गुरुवार, 19 जुलाई 2018

लिंचिंगः पैशाची मानसिकता


लोकतंत्र के स्तंभ भारत में कभी गोरक्षा तो कभी चाइल्ड किडनैंपिंग और कभी यौन हिंसा से गुस्साई भीड को किसी की हत्या करने की छूट नहीं दी सकती। जिस देश  में “अहिंसा परमो धर्म“ का पालन किया जाता रहा हो और दुनिया  जिस देश को  शांति  और अहिंसा के संदेशवाहक  गौतम बुद्ध, महावीर और महात्मा गांधी की कर्मभूमि मानती हो, उस देश  में  पैशाची मानसिकता के लिए कोई जगह नहीं हो सकती। फिर ऐसा क्यों हो रहा है जिससे पूरी दुनिया में हमारा सिर शर्म  से झुक रहा है। देश  की शीर्ष  अदालत भी लिंचिग की बढती घटनाओं से विचलित है। कोई भी धर्म और समाज  गोरक्षा के लिए इंसान की हत्या करने की अनुमति नहीं देता है। भीडतंत्र की पैशाची मानसिकता को देश  का कानून रौंदने की अनुमति नहीं दी जा सकती। हिंसा का वातावरण देश में सामुदायिक सदभाव और  भाईचारे को तहस-नहस कर देगा। सभ्य समाज  सामाजिक विद्धेष  और साम्प्रदायिकता को जरा भी  बर्दाश्त  नहीं कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को लिंचिंग की कडी भर्त्सना करते हुए केन्द्र और राज्यों की सरकार को साफ-साफ शब्दों में कहा है कि इसे रोकना सरकार का दायित्व है। लिचिंग जैसी  पैशाची  हिंसा को  कानून-व्यवस्था का मामला बताकर सरकार अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों से भाग नही सकती । भारत में हर नागरिक को सम्मान से जीने का अधिकार है और कोई भी दूसरा व्यक्ति इसे छीन नहीं सकता। कोर्ट  ने लिंचिंग रोकने के लिए दिशा -निर्देश  जारी करते हुए राज्यों को इन्हें लागू करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। साथ ही केन्द्र से कहा है कि  लिंचिंग के दोषियों को सख्त-से-सख्त सजा देने के लिए कानून बनाने की पहल भी होनी चाहिए। भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में फिलहाल लिंचिंग जैस संगीन अपराध के लिए कोई स्पष्ट  प्रावधान नहीं है। कोडिफाइड लॉ नहीं होने से दोषी बच निकलते  हैं। सीआरपीसी (क्रिमिनल प्रोसिजर कोड) की धारा 223ए के तहत दोषियों पर मामला दर्ज तो किया जा सकता है मगर यह अपर्याप्त साबित हुआ है।  बहरहाल, सबसे बडा सवाल यह है कि कानून और व्यवस्था को अपने हाथ में लेने वाले और गो रक्षा के नाम पर इंसान की हत्या करने वाले “ उपद्रवियों“ को क्या  सरकार रोक पाएगी? मंगलवार को सुप्रीप कोर्ट  के दिशा -निर्देश  के महज तीन घंटे बाद भाजपा  शासित झारखंड में भगवा कार्यकर्ताओं ने 80 वर्षीय  आर्य समाज के नेता स्वामी अग्निवेश  की लातों, घूंसों से पिटाई के बाद उन पर ईंट और पत्थर तक फेंके। इस देष में असहिश्णुता ने सारी हदें पार कर ली है। मंगलवार को ही एक न्यूज चैनल के लाइव कार्यक्रम में एक ंमौलवी ने महिला पैनेलिस्ट वकील से मारपीट तक कर डाली। दो दिन पहले (14 जुलाई को)  कर्नाटक में बिदर जिले के मुरकी गांव में भीड ने एक युवक को बच्चा चोर समझ कर मार डाला। पीडित मदद के लिए चिल्लाता रहा मगर भीड के सामने पुलिस भी उसकी मदद नहीं कर पाई। इंडियास्पेंड कंटेंट के अनुसार 2010 से 2017 के बीच हुए 63 लिंचिंग मामलों में 80 फीसदी से अधिक मुसलमानों को निषाना बनाया गया है। 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से लिचिंग के मामले बढे हैं और इन 63 मामलों मेंसे आधे से ज्यादा भाजपा षासित राज्यों से संबंधित हैं। लिंचिंग में मारे गए 28 लोगों में 24 मुस्लिम समुदाय से हैं। लिंचिंग की 54 फीसदी घटनाएं अफवाहों पर आधारित थी। एमनेस्टी इंटरनेश ल की ताजा रिपोर्ट  के अनुसार 2018 के पहके छह माह में सबसे ज्यादा हैट क्राइम के 100 मामले  उत्तर प्रदेश  और उसके बाद गुजरात में सामने आए हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी लिंचिंग की कडे शब्दों में भर्त्सना कर चुके हैं मगर उपद्रवी किसी की सुनने को तैयार नहीं है। इन उपद्रवियों से निपटने के लिए सख्त कानून बनाने की जरुरत है।