भारत के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग का “काला“ अध्याय फिलहाल बंद हो गया है। कांग्रेस के दो सांसदों ने मंगलवार को राज्यसभा सभापति वैकेया नायडू द्वारा महाभियोग का प्रस्ताव अस्वीकार करने संबंधी फैसले के खिलाफ दायर याचिका वापस ले ली। सोमवार को कांग्रेस के दो सांसदो ने सुप्रीम कोर्ट में इस आशय की याचिका दायर की थी। इस याचिका में कहा गया था कि राज्यसभा में मुख्य न्यायाधीश अथवा न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश करने के लिए जितने सांसदों के हस्ताक्षर की अनिवार्यता थी, उसे पूरा करने के बाद सभापति के पास आरोपों की जांच के लिए पैनल गठित करने के सिवा और कोई विकल्प नहीं था। कांग्रेस को इस बात पर भी ऐतराज है कि 20 अपैल को राज्यसभा सभापति को महाभियोग का प्रस्ताव पेश किया गया, 24 अप्रैल को इसे अस्वीकार कर लिया गया। महाभियोग का यह अध्याय बंद हो तो गया मगर इस इसका नाटकीय पटाक्षेप अनापेक्षित था। सुप्रीम कोर्ट में जिस तरह से इसके दो सांसदों की याचिका को हैंडल किया गया, कांग्रेस ने उस पर भी सवाल उठाया है। पार्टी सांसद और नामचीन वकील कपिल सिब्बल के अनुसार मामला चीफ जस्टिस से जुडा हुआ था, इसलिए मुख्य न्यायाधीश इस मामले में अपने “मास्टर ऑफ रोस्टर“ अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकते थे। मुख्य न्यायाधीश ने सोमवार देर रात “मास्टर ऑफ रोस्टर“ अधिकार का इस्तेमाल करते हुए इस मामले की सुनवाई को पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ के सुपुर्द की था। कपिल सिब्बल का कथन है कि बगैर न्यायिक आर्डर के कोई भी मामला संविधान पीठ के सुपुर्द नहीं किया जा सकता। अवाम इसका जवाब तलाश रहा है। बहरहाल, देश के मुख्य न्यायाधीश का विवादों में घिरे रहना बेहद दुखद है और इससे न्यायपालिका की छवि पर असर पडना स्वभाविक है। चीफ जस्टिस बनने से पहले ही जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ विवादों का सिलसिला शुरु हो चुका था। ओडिशा के एक सामाजिक कार्यकर्ता ने राष्ट्रपति को चिठ्ठी लिखकर उन पर गलत हलफनामा लेकर जमीन हासिल करने का आरोप लगाया था। मामला 70 के दशक के उस समय का है जब दीपक मिश्रा कटक में वकालत किया करते थे। उस समय इस मामले की सीबीआई जांच भी हुई थी। देश के सिनेमाघरों में फिल्म से पहले राष्ट्रगान बजाने का आदेश भी जस्टिस मिश्रा ने ही दिया था हालांकि बाद में सरकार ने खुद ही इसे वापस लेने का आग्रह किया था। जस्टिस दीपक मिश्रा बुलेट प्रूफ वाहन और जेड श्रेणी सुरक्षा में सफर करने वाले सुप्रीम कोर्ट के एकमात्र जज हैं। मुंबई सीरियल बम ब्लास्ट के फैसले के बाद जस्टिस मिश्रा को धमकियां मिलने के कारण उनकी सुरक्षा व्यवस्था को और पुख्ता किया गया था। भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में जस्टिस मिश्रा पहले ऐसे मुख्य न्यायाधीश हैं जिनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जजों ने पत्रकार सम्मेलन बुलाकर सार्वजनिक तौर पर श अदालत के कामकाज पर सवाल उठाए थे। महाभियोग प्रस्ताव का सामना करने वाले जस्टिस मिश्रा पहले मुख्य न्यायाधीश हैं। जस्टिस मिश्रा ने ही गरीबों को मुफ्त कानूनी सलाह मुहैया कराने और एफआईआर को 24 घंटे के भीतर वेबसाइट पर डालने के महत्वपूर्ण फैसले भी दिए हैं। देश की न्यायपालिका इस समय विश्वसनीयता के संकट से गुजर रही है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट जजों की नियुक्ति को लेकर न्यायपालिका और सरकार आमने-सामने है। सरकार को जजों की नियुक्ति में दखल की दरकार है। इसीलिए मीजूदा कॉलेजियम सिस्टम सरकार को नागवार लग रहा है। इससे न्यायपालिका की स्वायत्तता खतरे में है। कांग्रेस ने जस्टिस मिश्रा पर नहीं देश के सर्वोच्च न्यायिक पद को महाभियोग में लपेटने का जो काम किया है, इतिहास इसके लिए हमेशा पार्टी को याद रखेगा।
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