शुक्रवार, 25 मई 2018

हिमाचल के विकास का रोडमैप

पानी का बर्तन सिर  पर उठाए महिलाओं को देखकर बहुत बुरा लगता है। मां की याद आती है। पहाडों में महिलाओं को बहुत ज्यादा परिश्रम करना पडता है। चुल्हा-चौका संभालने के अलावा, पूरी घर-गृहस्थी संवारना  खेतों में काम करना और उस पर पीने के पानी के लिए दूर-दूर तक भटकना। हर गर्मी में यह सिला बदस्तूर जारी है। शुद्ध पीने का पानी हर इंसान की बुनियादी जरुरत है और हर सरकार की उच्च प्राथमिकता। मगर आजादी के सात दशक बाद भी अगर पहाडों की  महिलाओ को पानी के लिए भटकना पडा, तो लानत है ऐसी आजादी पर। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर जी आप तो साधारण ग्रामीण परिवेश  से हैं, किसी राज परिवार से नहीं। आप तो  ग्रामीण और दूर-दराज स्थित ग्रामीण इलाकों की महिलाओं की कठिनाइओं से बखूबी परिचित हैं। आपकी सरकार की पहली और सर्वोपरि प्राथमिकता लोगों को  शुद्ध पेयजल मुहैया कराना होनी चाहिए। अपनों  और वोट बैंक को  रेवडियां बांटने के लिए अभी साढे चार साल से ज्यादा का समय पडा है। आपने  तुगलगी फरमान जारी कर दिया कि गुम्मा के लोग नोटी खडड में मिलने वाली कूल्हों का पानी इस्तेमाल न करें। यह तो स्थानीय लोगों से  सरासर अन्याय है। भीषण गर्मी में मौसमी सब्जियों के लिए  कूल्ह का पानी ही एकमात्र सहारा है और अगर यह बंद हो गया ति किसानों को भारी नुकसान उठाना पडता है। गुम्मा का क्षेत्र मौसमी सब्जियां उगाने के लिए जाना  जाता है और ये ताजा सब्जियां हर रोज  शिमला को सप्लाई की जाती है। किसानों की नगदी आय का यह प्रमुख साधन है।  शिमला शहर की प्यास बुझाने के लिए किसानों को क्योंकर “त्याग“ देना पडे। हर बार  ग्रामीण  ही क्यों  त्याग दे , किसान तो हमेशा बेहाल रहता है। शहरी लोग तो मिनरल वाटर से भी गुजारा कर लेंगे। बहरहाल, गुम्मा में कूल्हों का पानी शिमला की प्यास नहीं बुझा सकता मगर यह गुम्मा के किसानों की रोजी-रोटी का प्रमुख स्त्रोत हैं। फौरी उपायों से पेयजल जैसी दीर्घकालीन समस्या का निदान नहीं हो सकता।  पेयजल के परम्परागत  स्त्रोत  सुख चुके  हैं  और भूमिगत पानी का स्तर साल-दर साल  नीचे जा रहा है ।नतीजतन, अधिकांश पेय जल स्कीमों  मेम पानी नहीं आ रहा है । इसके लिए दीर्घकालीन योजना बनाई जानी चाहिए  । मगर हर सरकार आज तक  फौरी  योजना  बनाती  रही है। फिरंगियों ने जब गुम्मा से  शिमला के लिए पानी लिफ्ट किया था तब नॉटी खडड में बत्तेरा पानी था। पहले इस का इस्तेमाल  शिमला की प्यास बुझाने  के लिए और बचे हुए पानी से अंग्रेजों ने चाबा में बिजली पैदा की और इस बिजली का उपयोग पानी लिफ्ट करने और  शिमला  बिजलीकरण करने के लिए किया गया। स्वदेशी  सरकार ने अंग्रेजों के नाज-नखरे तो अक्षरश  ग्रहण कर लिए मगर सुशासन के तौर-तरीके सीखने  भूल गए। शिमला हिमाचल की राजधानी है और इस स्थिति में इसका तेजी से फैलना-फूलना स्वभाविक है। राजधानी को राक्षस की तरह फैलने से बचाने के लिए एक प्राधिकरण स्थापित (शिमला विकास प्राधिकरण) करने  की जरूरत  है जो इस शहर की अगले सौ साल की जरुरतों को ध्यान में रखकर विकास का रोडमैप तैयार करे। और इसी तरह पूरे राज्य के लिए पंचायत स्तर से विकास का दीर्घकालीन रोडमैप तैयार किया जाना चाहिए । इसमें माकूल पेयजल, बिजली,सडक, स्कूल और अन्य बुनियादी जरुरतों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। इस तरह के रोडमैप के लिए वित्तीय संसाधन जुटाना कोई कठिन   काम नहीं है। बस दूरदर्शिता  और दृढ इच्छा शक्ति की जरुरत है।