भाजपा की जुगाड कर्नाटक में काम नहीं आई। बतेरी कोशिश की मगर कांग्रेस-जनता दल (एस) की जुगाड ने बाजी मार ली। 72 घंटे से भी काम समय के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा जुगाड में फिस्सडी निकले। छह माह तक लगातार अमित शाह के साथ कर्नाटक नापते-नापते भी येदि उनकी “जगाडु“ प्रतिभा को ग्रहण नहीं कर पाए। अमित शाह की राजनीतिक “जुगाड“ प्रतिभा की पूरी दुनिया कायल है। कर्नाटक के राज्यपाल द्वारा येदियुरप्पा को विश्वास मत हासिल करने के लिए 15 दिन का समय देने पर सोशल मीडिया पर कमेंट था “ 15 दिन में तो अमित शाह उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोन-उन के दस्तखत भी ले लाएंगे“। 2017 में गुजरात राज्यसभा के चुनाव के दौरान अमित शाह ने कांग्रेस के दिग्गज नेता अहमद पटेल को जीत के लिए जिस तरह से पसीने छुडवाए थे, कर्नाट्क में येदियुरप्पा की सरकार बनाने के समय उसकी पुनरावृति हो रही थी। उस समय भी कांग्रेस को अपने विधायक भाजपा की पोचिंग से बचाने के लिए बंगलुरु में छिपाना पडा था। इस बार भी कांग्रेस और जनता दल (एस) के विधायकों को भाजपा की पोचिंग से हैदराबाद में छिपाना पडा। इसे कहते हैं“ तू डाल-डाल, मैं पात-पात“। कर्नाटक में न कांग्रेस-जनता दल (एस) गठबंधन जीता, न ही भाजपा हारी, लोकतंत्र की लाज बच गई। 15 दिन का समय मिल जाता, अमित शाह की पार्टी शर्तिया विश्वास मत प्राप्त कर लेती। 7 दिन भी मिल जाते, येदियुरप्पा मुख्यमंत्री बने रहते। सुप्रीम कोर्ट ने सारा खेल बिगाड दिया। कोर्ट की व्यवस्था से दल-बदलू डर गए। टॉप कोर्ट ने साफ कर दिया था कि विधायक इस गलतफहमी में न रहे कि शपथ लेने से पहले विधायकों पर दल-बदल लागू नहीं होता है। सियासी नेता कानून को सुविधानुसार तोडने-मरोडने में सिद्धहस्त हैं। कनार्टक में कांग्रेस, जनता दल (एस) के विधायकों को यह कहकर बरगलाया जा रहा था कि शपथ लेने से पहले दल-बदल कानून से न डरें। धन्य हैं हमारे सियासी नेता और समकालीन राजनीति। कोई किसी से कम नहीं है। मगर एक सच्च्चाई यह है कि “जुगाड की हांडी“ बार-बार नहीं चढती“।
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