हिमाचल प्रदेश के पर्यटन स्थल कसौली में अतिक्रमण हटाने गई महिला अधिकारी की निर्मम हत्या ने देश में उस सच को उजागर किया है जिससे आज तक हर सरकार आंख फेरती है। और यह सच हैः सियासी नेताओं और भ्रष्ट नौकरशाही की छत्रछाया में फलता-फूलता अवैध निर्माण और अतिक्रमण। सरकारीकर्मी अथवा पुलिस की एक अदद जान की कीमत “ रसूखदार“ अतिक्रमणकारियों के लिए कोई मायने नहीं रखती है। भारत में कहीं भी धडल्ले से अवैध निर्माण अथवा अतिक्रमण किया जा सकता है। गली-गली, बाजार-बाजार जहां भी खाली जगह पर अतिक्रमण करना आसान है। ज्यादा से ज्यादा क्या होगा। निकाय या निगम कर्मचारी आएगा, अतिक्रमण हटाने अथवा गिराने की धौंस जमाएगा और अंत में मोल-तोल करके घूस में मोटी रकम ऐंठ कर खिसक लेगा। यही स्थिति अवैध निर्माण को लेकर है। जिस समय अवैध निर्माण किया जाता है, कोई भी निगरानी निकाय अधिकारी अथवा कर्मचारी इसे बंद करवाने नहीं आएगा मगर निर्माण पूरा होते ही इसे नियमित करने की आड में मोटी घूस लेकर मामला रफा-दफा कर लेगा। यह सिला लंबे समय से जारी है और दिल्ली से लेकर श्रीनगर-कन्याकुमारी, गुवाहटी-सिल्लीगुडी तक हर पालिका-नगर निगम क्षेत्र में धडल्ले से चल रहा है। दिल्ली में प्रमुख राजमार्गों पर अतिक्रमण इस कद्र बढ गया है कि सुप्रीम कोर्ट को एमसीडी और एनएमसीडी को स्पेशल अतिक्रमण हटाओ मुहिम चलाने के निर्देश देने पडे । हिमाचल प्रदेश में कसौली ही नहीं, शिमला, धर्मशाला, डलहौजी, कुल्लू-मनाली भी अपवाद नहीं है। पूर देश में अतिक्रमण का आलम यह है कि हर छोटा-बडा शहर इस मामले में एक-दूसरे को पीछे छोडता नजर आता है। इसी साल 24 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने राजधानी दिल्ली में अतिक्रमण हटाने के लिए केन्द्र सरकार को स्पेषल टास्क फोर्स (एसटीएफ) गठित करने के निर्देश दिए थे । पंजाब में अरबों रु मूल्य की सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा है। सरकार के पास अवैध कब्जाधरियों की पुख्ता जानकारी तक नहीं है। सरकारी जमीन पर से अवैध कब्जा हटाने के लिए राज्य सरकार को एक केबिनेट सब-कमेटी का गठन करना पड़ा । कानून भी अतिक्रमण का मददगार है। कानून की नजर में निजी जमीन पर अतिक्रमण करना अपराध नहीं है और इसे छुडाने के लिए मालिक को अदालतों के चक्कर लगाने पडते हैं। राजस्वकर्मियों को घूस देकर सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा करना तो और भी आसान है। कब्जा छुडाने वालों को भी घूस देकर पटाया जाता है। हिमाचल प्रदेश में विशाल जंगलाती जमीन पर अवैध अतिक्रमण हो रखा है और इससे हटाने के लिए भी न्यायपालिका को ही दखल देना पडा है। सरकार कुछ नहीं करती और न ही करेगी। दरअसल, निहित स्वार्थी राजनीति और भ्रष्ट व्यवस्था ने पूरे सिस्टम को पंगु बना डाला है। लोगों को लुभाने के लिए सरकार खुद ही अतिक्रमण को बढावा दे रही है। हिमाचल में राज्य सरकार की रिटेशन पॉलिसी इसकी मिसाल है। इस पॉलिसी के तहत शत प्रतिषत अवैध निर्माण को नियमित किए जाने का प्रावधान। कांग्रेस हो या भाजपा, चुनावों से कुछ समय पहले हर सरकार मतदाताओं को पटाने के लिए यह पॉलिसी अपनाती है। अतिक्रमणकारियों को यह बात भली-भांति मालूम है कि अतिक्रमण करके बनाए गए निर्माण को गिराने का किसी भी सरकार में साहस नहीं है। हिमाचल प्रदेश हो या दिल्ली अतिक्रमण हटाने का काम न्यायपालिका के निर्देशों पर किया जाता है। कसौली का अतिक्रमण प्रकरण भी इसी “मनौती (अपीजमेंट) का नतीजा है। सरकार और भ्रष्ट नौकरशाही की छत्रछाया में फलते-फूलते अतिक्रमणकारियों को न्यायपालिका से भी डर नहीं लगता है। कसौली प्रकरण ने हिमाचल प्रदेश की “ दिशाहीन" पर्यटन नीति के कडवे सच को भी उजागर किया है। अतिक्रमण करके बेतरतीब विकसित किए गए पर्यटक स्थलों से हिमाचल का उद्धार होने से रहा। इस तरह की नीति सिर्फ लोगों को संवेदनहीन बना सकती है।
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