बलात्कार करने वाले दरिंदों के लिए अविलंब फांसी के सिवा और कोई भी सजा मानवता का अपमान है। इस पर अगर जनमत संग्रह कराया जाए तो सौ फीसदी लोग यही कहेंगे कि बलात्कारियों को फौरन फांसी से भी ज्यादा सख्त सजा दी जानी चाहिए। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने “निर्भया“ के बलात्कारियों की पुनर्विचार (रिवीजन) याचिका खारिज करते हुए तीनों दरिंदों की फांसी सजा की सजा बरकरार रखी है। चौथे बलात्कारी ने पुनर्विचार (रिवीजन) याचिका दायर नहीं की थी। और संभावना है तीन बलात्करियों की याचिका खारिज होने के बाद अब चौथा बलात्कारी सुप्रौम कोर्ट का दरवाजा खटखटाए। इससे लगता है निर्भया को न्याय अभी नहीं मिला है। जब तक दरिंदों को फांसी नहीं होगी, न्याय भटकता रहेगा। न्याय में विलंब के लिए देश में कानून को तोडना, मरोडना आम बात है। भारत की न्यायिक व्यवस्था की यही सबसे बडी कमजोरी है। 16 दिसंबर, 2012 की रात दिल्ली में 23 वर्षीय युवती से चलती बस में छह दरिंदों ने सामूहिक बलात्कार करने के बाद उसे मरने के लिए सडक पर फेंक दिया था। बहशियों की इस दरिंदगी ने पूरे देश की आत्मा को झकझोर कर रख दिया था। इसके बाद देश में बलात्कार से संबंधित कानून को और सख्त बनाया गया और बलात्कारियों को फांसी की सजा का प्रावधान किया गया। इस मामले में ट्रायल कोर्ट 13 दिसंबर, 2013 को चारों बलात्कारियों को फांसी की सजा सुनाई। पांचवा बलात्कार नाबालिग था, इसलिए उस पर जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड में अलग से मुकदमा चला और उसे तीन साल के लिए बाल सुधार गृह भेज दिया गया। छठे अभियुक्त ने तिहाड जेल में आत्महत्या कर ली थी। ट्रायल कोर्ट के बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने भी चारों की फांसी की सजा बरकरार रखी। 2014 में सुप्रीम कोर्ट में तीन अभियुक्तों द्वारा पुनर्विचार याचिका दायर किए जाने पर शीर्ष अदालत ने फांसी की सजा पर रोक लगा दी। मई, 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने भी ट्रायल और हाई कोर्ट की बलात्कारियों की फांसी की सजा बरकरार रखी। इसके बावजूद बलात्कारी फांसी से बचते रहे। तीन अभियुक्तों ने सुप्रीम कोर्ट में रिवीजन पिटीषन दायर कर दी। सोमवार को दरिदों की यह चाल भी विफल हो गई। लेकिन अभी भी इन दरिंदों के पास फांसी से लटकने के रास्ते हैं। तीनों सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव याचिका दायर कर सकते हैं। 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने रुपा अषोक बनाम आशिक हर्रा के मामले में क्यूरेटिव याचिका का विकल्प दिया था। पुनर्विचार याचिका ख़ारिज होने के बाद न्यायपालिका से न्याय पाने का यह अंतिम मौका होता है। इस याचिका पर फैसला आने के बाद ही फांसी के अभियुक्त राष्ट्रपति से अंतिम गुहार लगा सकते हैं। वैसे अगर क्यूरेटिव याचिका से पहले वौथे अभियुक्त ने सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्विचार याचिका दायर कर दी और यह एडमिट हो गई, तो फांसी की सजा और लंबी लटक सकती है। भारत में नैसर्गिक न्याय की यह प्रकिया निर्दोशों को कम, दरिंदों के लिए ज्यादा मददगार साबित हो रही है। माना की न्याय कीे आंखों पर निष्पक्षता की पट्टी बंधी होती है और यह मार्मिक भावनाओं में भी नहीं बहता है। मगर ऐसी न्याय प्रकिया की प्रासंगिकता पर सवाल उठना स्वभाविक है जो दरिंदों के लिए फांसी जैसी सख्त सजा टालने में मददगार सबित हो। निर्भया मामले में ट्रायल कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक सभी अदालतों ने दरिदों को फांसी की सजा सुनाई तो है मगर सजा लंबी कानूनी प्रकिया में उलझ कर रह गई है। इसी लंबी कानून प्रकिया के कारण ही सख्त सजा के बावजूद बलात्कार के मामलों में कोई गिरावट नहीं आ रही है। इसके विपरीत निर्भया मामले के बाद से बच्चियों से बलात्कार के मामले बढे हैं। अब समय आ गया है कि देष में बलात्कारियों के लिए त्वरित सजा का कानून बनाया जाए।
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