गुरुवार, 17 मई 2018

कांग्रेस पर संकट

कर्नाटक में विधानसभा चुनाव परिणाम निकलने के साथ ही लोकतंत्र के पर्व का सोमवार को समापन हो गया। इस पर्व में जात-पात, धर्म-कर्म, ऊंच-नीच और आरोप-प्रत्यारोप की आहुतियां चढाने के लिए सियासी नेताओं ने कोई कसर  नहीं छोडी। अततः, चुनावी दलदल में इस बार कमल खिला है और कांग्रेस फिर चुनाव हार गई है। चुनाव हारना तो जैसे ग्रांड ओल्ड पार्टी की नियति बन गई है।  नरेन्द्र मोदी के प्रधान मंत्री बनने के चार साल के दौरान कांग्रेस 11 राज्यों से सिकुड कर 3 राज्यों में सिमट गई है और भाजपा-राजग का षासन 8 से बढकर 21 तक फैल गया है। कांग्रेस ने कर्नाटक को फतेह करने के लिए क्या नहीं किया। हर विधानसभा सीट के लिए अलग से रणनीति बनाई। पार्टी के कार्यकर्ताओं ने हर बूथ स्तर तक कांग्रेस सरकार की उपलब्धियों का परचम लहराया और मतदाताओं से सीधा संपर्क  साधा । कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पूरे राज्य में घूम-घूम कर पार्टी का अलख जगाया।  वोटरों को लुभाने के लिए हर हथकंडे अपनाए। चुनाव से दो महीने पहले मार्च में कन्नडिगा स्वाभिमान“ का नारा बुलंद कर राज्य का अलग षासकीय झंडा तय किया गया। लिंगायत समुदाय को हिंदू धर्म  से अलग अल्पसंख्यक समुदाय के तौर पर मान्यता दी। इतना सब करने के बावजूद कांग्रेस चुनाव हार गई। देष का मतदाता अब सयाना हो गया है। वह नेताओं के झांसे में नहीं आता।  सच कहा जाए तो कांग्रेस ने राज्य में हार की बुनियाद उसी दिन रख दी थी, जिस दिन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने दो-दो हलकों से चुनाव लडने के लिए पर्चा  भरा था। जिस पार्टी का षीर्श नेता अपनी सीट को लेकर आष्वस्त न हो, उसका हारना तय है। वैसे  नरेन्द्र मोदी- अमित षाह की जोडी का कांग्रेस के पास कोई तोड नहीं है। कांग्रेस का राश्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी की यह पहली हार है। लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस पंजाब और पुडुचेरी को छोडकर हर विधानसभा चुनाव हारी है। एक के बाद एक विधानसभा चुनाव हारने के कारण कांग्रेस में नेतृत्व का संकट खडा हो सकता है। कांग्रेस का अब तक का यही इतिहास रहा है कि वह बहुत देर तक सत्ता से बाहर नहीं रह सकती और जो नेता उसे सता में लाने की क्षमता नहीं रखता है, देर-सबेर उसे हटा दिया जाता है। नेहरु परिवार पर पार्टी इसी मकसद से आश्रित रही है क्योंकि परिवार के बाहर का नेतृत्व पार्टी को सत्ता में नहीं ला सका। इसी लक्ष्य को सामने रखकर कांग्रेसी जब-तब प्रियंका गांधी वाड्रा को आगे लाने का आहवान करते रहे हैं। प्रियंका गांधी में अपनी दादी इंदिरा गांधी जैसा स्पार्क दिखता है मगर अपने पति राबर्ट वाड्रा पर मुकदमे चलने से प्रियंका की छवि पर भी असर पडा है। बहरहाल,  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राश्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) देष को यह बात समझाने में कामयाब रहा है कि कांग्रेस को एक परिवार ने बंधक बना रखा है। भाजपा और आरएसएस कर्नाटक में सभी गैर भाजपाई दलों को हिंदू-विरोधी साबित करने में सफल रही है। कांग्रेस के लिए अब सबसे बडा संकट यह होगा कि अन्य विपक्ष दल राहुल गांधी के नेतृत्व को स्वीकार करने से हाथ खींच सकते हैं। कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए अब एक ही लाइफ लाइन बची है। इस साल के अंत मंे राजस्थान, मध्य प्रदेष, छतीसगढ और मिजोरम में विधानसभा चुनाव होने है। मिजोरम ज्यादा मायने नहीं रखता है मगर  राजस्थान, मध्य प्रदेष और छतीसगढ बेहद महत्वपूर्ण  है।  अगर कांग्रेस इन राज्यों में भी चुनाव हार जाती है, तो 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का अस्तित्व ही खतरे में पड जाएगा। कांग्रेस के लिए अच्छी खबर यह है कि पार्टी का 30 से 40 फीसदी का जनाधार बरकरार है। कर्नाटक में मात्र 0.5 फीसदी ज्यादा वोट लेकर भाजपा स्पश्ट बहुमत के करीब पहुंचने में कामयाब रही है।  कांग्रेस आज भी बडी पार्टी है और उसका पूरे देष में जनाधार है। बस उसे लोकप्रिय नेतृत्व की दरकार है।