शनिवार, 12 मई 2018

तेल के खेल में चुनावी फसल

भारत में हर फैसला 90 फीसदी राजनीतिक और 10 फीसदी व्यवहारिक होता है। और तो और विशुद्ध आर्थिक फैसलों पर भी राजनीतिक हित हॉवी रहते हैं। औरों की खेतों से कैसे फसल काटी जाती है, राजनीतिक दलों को यह कला बखूबी आती है। पेट्रोल-डीजल की कीमतें  का मामला  ही  ले लीजिए है। हर रोज  कीमतें  तय करने वाली तेल कंपनियां 24 अप्रैल से इन्हें स्थिर रखे हुए हैं जबकि इस दौरान अंतरराष्ट्रीय  बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में 3 डालर प्रति बैरल बढ चुकी है। उपभोक्ताओं पर तेल कंपनियों की यह मेहरबानी कर्नाटक विधान सभा चुनाव के कारण हुई है। केन्द्र में सतारूढ मोदी सरकार को हर हाल में  दक्षिण भारत के महत्वपूर्ण  राज्य कर्नाटक में विधानसभा चुनाव जीतने हैं, इसीलिए तेल कंपनियों ने पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढाए । दक्षिण भारत में कर्नाटक एक मात्र ऐसा राज्य है, जहां भगवा पार्टी का वर्चस्व है। पिछले साल गुजरात एवं हिमाचल प्रदेश  के विधानसभा चुनाव के दौरान भी पेट्रोल के दाम स्थिर रखे गए थे। 2017 के  शुरु में  पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और असम विधानसभा चुनाव के  दौरान भी पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढाए गए थे हालांकि तब प्रतिदिन की बजाए 15 दिन में कीमतों का रिवीजन किया जाता था। तेल कंपनियों 12 मई का इंतजार कर रही हैं। इस दिन  कर्नाटक में मतदान हो रहा है। इतना तय है कि 12 मई के बाद किसी भी दिन पेट्रोल-डीजल के दाम बढ सकते हैं। इन दिनो अंतरराष्ट्रीय  बाजार में कच्चे तेल के दाम पिछले साढे चार साल के उच्चतम स्तर पर है। कच्चे तेल के दामों में नरमी की कोई उम्मीद भी नहीं है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव प्रचार ने मतदाताओं को फिर कई राजनीतिक नौटंकियां  दिखाई हैं। शुक्रवार को इसकी फिर बानकी मिली।  कांग्रेस ने एक वीडियो जारी किया है जिसमें रेड्डी बंधुओं के अवैध खनन मामले में पक्ष में फैसला हासिल करने के लिए सुप्रीम कोर्ट  के पूर्व  जज के बेटे और  भाजपा नेता में सौदेबाजी होती दिखाई गई है। भाजपा ने इस वीडियो को फर्जी बताया है मगर कांग्रेस इसे असली बता रही है। मामला 2010 का है और कांग्रेस इसे 2018 में मतदान से दो दिन पूर्व  जारी कर रही है। जाहिर है यह सब ओछी राजनीति का हिस्स्सा है और कांग्रेस इसे मतदान के लिए भुनाना चाहती है। पांच साल तक राज्य में कांग्रेस का शासन था मगर इस दौरान इस वीडियों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। इससे पहले बंगलुरु के एक फ्लैट में दस हजार वोटर कार्डस मिलने पर भी भाजपा और कांग्रेस ने एक दूसरे को लपेटने का कोई मौका नहीं छोडा था। निर्वाचन आयोग द्वारा इन वोटर कार्डस को असली बताए जाने पर मामला और संगीन हो गया। पहले माना जा रहा था कि फर्जी वोटर कार्डस बनाने के लिए  बगलुरु के इस फ्लैट का इस्तेमाल किया जा रहा था और शक की सुई कांग्रेस पर टिकी हुई थी। इस प्रकरण ने फिर इस सच्चाई को उजागर किया है कि निर्वाचन आयोग की तमाम  कोशिशों  के बावजूद चुनाव में धांधलियां हो रही हैं और निष्पक्ष  और स्वतंत्र  चुनाव अभी भी दूर की कौडी है। तेल से राजनीतिक फसल काटने का यह आर्ट बहुत पुराना है। भारत ही नहीं अमेरिका में  भी  राष्ट्रपति  चुनाव के समय पेट्रोल सस्ता हो जाता है। कांग्रेस भी इस खेल से भरपूर राजनीतिक और आर्थिक फसल काटती रही है। सरकार का खजान तो  फ्यूल पर लगाए जा रहे  शुल्क से भरा जाता है। मई, 2014 से 2018 के बीच मोदी सरकार 7 बार पेट्रोल-डीजल पर  शुल्क बढा चुकी है। तेल के खेल से राजनीतिक फसल काटने का यह सिला बदस्तूर जारी रहेगा। लोगों को बस उस दिन का इंतजार है जब अमेरिका की तरह भारत में भी चुनाव के समय पेट्रोल-डीजल सस्ता होगा।