मोदी सरकार के चार साल के कार्यकाल पर “एक तो मंहगाई, उस पर सरकार की रुसवाई मार गई'' के बोल पूरी तरह से चरितार्थ होते हैं। मतदाताओं को पटाना हो तो, अंतरराष्ट्रीय कीमतों से जोडे जाने के बावजूद पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढाए जाएंगे मगर सामान्य दिनों मे दाम बढाने का कोई मौका नहीं छोडा जाएगा। पिछले नौ दिन में हर रोज पेट्रोल-डीजल के दाम बढाए जा रहे हैं। मंगलवार को दिल्ली मंे पेट्रोल 76.87 रु प्रति लीटर और मुंबई में 84. 70 लीटर बिक रहा था। ये अब तक के उच्चतम दाम हैं। बुधवार को भी दाम बढ़ाए गए । कर्नाटक में विधानसभा चुनाव थे, तो 25 अप्रैल से 12 मई तक तेल कंपनियों ने एक दिन भी पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढाए जबकि इस दौरान कच्चे तेल की कीमतों में 3 डालर प्रति बैरल का इजाफा हुआ था। जाहिर है तेल कंपनियां यह सब सरकार के कहने पर कर रही थी। अगस्त 2017 से तेल कंपनियां पेट्रोल-डीजल के दाम अंतरराष्ट्रीय कीमतों से जोडकर हर रोज निर्धारित कर रही हैं। कहने को यह कदम उपभोक्ताओं को लाभ पहुंचाने के लिए उठाया गया है, मगर अब तक लोगों को चुनाव समय के सिवा कोई राहत नहीं मिली है। भारत में पेट्रोल-डीजल के ऊंचे दामों के लिए सरकार की अधिकाधिक राजस्व उगाहने की “भूख“ प्रमुख रुप से जिम्मेवार है। मोदी सरकार बार-बार कच्चे तेल की बढती अंतरराष्ट्रीय कीमतों को जिम्मेदार ठहरा रही है मगर वस्तु स्थिति कुछ और ही है। जुलाई 2008 में कच्चे तेल की कीमतें जब रिकॉर्ड 142 डॉलर प्रति बैरल थी, तब भी भारत में पेट्रोल के दाम 50 रु लीटर के आसपास और डीजल 35 रु लीटर के आसपास थे। इस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमते 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास अर्थात 2008 से 80 फीसदी से कम है मगर भारत में पेट्रोल 76 से 80 रु लीटर और डीजल 68 रु लीटर बिक रहा है। तब पेट्रोल और डीजल पर सब्सिडी दी जा रही थी। अगर सब्सिडी हटा भी ली जाए, तब भी उस समय देश में पेट्रोल और डीजल आज की तुलना में काफी सस्ता बिक रहा था। इससे पता चलता है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों के मामले में सरकार लोगों को “लूट“ रही है। मोदी सरकार के आने के बाद से पेट्रोल-डीजल पर 410 फीसदी से ज्यादा का शुल्क बढाया जा चुका है। मौजूदा समय में उपभोक्ता को दिल्ली में पेट्रोल पर 47 फीसदी और डीजल पर 37 फीसदी शुल्क देने पड रहे हैं। संप्रग सरकार की तुलना में मोदी सरकार के चार साल में पेट्रोल और डीजल के दाम अपेक्षाकृत कम रहे हैं। जनवरी 2016 में कच्चे तेल की कीमतें 27.67 डॉलर प्रति बैरल तक गिर चुकी थी। यह 2003 के न्यूनतम 28.36 डॉलर बैरल से भी कम थी मगर इसके बावजूद भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में अधिकतम 20 फीसदी की गिरावट आई थी। बाजार में कच्चा तेल सस्ते से सस्ता बिकने के बावजूद भारत में पेट्रोल की कीमतें 60 रु लीटर से नीचे नहीं आ पाईं। यह तो लोगों का सरासर शोषण है कि बाजार में जब कच्चा तेल की कीमतें रिकॉर्ड 142 डॉलर प्रति बैरल (2008) हो, तब भारत में पेट्रोल 50 रु लीटर बिके और जब कच्चे तेल के दाम 28 डॉलर बैरल (2016) हो तो पेट्रोल 70 रु लीटर बिके। पेट्रोल-डीजल को जीएसटी से बाहर रखना मोदी सरकार का जनता से सबसे बडा छल है। इस समय केन्द्र और 21 राज्यों में भगवा पार्टी की सरकार है और अगर मोदी सरकार चाहे तो पेट्रोल-डीजल को भी जीएसटी के दायरे में ला सकती थी। इससे उपभोक्ताओं को खासी राहत मिलती। अब तक तो ऐसा हुआ नहीं मगर अगले साल लोकसभा चुनाव और इस साल के अंत में चार राज्यों के विधानसभा चुनाव, मुमकिन है सरकार पेट्रोल-डीजल को भी जीएसटी के तहत लाने के लिए आगे आए। वोट के लिए सियासी दल कुछ भी कर सकते हैं।
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