शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

पहाडी राज्यों का दर्द

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की वीरवार को हिमाचल यात्रा के दौरान राज्य की जनता में “विशेष  पैकेज“ की उम्मीद जगना स्वभाविक है। हिमाचल प्रदेश  में  वर्षांत  तक विधानसभा होने है और इस बार भी भाजपा राज्य में सत्ता की प्रबल दावेदार है। प्रधानमंत्री ने उत्तर प्रदेश  और बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान दोनों राज्यों को विशेष  पैकेज देने का ऐलान किया था। अब हिमाचल की बारी है। कठिन  भौगोलिक परिस्थितियां और चरम जलवायु के कारण  पहाडों में विकास की लागत मैदानी क्षेत्रों की तुलना में  दो से अढाई गुना ज्यादा आती है। पहाडी राज्यों में रेल नेटवर्क न के बराबर है। हिमाचल प्रदेश  में आजादी के बाद सात दशकों में एक किलोमीटर लंबी ब्रॉडगेज रेलवे लाइन तक नहीं बन पाई है। प्रस्तावित पठानकोट-मनाली-लेह रेल लाइन अभी भी कागजों में ही सिमटी हुई है जबकि यह रेल लाइन सामरिक दृष्टि  से बेहद उपयोगी है। हिमाचल प्रदेश  मे कालका- शिमला और पठानकोट-जोगेन्द्रनगर छोटी रेल लाइनें  (नेरो गॉज) का निर्माण अग्रेंजो द्वारा किया गया था। स्वदेशी  सरकार इन लाइनों को बॉड गेज तक नहीं कर पाई है । 16 किलोमीटर लंबी नंगल-उना-तलवाडा बॉड गेज लाइन का निर्माण कार्य  तीन दशक से ज्यादा समय में भी पूरा नहीं हो पाया है। हिमाचल प्रदेश  में बद्दी-बरोटीवाला क्षेत्र हालांकि  एशिया  का तीसरा सबसे बडा ड्रग उत्पादक हब है मगर इस क्षेत्र के लिए भी आज तक रेल लाइन का निर्माण नहीं हो पाया है जबकि यह क्षेत्र कालका और चडीगढ के काफी समीप है। समय पर रेल लाइनें पूरी नहीं होने से इनकी लागत बढ जाती है।  उत्तराखंड में 125 किलोमीटर लंबी  ऋृशिकेश -कर्णप्रयाग  रेल लाइन इसकी गवाह है । इस रेल लाइन का काम समय पर शुरु नहीं होने के कारण छह साल में इसकी लागत 4000 करोड रु से बढकर 16,500 करोड रु हो गई है। अभी भी इस रेल लाइन पर काम  शुरु नहीं हो पाया है। इस रेल लाइन में देश  की सबसे 15 किलोमीटर लंबी सुरंग का निर्माण होना है। पहाडी राज्यों के लिए रेल लाइनें और सडकें उनकी जीवन रेखा होती है। पहाडों की बात तो छोडिए, स्वदेशी  सरकार आजादी के सात दशक में बमुश्किल  13,000 किलोमीटर लंबी रेल लाईनें बिछा पाईं है। आजादी से पहले फिरंगी सरकार ने 50, 000 किलोमीटर लंबी रेल लाइनों का निर्माण किया था। पहाडों में समयबद्ध और योजनाबद्ध विकास करवाना आसान नहीं है। पहाडों को अपनी वन संपदा को भी संरक्षित रखना है और सडकों का निर्माण भी करना है। सडक निर्माण और विकास की परियोजनाएं लागू करने के लिए वृक्षों का कटान आवश्यक  है। केन्द्र सरकार ने पर्यावरण संरक्षण के दृष्टिगत  वृक्ष कटान को लेकर नियम खासे सख्त कर रखे हैं और इनके कारण अक्सर पहाडों में निर्माण कार्य में लंबा विलंब हो जाता है और लागत बढ जाती है। एक जमाने में वन संपदा पहाडी राज्यों के लिए राजस्व का जरिया भी था मगर अब नहीं है। पहाडों के लोग भी वन खेती से कोई आय अर्जित नहीं कर सकते है। वस्तु स्थिति यह है कि पहाड के लोगों को हर मामले में भेदभाव का  शिकार होना पड रहा है। सडक यायायात के अलावा परिवहन का और कोई भी पुख्ता साधन नहीं है। मैदानी क्षेत्रों की तुलना में पहाडी राज्यों का तेजी से ओद्योगिकरण भी नहीं हो पाया है और इसलिए रोजगार सृजन काफी कम है । केन्द्र द्वारा  पहाडी राज्यों को उधोग स्थापित करने के  लिए तरह-तरह रियायतें दिए जाने  और सस्ती बिजली तथा लेबर मुहैया होने के कारण पहाडी राज्यों का थोडा-बहुत औद्योगिकरण हुआ तो है मगर स्थानीय लोगों को प्रर्याप्त रोजगार नहीं मिल पाया है। इसी कारण  हिमाचल में  शिक्षित बेरोजगारों की संख्या पंजाब और हरियाणा से काफी ज्यादा है। इन हालात में हिमाचल प्रदेश  जैसे पहाडी राज्य के लिए केन्द्र से विशेष  पैकेज की दरकार है। प्रधानमंत्री ने उतराखंड चुनाव प्रचार के दौरान राज्य के लोगो से विशेष  पैकेज का वायदा किया था। उत्तराखंड की जनता ने भाजपा को प्रचंड जनादेश  दिया है। लोकसभा चुनाव क दौरान मोदी ने हिमाचल के लोगों से भी यही वायदा किया था। वायदों को पूरा करने का यही सही समय है।

गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

अब तो संभले केजरीवाल

राजधानी दिल्ली में दो साल में ही अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी से जनता का मोहभंग हो गया है। एमसीडी के चुनाव परिणाम यही संकेत   दे रहे हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपनी हार का ठीकरा भले ही इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मषीनों के सर फोड लें, मगर सच्चाई यही है कि दिल्ली की जनता ने आप और केजरीवाल की “नकारात्मक राजनीति“ को नकार दिया है। केजरीवाल “नई राजनीतिः की बाते करते-करते “नकारात्मक राजनीति“ के चैंपियन बन  गए हैं । एमसीडी चुनाव  मतदान से दो दिन पहले भी अरविंद केजरीवाल  इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को दोषी  ठहराने से बाज नहीं आए । केजरीवाल ने दावा किया था कि अगर ईवीएम मशीनों में गडबडी नहीं हुई तो आप 272 मेंसे 200 सीटें जीतेगी। मगर आम आदमी पार्टी मात्र 47 सीटें ही जीत पाई हैं। इससे साफ है कि ईवीएम मशीनों में कोई गडबडी नहीं हुई है। अगर हुई होती तो केजरीवाल की पार्टी  को 47 सीटें भी नहीं मिलती। दिल्ली की जनता के गले यह बात भी उतर नहीं रही थी कि अगर  ईवीएम मशीनों में गडबडी की जा सकती है, तो 2015 के विधानसभा चुनाव में क्यों नहीं हुई? इन्हीं ईवीएम मशीनों के दम पर आम आदमी पार्टी को 2015 में प्रचंड बहुमत मिला था। आम आदमी पार्टी की लूटिया डूब रही है, दीवारों पर लिखी यह इबादत पंजाब और गोवा विधानसभा चुनाव में मिली पराजय के बाद साफ पढी जा सकती थी। इसके बाद दिल्ली के राजौरी गार्डन विधानसभा उपचुनाव में आप के  प्रत्याशी  की जमानत जब्त हो जाने के बाद भी दीवारों पर लिखी इबादत साफ-साफ कह रही थी कि अरविंद केजरीवाल का जादू लुप्त हो चुका है। पर अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी हार का सामना करने की बजाए अभी भी  ईवीएम मशीनों को  जिम्मेदार  ठहरा रहे हैं । दिल्ली की जनता बेहद जागरुक है और वह यह बात भली-भांति जानती है कि केजरीवाल सिर्फ  बहाने बना रहे हैं। उन्हें दिल्ली की जनता ने राजधानी का राजकाज चलाने और इसका कायाकल्प करने के लिए प्रचंड जनादेश  दिया था। केजरीवाल ने इस जनादेश  की कद्र नहीं की और वे दिल्ली के बाहर आप का परचम फहराने के लिए हाथ-पांव मारते रहे। दिल्ली की जनता को यह बात गवारा नहीं लगी। राजोरी गार्डन विधानसभा उपचुनाव में पार्टी प्रत्याशी की जमानत जब्त हो जाना इस बात के  स्पष्ट  संकेत थे। इस साल केजरीवाल को यह तीसरा बडा झटका है। पहले पंजाब और गोवा के विधानसभा चुनाव की हार, फिर राजौरी गार्डन उपचुनाव और अब एमसीडी उपचुनाव के परिणाम यही कह रहे हैं कि दिल्ली में 2015 के विधानसभा चुनाव में भले ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लहर नहीं चली मगर 2017 में मोदी की प्रचंड लहर चल रही है। दिल्ली एमसीडी चुनाव परिणाम ने यह बात भी साफ कर दी है कि देश  में विपक्ष के पास मोदी का कोई विकल्प नहीं है और अरविंद केजरीवाल की “नकारात्मक“ राजनीति भी जनता को गवारा नहीं है। दो साल के भीतर आम आदमी पार्टी चुनावी दंगल में जो हश्र हुआ है, उसने 1977 में जनता पार्टी की याद दिला दी है। आपातकाल की ज्यादतियों से भनभनाई जनता ने 1977 में कांग्रेस का आधे भारत (कॉउ बैल्ट) मे सुपडा साफ कर दिया था और लोकसभा चुनाव से कुछ समय पहले बनी जनता पार्टी को प्रचंड जनादेश  दिया था। मगर तब भी जनता पार्टी इस जनादेश  का सम्मान नहीं कर पाई और देश  की हर बुराई के लिए कांग्रेस और इंदिरा गांधी को  दोषी  ठहराती रही। नतीजतन, अढाई साल में जनता पार्टी की सरकार भी गिर गई और पार्टी भी टूट गई। अरविंद केजरीवाल भी पिछले दो साल में हर बात के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को  दोषी  ठहरा रहे है। अगर केजरीवाल तुरंत संभले नहीं, आम आदमी पार्टी का भी जनता पार्टी जैसा ही हश्र हो सकता है। भारत की जनता को “नकारात्मक“ राजनीति कभी  रास नहीं आई।

बुधवार, 26 अप्रैल 2017

कानून -व्यवस्था की समस्या नहीं है नक्सली

 छतीसगढ के सुकमा जिले में सोमवार को नक्सलियों ने केन्द्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स (सीआरपीएफ) के 25 जवानों को मार डाला। लगभग तीन सौ नक्सलियों ने घात लगाकर सीआरपीएफ के   जवानों पर हमला बोल दिया। हमलावरों में महिला नक्सली भी  शामिल थीं।  सीआरपीएफ के लगभग 100 जवान सडक निर्माण कर रहे श्रमिकों की सुरक्षा के लिए तैनात थे। दुर्भाग्यवश , जवान अपनी ही रक्षा नहीं कर पाए।  इस साल नक्सलियों का सुरक्षा बलों पर यह दूसरा बडा हमला है। इसी मार्च में नक्सलियों ने सीआरपीएफ के गश्त   लगा रहे 11 जवानों को मार डाला था । छतीसगढ राज्य में  सुकमा जिला माओवादियों का गढ माना जाता है और लंबे समय से यह जिला नक्सल समस्या से पीडित है। सुकमा को जाने वाली हर सडक खूनी मानी जाती है और कहीं से भी इस जिले का सफर पूरी तरह से जोखिम भरा होता है। इस सच्चाई को सरकार भी जानती है और नक्सलियों से लडने वाले सुरक्षाकर्मी भी। और यह बात भी सभी जानते हैं कि नक्सली घात लगाकर हमला करते हैं। इसके बावजूद सीआरपीएफ के जवान फिर  शहीद हो गए। केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को माना कि नकसलियों ने जवानों की निर्मम हत्या की है और सरकार इसका माकूल जवाब देगी। गूह  मंत्री  ने अब नक्सल समस्या से पीडित राज्यों की बैठक 8 मई को बुलाई है। पर सबसे बडा सवाल यह है कि क्या  बैठक से नक्सल जैसी गंभीर समस्या का हल निकल पाएगा ? आज तक सरकार  बैठक-दर- बैठक ही तो करती आई है। सुरक्षा   विशेषज्ञ  भी मानते हैं कि वातानुकुलित बंद कमरों में चाय-पानी पीकर देश  की अखंडता से जुडी गंभीर समस्याओं का हल नहीं निकाला जा सकता। कश्मीर  हो या छतीसगढ अथवा पूर्वोतर राज्य, जवानों पर हर हमले के बाद यही बात कही जाती है मगर सरकार न तो नक्सली समस्या का कोई संतोषजनक हल निकाल पाई है और न ही  कश्मीर  समस्या का।  आखिर यह सिलसिला कब तक जारी रहेगा? नक्सल मूलतः व्यवस्था से जुडी संवेदनशील समस्या है। नक्सली वामपंथी आंदोलन की उपज है और साम्यवादी व्यवस्था के पैरवीकर। पश्चिम   बंगाल से  शुरु होकर नक्सलवाद अब छतीसगढ, आंध्र प्रदेश , महाराष्ट्र , तेलंगाना और ओडीशा तक फैल चुका है। देश  के लगभग सौ जिले नक्सली समस्या से पीडित हैं। इन राज्यों के कबालियों में नक्सलियों  की गहरी पैठ है। नक्सली भारतीय संविधान को  फिरंगी उपनिवेशवाद का प्रतीक मानते हैं जिसमें वन उपज और अधिकारों को कबायलियों से छीनकर सरकार के सुपुर्द  कर दिया गया है। नक्सलियों का मानना है कि स्वदेशी  सरकार के इस कदम से वन उपज और वन खेती पर आश्रित लगभग चार लाख कबायली बेरोजगार और बेघर हो गए हैं।  इसी सोच के कारण नक्सली कबायली क्षेत्रों में सडक जैसे विकास कार्य  का भी मुखर विरोध करते हैं और इस क्रम में जवानों पर हमले किए जातेे हैं। इंटेलीजेंस एजेंसियों का आकलन है कि  लगभग बीस हजार हथियारबंद नक्सली नक्सल-पीडित राज्यों में सक्रिय हैं। इसके अलावा नक्सलियों के लगभग 50,000 सक्रिय मेंबर हैं। धनाढ्य तबकों को लूटकर उन्हें गरीबों और कबायलियों में बांटना नकसलियों की रणनीति है। टाइम्स ऑफ इंडिया द्वारा कराए गए सर्वेक्षण के अनुसार देश  का 58 फीसदी जनमानस नक्सलियों के प्रति सकारात्मक राय रखता है। केवल 19 फीसदी सरकार की तरह नक्सलियों को देशद्रोही और विध्वंसक मानते है। देश  में नक्सलवाद और अलगाववाद दिन-ब-दिन बढता जा रहा है। नक्सल समस्या भी कानून और व्यवस्था से जुडी समस्या नहीं है। जब तक सामाजिक अन्याय और आर्थिक असमानता रहेगी, नक्सलवाद अथवा अलगाववाद की समस्या पैदा होती ही रहेगी। आजादी के तक तक कोई अर्थ  नहीं है, जब तक देश  के हर नागरिक की  विकास में सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित   न हो। बहरहाल, नक्सल समस्या का हल भी राजनीतिक ही है और इसके लिए गंभीर प्रयास किए जाने चाहिए।

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

मोदी सरकार का सपना

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नए भारत के निर्माण के वास्ते राज्यों से टीम इंडिया बनाने का आहवान किया है। निसंदेह,नए भारत के सपने को सभी राज्यों और मुख्यमंत्रियों के सहयोग से ही साकार किया जा सकता है। रविवार को नीति आयोग की संचालन परिषद की बैठक में प्रधानमंत्री ने कहा है कि वे खुद मुख्यमंत्री रह चुके हैं, इसलिए राज्यों की आर्थिक विषमताओं से बखूबी परिचित है। राज्यों के लिए यह बेहतर स्थिति है। प्रधानमत्री ने बैठक में मौजूदा अप्रैल से मार्च वाले वित्तीय वर्ष  को  जनवरी से दिसंबर तक बदलने की पैरवी भी की है। मोदी सरकार केन्द्रीय बजट को फरवरी 28 की बजाए फरवरी के  शुरु में पेश  करने की रिवायत शुरु कर चुकी है। प्रधानमंत्री ने राज्यों के लिए इस बात की भी छूट दी है कि राज्यों को बजटीय परियोजनाओं के स्वीकृति के लिए नीति आयोग आने की जरुरत नहीं है। इसके लिए वे नीति आयोग की तरह विशेषज्ञों की सेवाएं ले सकते हैं। मोदी सरकार वित्तीय प्रबंधन में आमूल-चूल बदलाव करने के पक्ष में है। और इसकी  शुरुआत हो भी चुकी है। मोदी सरकार को उम्मीद है कि वित्तीय प्रबंध में क्रांतिकारी बदलाव से देश  तेजी से आगे बढ सकता है। इस बात में भी दो राय नहीं हो सकती है कि राज्यों की एक समान तरक्की के बगैर देश  की प्रगति संभव नहीं है।  दुर्भाग्यवश , आजादी के सात दशक बीत जाने के बावजूद भी कई राज्य अभी भी अपेक्षाकृत पिछडे हुए हैं। बिहार के मुख्यमंत्री ने बैठक में इस बात की  शिकायत भी की कि पिछडे राज्यों को 14वें वित्त आयोग से कोई विशेष  राहत नहीं मिली। उनकी मांग है कि केन्द्र को पिछडे राज्यों के लिए इसकी भरपाई करनी चाहिए। राज्यों को केन्द्र से और भी कई  शिकायतें हैं और इनमें प्रमुख हैं कि केन्द्र सरकार उन राज्यों से सौतेला व्यवहार करती है जहां विपक्षी दलों की सरकारें सत्तारुढ होती हैं। रविवार को आयोग की बैठक में हिमाचल प्रदेश  के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने यही  शिकायत की। मगर यह रिवायत भी कांग्रेस ने ही  शुरू  की है। भाजपा आज तक इस बात को भूल नहीं पाई है कि किस तरह नब्बे के दशक में केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने बाबरी मस्जिद प्रकरण के बाद हिमाचल, राज्स्थान, उत्तर प्रदेश  और मध्य प्रदेश  में चुनी हुई  भाजपा सरकारों को बर्खास्त कर दिया था। कांग्रेस  शासन में भाजपा अथवा गैर-कांग्रेसी सरकारों से भी वित्तीय मदद में भेदभाव किया जाता था।  तथापि, दो गलत काम मिलकर भी अच्छा नहीं कर सकते।  संघीय ढांचे में केन्द्र सरकार और राज्यों में टकराव की बजाए मिल-जुल कर ही देश  को तेजी से आगे ले सकते हैं और विकास की तेज रफ्तार में किसी भी तरह के अवरोधक नहीं आने चाहिए। तथापि, प्रधानमंत्री की इस पहल में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पश्चिम  बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अभी से रोडे अटकाने  शुरु कर दिए हैं। आम आदमी पार्टी को पंजाब और गोवा के विधानसभा चुनावों में करारी हार का सामना करना पडा है और अब केजरीवाल हार का ठीकरा इलेक्ट्रानिक वोटिंग  मशीन  में गडबडी के सर फोड रहे हैं। रविवार को ही दिल्ली में निकाय चुनाव के लिए मतदान सपन्न हुआ है और एक्जिट पोल के नतीजे आम आदमी पार्टी के सफाए के संकेत दे रहे हैं। केजरीवाल ने अभी से दिल्ली निकाय चुनाव में भी  इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन   में गडबडी के आरोप लगाए हैं। कहावत है “ खिसखियानी बिल्ली, खंबा नोचे“।  दोनों ही नीति आयोग की बैठक से अनुपस्थित रहे। केजरीवाल को मोदी सरकार से सौ तरह की  शिकायतें हैं। ममता को भी केन्द्र से उदार वित्तीय सहायता नहीं मिलने का गिला है। देश  के समग्र विकास के लिए किसी भी राज्य को आधे-अधूरे विकास से पीछे नहीं छोड जा सकता।  केन्द्र में सत्तारूढ मोदी सरकार के लिए सुखद स्थिति यह है कि अधिकांश  राज्यों में भाजपा की सरकारें है। सरकार इस स्थिति को भुनाकर नए भारत का निर्माण कर सकती है।

कहां है स्टील फ्रेम ?

एक जमाने में देश  के राज-काज की रीढ की हडडी माने जाने वाले नौकरशाह आज सियासी नेताओं की “जी हजूरी“ करने वाले “बाबू“ बन कर रह गए हैं। जिन लोगों ने फिरंगी  शासन झेला  है, वे इस बात के गवाह है कि तत्कालीन इंडियन सिविल सर्विस ब्रिटिश  सरकार का स्टील फ्रेम हुआ करता था और यह इतना मजबूत था कि सियासत और  घूसखोरी  के  पैने दांत  भी इसे काट नही सकते थे। वे कायदे और कानून के एकदम पक्के हुआ करते थे। मजाल है कि उनके रहते कोई नियमों को तोड-मरोड कर उनका फायदा उठा पाए। लार्ड विलियम सिसिल को जब क्वीन एलिजाबैथ का सचिव बनाया गया था, उन्हें किसी भी तरह के गिफ्ट न लेने, कायदे-कानून के पालन के प्रति  पूरी तरह  से निष्ठावान  रहने और हर हालत में महारानी को  उत्कृष्ट   सलाह देने की  शपथ दिलाई गई थी। बाद में यही  शपथ हर आइसीएस अधिकारी को दिलाई जाती थी। पुरान लोग आज भी फिरंगी सरकार के स्वच्छ, पारदर्शी  और कानून सम्मत  राज-काज के कायल हैं और अक्सर कहते हैं, “इससे तो अंग्रेजों का  शासन ही अच्छा था“।  आजादी के बाद इस स्टील फ्रेम का रंग-रुप भी बदल गया और तेवर भी। जिस नौकरशा ही पर भारत को गर्व था, उसी को लेकर अब देश  के गृहमंत्री राजनाथ सिंह को ही कहना पडा रहा है “ सियासी नेताओं की जी हजूरी न करें नौकरशाह“। आजादी के सात दशक मेँ  देश  का यह “स्टील फ्रेम“ स्टील केज में परिवर्तित हो चुका है। आखिर इस स्थिति को लाने के लिए कौन जिम्मेदार हैं? ब्रिटिश  साम्राज्य में भारत के लिए सच्चे दिल से स्टील फ्रेम वाली इंडियन सिविल सर्विस को चुना था। यह बात दीगर है कि इसमें भी भेदभाव किया गया। शुरु में अंग्रेजी अफसरों  को ही आईसीएस में भर्ती किया जाता। भारतीयों के लिए दूसरे दर्जे की सिविल सर्विस में रखा जाता। मगर बाद में आईसीएस को भारतीयों के लिए भी खोल दिया था। ब्रिटिश  साम्राज्य में कायदे- कानून को न तो तोडा-मरोडा जाता था और न ही इनका उल्लघंन किया जाता। आजादी के बाद उतरोत्तर स्थिति एकदम बदल गई। नियमों को तोडना और कानून को मरोडना, सियासी नेताओं का शौक  बन गया  है। दुर्भाग्यवश "जी हजूरी"  करने वाले नौकरशाह इसमें नेताओं का साथ देते हैं।  ब्रिटिश  शासन की ही तरह राज-काज का पूरा दारोमदार भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारियों के जिम्मे है। विदेशी  मामलों के लिए भारतीय विदेश  सेवा है। भारतीय पुलिस सेवा, भारतीय वन सेवा, भारतीय आर्थिक एवं सांख्यिकी सेवा और इन सब के बाद केन्द्रीय  एवं विभिन्न राज्यों की प्रशासनिक और पुलिस सेवाएं है। हर राज्य के पास मुख्य सचिव के अलावा, कई अतिरिक्त मुख्य सचिव, तीन-चार डीजीपी और आला अफसरों की फौज है। इसके बावजूद भी न तो देश  में कायदे-कानून का सख्ती से पालन किया जा रहा है, और न ही कहीं पारदर्शी  और स्वच्छ प्रशासन की झलकमात्र भी नजर आती है। आजादी से पहले का प्रशासन मूलत़ पुलिस स्टेट पर आधारित था और सरकार का काम कानून-व्यवस्था को बनाए रखना और ज्यादा से ज्यादा लोगों के लिए कुछ बुनियादी सुविधाएं मुहैया  कराना हुआ करता था। आजादी के बाद भारत वेल्फेयर स्टेट बन गया था और इसमें नौकरशाही को “ प्रगति और विकास“ के एजेंट के रुप में काम करना था। अब डीसी मात्र कानून-व्यवस्था को लागू करने वाला डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ही नहीं, वह जिले में योजनाबद्ध  विकास कार्यों का भी मुखिया था। अखिल भारतीय प्रशासनिक एवं पुलिस और राज्यों की प्रशासनिक-पुलिस अधिकारियों को  ट्रेनिंग  के समय भी वेल्फेयर स्टेट की घुटी पिलाई जाती है।  21 अप्रैल को सिविल सर्विस दिवस पर देश  की प्रशासनिक सेवाओं की समकालीन प्रांसगिकता के आकलन की जरुरत महसूस की जा रही है। आए दिन नौकरशाही के  भ्रष्ट   कारनामों और अकूत संपति जमा करने के कच्चे चिठ्ठे  देश  की “स्टील फ्रेम“ सर्विस को जंग लगा रहे हैं।   

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

लालबत्ती कल्चर को बाय-बाय

देष में लालबत्ती कल्चर को समाप्त करना मोदी सरकार का साहसिक कदम है। बुधवार को भारत सरकार ने ऐलान किया कि पहली मई से केन्द्र का कोई भी मंत्री, नेता और आला अधिकारी लालबत्ती इस्तेमाल नहीं करेगा। इतना ही नहीं मोदी सरकार ने कानून की किताब (मोटर व्हीक्ल एक्ट) में लालबत्ती के प्रावधान को ही हटाने का निश्चय  किया है। यानी “न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी“। एबुलेंस, फायर ब्रिगेड और पुलिस की गाडी पर नीली बत्ती लगाना जारी रहेगा। लालबत्ती “ वीआईपी“ कल्चर का प्रतीक है और लोकतंत्र में जनता जर्नादन ही “वीआईपी“ मानी जाती है। जनसेवक (पब्लिक सर्वेंट) जनता से ऊपर खुद को वीआईपी माने, यह लोकतंत्र का घोर अपमान है। प्रधानमंत्री ने खुद माना है कि “सभी भारतीय खास हैं, और सभी भारतीय वीआईपी हैं“। सुप्रीम कोर्ट  भी कह चुका है कि लालबत्ती का इस्तेमाल गलत है और देश  में जनता ही वीआईपी है।  केन्द्र से एक माह पहले पंजाब में अमरेन्द्र सिंह सरकार भी वीआईपी कल्चर की प्रतीक “लालबत्ती“ को समाप्त कर चुकी है। अब केन्द्र की देखादेखी उतराखंड  सरकार ने भी लालबत्ती कल्चर को समाप्त करने का ऐलान किया है। राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने टिवटर पर लालबत्ती बगैर अपनी गाडी की तस्वीर पोस्ट भी की है। महाराष्ट्र  के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस ने भी सोशल मीडिया पर लालबत्ती लगाए बगैर अपनी गाडी पोस्ट की है। दोनों राज्यों की तरह भाजपा-शासित अन्य राज्य भी वही करेंगे जो केन्द्र सरकार करेगी। लालबत्ती फिरंगी मानसिकता का प्रतीक भी है। फिरंगी सरकार भारतीयों को गुलाम मानते थे और इसीलिए अपनी गाडियों पर लालबत्ती  लगाकर अपने वीआईपी स्टेटस को बघारते थे। दुर्भाग्यवश, आजादी के बाद स्वदेशी  नेताओं को यही वीआईपी कल्चर खूब भाया और अदने से लेकर बड़े नेता  तक सभी खुद को वीआईपी बताने में कोई कसर नहीं छोडते। देश  ने लगभग सात दशक तक ब्रिटिशकालीन वीआईपी कल्चर झेला है। देश  को आजाद कराने का  श्रेय लेने वाली कांग्रेस सरकार ने आज तक इस वीआईपी कल्चर को तिलांजलि नहीं दी। केद्र सरकार के साथ-साथ पंजाब की कांग्रेस सरकार बधाई की पात्र है कि सात दशक से देश  जिस “घमंडी“ और राजसी कल्चर की पीडा झेल रहा था, अततः उससे निजात मिली है। मगर सवाल यह है कि क्या “ लालबत्ती” का चलन खत्म कर देने भर से वीआईपी कल्चर समाप्त हो जाएगा। विदेशों  में  राष्ट्रपति  से लेकर मंत्री, सांसद तक सभी आम आदमी की तरह काम करते हैं। कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल हुई थी, जिसमें रुस के  राष्ट्रपति  व्लादिमीर पुतिन को अपनी गाडी में स्वचालित पेट्रोल पंप खुद फ्यूल भरते हुए दिखाया गया था। कुछ साल पहले इग्लैंड के प्रधानमंत्री के वाहन द्वारा  टेªफिक नियमों का उल्लघंन करने पर पुलिस ने चालान काट दिया था।  भारत में भी कभी ऐसा हो सकता है, आज के हालत में इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। देश  के नेता कितने घमंडी और वीआईपी कल्चर प्रेमी हैं, इसके प्रमाण आए दिन मिलते रहते हैं। हाल ही में  शिवसेना के सांसद रवीन्द्र गायकवाड ने एयर  इंडिया के कर्मचारी को चप्प्पलों से पीटा था और इस पर इस एयरलाइंस ने आरोपी को अपनी फलाइट्स से ही बैन कर दिया था। इस घटना के एक दिन बाद तेलंगाना के एक वरिष्ठ  कांग्रेस नेता विधानसभा परिसर में पुलिस से ही उलझ पडे जबकि बह अपनी डयूटी निभा रहा था। टोल नाकाओं पर नेताओं द्वारा कर्मचारियों से बदसलूकी करना आम बात है। समस्या देश  के नेताओं की ”राजसी” मानसिकता  है। संसद अथवा विधानसभा का सदस्य चुने जाते ही वे ”जनप्रतिनिधि“ से “ वीवीआईपी“ बन जाते हैं। इस बात के दृष्टिगत  जनता पूछ सकती है कि अगर हम वीआईपी है, ओ फिर हमें भी एयरपोर्ट पर कतार से निजात मिलनी चाहिए। अस्पताल में वीआईपी ट्रीटमेंट और सरकारी दफ्तरों में बेरोकटोक प्रवेश  मिलना चाहिए। टवीटर पर किसी ने प्रतिकिरया व्यक्त की है “मोदी जी बस से दफ्तर आएं तो मानें।

गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

”बुरे वक्त के किंग“

एक जमाने  में  शराब उद्योग को नया आयाम देने वाले उधोगपति और खेल प्रेमी विजय माल्या के सितारे इन दिनों गर्दिश  में है। और इसके लिए माल्या खुद जिम्मेदार हैं। किसी भी कारोबार को कुशाग्र और समयबद्ध निर्णय से ही  आगे बढाया  या डूबोया  जा सकता है। इसी कारण “किंग ऑफ गुडस टाइम्स“ के तखलुस्स से नवाजे गए विजय माल्या अब “ किंग ऑफ बैड टाइम्स“ के प्रतीक बन गए हैं। अति महत्वाकांक्षी विजय माल्या को अपना कारोबार बढाने का जनून था। माल्या हमेशा अपने कारोबार का दायरा बढाने में लगे रहते। उन्होंने कई व्यवसायों को शामिल कर अपने कारोबार का दायरा बढाया भी। देश  के प्रतिष्ठित  संस्थानों से उन्हें प्रतिभाशाली लोगों को चुन-चुन कर अपने साथ मिलाया और अपनी शराब कंपनी किंगफिशर को बुलदियों पर पहुंचाया। तथापि, भारत में शराब व्यवसाय को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता है। इसलिए विजय माल्या इससे पीछा छुडाना चाहते थे। माल्या ने मैन्युफेक्चरिंग, फर्टिलाइजर, टेलिविजन और नागरिक विमानन में निवेश  भी किया। उन्होंने किंगफिशर एयरलाइंस को ऐसे समय में  शुरु किया जब यह उधोग बुरे दौरे से गुजर रहा था।  शराब कारोबार में 40 से 50 फीसदी मुनाफे की तुलना में एयरलाइंस में एक से दो फीसदी भी बमुश्किल   मुनाफा कमाया जा सकता है। माल्या का एक और जनून थाः नई-नई कंपनियां खरीदना। और कई बार बगैर ठोंक-पीट कर कंपनियां खरीदते।   यही उनकी सबसे बडी गलती थी। किंगफिशर को अंतरराष्ट्रीय  विमानन कंपनी बनाने के चक्कर में माल्या ने भीषण घाटे में चल रही एयर डेकन को मुंहमांगे दाम पर खरीदा। माल्या ने एयर डेक्न की बैंलेस  शीट तक नहीं देखी जबकि हर कारोबारी सबसे पहले यही करता है। उस समय माल्या का कारोबार बुलंदियों पर था। इतना ही नहीं विजय माल्या ने किंगफिशर एयरलाइंस पर दोनों हाथों से खूब पैसे उडाए। किसी यात्री की  फ्लाइट छूट गई तो वे उसे फौरन कंपनी के खर्चे पर दूसरी एयरलाइंस की फ्लाइट से भिजवाते। किंगफिशर  के लिए उन्होंने महंगी से महंगी विदेशी  पत्रिकाएं मंगवाई मगर इस बात पर जरा भी ध्यान नहीं दिया कि क्या वे कंपनी के गोदामों से बाहर भी निकलीं। किंगफिशर के प्रचार के लिए महंगी से महंगी मांडल को हायर कर उनपर डटकर पैसे लुटवाए। इन सब बातों का कंपनी के मुनाफे पर बुरा असर तो पडना ही था। जिस उधोग में मुनाफ का मार्जिन बहुत ही कम हो, वहां कोई भी कारोबारी पैसे इस तरह से बर्बाद नहीं करता। नतीजतन, माल्या के पास न तो किंगफिशर शराब कंपनी रही और न ही किंगफिशर एयरलाइंस चल पाई। किंगफिशर चलाने के लिए  बैंकों से भारी-भरकम कर्जा  लिया मगर कंपनी भी डूबी और माल्या भी। लगभग 9000 करोड डकार जाने के बाद वे गिरफ्तारी से बचने के लिए विदेश  भाग गए और अब भारतीय बैंकिग उधोग की “नॉन-परफॉर्मिंग एसेट” के सिंबल बने हुए हैं। भारत के प्रत्यर्पण आग्रह पर मंगलवार को स्काटलैंड यार्ड ने माल्या को गिरफ्तार किया तो सही मगर तीन घंटे के भीतर उन्हें कोर्टे से जमानत भी मिल गई। माना जा रहा है कि औपचारिकता निभाने के लिए माल्या खुद पुलिस के सामने पेश  हुए और इस दौरान उनके वकील न्यायालय में उनके लिए जमानत की कार्रवाई करते रहे। इससे साफ है कि भारत सरकार के लिए माल्या का प्रत्यर्पण करवाना आसान नहीं है। इससे पहले भी भारत ललित मोदी, अजय प्रसाद खेतान, आनंद कुमार जैन, विजयेन्द्र कुमार रस्तोगी, रवि शंकरण सरीखे कई क्रिमिनल भगोडों का प्रत्यर्पण कराने में कामयाब नहीं हो पाई है। इंग्लैंड में प्रत्यर्पण की प्रकिया बेहद लंबी न्यायिक प्रकिया है। आरोपी को अपील का अधिकार होने के कारण, वह इसे लंबा खींच सकता है। इसीलिए, इंग्लैंड के साथ प्रत्यर्पण संधि होने के बावजूद माल्या को भारत लाना आसान नही है। विजय माल्या इस स्थिति से बखूबी परिचित हैंे, इसीलिए इग्लैंड भाग गए।

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

मोदीकेयर

मोदी सरकार जेनेरिक दवाओं के प्रचलन को बढावा देने के लिए बहुत बडा कदम उठाने जा रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सूरत में ऐलान किया है कि अब देश  भर में डॉक्टरों को रोगियों के लिए जेनेरिक दवाएं लिखना अनिवार्य  होंगा । इसके लिए सरकार जल्द ही कानून बनाएगी। जेनेरिक दवाए ब्रांडिड दवाओं की तुलना में काफी सस्ती होंती हैं। देश  की 50 फीसदी आबादी आज भी जरुरी  दवाओं की पहुंच से महरुम है।  भारत में मल्टी नेशनल और स्वदेशी  बडी ड्रग उत्पादक कंपनियों  के ऊंचे दाम वाली दवाएं आम आदमी की पहुंच से बाहर है। मल्टी नेशनल कंपनियों ने महंगे दामों पर दवाएं बेचकर भारी लूट मचा रखी है। ड्रग मैन्युफेक्चरिंग कंपनियां विगत पांच साल से लगातार कीमतें बढा रही हैं जबकि इस दौरान मुद्रा स्फीति गिरी है और उत्पादन लागत भी कम हुई है। पांच साल पहले मल्टी नेशनल कंपनियों की जिस एक गोली की कीमत 5 रु हुआ करती थी, वह बढते-बढते अब 20 को पार कर गई है। खासकर, हृदय रोग, मधुमेह (शुगर), रक्त चाप जैसी आम बीमारियों की दवाएं माह-दर-माह महंगी होती जा रही हैं। इसके लिए सरकार, डाक्टर्स  और  भ्रष्ट  सरकारी तंत्र  सब-के-सब जिम्मेदार हैं। देश  में ड्रग की कीमतें ड्रग प्राइस कंट्रोल आर्डर के तहत निर्धारित की जाती हैं और इसके किए सरकार ने कुछ मानदंड तय कर रखे  हैं।  इन्हीं के मुताबिक जरुरी और गैर-जरुरी दोनों ही तरह की दवाओं की कीमतें तय की जाती है। तथापि, सरकार का ड्रग प्राइस निर्धारण मेकेनिज्म  आम आदमी के समझ से बाहर है। गरीब और आर्थिक तौर पर दुर्बल व्यक्ति आज तक यह बात समझ नहीं पाया है कि मुद्रा-स्फीति अथवा महंगाई में मामूली सी वृद्धि पर जब कीमतें फौरन बढा दी जाती हैं, मुद्रा-स्फीति गिरने पर कम क्यों नहीं की जातीं। और जब सरकारी प्राधिकरण कीमतों तय कर रहा हो, तो इस बात का ख्याल क्यों नहीं रखा जाता। कीमतें अगर कम कर भी दी जाती हैं, तो ड्रग उत्पादक बडी चतुराई से दवा की मात्रा अथवा साइज  कम करे देंगे।  भ्रष्ट  सरकारी तंत्र भी जनता का साथ देने की बजाए उत्पादकों का साथ देता है। इस मामले में हिमाचल प्रदेश  का औद्योगिक क्षेत्र बद्दी-बरोटीवाला मिसाल है। चंद सालों में बद्दी-बरोटीवाला दुनिया का तीसरा सबसे बडा ड्रग उत्पादक हब बन कर उभरा  है और यहां 200 देशों के लिए 150 बल्क ड्रग का उत्पादन होता है। 30,000 करोड रु से ज्यादा के टर्न ओवर मेंसे 9500 करोड रु का निर्यात होता है। हिमाचल प्रदेश  में उधोगों के लिए आयकर से लेकर आबकारी  शुल्क तक कई तरह की रियायतें दी जाती है। बिजली भी माकूल और काफी सस्ती है और लेबर भी। इसके बावजूद बद्दी-बरोटीवाला में तैयार की जा रही दवाएं हिमाचल  में ही महंगे दामों पर बेची जा रही है। हाल ही में कुछ जरुरी  दवाओं की कीमतों में कमी की तो गई मगर दवा का आकार-प्रकार घटा दिया गया। पूरे देश  में यही चल रहा है। ड्रग मैन्युफेक्चर्स  आराम से कीमतें बढा देते हैं पर उन्हें पूछने वाला कोई नहीं है। बहरहाल, जेनेरिग ड्रग ब्रांडिड दवाओं से न केवल सस्ती हैं मगर ज्यादा प्रभावी भी हैं और इन दवाओं का शरीर पर प्रतिकूल असर भी नहीं पडता है। भारत जेनेरिक दवा उत्पादन में दुनिया का अग्रणी देश  है। इस बात के  दृष्टिगत  देश  में महंगी ब्रांडिड दवाओं की अपेक्षा जेनेरिक दवाओं को बढावा देने के लिए यह उपयुक्त समय है। भारत समेत एशिया या के अधिकांश  मुल्कों की 50 फीसदी आबादी को जरुरी  दवाएं नहीं मिल पातीं। जेनेरिक दवाएं इसका उपयुक्त विकल्प है। मगर सस्ती जेनेरिक दवाओं का लाभ आम आदमी को तभी मिलेगा जब डाक्टर्स  भी मरीजों को जेनेरिक दवाएं लिखना  शुरु करें। अमूमन, देश  में ब्रांडिड दवाओं को लिखने का प्रचलन है और डाक्टर भी ऐसी ही दवाएं लिखते हैं।  प्रधानमंत्री की ताजा पहल स्वाग्त योग्य है।

मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

बर्बरता या साजिश

आतंक और अलगाववादी हिंसा में झुलस रहे जम्मू-कश्मीर  में आए रोज कोई-न-कोई ऐसी घटना हो जाती है या करा दी जाती है, जिससे सेना और स्थानीय लोगों के बीच की दूरी बढती ही जाए और अलगाववादियों के नापाक मंसूबे फले-फूले। इस माह की 9 तारीख को श्रीनगर लोकसभाई सीट के लिए हुए मतदान के दौरान सेना द्वारा  मानव आवरण (ह्यूमन  शील्ड) के रुप में एक व्यक्ति को जीप से बांधने की घटना पर इन दिनों कश्मीर  घाटी में बवाल मचा हुआ है। इस घटना का वीडियो वायरल होते ही सेना के खिलाफ घाटी में गुस्सा और भडक गया है। सोमवार को राज्य की पुलिस ने इस मामले में सेना के खिलाफ प्राथमिक (एफआईआर) दर्ज की । इस वीडियो को जम्मू-कश्मीर  के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था। जाहिर है  इस वीडियो को किसी खास मकसद से तैयार करने के बाद इसे सोशल मीडिया पर पोस्ट किया गया। इस वीडियो में आरोप लगाया गया है कि सेना ने मतदान के दौरान हिंसक भीड़ से  निपटने के लिए स्थानीय व्यक्ति को जीप में बांध कर उसे मानव आवरण के तौर पर इस्तेमाल किया। जिस व्यक्ति को जीप में बंधा दिखाया गया है, उसने बाद में खुद माना कि वह अपना वोट डालने के बाद जब घर लौट रहा था, उसे गिरफतार कर लिया और  प्रद्रशनकारियों   निपटने के लिए जीप के फ्रंट से बांध दिया। सुरक्षाकर्मियों ने बाद में जांच टीम को बताया कि मतदान के समय  उपचुनाव का बहिष्कार  करने वाले  अलगाववादी एक पोलिंग बूथ को घेर कर वहां तैनात पुलिस और सीआरपीएफ के जवानों को जिंदा जलाने की फिराक में थे। सेना को इन सुरक्षाकर्मियों का एसओएस मिला और सैनिक तुरंत घटनास्थल के लिए रवाना हो गए। लेकिन अभी तक इस बात की कोई  पुष्टि  नहीं हुई है कि क्या सेना ने वाकई ही प्रद्रशनकारियों से निपटने के लिए मानव आवरण का इस्तेमाल किया ? सेना के खिलाफ दर्ज एफआईआर से इस बात की  पुष्टि हो रही है। मगर अब तक का अनुभव इस बात की गवाही नहीं देता है। सेना ने आज तक कभी भी हिंसक प्रद्रशनकारियों  से निपटने के लिए मानव आवरण को ढाल नहीं बनाया। मूलतः, प्रद्रशनकारियों  से निपटने का यह कवच इसराइली सेना द्वारा फलीस्तीनियों  खिलाफ प्रयोग किया जाता रहा है। सुरक्षाकर्मियों पर पत्थरबाजी की प्रैक्टिस भी फलीस्तीन से ही कश्मीर  में आई है। फलस्तीनी युवक इसराइली सैनिकों को पत्थर फेंक कर भगाने की कोशिश  करते थे । इसराइली सैनिकों द्वारा फलीस्तनी प्रद्रशनकारियों के खिलाफ  7 साल के बालक को  ह्यूूमन शील्ड बतौर इस्तेमाल करने की घटना के सार्वजनिक हो जाने के बाद 2016 में वहां भी  इस प्रैक्टिस पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इससे पहले 2009 में संयुक्त राष्ट्र  की रिपोर्ट  में इजरायल पर 11 साल के बालक को  ह्यूूमन  शील्ड बतौर इस्तेमाल करने की पुष्टि  हुई  थी। बहरहाल, भारतीय सेना इजराइल की तरह किसी व्यक्ति को मानव आवरण बतौर प्रयोग करे, इस पर सहज में विश्वास  करना  कठिन  है। सेना लंबे समय से  कश्मीर मेँ  तैनात है और  सरकार ने आर्म्ड फोर्सिस स्पेशल पॉवर एक्ट के तहत सुरक्षाकर्मियों को बेतहाशा  अधिकार दे रखे हैं। किसी व्यक्ति को जीप में बांधकर सेना कश्मीर  को आतंक और हिंसा की भठ्ठी में झोंकने वाले अलगाववादियों से निपटने के लिए ऐसी बचकानी हरकत नहीं कर सकती। कश्मीर  में आतंकी इतने भी नौसिखिए नहीं हैं कि वे जीप में बंधे हट्टे-कटटे व्यक्ति को देखकर संयम बरतें। दिन-रात निर्दोष  लोगों की हत्या करने वालों के खिलाफ इस तरह की सामरिक नीति जरा भी प्रभावी नहीं हो सकती। और भारतीय सेना इतनी भी कच्ची नहीं है कि वह इस तरह की किसी घटना का वीडियो बनने देती। जाहिर है यह सब सेना को बदनाम करने के लिए किया गया है। दुखद यह है कि सियासी नेता वोट की खातिर किसी भी हद तक जा सकते हैं।

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

भगवा पार्टी का जलवा

सात राज्यों में  हालिया सपन्न  हुए उपचुनाव परिणामों के स्पष्ट  संकेत हैं कि भाजपा का जलवा न केवल बरकरार है, अलबत्ता और सघन होता जा रहा है। अमूमन, उपचुनाव परिणामों का देश  की राजनीति पर बहुत बडा असर नहीं पडता है । मगर इन उपचुनाव ने देश  के आने वाले राजनीतिक परिदृश्य  की एक झलक पेश  की है। उपचुनाव के परिणाम साफ-साफ बता रहे हैं आम आदमी पार्टी का दिल्ली में भी सुपडा साफ हो सकता है। इन परिणामों से यह भी पता चलता है कि भाजपा का ग्राफ गैर-हिंदी भाषी  राज्यों में भी तेजी से ऊपर चढ रहा है। सबसे अहम बात यह है कि राजनीतिक दलों, विशेषतय  आप और कांग्रेस द्वारा इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों की  क्रेडिबिलिटी  पर जो सवाल उठाए जा रहे हैं, उसका भी  जबाव मिल गया है। मध्य प्रदेश  में भिंड जिले की अटेर सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी  की विजय पार्टी की एवीएम को लेकर तमाम आशंकाओं  को निर्मूल साबित करती हैं। इसी सीट की इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की  क्रेडिबिलिटी  को लेकर कांग्रेस सबसे ज्यादा शोर  मचा रही थी। मुख्यमंत्री सही शिवराज सिंह की लाख कोशिशों  के बावजूद भाजपा, कांग्रेस से यह सीट नहीं छीन पाई। इससे साफ है कि  इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की विश्वसनीयता  पर सवाल उठा कर राजनीतिक दल अपनी पराजय का ठीकरा मशीनों पर फोड रहे हैं।  उपचुनाव में आम आदमी पार्टी की करारी हार से दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को तगडा झटका लगा है। पंजाब और गोवा के विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद एक माह में केजरीवाल को यह दूसरा बडा झटका है। जिस आम आदमी पार्टी को विधानसभा चुनाव में जनता ने सर-आंखों कर बिठाया था, उसी पार्टी को मात्र दो साल में लोगों ने बुरी तरह से दुत्कार दिया है।  दिल्ली के राजौरी गार्डन उपचुनाव में आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी  की जमानत तक जब्त हो जाना केजरीवाल के लिए बहुत बडा झटका है। भाजपा को इस सीट पर जबरदस्त सफलता मिलना  राजधानी में पार्टी की वापसी के संकेत हैं। कांग्रेस को दिल्ली के चुनाव नतीजों से इस बात का संतोष  है कि अभी भी  ग्रांड ओल्ड पार्टी ही देश  की राजधानी में भाजपा का विकल्प है। राजौर गार्डन में कांग्रेस दूसरे स्थान पर रही है। 23 अप्रैल को होने वाले निकाय (एमसीडी)  चुनाव पर भी इस उपचुनाव का असर पड सकता है। एमसीडी के चुनाव परिणाम आम आदमी पार्टी के भविष्य  की दशा  और दिशा  तय कर सकते हैं। दिल्ली के अलावा  पश्चिम  बंगाल के कांति दक्षिण विधानसभा सीट पर भाजपा का  शानदार प्रदर्शन  न केवल ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के लिए बल्कि वामपंथी मोर्चे  के लिए भी खतरे की घंटी है। इस उपचुनाव में वामपंथी मोर्चे को तीसरे स्थान पर धकेलते हुए  भाजपा ने दूसरा स्थान हासिल कर अपनी जबरदस्त उपस्थिति दर्ज  करवाई है। इस सीट पर वामपंथी और कांग्रेस प्रत्याषियों की जमानत तक जब्त हो गई है। पिछले साल विधानसभा चुनाव में इसी सीट पर भाजपा के उम्मीदवार  को मात्र 15,000 वोट मिले थे। इस बार भाजपा  को 52, 843 वोट मिले हैं। मगर भगवा पार्टी को कर्नाटक और झारखंड में झटका लगा है। कर्नाटक की दोनों सीटों पर कांग्रेस की विजय से पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश  भाजपा अध्यक्ष वाईएस येदुरप्पा की उपयोगियता पर सवाल खडा हो गया है। उपचुनाव के दौरान भाजपा ने कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री एसएम कृष्णा को  पार्टी में  शामिल करवाया था। इसका पार्टी को कोई लाभ नहीं मिला। कर्नाटक में अगले साल विधानसभा चुनाव होने है। पार्टी को फिर से अपनी प्राथमिकताएं तय करनी होंगी। दक्षिण में कर्नाटक एकमात्र भाजपा का गढ है और पार्टी हर हाल में इसे बरकरार रखना चाहेगी। झारखंड के उप चुनाव में भाजपा जेएमएम को नहीं रोक पाई। निष्कर्ष  यह है कि ताजा उपचुनाव भाजपा के लिए अच्छे हैं तो कांग्रेस के लिए भी उतने बुरे नहीं है।

तलाक, तलाक ,, तलाक

मुस्लिम समुदाय में  तलाक की प्रथा खासी चर्चा का विषय बना हुई  है। मुस्लिम समाज में  शादी-शुदा महिला को तीन बार “तलाक” भर कह देने से जनाब मियां अपनी बीवी को छोड सकता है। इंटरनेट और महिला सशक्तिकरण के इस जमाने में मुस्लिम महिलाओं को भोग की वस्तु मानने वाले कटटरपंथी आज भी इस बात पर अडे हुए है कि तलाक़ की  मौजूदा  व्यवस्था  कानून सम्मत  है। कटटरपंथी  कह रहे हैं कि  इस्लामिक न्यायशास्त्र सिंद्धात के तहत मुस्लिम समाज में  शादी-ब्याह से जुडे कायदे-कानून मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत बनाए गए हैं, इसलिए न्यायपालिका भी इन्हें बदल नहीं सकती।  मुस्लिम पर्सनल लॉ  शरीयत पर आधारित है। मोटे तौर पर  शरीयत कुरान के प्रावधानों के साथ-साथ पैंगबर मोहम्मद की  शिक्षा और रिवायतों से जुडा है। लेकिन पैंगबर ने महिलाओं को कभी भोग की वस्तु नहीं माना, अलबता वे उन्हें पुरुष  का अर्धांगिनी मानते थे। पैंगबर आज होते तो कभी भी तीन बार तलाक जैसी अमानवीय कुप्रथा का पक्ष नहीं लेते। वैवाहिक बंधन जैसे पवित्र रिश्ते   को मात्र तीन बार तलाक कहकर नेस्तानाबूद करने का यह नियम मुस्लिम पर्सनल लॉ में संभवतय कबायली मानसिकता का ही हिस्सा है। इस्लाम धर्म  बनने से पहले अरब में कबाइली सामाजिक संरचना थी। कबीलों के सामाजिक कायदे-कानून जुबानी हुआ करते। सातवीं सदी में जब मदीना में इस्लाम की स्थापना हुई, कुरान अन्य सभी समुदाय पर हावी हो गया और कबायली सामाजिक  व्यवस्था की जगह इस्लाम ने ले ली। पैंगबर के बाद विभिन्न धार्मिक सस्थानों और शरीयत लागू  करने वाले मुल्कों ने अपनी-अपनी सुविधानुसार इन कानूनों की व्याख्या की और इन्हें विकसित किया। बहरहाल, देश  की 90 फीसदी मुस्लिम महिलाएं तीन बार तलाक और बहुपत्नी  प्रथा के सख्त खिलाफ है और इन दोनों को निरस्त करने की पुरजोर मांग कर रही है। भारत में मुस्लिम पर्सनल लाँ 1937 में वजूद में आया था। आजादी के बाद भी यह कानून यथावत बरकरार रहा। संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत देश  में सभी नागरिकों को कानून का एक बराबर संरक्षण है मगर जब बात  शादी-ब्याह  और विरासत जैसे व्यक्तिगत मुद्दों की आई तो समान आचार संहिता (यूनीफोर्म सिविल कोड) की बजाए मुस्लिम समुदाय के लिए पर्सनल लॉ को लागू किया गया। यानी कानून के तहत एक अलग कानून। इसी कारण आज देश  में  शादी-ब्याह और विरासत को लेकर मुस्लिम समुदाय के लिए अलग कानून है, हिंदुओं-सिखों और पारसियों के लिए अलग। भारतीय जनता पार्टी और उससे संबद्ध भगवा संगठनों को इस पर सख्त ऐतराज है। 1985 में पहली बार  शाह बानो नाम की मुस्लिम महिला ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड  के  तलाक को सुप्रीम कोर्ट  में चुनौती दी और पति से गुजारे का हक (एलीमॉनी) मांगा था। न्यायालय ने शाह  बानो के पक्ष में फैसला सुनाते हुए महिला को गुजारा निधि दिलाई भी थी।  पर मुस्लिम समुदाय के तुष्टिकरण  के लिए तत्कालीन राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार ने संविधान में संशोधन करके सुप्रीम कोर्ट  के इस फैसले को  निष्क्रिय  कर दिया । बहरहाल, तीन बार तलाक का मुद्दा अब सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ के हवाले है और 11 मई से इस पर सुनवाई  शुरु होगी। अदालत का फैसला आने तक तलाक को लेकर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड  भी अब रास्ते पर आ गया है। बोर्ड ने दावा किया है कि वह डेढ साल के भीतर तीन बार तलाक के मामले को सुलझा लेगा। बोर्ड  सुप्रीम कोर्ट में तलाक के खिलाफ दायर याचिका का मुखर विरोध कर चुका है। बोर्ड यह भी मान चुका है कि हालांकि तीन बार तलाक बोलकर वैवाहिक बंधन तोडना अपराध है मगर इस कानून को बदला नहीं जा सकता। बोर्ड के इस स्टैंड के  दृष्टिगत  इसकी किसी बात पर भरोसा नहीं किया जा सकता। अन्तोगत्वा, सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ का फैसला ही सर्वमान्य हो सकता है। सुखद स्थिति यह है कि केन्द्र में सत्तारूढ मोदी सरकार भी अन्यायपूर्ण तलाक को निरस्त करने के पक्ष में है।

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

पेट्रोल पंप मालिकों की धमकी

तमाम पेट्रोल पंप अगर रविवार को बंद रहें, तो इससे देश  को फायदा ही होगा। फ्यूल की बचत  होगी, कॉस्ट कटिंग भी होगी  और फीलिंग स्टेशन  पर काम करने वालों को भी साप्ताहिक अवकाश मिल पाएगा। आम के आम, गुठ्लियों के  भी दाम। फ्यूल भी बचेगा और प्रदूषण से भी निजात मिलेगी। कंसोर्टियम ऑफ इंडियन पेट्रोलियम डीलर्स  ने 10 मई से  देश  भर के सभी फीलिंग स्टेशन रविवार को बंद रखने और बाकी दिन सुबह 9 बजे से  शाम 6 बजे तक काम करने की धमकी दी है। पेट्रोल पंप मालिकों का कहना है कि ऑयल कंपनियां उनका मार्जिन बढा नहीं रही हैं जबकि पंप को चलाने की लागत उतरोत्तर बढती ही जा रही। जनवरी में भी  पेट्रोल पंप मालिकों ने हडताल की धमकी दी थी और तब ऑयल कंपनियों ने डीलर्स  को मार्जिन बढाने का आश्वासन    देकर इसे टाल दिया था, मगर अभी तक बढाया नहीं है। इस स्थिति के  दृष्टिगत  कॉस्ट कटिंग के लिए डीलर्स  के पास रविवार को पंप फीलिंग स्टेशन बंद रखने और अन्य दिन सीमित समय के लिए काम करने के सिवा कोई चारा नहीं रह गया है। लेकिन पेट्रोल पंप के डीलर्स इस धमकी को लेकर एकमत नहीं है।  कंसोर्टियम ऑफ इंडियन पेट्रोलियम डीलर्स  रविवार को फीलिंग स्टेशन बंद रखने के पक्ष में है तो ऑल इंडिया  पेट्रोलियम डीलर्स  एसोसिएशन  इसका विरोध कर रहा है। बहरहाल, पेट्रोल पंप मालिकों की यह धमकी काबिलेगौर है और इससे देश  का हित ही होगा।  पूरे देश  में इस समय 56,190 फीलिंग स्टेशन हैं। इनमेंसे  52,604 साार्वजनिक सेक्टर की तेल कंपनियां- इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम एवं भारत  पेट्रोलियम- के हैं। बकाया निजी कंपनियों के।  2014-15 के दौरान देश  में लगभग 1650 लाख टन फ्यूल (पेट्रोल-डीजल, एविएशन फ्यूल) की खपत हुई थी मगर 2015-16 में यह बढकर 1830 लाख टन को भी पार कर गई थी। 2016-17 में फ्यूल की खपत 2100 लाख टन को भी पार कर सकती है। खपत की तुलना में देश  में कच्चे तेल का उत्पादन बहुत कम है। पिछले चार साल में तेल का घरेलू उत्पाद लगातार कम हो रहा है।   2015-16 में फ्यूल की 1830 लाख टन खपत की तुलना में घरेलू उत्पादन मात्र 369 लाख टन रहा। 2015-16 में भारत को अपनी फ्यूल खपत का 81 फीसदी से भी अधिक  आयात करना पडा जबकि 2014-5 में आयात 78.5 फीसदी था। 2015-16 में भारत ने 2000 लाख टन कच्चे तेल का आयात किया था। देश  की काफी विदेशी  मुद्रा तेल के आयात पर  खर्च  हो रही है।  देश  को अगर अपनी विदेषी मुद्रा बचानी है, तो पेट्रोल-डीजल की बचत करनी होगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2022 तक फ्यूल आयात को 67 फीसदी तक घटाने का लक्ष्य तय कर रखा है। अगर रविवार को देश  भर के पेट्रोल पंप रविवार को बंद रहते हैं, तो इसमें बुरा ही क्या है। आपतकालीन सेवाओं के लिए अलग से व्यवस्था की जा सकती है।  देश  में हर दिन लगभग औसतन 3,660,000 बैरल (581940000 लीटर) पेट्रोल-डीजल की खपत होती है और अगर रविवार को फीलिंग स्टेशन बंद रहते हैं तो हर माह कम-से-कम  एक लाख बैरल की बचत की जा सकती है।  कंसोर्टियम ऑफ इंडियन पेट्रोलियम डीलर्स  ने रविवार को फीलिंग स्टेशन बंद रखने के लिए   प्रधानमंत्री के ”फ्यूल बचाओ” अभियान का हवाला दिया है पर माना यही जा रहा है कि डीलर्स ऑयल कंपनियों पर दबाव डालने के लिए रविवार को पेट्रोल पंप बंद रखने की धमकी दे रहे हैं। ऐसी धमकी डीलर्स  पहले भी दे चुके है पर  इस पर गंभीरता से विचार करने की जरुरत है। देश  में फ्यूल को बचाने के लिए दिल्ली की सम-विषम (ऑड-ईवन) स्कीम से  कहीं ज्यादा रविवार को  पेट्रोल पंप बंद रखना प्रभावी साबित हो सकता है।

जम्मू -कश्मीर मेँ अविश्वास का पहाड

गत रविवार को श्रीनगर में उप-चुनाव के दौरान हुई हिंसा साफ-साफ बता रही है कि  कश्मीर  में हालात दिन-ब-दिन बिगडते जा रहे हैं। श्रीनगर लोकसभा सीट के लिए कराए गए मतदान में मात्र सात फीसदी वोटिंग हुई। यह कश्मीर में  अब तक का सबसे कम मतदान है। चुनावी हिंसा में 8 लोग मारे गए और 200 से अधिक घायल हो गए। बुधवार को घाटी के अनंतनाग लोकसभाई सीट के लिए मतदान होना था । हिंसा के  चलते  मतदान स्थगित  करना पड़ा  इस सीट पर मुख्यमंत्री महबूबा मुफती के भाई तस्दुक मुफ्ती सतारूढ दल  पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के उम्मीदवार हैं और उन्होंने निर्वाचन आयोग से इस उपचुनाव को स्थगित करने की मांग की थी  । तस्दुक मुफ्ती  अब यह आरोप भी लगा रहे हैं कि उनकी पार्टी मौजूदा हालात में उप-चुनाव के पक्ष में नहीं थी और निर्वाचन आयोग को इस बारे आगाह भी किया गया था। इसके बावजूद   कश्मीर घाटी में उप-चुनाव कराए गए। महबूबा मुफ्ती के मुख्यमंत्री बनने के बाद अनंतनाग सीरा ट खाली हुई है। श्रीनगर सीट पीडीपी के सांसद तारिक कारा द्धारा  इस्तीफे देने के बाद  खाली हुई थी। अनंतनाग लोकसभाई सीट में अनंतनाग के अलावा पुलवामा, कुलगाम और शोपियां जिले पडते हैं और चारों ही हिंसा से पीडित हैं। ताजा हालात में लगता नहीं है कि बुधवार को अनंतनाग में  मई  मेँ  भी मतदान मुमकिन हो पाएगा। वैसे भी, सात फीसदी मतदान से चुना गया नुमाइंदा लोकतंत्र का मजाक लगेगा। लोकतंत्र में बंदूक के साए में चुनाव कराने का कोई औचित्य नहीं है। कश्मीर  में अलगाववादियों ने श्रीनगर और अनंतनाग उपचुनावों के बायकाट  का आहवान कर रखा है। माना जा रहा है कि इसी वजह श्रीनगर सीट के उपचुनाव में मतदान फीका रहा है। कश्मीर  में अलगाववादी चुनावों का बराबर बहिष्कार  करते रहे हैं मगर इसके बावजूद राज्य में कभी भी इतना कम मतदान नहीं हुआ। 2014 में कराए गए विधानसभा चुनाव में अलगाववादियों के चुनाव बहिष्कार  की धमकी के बावजूद औसतन 65.23 फीसदी मतदान हुआ था। इतना ही नहीं तब पहले चरण में  71.28 फीसदी, दूसरे चरण में 71 फीसदी और अंतिम चरण में रिकार्डतोड 76 फीसदी मतदान हुआ था। और यही बात नई दिल्ली के लिए सबसे ज्यादा खाए  जा रही है। ताजा मतदान के आंकडे स्पष्ट  संदेश  दे रहे हैं कि अढाई साल से भी कम समय में कश्मीर  की अवाम का लोकतंत्र से विश्वास  उठ चुका है और इसके लिए केन्द्र के अलावा राज्य में सत्तारूढ पीडीपी-भाजपा सरकार पूरी तरह से जिम्मेदार है। विधानसभा चुनाव में कश्मीर  घाटी से भाजपा  एक भी सीट नहीं जीत पाई थी और घाटी की अधिकांश  सीटों पर पार्टी के उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो गई थी। इसके बावजूद पीडीपी का भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई  जो कश्मीर  की अवाम को नागवार गुजरा। अवाम का मानना है कि पीडीपी ने भाजपा से गठबंधन करके जनता से धोखा किया है। इसी कारण कश्मीर  की अवाम  राष्ट्रीय   मुख्यधारा से विफरी हुई है। न तो राज्य सरकार और न ही केन्द्र सरकार कश्मीरी  अवाम की आकांक्षाओं पर खरी उतर पाई है। लोकतंत्र में अगर जनता की चुनी हुई सरकार उनके सपनों और अपेक्षाओं को समय पर पूरा नहीं कर पाती है, तो अवाम का हताश  होना स्वभाविक है। कश्मीर  की जनता को यह बात भी नागवारा गुजरी है कि अब तक केन्द्र में जो भी सरकार आई, उसने  कश्मीर  किसी-न-किसी तरह की पहल की मगर मोदी सरकार अढाई साल बीत जाने पर भी कोई कदम नहीं उठा पाई है। इससे कश्मीर  के लोगों को लगता है कि मोदी सरकार उन्हें नजरांदाज कर रही है और  कश्मीरियों  की आकांक्षाओं और राजनीतिक मांगों को गंभीरता से नहीं ले रही है। भाजपा की मुस्लिम विरोधी छवि  आग में घी का काम कर रही है। कश्मीर  देश  का मुस्लिम बहुल एकमात्र राज्य है। कश्मीर  घाटी में केंद्र  सरकार के प्रति अविश्वास  का पहाड खडा हो गया है।  मोदी सरकार को इस राज्य को    मुख्यधारा से जोडने के लिए कश्मीर  की अवाम का भरोसा जीतना होगा। ्

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

“भगवा गणतंत्र“

क्या हम “भगवा गणतंत्र“ की ओर जा रहे हैं? केन्द्र और विभिन्न राज्यों  में भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद से बदस्तूर जारी भगवा पार्टी से जुडे संगठनों और उनके कार्यकर्ताओं की मानसिकता से यही अहसास होता है। गौ-तस्करों  की सरेआम पिटाई करना, गौ-मांस सेवन के संदेह मात्र पर किसी को जलाकर मार डालना और  दलितों को पकडकर उन्हें निर्वस्त्र करने जैसे कृत्य आए दिन की बात हो गई है। गत दिनों राजस्थान के अलवर में गौ-रक्षकों ने एक आदमी को तस्करी के संदेह में जान से मार डाला।  और-तो-और  भगवा संगठनों से जुडे लोग वेलेंटाइन डे पर प्रेमियों को अपमानित करने अथवा महिलाओं की स्वतंत्रता पर टोका-टोकी  करने में भी कोई कसर नहीं छोडते हैं। धर्मांतरण का मामला हो या सहिष्णुता , यह सब भी भगवा संगठनों की मनमाफिक किया जाना चाहिए, वरना आप “पाकिस्तानी“ करार कर दिए जाएंगे।  अवैध मंदिर तोडे जाने पर भगवावस्त्रधारी आसमान सिर पर उठा लेते हैं मगर  मस्जिद तोडने में जरा भी गुरेज नहीं करते। हालिया घटनाएं साफ-साफ कह रहीं हैं कि भगवा संगठनों को  देश  में कानून को अपने हाथ में लेने का जैसे लाइसेंस मिल गया हो। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश  को तीव्र विकास , डिजिटल इंडिया और “मेक इन इंडिया“ के सपने दिखा रहे हैं पर भगवा संगठन भारत को अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में धकलने पर आमादा हैं। गौ-रक्षकों की खडमस्तियों पर प्रतिबंध लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट  में याचिका दायर की गई है। न्यायालय ने  शुक्रवार को इस याचिका पर केन्द्र और उत्तर प्रदेश , राजस्थान समेत 6 राज्यों को नोटिस भी जारी किया है। वीरवार को सुप्रीम कोर्ट  ने अयोध्या में विवादित ढांचे पर कहा कि बाबरी मस्जिद मामले में न्याय नहीं हुआ है। सीबीआई ने भी इस मामले में भाजपा के वरिष्ठ  नेता लाल कृष्ण  आडवानी, मुरली मनोहर जोशी  और सुश्री उमा भारती समेत 13 पर आपराधिक मामला बहाल करने का आग्रह किया है। 25 साल से यह मामला लंबित पडा है। भाजपा राम मंदिर के मुद्दे को लंबा खींचकर इसे राजनीतिक फायदे के लिए भुनाना चाहती है। और अब जब भगवा पार्टी को लग रहा है कि राम मंदिर का मुददा ज्यादा समय तक भुनाया नहीं जाया सकता, गौ रक्षा के मुद्दे को उछाला जा रहा है। निसंदेह, गौ माता भारत की अस्मिता से जुडी है मगर इस सच्चाई को भी नकारा नहीं जा सकता कि “ गौ-माता“ के प्रति हमारी श्रद्धा ने पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचाया है। ताजा अध्ययन से पता चलता है कि गाय जितनी हानिकारक गैसों का उत्सर्जन करती हैं, उतनी पेट्रोल-डीजल पर चलने वाले वाहन भी नहीं करते हैं। धरती के वायुमंडल को जहरीला बनाने में मीथेन गैस को प्रमुख तौर पर जिम्मेदार माना जाता है। मीथेन गैस के ग्रीनहाउस प्रभाव को वायुमंडल के लिए सबसे ज्यादा हानिकारक माना जाता है। ग्रीन गैस सूर्य की गर्मी को सोखती है और धरती को गर्म करती हैं। नासा की रिपोर्ट के अनुसार गाय, भेड-बकरियां बडी मात्रा में मीथेन गैस छोडती है। अनुमान है कि 90 ंमीलियन टन मीथेन गैस पालतु जनवरों से उत्सर्जित होती हैं। जानवरों की पाचन प्रकिया जुगाली के कारण मीथेन गैस बनती है। ईंधन जलाने से लेकर दुधारु पशु  पालन तक सभी कामों में मीथेन गैस उत्सर्जन का बडा हाथ है। भारत में विकसित देशों  की तरह गाय को नकारा नहीं जाता, बल्कि उसकी ताउम्र सेवा की जाती है। इसी कारण  गौ-वंश की आबादी  उतरोतर बढती ही जा रही है। तथापि, भारत दुनिया में बीफ का सबसे बडा निर्यातक है। 2015 में भारत से 2081 हजार मीट्रिक टन बीफ का निर्यात किया गया था। यह अमेरिका के 1167 हजार मीट्रिक टन निर्यात से लगभग दोगुना  है। बहरहाल, कानून को अपने हाथ में लेकर गौ-रक्षा करना कोई जिम्मेदारी का काम नहीं है। इससे देश  की अखंडता पर ही प्रहार हो रहा है।

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

दलाई लामा से क्यों डरता है चीन?

 81 साल के  तिब्बती आध्यात्मिक नेता दलाई लामा की अरुणाचल प्रदेश  यात्रा पर ड्रैगन लाल-पीला हो रहा है? दलाई लामा इन दिनों अरुणाचल प्रदेश  की यात्रा पर हैं। चीन पूर्वोतर भारत के इस राज्य को विवादास्पद मानता है और इसी बिला पर चीन को तिब्बती नेता की यात्रा पर सख्त ऐतराज है। मगर हकीकत यह भी है कि  दलाई लामा कहीं भी चले जाएं, चीन के कान खडे हो जाते हैं। वे जिस देश  की यात्रा पर जाते हैं, चीन फौरन अपनी आपत्ति जता देता है। दलाई लामा को पूरी दुनिया में “शांति  दूत“ माना जाता है और वे जहां भी जाते है, शांति  का ही संदेश  देते हैं। उनकी न तो चीनी नेताओं जैसी उपनिवेशवादी महत्वाकांक्षाएं हैं और न ही तिब्बती आध्यात्मिक नेता काइयां कूटनीतिज्ञ हैं। फिर भी चीन इस वयोवृद्ध नेता  से हमेशा  चिढा रहता है। 2010 में जब दलाई लामा अमेरिकी यात्रा पर गए थे, तब भी चीन ने अपनी कडी आपत्ति जताई थी मगर तत्कालीन  राष्ट्रपति  बराक ओबामा ने इस विरोध के बावजूद दलाई लामा से मुलाकात की थी। चीन के डर से ही श्री लंका ने दलाई लामा को वीजा देने से इंकार कर दिया था। 2016 में दलाई लामा की मंगोलिया यात्रा पर भी चीन खासा लाल-पीला हुआ था और  चीन ने इस मुल्क के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध तक लगाए थे। यह जानते हुए भी कि दलाई लामा की अरुणाचल प्रदेश  यात्रा, भारत का आंतरिक मामला है, चीन ने भारत को धमकी दी है कि इस यात्रा से बींजिग और भारत के संबंधों में खासा तनाव आया है। यही बात चीन ने दलाई लामा की अमेरिकी यात्रा के दौरान भी कही थी और हर उस देश  से कहता है, जहां भी तिब्बती आध्यात्मिक गुरु जाते हैं।  दलाई लामा से चीन आखिर क्यों इतना डरा हुआ रहता है? तिब्बत में बौद्ध धर्म का इतिहास काफी पुराना है। 1409 में बौद्ध धर्म  के प्रचार के लिए जेलग स्कूल की स्थापना के बाद से बौद्ध और तिब्बतियों के बीच लडाई जारी रही है। 1609 में तिब्बत के एकीकरण के बाद यह लडाई बंद हुई और तिब्बत पूरी दुनिया में सांस्कृतिक सपन्न क्षेत्र के रुप में उभरा। 13वें दलाई लामा ने 1912 में तिब्बत को स्वतंत्र  घोषित  कर दिया। चीन इसे पचा नहीं पाया और चालीस साल बाद चीन ने तिब्बत पर तब आक्रमण किया जब 14वें दलाई लामा के चुनने की प्रकिया चल रही थी। तिब्बत को इस आक्रमण में हार का सामना करना पडा। कुछ सालों बाद तिब्बतियों ने चीन के खिलाफ बगावत का बिगुल बजाया पर वे इसमें सफल नहीं हुए। 1959 में दलाई लामा चीन के चंगुल से बचने के लिए अपने समर्थकों समेत भारत की शरण में आ गए और तब से हिमाचल प्रदेश  के धर्मशाला स्थित मुख्यालय में रह रहे हैं। छह दशक से भी अधिक समय से भारत समेत दुनिया के अलग-अलग मुल्कों में निर्वासित रहने के बावजूद तिब्बतियों की स्वायत राज्य की मांग और चीन के उपनिवेशवाद से आजादी का संकल्प टस-से-मस नहीं हुआ है। अलबत्ता इस दौरान तिब्बतियों का संकल्प  और प्रखर हुआ है। चीन इसके लिए दलाई लामा को जिम्मेदार मानता है और वह तिब्बतियों के धार्मिक गुरु को अलगाववादी भी बताता है।  चीन को यही डर सता रहा है।  दलाई लामा तिब्ब्तियों के ही नहीं दुनिया में  शान्ति  के प्रहरी और धार्मिक स्वत्रंतता के प्रेरणा स्त्रोत हैं। चीन बेशक दुनिया की बडी शक्ति हो और अपनी आर्थिक और सैन्य ताकत से वह  विश्व को  डराता-फिरता है मगर वह स्वंय दलाई लामा और तिब्बतियों की दृढ इच्छा शक्ति से डरता है। इतिहास इस बात का गवाह है कि दमन से आजादी के परवानों को दबाया नहीं जा सकता। दलाई लामा की अरुणाचल प्रदेश  की यात्रा के विरोध की पृष्ठभमि  में भी चीन की यही मानसिकता काम कर रही है।


गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

कर्ज माफी हल नहीं

देश  में इन दिनों किसानों के कर्ज माफी की होड लगी हुई है। उत्तर प्रदेश  में योगी आदित्यनाथ सरकार ने किसानों के 39,729 करोड रु के कर्ज माफ कर दिए है। इससे 2 करोड 13 लाख किसानों को फायदा होगा। भाजपा ने अपना चुनावी वायदा पूरा किया है। उत्तर प्रदेश  विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किसानों के कर्ज माफ करने का वायदा किया था। भाजपा मेनिफेस्टो में भी किसानों के कर्ज  माफी का वायदा किया गया था।  पंजाब में कांग्रेस ने किसानों के कर्ज माफी का वायदा कर रखा है । राज्य की अमरेन्द्र सरकार किसानों के कर्ज माफी की तैयारी में है और उत्तर प्रदेश  के बाद कांग्रेस सरकार पर तुरंत कर्ज माफी की घोषणा के लिए दबाव बढ सकता है । इस साल के अंत में होने वाले गुजरात और हिमाचल प्रदेश  विधानसभा चुनाव में भी किसानों की कर्ज माफी का मुद्दा प्रमुख रहेगा। किसानों को रिझाने के लिए उत्तर प्रदेश  और पंजाब की तरह कांग्रेस और भाजपा दोनों ही कर्ज माफी का वायदा कर सकते हैं। महाराष्ट्र में  भाजपा सरकार पर किसानों के कर्ज माफी के लिए कांग्रेस और राकांपा समेत विपक्षी दलों का भारी दबाव पड रहा है। इसके लिए सभी विपक्षी दल एकजुट हो गए हैं। सरकार का कहना है कि उसकी माली हालात 22,000 करोड रु के कर्ज माफ करने की अनुमति नहीं देती। कर्नाटक में जनता दल (सेकुलर) के नेता एचडी कुमारस्वामी पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि अगर उनकी पार्टी की सरकार बनती है, तो 24 घंटों के भीतर किसानों के कर्ज माफ कर दिए जाएंगें। कर्नाटक में मई, 2018 में विधानसभा चुनाव होने हैं। मगर क्या कर्ज माफ करना किसानों की समस्याओं का हल है? चुनाव के समय लोक-लुभावने वायदे कर मतदाताओं को रिझाने के वायदे को पूरा करने से किसानों का कोई भला नहीं होने वाले है। किसानों की सबसे बडी समस्या है कि उसकी पैदावार के लाभदायक दाम कैसे मिले और वह अपनी खेती से ज्यादा से ज्यादा कमाई करे। अगर सरकार ऐसा करने में सफल हो जाती है तो किसानों के कर्ज माफी की नौबत ही नहीं आएगी। मगर दुखद स्थिति यह है कि समकालीन सरकार अपने हर फैसले को “राजनीतिक चश्मे  ” से देखती है। कर्ज  माफी का फैसले ही लें। इससे पहले भी सरकार किसानों के कर्ज माफ कर चुकी है। फरवरी, 2008 में संप्रग सरकार की 600 अरब रु की एग्रीकल्चर डेट वेवर एंड डेट रिलीफ स्कीम के तहत देश  के कुल 5 करोड लघु एवं सीमांत किसानों मेंसे 4.3 करोड कर्ज माफ किए गए थे। देश  के कुल किसानों का 70 फीसदी लघु एव सीमांत किसान है। हरियाणा में देवी लाल साकार नब्बे के दशक  में किसानों के कर्ज  माफ कर चुकी है मगर बैकों को इसकी एवज में माकूल राशि  नहीं दे पाई जिस वजह यह योजना विफल रही है। बहरहाल, कर्ज को राजनीतिक मुद्दा बनाए जाने से न तो किसानों को फायदा हो रहा है और न ही वित्तीय संस्थाओं का। सरकार के इस तरह के कदम से देश  का वित्तीय प्रबंध का दिवाला उठ रहा है। कर्ज लेकर उसकी अदायगी नहीं कर पाना कोई बेहतर वित्तीय प्रबंध नहीं है और अगर सरकार ही वित्तीय कुप्रबंध को प्रोत्साहित करे, तो देश  की वित्तीय हालात का दिवाला उठना तय है। पंजाब क माली हालात बेहद खराब है। सातवें वेतन आयोग की सिफारिशे   लागू करने के लिए राज्य सरकार के पास वित्तीय साधन नहीं है। कर्मचारियों को समय पर वेतन और पेंशन   के लाले पडे हुए हैं। सरकार पर सवा लाख करोड से ज्यादा का कर्जा  है और इसमेंसे आधा कर्जा ( लगभग 60 लाख करोड रु) अगले सात साल में चुकाने है। किसानों को दी जा रही मुफ्त बिजली से पहले ही सरकार पर खासा बोझ पड रहा है। और अब अगर किसानों के कर्ज माफ किए जाते हैं, तो सरकार की माली हालत और खराब हो सकती है।

बुधवार, 5 अप्रैल 2017

भ्रष्टाचार पर हमला

काले धन पर नोटबंदी से हमला करने के बाद भ्रष्ट  राजनेताओं और फर्जी कंपनियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दृढ निश्चय  को दर्शाता  है। तीन दिन पहले प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने देश  भर में सौ से ज्यादा ठिकानों पर छापे मारकर लगभग तीन सौ फर्जी (शैल ) कंपनियों को खंगाला और उनके मालिकों को ढूंढ कर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की । अगले दिन राजनीतिक नेताओं की बेनामी संपति को जब्त कर लिया गया। इस क्रम में हिमाचल प्रदेश  के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की दिल्ली के महरौली क्षेत्र में डेरा मंडी स्थित फार्म को जब्त कर लिया गया।  दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा वीरभद्र सिंह की गिरफ्तारी संबंधी याचिका अस्वीकार करने के तुरंत बाद ईडी ने  यह कारवाई की। प्रवर्तन निदेशालय का आरोप है कि वीरभद्र सिंह ने अवैध धन (घूस) से इस फार्म हाउस को मैपल डेस्टिनेश नस एंड ड्रीमबिल्ड नाम की फर्जी कंपनी के नाम खरीद रखा था। इस फर्जी कंपनी के मालिक (शेयरहोल्डर्स) वीरभद्र सिंह का बेटा और बेटी हैं। ईडी ने पंजाब के पूर्व अकाली मंत्री स्वर्ण सिंह फिल्लौर, बेटे धर्मवीर और पूर्व  मुख्य संसदीय सचिव अविनाश  चन्द्र की बेनामी संपत्ति भी जब्त कर ली। गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री दिगबंर कामत और चर्चिल आलेमाव की अवैध संपत्ति भी जब्त कर ली गई है। दोनों गोवा कांग्रेस के दिग्गज नेता है। ईडी ने  प्रिवेशन ऑफ मनी लॉड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) और फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट (फेमा) के तहत ये कार्रवाइयां की है। काग्रेस भले ही इन कार्रवाइयों को “बदले की भावना“ से प्रेरित करार दे मगर जनमानस नोटबंदी की तरह मोदी सरकार की इस पहल का भरपूर समर्थन करेगा। पूरा देश  इस सच्चाई को जानता है कि सियासी नेता दूध के धूले नहीं है। और अगर सियासी नेताओं की विश्वसनीयता  पर जनमत संग्रह कराया जाए, तो बहुमत यही कहेगा कि अधिकतर नेता ंआकंठ  भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। चुनाव के दौरान नामांकन पत्र दाखिल करते समय उम्मीदवारों को अपनी पूरी चल-अचल संपति का ब्यौरा भी देना पडता है।     निर्वाचन आयोग इस जानकारी को फौरन सेंट्रल बोर्ड  ऑफ डायरेक्ट टैक्सिस (सीबीडीटी) को भेज देता है। स्वंयसेवी संस्था न्यू एडीआर द्वारा एकत्रित जानकारी मुताबिक पिछले 15 साल में मंत्रियों, सांसदों और विधायकों की चल-अचल संपत्ति में बेताहाश  इजाफा हुआ है और अधिकांश  मामलों में यह आय के ज्ञात स्त्रोतों से कहीं ज्यादा है। एक-आध मामले को छोडकर न तो आयकर विभाग ने और न ही प्रवर्तन निदेशा लय ने  आज तक सांसदों और विधायकों की अकूत संपति को खंगाला। आंकडों के अनुसार देश  में 15 लाख पंजीकृत कंपनियां हैं मगर मात्र 6 लाख ही अपना सालाना रिटर्न भरती हैं। इससे साफ है कि 9 लाख कंपनियां फर्जी हैं और बेनामी संपत्तियां इक्ठ्ठी करने के लिए बनाई गई हैं। देश  में कायदे-कानून के घोर उल्लंघन की रिवायत है। सवा सौ करोड से ज्यादा की आबादी वाले देश  में मात्र एक फीसदी आबादी आयकर अदा करती है और इनमें अधिकांश नौकरी-पेशा  लोग हैं। एक करोड रु से ज्यादा आयकर चुकाने वाले मात्र 5,000 लोग हैं जबकि देश  में 2.36 लाख करोडपतियों के पास 90 खरब रु से भी ज्यादा अकूत संपत्ति है़। न्यू वर्ड वैल्थ की रिपोर्ट  के अनुसार 2007 के बाद पूरी दुनिया में बैल्थ क्रिएशन  में नाममात्र की वृद्धि हुई है, भारत में यह 55 फीसदी से भी ज्यादा है मगर इस दौरान इस अनुपात में आयकर भरने वाले में कोई वृद्धि नही हुई है। विपक्ष को सरकार के हर अच्छी पहल की निंदा करने की आदत है। जो काम कांग्रेस सालों नहीं कर पाई, मोदी सरकार ने मात्र अढाई साल में कर दिखाया है। देश  की दिल्ली इच्छा है कि भ्रष्ट नेताओं  को सलाखों के पीछे होना चाहिए। जन सेवा को:धन सेवा“ बनाने की सियासी प्रवृति को जड से उखाडने की जरुरत है।

मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

फसल बीमा योजना

किसानों के लिए फसल बीमा योजना उतनी ही जरुरी है, जितनी फसल उगाने के लिए बीज, खाद और पानी। किसान खून्-पसीना बहाकर फसल तैयार करता है पर कुदरत की मार पडने पर पलक झपकते ही उसका सब कुछ तबाह हो जाता है। बेचारा किसान, किस्मत का मारा हताशा  में आत्महत्या तक करने पर विवश  हो जाता है। देश  की यह सबसे बडी त्रासदी है कि आजादी के सात दशक बाद भी “अन्नदाता” किसान आज भी उतना ही लाचार है, जितना वह आजादी से पहले था। किसानों की इस पीडा को समझते हुए मोदी सरकार ने किसानों के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू तो की है मगर यह  कारगर साबित नहीं हुई है। आपदा के समय किसानों को अविलंब मदद की दरकार होती है मगर निजी कंपनियां तत्काल क्लेम नहीं देती। क्लेम लेने के लिए कई तरह की औपचारिकताएं पूरी करनी पडती है। किसान यह सब नहीं जानता। तरह-तरह की खामियों के कारण  पूर्व   शिरोमणि अकाली दल नीत बादल सरकार ने इस फसल बीमा योजना को नामंजूर कर दिया था। मगर बादल सरकार किसानों के लिए तसल्लीबख्श  फसल बीमा योजना तैयार नहीं कर पाई।  अब पंजाब में कैप्टन अमरेन्द सिंह सरकार ने राज्य के किसानों के लिए पुख्ता फसल बीमा योजना लागू करने की पहल की है। नई सरकार ने अपनी बीमा कंपनी बनाने का फैसला किया है ताकि किसानों की पक्की फसल को नुकसान होने पर उसे समय पर समुचित मुआवजा मिल सके। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की सबसे बडी खामी यही है कि इसमें किसानों के हितों का जरा भी ध्यान नहीं रखा गया है। बीमा कंपनियों की कोई जबावदेही तय नहीं है। अभी तक यह भी पता नहीं है कि किसान कैसे क्लेम करे और अगर क्लेम नहीं मिलता है, तो अपील कहां करे। प्रधानमंत्री बीमा योजना के तहत पूरे गांव को यूनिट बनाया गया है। यानी अगर पूरे गांव की फसल खराब हुई है तो ही क्लेम मिलेगा। किसानों को  शिकायत है कि अक्सर ओलावृष्टि  जैसी आपदा पूरे गांव की बजाए आंशिक  अथवा कुछ एक खेतों में पडते हैं। इस स्थिति में नुकसान का आकलन नहीं किया जाता। दस फीसदी से ज्यादा नुकसान का पैमाना जरा भी किसान के हित में नहीं है जबकि सरकार भी यह सच्चाई जानती है कि औसतन नुकसान दस फीसदी से कम रहता है। इस स्थिति में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना किसानों के हित की बजाए बीमा कंपनियों का ही हित साध रही है। केन्द्रीय फसल योजना के तहत प्रीमियर का पैसा सीधे बैंक से कटता है और कई बार दो या तीन दिन बार क्योंकि किसानों के एक से ज्यादा अकांउट होते हैं। जाहिर है इस स्थिति से किसानों की बजाए बीमा कंपनियां को ज्यादा फायदा हो रहा है। फसल बीमा योजना की सबसे बडी खामी यह है कि बीमा कंपनियां केवल अपना मुनाफा देखती हैं और क्लेम देने में सौ तरह की मीन-मेख निकालती हैं। इन सब बातों के  दृष्टिगत  अमरेन्द्र सरकार का अपनी बीमा कंपनी बनाने का फैसला काबिलेतारीफ है। इसका सबसे बडा फायदा यह होगा कि कंपनी की जवाबदेही राज्य सरकार के प्रति होगी और कंपनी वही करेगी जो सरकार कहेगी। सरकार की कंपनी का मूल मकसद मुनाफा कमाना नहीं होगा और वह निजी कंपनियों की तुलना में कहीं ज्यादा किसानों के हितों का ख्याल रखेगी। प्रीमियर का पैसा भी बाहर नहीं जाएगा और आपदा के समय तत्काल किसानों की मदद हो पाएगी। बहरहाल, कर्ज  और आर्थिक बदहाली में डूबे पंजाब के किसानों को कर्ज  माफी और आपदा में मददगार फसल बीमा योजना बडी राहत दे सकती है। इन योजनाओं को अगर सफल अंजाम दिया जाता है, राज्य का किसान  अमरेन्द्र सरकार  की बल्लियां लेगा।

अंधेरी सुरंग में धुंधली किरण

चालीस साल से आतंक की  भीषण  आग में झुलसे रहे जम्मू-कष्मीर में चेनानी-नाषरी सुरंग के लोकार्पण से न केवल उन लोगों को सुविधा होगी जो जम्मू संभाग से सडक के रास्ते  कष्मीर घाटी में प्रवेश  करते हैं, बल्कि कश्मीर  घाटी के पर्यटन को भी गति मिलने की आशा  की जा सकती है। इस सुरंग का निर्माण संप्रग सरकार के समय में  शुरु हुआ था मगर मोदी सरकार ने इस पर तेजी से काम करके इसे रिकार्ड समय पर पूरा किया है। 9.2 किलोमीटर लंबी इस सुरंग के निर्माण पर 2500 करोड रु खर्च हुए हैं। जम्मू से श्रीनगर की दूरी 30 किमी कम हो गई है। खास बात यह है कि  भारी बर्फबारी के दौरान भी घाटी का सडक मार्ग बंद नहीं होगा। हर रोज करीब 27 लाख और हर साल लगभग 90 करोड रु के फ्यूल की बचत होगी। सुरंग में दुनिया के बेहतरीन सेफ्टी इंतजाम किए गए हैं। सुरंग में किसी तरह की दिक्कत आने पर बगल में एक और सुरंग का निर्माण किया गया है। सुरंग में फायर कंट्रोल, सिंग्नल्स, ऑटोमैटिक इलेक्ट्रिकल एवं कम्युनिकेषन सिस्टम लगाए गए हैं। सुरंग में हर 75 मीटर पर सीसीटीवी लगाए गए हैं। मोबाइल नेटवर्क की सुविधा भी है और पूरी सुरंग को कंट्रोल रुम से मॉनिटर किया जाएगा। यह सुरंग दुनिया की छठी और भारत की पहली ऐसी टनल है जिसमें “ट्रांसवर्स  वेटिलेशन सिस्टम“ लगाया गया है। इससे यात्रियों को टनल में ताजा हवा मिलेगी। लंबी सुरगों में वाहनों के फ्यूल उत्सर्जन से निकलने वाली गैस और कार्बन डाई ऑक्साइड का स्तर काफी ज्यादा होता है, इसलिए टनल के भीतर ताजी हवा जरुरी है। इतना सब होने के बावजूद जनमानस के मन-मस्तिष्क  में एक सवाल बार-बार कौंध रहा है कि “आतंकियों से इस सुरंग को बचाने के क्या पुख्ता इंतजाम हैं? घाटी के अलगाववादियों ने इस सुरंग को यह कहकर खारिज कर दिया है कि  कश्मीर  “राजनीतिक मुददा“ है और इसे आर्थिक पैकेज अथवा सुरंग खोलकर हल नहीं किया जा सकता। अलगाववादियों ने रविवार को कश्मीर  में बंद का आहवान किया था और घाटी में इसका काफी असर भी हुआ। पब्लिक ट्रांसपोर्ट सेवाएं भी बंद के कारण प्रभावित हुई। इस बात में दो राय नहीं है कि  कश्मीर  की आर्थिकी को उभारने के लिए घाटी में अमन-चैन की सख्त दरकार है। चालीस साल के आतंक ने  कश्मीर  घाटी में बिजली, पानी, षिक्षा, यातायात, दूर संचार और सडक जैसी बुनियादी सुविधाओं को भी धराशायी कर रखा है। केन्द्र से मिल रही मदद का अधिकांश  हिस्सा सुरक्षा पर खर्च किया जा रहा है। शिक्षा संस्थान लंबे समय तक बंद रहती हैं और दूर-संचार सुविधाएं अक्सर ठप्प हो जाती हैं या कर दी जाती हैं। पर्यटन जम्मू-कश्मीर   की रीढ की हड्डी माना जाता है और आतंक ने सबसे ज्यादा इसे प्रभावित किया है। कश्मीर  में सेना की लंबे समय से तैनाती का सबसे बुरा असर भी पर्यटन पर पडा है। करप्शन  पर किए गए  एक अध्ययन के अनुसार राज्य में एक अदद यूनिट सेना की तैनाती से  कश्मीर  में 232 पर्यटन यूनिट की कमी आई है। चालीस साल में पर्यटन को कितना नुकसान उठाना पडा है, इसका सहज में अंदाजा लगाया जा सकता है। यही कश्मीर  की सबसे बडी त्रासदी है। किसी भी राज्य अथवा परिवार की आर्थिकी तहस-नहस करने से आम आदमी सबसे ज्यादा प्रभावित होता है। पिछले चालीस साल में सियासी नेताओं की खुशाहली में कोई कमी नहीं आई है। सांसद अथवा विधायक चुने जाने पर उन्हें सुरक्षा के साथ-साथ मोटी तनख्वाह और भत्ते मिलते हैं और हार जाने के बाद पेंशन। मगर चालीस साल से लगातार तबाह हो रहे पर्यटन उधोग पर निर्भर आम आदमी को क्या मिला? वह अलगाववाद और कुशासन के बीच पीस रहा है।  चेनानी-नाशरी सुरंग आशा  की  किरण तो है पर मौजूदा हालात में एकदम धुंधली सी लगती है।