गुरुवार, 17 मई 2018

सीएम वही जो गवर्नर मन भाए!

मोदी सरकार के समय एक प्रचलित जुमला है “मुख्यमंत्री वही जो गवर्नर मन भाए“।  कर्नाटक में त्रिशंकू विधानसभा के लिए यह जुमला सटीक बैठता है। किसी भी पार्टी को स्पष्ट  बहुमत  नहीं मिलने की स्थिति में  राज्यपाल जिस भी पार्टी अथवा गठबंधन को न्यौता देंगे, वह जोड-तोड करके सरकार बना ही लेगी और अपना बहुमत सिद्ध भी कर लेगी। मंगलवार को कर्नाटक  में  त्रिशंकू  विधानसभा की स्थिति  साफ  होते ही जोड-तोड शुरु हो गई । कांग्रेस ने बगैर एक क्षण गंवाए, जनता दल (एस) को अपना समर्थन देकर  भाजपा का सरकार बनाने के दावे में रोडा अटका दिया। कांग्रेस के समर्थन से गदगद जनता दल (एस) के नेता एच डी कुमारस्वामी ने फौरन सरकार बनाने का दावा भी ठोक दिया। 224 सदस्यीय  कर्नाटक विधान सभा में कांग्रेस और जनता दल(एस) को 116 विधायकों  जे समर्थन से  स्पष्ट  बहुमत   है। भाजपा के 104 सदस्य हैं और उसे बहुमत के लिए 8 सदस्यों के समर्थन की दरकार है। 224 मेंसे 222 हलकों  के ही चुनाव हुए हैं। दो विधानसभा हलकों में चुनाव स्थगित कर दिए गए थे। कांग्रेस के लिंगायत विधायक  एच डी कुमारस्वामी को पार्टी समर्थन के खिलाफ हैं और बगावत की धमकी दे चुके हैं। जनता दल (एस) नेता एव पूर्व मुख्यमंत्री कुमारस्वामी वोक्कालिगा समुदाय से हैं। लिंगायत समुदाय को  वोक्कालिगा फूटी आंख भी नहीं सुहाते हैं।  सिद्धारमैया सरकार ने वोक्कालिगा से ताल्लुक रखने वाले अधिकारियों से खूब भेदभाव किया था। बुधवार को कुमारस्वामी ने भाजपा पर उनकी पार्टी के विधायकों की खरीद-फरोख्त के संगीन आरोप भी लगाए हैं। जनता दल (एस)  के पांच विधायक लापता हैं और पार्टी को संदेह हैं कि ये सभी भाजपा के खेमे में चले गए हैं। बंगलुरु में राजनीतिक नोटंकियां जारी है। कांग्रेस के तीन विधायक भी लापता है। कांग्रेस के  विधायकों को पोचिंग से बचाने के लिए बसों में ठूंस कर पहले राजभवन और फिर रिजॉर्ट  में ले जाया गया। देश  में बाकायदा दल-बदल कानून लागू है। इस कानून के तहत किसी भी पार्टी से सम्बद्ध विधायक पार्टी छोडने पर अपनी सदस्यता गंवा सकता है। इसके बावजूद भी विधायक दल-बदल करने में संकोच नहीं करते हैं। इससे पता चलता है कि भारत में कानून का कितना सम्मान किया जाता है। बहरहाल, सरकार किस पार्टी अथवा गठबंधन की बनती है, अब यह बात पूरी तरह से राज्यपाल के विवेक पर निर्भर था ।  और राज्यपाल का विवेक संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार काम करता है। त्रिषंकू विधानसभा की स्थिति के लिए कोई संवैधानिक व्यवस्था नहीं है। 1989 में देश  में पहली बार त्रिशंकू संसद का गठा हुआ था। तत्कालीन  राष्ट्रपति  रामास्वामी वेंकेटरमण ने सबसे बडे दल को पहले सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने की परंपरा का निर्वहन किया था। मगर 1996 में जब इसी परंपरा का निर्वहन किया गया, सरकार 14 दिन भी चल नहीं पाई। इस स्थिति के  दृष्टिगत  संविधान  विशेषज्ञ  मानते हैं कि राज्यपाल को सबसे बडे दल की परंपरा के साथ-साथ स्थाई सरकार को भी तवज्जो देनी चाहिए। दल-बदल से बनी सरकार  संविधान का अपमान है और राज्यपाल संविधान का रक्षक होता है। कर्नाटक में भाजपा बेषक सबसे बडा दल है मगर पार्टी के पास  स्पष्ट  बहुमत नहीं है और अगर पार्टी सरकार बनाती है, तो उसे अपना बहुमत साबित करने के लिए दल-बदल का सहारा लेना पडेगा। मौजूदा स्थिति में बहुमत कांग्रेस-जनता दल (एस) के पक्ष में है। राज्यपाल का विवेक भी  स्पष्ट  रुप से इस स्थिति को देख सकता था  कि बहुमत कांग्रेस-जद(एस) गठबंधन के पास है। मगर 38 विधायकों वाले दल को सरकार बनाने का न्यौता देना भी तो जनादेश  का अपमान है। जनता दल (एस) को समर्थन देकर कांग्रेस का मकसद स्थायी सरकार देना नहीं, अलबत्ता भाजपा को सत्ता से बाहर रखना है। यह भी निराशाजनक स्थिति है।   विधानसभा में  बहुमत सिद्ध करने के लिए विपक्ष के विधायकों को अनुपस्थित कराने की रणनीति भी लोकतंत्र के लिए घातक है। अतत:, मुख्यमंत्री वही बना जो गवर्नर के विवेक को भाया  और  राज्यपाल का मन तो बीजेपी के साथ है ।