोषी था, जितने अन्य थे। इस जघन्य अपराध में कुल मिलाकर छह लोग शामिल थे। इनमें से एक नाबालिग था। चार बलात्कारियों को अदालत ने सितंबर 2013 में मौत की सजा सुनाई। दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी फांसी की सजा बरकरार रखी है। फिलहाल मामला सर्वोच्च न्यायालय में है। न्यायालय ने चारों की फांसी पर रोक लगा रखी है। पांचवें अपराधी ने तिहार जेल में फंदा लगाकर खुदकुशी कर ली थी। कुल मिलाकर, निर्भय के चार बलात्कारियों को फांसी की सजा, पांचवें की खुदकुशी मगर नाबालिग को मात्र बाल सुधार गृह की सजा और फिर तीन साल बाद आजादी। विडंबना यह है कि दिसंबर 2012 के छह माह बाद “नाबालिग बलात्कारी“ बालिग होने वाला था। और बलात्कार के समय वह बालिग होता, तो उसे भी फाँसी दी जा सकती थी। पूरा देश यही कह रहा है, “यह कहां का इंसाफ“। इस इंसाफ से निर्भय के माता-पिता के जख्मों पर सिर्फ नमक छिडका है और अब दिसंबर में जब “नाबालिग बलात्कारी“ आजाद हो जाएगा, निर्भय की “ आत्मा“ को भी शांति नहीं मिल पाएगी। देश में हर बडी से बडी और ज्वलंत से ज्वलंत समस्या का फौरी तौर पर निदान करने का चलन है। कुछ समय तक पूरा देश उबलता है, फिर सब कुछ भुला दिया जाता है। निर्भय गैंग रेप केस में भी यही हुआ। कुछ दिनों तक पूरा देश उबलता रहा। सरकार ने जुवेनाइल कानून की समीक्षा के लिए एक न्यायिक समिति भी बना ली। समिति को पूरे देश से अस्सी हजार से ज्यादा सुझाव मिले। समिति ने निर्भय जैसी सामूहिक बलात्कार कांड का ठीकरा पुलिस और प्रशासन के सिर पर फौड दिया। सरकार ने 2013 में क्रिमिनिल लॉ को संषोधित करने के लिए अध्यादेश भी जारी कर दिया। बलात्कर के मामलों की सुनवाई के लिए छह नई फास्ट-ट्रैक अदालतें खोली गईं मगर जुवेनाइल की उमर 18 साल ही रखी गई। इसलिए, नाबालिग बच निकला। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार भारत में हर रोज 92 महिलाएं बलात्कार का शिकार होती हैं। चौंकाने वाल तथ्य यह है कि 96 फीसदी “बलात्कारी“ पीडिता के परिचित होते हैं और 20 फीसदी के करीब नाबालिग और 70 फीसदी से भी ज्यादा पीडिता नाबालिग। हर साल बलात्कार के मामले उतरोत्तर बढ रहे हैं। मद्रास उच्च न्यायालय ने हाल ही में केन्द्र सरकार को बच्चियों से बलात्कार करने वालों को “नपुसंक“ बनाने की सजा का प्रावधान करने को कहा है। इससे पता चलता है कि देश बलात्कार की घटनाओं से किस कद्र चिंतित है। केन्द्रीय मंत्री और न्यायपालिक भी अगर बलात्कार की घटनाओं से जुडी न्यायप्रकिया से संतुष्ट नहीं है, तो सरकार को मामले पर गंभीरता से सोचने की जरुरत है।
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)






