रविवार, 13 मई 2018

काश मैं भी उन जैसा बन पाता !

सोशल मीडिया पर रचनाकार मित्रों के आचार-विचार पढकर, कॉलेज के जमाने में महान कवि सूर्य  काँत  त्रिपाठी  निराला जी का एक वृतांत याद आ गया। स्नातक में हिंदी मेरा इलेक्टिव विषय था और हमें रचनाकारों को कंठस्थ करना पडा था। रक्षाबंधन के दिन निराला जी को इलाहाबाद में अपनी मुंहबोली बहन कवियत्री महादेवी वर्मा से राखी बंधवाने उनके घर जाना था । स्वभाव से एकदम फक्कड निराला जी बहन को गिफ्ट देने के लिए अपनी रायल्टी लेने दौडे-दोडै प्रकाशक के पास गए। पैसे लेकर “इक्के“(तांगे) में सवार जब बहन महादेवी के घर की तरफ जा रहे थे, रास्ते में एक वृद्ध महिला भीख मांगती नजर आई। साधुवादी  निराला जी ने इक्का छोडा और महिला को समझाने लगे कि “ भीख“ मांगने से अच्छा उसे कोई काम करना चाहिए। महिला काफी वृद्ध थी और मेहनत करके अपना गुजारा करने की स्थिति में नहीं थी। उसका कोई आगे-पीछे भी नही था। निराला जी ने वृद्धा को अपना बिजनेस  शुरु करने की सलाह दी मगर इसके लिए छोटी-मोटी पूंजी  की जरुरत थी। वृद्धा के पास इतनी भी पूंजी नहीं थी कि वह अपना बिजनेस  शुरु कर सके। निराला जी ने फौरन रायल्टी की पूरी राशि  वृद्धा को दे दी। अब उनके पास बहन के लिए गिफ्ट खरीदने के पैसे भी नहीं थे। वे महादेवी वर्मा के घर पहुंचे, राखी बंधवाई और चुपचाप खडे  ही रहे । बाहर “इक्केवाला“ अपना भाडा लेने के लिए खडा था। और तब बहन को आगे आना पडा।  इस महान कवि की रचनाएं जितनी समृद्ध थी, उससे कहीं ज्यादा विशाल उनका हृदय था।    विशुद्ध भोतिकवादी जमाने में हम आज इस तरह की “दानवीरता“ की कल्पना तक नही कर सकते। रचनाकार तो बन नहीं सका मगर आज भी यही तमन्ना है कि काश  में भी निराला जी जैसा एक फीसदी दानवीर बन पाता और भौतिकवादी सोच से निजात पा लेता।