शनिवार, 19 मई 2018

लोकतंत्र की हत्या

मोदी सरकार ने अपने चार साल के “पारदर्शी “ शासन में स्वस्थ-समृद्ध  लोकतांत्रिक परंपराओं का जी भरकर उपहास उडाया है। दल-बदल लोकतंत्र के लिए सबसे बडा खतरा है। दल-बदल कराकर बनाई गई सरकार जनादेश  का घोर अपमान है। एक जमाने में भाजपा यही सब कुछ कहा करती थी। सत्ता में आते ही भगवा पार्टी सारी आदर्शवादी  बातें भूल गई। कर्नाटक में सरकार बनाने के लिए भाजपा दल-बदल का खुलेआम सहारा ले रही है। केन्द्र में सरकार भी अपनी है और राज्यों में गवर्नर भी अपने।  गवर्नर्स अपने हैं तो कानून को सुविधानुसार तोडा -मरोड़ा जा सकता  है। गोवा में सरकार बनाते समय वहां के गवर्नर को सबसे बडी पार्टी को सरकार बनाने की रिवायत याद नहीं रही मगर कर्नाटक में जरुर रही। गोवा विधानसभा  चुनाव के त्रिशंकू जनादेश  में कांग्रेस  सबसे बडी पार्टी थी पर केन्द्र में सत्तारूढ मोदी सरकार को यह कतई गवार नहीं था कि कांग्रेस सरकार बनाए। राज्यपाल ने कांग्रेस की बजाए दूसरी बडी पार्टी भाजपा नीत गठबंधन को सरकार बनाने का न्यौता दिया। राज्यपाल महोदय ने तर्क  दिया बहुमत भाजपा के साथ था, इसलिए गठबंधन को न्यौता दिया गया। परंपरा अनुसार अगर सबसे बडी पार्टी सरकार बनाने का निमत्रंण ठुकरा देती है, तभी दूसरी पार्टी को सरकार बनाने का न्यौता दिया जा सकता है। मोदी सरकार के राजभवन में पदस्थ नुमाइदों ने मणिपुर, मेघालय और अब कर्नाटक में कांग्रेस को सता से बाहर रखने के लिए  इन परम्पराओं  का पालन नहीं किया किया।  बहुमत परखने के लिए राजभवन  कोई उपयुक्त जगह नहीं है। विधायकों की परेड कराना और उन्हें भेड-बकरियों की तरह गिनना जनादेश  का अपमान है। यह काम विधानसभा में होना चाहिए और देश  की शीर्ष  अदालत कई बार यह व्यवस्था दे चुकी है। बहुमत भी विधानसभा में जल्द से जल्द  साबित होना चाहिए। 15 दिन का लंबा समय  “दल-बदल (होर्स ट्रेडिंग) को बढावा देता है। कर्नाटक में पूरा खेल यही था।  गोवा, मणिपुर और कर्नाटक में जो कुछ भी हुआ, उससे भारतीय लोकतंत्र  शर्मसार हुआ है। कर्नाटक में कांग्रेस-जनता दल (एस) को स्पश्ट बहुमत के बावजूद इस गठबंधन को गोवा की तर्ज पर सरकार बनाने का निमत्रंण नहीं दिया गया। भाजपा को स्पश्ट बहुमत साबित करने के लिए के लिए कम-से-कम सात विधायकों की दरकार है। विधानसभा में केवल दो निर्दलीय चुन कर आए हैं। इनमेंसे एक भाजपा के साथ हो लिया है, दूसरा कांग्रेस के साथ है। दोनों निर्दलीय विधायकों के समर्थन के बावजूद भाजपा बगैर दल-बदल कराए अपना बहुमत साबित नहीं कर सकती। कांग्रेस और जनता दल (एस) के विधायकों के  विश्वास  प्रस्ताव के समय  पार्टी व्हिप दर किनार करते हुए अनुपस्थित रहने  पर भी यह दल-बदल माना जाएगा। भाजपा की ओर से  यह भी कहा  जा रहा है कि शपथ लेने से पहले किसी भी विधायक पर दल-बदल लागू नहीं होता है। यानी वह एक पार्टी छोड, दूसरी में शामिल हो सकता है। यह सरासर लोकतंत्र की  हत्या  है।   सुप्रीम कोर्ट ने वीरवार को सुनवाई के दौरान इस तर्क  को निरर्थक  बताते हुए कहा कि शपथ लेने से पहले भी किसी को दल-बदल की अनुमति नहीं दी जा सकती। पार्टी  के टिकट पर निर्वाचित होकर आया विधायक  शपथ से पहले या बाद में दल बद्ले, वह दल-बदलू ही माना जाएगा। दल-बदल को बढावा देने वाले सियासी दल, सरकार और राज्यपाल लोकतंत्र के मित्र नहीं हो सकते।  भारतीय लोकतंत्र का सौभाग्य है कि न्यायपालिका  “सत्ता के लिए कुछ भी करेंगे“ की मानसिकता वाली सियासी दलों को नकेल डाल रही है। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट  ने मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को शनिवार चार बजे तक विश्वास  मत हासिल करने का आदेष देकर लोकतंत्र की लाज रखी है।  प्रो-टेम स्पीकर का चयन, उसकी अधिसूचना और षपथ और फिर सभी 222 विधायकों की षपथ  कल 4 बजे तक पूरा करना चुनौतीपूर्ण  है मगर टॅाप कोर्ट के आदेश  हैं, तो यह सब करना ही पडेगा। बस तमाशा  देखते रहिए और शनिवार सांयकाल  तक इंतजार कीजिए।