खुद के लिए सरकारी बंगला, पेंशन और अन्य सुविधाएं जुटानी हो, तो तमाम कटुता, मतभेद-मनभेद और आलोचना- विवेचना भुला कर सियासी नेता एक हो जाते हैं। इस मामले में तब उन्हें न तो नैतिकता याद रहती है और न ही आदर्शवादी राजनीतिक आचरण। उत्तर प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगलों की सुविधाएं मुहैया कराने के लिए अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार द्वारा 2016 में संशोधित यूपी “मिनिस्टर सैलेरी, अलॉटमेंट फेसलिटी एक्ट 2016 इस बात का प्रमाण है। अपने “पिताश्री“ को लखनऊ में ताउम्र सरकारी बंगले की सुविधा जुटाने के लिए समाजवादी सरकार ने ऐसा कानून पारित किया जो न तो संविधान सम्मत था और न ही इसकी कोई तार्किक परीणिति थी। इससे पहले 1981 में विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार नेे कानून बनाया था जिसके तहत पद छोडने के 15 दिन के भीतर पूर्व मुख्यमंत्री को सरकारी बंगला खाली करना अनिवार्य था। समाजवादी सरकार ने पूर्व मुख्यमंत्रियों को ताउम्र सरकारी बंगले की सुविधाएं देने के लिए इस कानून में संशोधन किया। योगी आदित्यनाथ सरकार ने भी इस कानून को निरस्त नहीं किया है क्योंकि भाजपाई भी इसकी मलाई चाट रहे हैं। भाजपा कितनी आदर्शवादी है, इसका पता इसी बात से चलता है कि केन्द्रीय गृह मंत्री, पूुर्व भाजपा अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह के पास भी लखनऊ में दो-दो सरकारी बंगले हैं। राजस्थान के मौजूदा राज्यपाल कल्याण सिंह के पास 1992 से लखनऊ में एक बंगला है। कल्याण सिंह 1991-92 और 1997-99 में राज्य के मुख्यमंत्री थे। बसपा प्रमुख सुश्री मायावती और समाजवादी पार्टी नेता मुलायम सिंह के पास भी लखनऊ में दो-दो सरकारी बंगले हैं। राज्य के एक और पूर्व मुख्यमंत्री राम नरेश यादव का परिवार अभी भी लखनऊ में सरकारी बंगले में रह रहा है। यादव 1977 में राज्य के मुख्यमंत्री थे और 2016 में वे स्वर्ग सिधार गए थे। पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी के पास 1989 से लखनऊ में सरकारी बंगला है। तिवारी मूलत उत्तराखंड के नैनीताल से हैं और एक बार इस राज्य के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। बहरहाल, अब सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को दो महीने के भीतर सरकारी बंगले खाली करने पडेंगे। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को निरस्त कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि पूर्व मुख्यंत्रियों को जनता की संपत्ति, सरकारी बंगलों में रहने का कोई अधिकार नहीं है। न्यायालय ने अखिलेश यादव सरकार द्वारा पारित संषोधित कानून को “ मनमाना और पक्षपाती“ करार दिया है। मुख्यमंत्री का पद छोडने पर उन्हें सुरक्षा और अन्य प्रोटोकोल संबंधी सुविधाएं तो दी जा सकती है मगर ताउम्र सरकारी बंगले की सुविधा देना संविधान का अपमान है। निसंदेह, कानून बनाना विधायिका का अधिकार है मगर कानून संविधान सम्मत, विवेकपूर्ण एवं तार्किक होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में ही पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगले खाली करने के लिए कहा था। राज्य में उस समय अखिलेश यादव की सरकार थी और न्यायालय के आदेश से मुख्यंमंत्री के पिता ओर समाजवादी पार्टी नेता मुलायम सिंह यादव भी प्रभावित हो रहे थे। कहावत है “ सैंया भयो कोतवाल, फिर डर काहे का“। समाजवादी पार्टी की सरकार थी और बेटा राज्य का मुख्यमंत्री। फिर चिंता किस बात की। “नेता जी“ को सरकारी बंगले की सुविधा जारी रखने के लिए कानून में संशोधन करके पूर्व मुख्यमंत्रियों को उमर भर की सुविधा प्रदान कर दी गई। मगर सियासी नेता अक्सर भूल जाते हैं कि हमारे संविधान निर्माता दूरदर्शी थे और उन्होंने पहले ही इस तरह के संवैधानिक व्यवस्थागत दुरुपयोग के लिए न्यायपालिका को अधिकार संपन्न कर रखा है। स्वतंत्र न्यायपालिका के रहते देश की संवैधानिक व्यवस्था का गलत इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से राजनीतिक दलों को सीख लेने की जरुरत है।
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