लंबे अंतराल के बाद पिछले कल परम मित्र कृष्ण भानु से बातचीत कर शिमला में बिताए स्वर्णिम दिन याद आ गए। समय किसी के लिए नहीं रुकता। काश रुकता और मैं अस्सी के दशक में लौट जाता। उस समय (70-80) शिमला का कॉफी हाउस पत्रकारों का ड्राइंग रुम हुआ करता था और पापाजी (आदरणीय हृदयेश आर्य) इसके प्रमुख पैटर्न। पापाजी का जब मन करता, लोअर बाजार स्थित अपनी दुकान से कॉफी हाउस आ जाते , ईधर-उधर की फेंकते और चल देते । तब लगभग सभी पत्रकार यूएस क्लब में रहते थे। रवीन्द्र रणदेव, पीएन शर्मा और खजूरिया जी नाभा हाउस के वासी थे। पत्रकार आचरण मैं औरों से अलग होते हैं । इतने कि अपनी विरादरी को भी नहीं बख्शते । एक बार रवीन्द्र रणदेव जी को शिमला नगर निगम चुनाव लडने कि सुझी। बस, फिर क्या था. पूरी पत्रकार बिरादरी सक्रिय हो गई। नाभा से कांग्रेस का टिकट भी मिल गया मगर हार गए और उनकी हार में पत्रकार बधुंओं का बडा हाथ था। मेरे लिए यह स्वर्णिम समय रहा है। काम भी फक्क्ड और तबयित भी। नाश्ता किया और यूएस क्लब से काफी हाउस को चल दिए। पत्रकार बंधुओं से गपशप की, माल रोड स्थित प्रैस रुम आ गए। तब तक लंच का समय हो जाता और सभी पत्रकार घर लौट जाते। आए दिन आशियाना में प्रैस काँफ्रेस होती, इसलिए अक्सर घर का लंच मिस हो जाता। शाम को खबरें भेजी और फिर काफी हाउस आकर बैठ गए, यह थी दिनचर्या । सचिवालय जाना हो तो सरकारी वाहन लेने आ जाता। ऐसी आरामदायक दिनचर्या अन्यत्र कहीं नहीं मिली। अल्प समय के लिए भोपाल और लखनऊ रहा। इन दोनों जगहों का काफी हाउस कल्चर भी शिमला जैसा ही है। लखनऊ का कॉफी हाउस तो ऐतिहासक घटनाओं का साक्षी रहा है। दिल्ली कॉफी हाउस का महानगरीय कल्चर एकदम अलग है । चंडीगढ का कॉफी ह्हसय विशुद्ध व्यवसायिक है। बहरहाल, शिमला के कॉफी काफी हाउसकर्मी हमारे लिए सूचनावाहक का काम करते। कौन आया या आएगा, कब आया अथवा आएगा और किसके साथ काफी की चुस्कियां लीं या लेगा , पूरी जानकारी हमें मिल जाती। सुबह से शाम तक कॉफी हाउस तब राजनीतिक नेताओं, वकीलों और पत्रकारों से अटा रहता था। राजनीति से सन्यास लेने के बाद भाजपा के दिग्गज नेता दौलत राम चौहान अक्सर हमें काफी के लिए आमंत्रित करते। एनडी की ब्लैक काफी के साथ चौहान जी भी ब्लैक कॉफी पीते। शांता कुमार, प्रेम कुमार धूमल, आनंद शर्मा समेत सभी सियासी नेता कॉफी हाउस के रेगुलर विजिटर थे। कई सियासी नेताओं का तो यह स्थाई अडडा था। नेताओं को इस बात का बखूबी अहसास था कि पत्रकारों से मिलना हो तो बस उनके ड्राइंग रुम (कॉफी हाउस) पहुंच जाएं, मुलाकात तो हो ही जाएगी। सुबह-सुबह इडली और शाम को बडा और सांभर की महक, कॉफी हाउस की विशेषता थी। बच्चों के लिए जैली। मेरा पुत्र आज भी उस जैली को भूल नहीं पाया है। के एस तोमर (हाल ही में हिमाचल लोक सेवा आयोग के चैयरमैन से सेवानिवृत) सुबह पूरे ग्रुप के साथ और अपराहं तातश्री पीएनषर्मा को कॉफी जरुर पिलाते। हमारी विरादारी में तबा प्रकाश लोहमी एकमात्र ऐसे पत्रकार थे जो इस दिनचर्या में शामिल नहीं थे। प्रकाश ज्योतिष के लिए इतने प्रसिद्ध थे कि लोग-बाग उन्हें रास्ते में रोक लेते और वे बडी संजीदगी से कुंडली देखने लग जाते। साधुवादी लोहमी सचमुच ज्योतिष विध्या का प्रकाश फैलाया करते और संभवतय आज भी वही कर रहे हैं। सीता राम खजुरिया की अलग ही डफली बजती थी । पत्रकारों के भीष्म पितामह जेएन साधु सबसे अलग थे। लांगवुड से पैदल चलकर हर रोज कॉफी हाउस आते और अपनी गैर पत्रकार मंडली से कॉफी हाउस के निचले फ्लोर में चर्चा करते। उन्हें अपनी बिरादरी से बेकार बतियाना गवारा नहीं था । उनके आचार-विचार से सहमत रहना हर किसी के वश की बात नहीं थी। उन्हें दुकानदारी, व्यापार, राजनीति से जुडे लोगों का पत्रकार बिरादरी में शामिल होने पर सख्त ऐतराज था। अपने समकालीन पीएन शर्मा की चुटकी लेने का अवसर वे कभी नहीं चूकते। के एस तोमर वाकई विलक्षण व्यक्ति हैं। आप उनकी कितनी भी नुक्ताचीनी कर लें मगर उनके सम्मोहन से बच नहीं पाएंगे। वे मेरे जैसे सामान्य पत्रकार से कहीं ज्यादा व्यवहारिक और सफल रहे हैं। मैं बस कागज काले ही करते रह गया और तोमर बहुत आगे निकल गए। पत्रकार से लोक सेवा आयोग का चैयरमैन बनना आसान नहीं है। वे किसी राजनीतिक दल से जुडे नहीं है। साधारण परिवार से अग्रणी अंग्रेजी अखबार का संपादक बनने तक के सफर का मैं भी गवाह हूं। मुझे सतर के दशक के वो दिन आज भी याद है जब तोमर एक स्थानीय अखबार के प्रतिनिधि के तौर पर मुझसे मिलने सचिवालय आया करते। तब मैं लोक संपर्क विभाग में काम करता था। उन्होंने कडी मेहनत और लग्न से बडे पायदान तय किए हैं। मेरा पुत्र अक्सर मुझे उलाहना देता है कि मैं तोमर जैसा एक फीसदी भी नहीं बन पाया। भानु ने मुझे सूचित किया है कि तोमर जी भी पत्रकार कॉलोनी में रहने आ गए हैं। मेरा मन भी उड कर शिमला पहुंचने को मचल रहा है। फिर तोमर के साथ रोज कॉफी हाउस जाऊं और गपशप करुं। एनडी शर्मा को भोपाल से शिमला बुला लूं। भोपाल में एनडी की आज भी यही दिनचर्या है। मुझसे उनसे रंजिष होती है। एनडी शर्मा पत्रकारों के आदर्श हैं। उन जैसा समकालीन पेशेवर, ईमानदार, विद्धान और समर्पित पत्रकार हो ही नहीं सकता। मैने उन जैसा बनने की बहुत कोशिश की मगर नहीं बन सका। भास्कर में बाबू लाल शर्मा भी आदर्श थे मगर एनडी सबसे बढकर हैं। 2003-04 में शिमला लौटने पर बहुत निराशा हुई थी । न तो पहले जैसा कॉफी हाउस माहौल और न ही पत्रकार बंधु। सूचना एव लोक संपर्क विभाग के निदेशक (अब सेवा निवृत) बीडी शर्मा अभी भी कॉफी हाउस के नियमित विजटर थे और पापा जी भी। मगर इक्का-दुक्का बुजुर्ग कॉफी हाउसकर्मियों को भी इस बात का मलाल था कि वो पुराने दिन अब लद गए । भानु की आज भी मस्त चाल-ढाल और संगीतमय सुर हैं। वे नई बिरदारी में भी रम गए लगते हैं। पत्रकारों की नई बिरादरी कॉफी हाउस कल्चर से ऊपर हो गई है। रिज पर स्थित आशियाना उनका नया ठिकाना हो गया है। यह प्रैस क्लब के एकदम समीप है। शिमला में अब पत्रकारों की भीड हो गई है और इस भीड में सब कुछ खो गया है। जाने कहां गए वो दिऩ़़़़़़़़्
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