शुक्रवार, 18 मई 2018

रमजान ,“आतंकी भी भाईजान“

आतंकी हिंसा में झुलस रहे जम्मू-कश्मीर  में मोदी सरकार द्वारा “सीजफायर“ की घोषणा से राज्य में रमजान के दौरान अमन-चैन कायम हो न हो, मगर केन्द्र के इस फैसले से राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को राहत जरुर मिल सकती है। वीरवार से जम्मू-कश्मीर में  यह सीजफायर लागू हो गया है। इसके तहत सुरक्षाकर्मी आतंकियों के हमले की स्थिति में ही जवाबी कार्रवाई  करेंगेें। मगर राज्य के भाजपाई नेता ही “सेना को गोलियां, आतंकियों को सेवेइयां“ की नीति से खासे क्षुब्ध हैं। मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने केन्द्र से रमजान के दौरान सुरक्षाकर्मियों द्वारा “सीजफायर“ की मांग रखी थी। मुख्यमंत्री ने रमजान के दौरान “ऑपरेशन आल आउट“ को रोकने के लिए सर्वदलीय बैठक भी बुलाई थी। भाजपा ने इसका बहिष्कार  किया था। सेना पिछले कई माह से आतंकियों के खिलाफ  “ऑपरेशन आल आउट“ चलाए हुए है। इस ऑपरेशन के दौरान इस साल अब तक 200 से ज्यादा आतंकी मारे जा चुके हैं। प्रधानमंत्री के जम्मू-कश्मीर  दौरे से ठीक पहले सीजफायर की घोषणा के कई राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। इस शनिवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जम्मू-कश्मीर  के दो दिन के दौरे पर श्रीनगर जा रहे हैं। कश्मीर  के अलगाववादी नेता पहले ही इस दौरे के बहिष्कार  की घोषणा कर चुके हैं। अलगाववादी सईद गिलानी, मीरवेज उमर फारुक  और यासीन मलिक ने “ शनिवार“ को “श्रीनगर के लाल चौक चलो“ का आहवान किया है। पाकिस्तान से ऑपरेट कर रहे आतंकी संगठन लष्कर-ए-तैयबा ने भी “सीजफायर“ को ठुकरा कर “वार्ता“ की मांग की है। 17 साल पहले अटल बिहारी वाजपेयी की राजग सरकार ने 2000-01 में भी रमजान के दौरान जम्मू-कष्मीर में चार चरणों में  सीजफायर लागू किया था। पहला सीजफायर नवंबर 28 से 27 दिसंबर 2000 तक लागू किया गया था और इस दौरान जम्मू-कश्मीर  में सुरक्षा बलों और नागरिकों समेत 211 लोग मारे गए थे। 28 दिसंबर से 26, जनवरी 2001 तक लागू दूसरे चरण के सीजफायर में 203, 27 जनवरी से 26 फरवरी के तीसरे चरण के सीजफायर में 235 और फरवरी 27 से 30 मई तक के चौथे चरण में 189 लोग मारे गए थे। इन आंकडों से स्पष्ट  होता है कि रमजान जैसे पवित्र माह में हिंसा और खून-खराबे के दानवों को  सीजफायर से कोई सरोकार नहीं है। सरकार का यह फैसला आतंकियों से लडते-लडते शहीद हुए सैनिकों की  शुरवीरता का घोर अपमान है। कश्मीर  में सेना सबसे बडी स्टैकहोल्डर है। उन सियासी नेताओं से भी कहीं ज्यादा जो भारी सुरक्षा बंदोबस्त में आतंकियों को रमजान के दौरान “सेवईयां“ खिलाने की पैरवी करते हैं। कश्मीर  का अवाम भी यही चाहेगा कि आतंकियों से वार्ता  करने की पैरवी करने वाले अलगाववादी और सियासी नेता बगैर भारी सुरक्षा के बाहर आकर देख ले, उन्हें जमीनी सच्चाई का पता चल जाएगा। और इस बीच भाजपा के वरिष्ठ  नेता और पूर्व  उप-मुख्यमंत्री निर्मल सिंह ने सेना पर  “राजनीतिक साजिश “ का आरोप लगाकर माहौल को और खराब कर दिया है। सेना ने जम्मू के नगरोटा में निर्मल सिंह द्वारा निर्माणाधीन भवन को फौरन बंद करने का नोटिस भेजा है। “एक तो चोरी, उस पर सीनाजोरी“ को चरितार्थ करते हुए नेता ने सेना पर ही संगीन आरोप मढ दिए हैं। यह प्रकरण इस बात का प्रमाण है कि राश्ट्रवादी का चोला ओढने वाले भाजपाई नेता भी अपने “निहित स्वार्थ“ के लिए कुछ  सकते हैं। कश्मीर  में ताजा सीजफायर से एक बार फिर सेना का मनोबल गिर सकता है। सेना ने दक्षिण कश्मीर  आतंक बहुल जिलों में आतंकियों के तमाम-छोटे बडे  मॉड्यूल का ध्वस्त कर डाला था। मगर अब एक माह में आतंकियों को फिर से सक्रिय होने का मौका मिल जाएगा। महबूबा मुफ्ती की प्रतिष्ठा  बचाने के लिए कश्मीर  में “ऑपरेशन आल आउट“ की सफलता को खतरे में डालना कारगर रणनीति  नहीं है।              



                रमजान में “आतंकी भी भाईजान“



आतंकी हिंसा में झुलस रहे जम्मू-कष्मीर में मोदी सरकार द्वारा “सीजफायर“ की घोशणा से राज्य में रमजान के दौरान अमन-चैन कायम हो न हो, मगर केन्द्र के इस फैसले से राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को राहत जरुर मिल सकती है। वीरवार से जम्मू-कष्मीर मंे यह सीजफायर लागू हो गया है। इसके तहत सुरक्षाकर्मी आतंकियों के हमले की स्थिति में ही जवाबी कार्रवाई  करेंगेें। मगर राज्य के भाजपाई नेता ही “सेना को गोलियां, आतंकियों को सेवेइयां“ की नीति से खासे क्षुब्ध हैं। मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने केन्द्र से रमजान के दौरान सुरक्षाकर्मियों द्वारा “सीजफायर“ की मांग रखी थी। मुख्यमंत्री ने रमजान के दौरान “ऑपरेषन आल आउट“ को रोकने के लिए सर्वदलीय बैठक भी बुलाई थी। भाजपा ने इसका बहिश्कार किया था। सेना पिछले कई माह से आतंकियों के खिलाफ  “ऑपरेषन आल आउट“ चलाए हुए है। इस ऑपरेषन के दौरान इस साल अब तक 200 से ज्यादा आतंकी मारे जा चुके हैं। प्रधानमंत्री के जम्मू-कष्मीर दौरे से ठीक पहले सीजफायर की घोशणा के कई राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। इस षनिवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जम्मू-कष्मीर के दो दिन के दौरे पर श्रीनगर जा रहे हैं। कष्मीर के अलगाववादी नेता पहले ही इस दौरे के बहिश्कार की घोशणा कर चुके हैं। अलगाववादी सईद गिलानी, मीरवेज उमर फारुक  और यासीन मलिक ने “ षनिवार“ को “श्रीनगर के लाल चौक चलो“ का आहवान किया है। पाकिस्तान से ऑपरेट कर रहे आतंकी संगठन लष्कर-ए-तैयबा ने भी “सीजफायर“ को ठुकरा कर “वार्ता“ की मांग की है। 17 साल पहले अटल बिहारी वाजपेयी की राजग सरकार ने 2000-01 में भी रमजान के दौरान जम्मू-कष्मीर में चार चरणों में  सीजफायर लागू किया था। पहला सीजफायर नवंबर 28 से 27 दिसंबर 2000 तक लागू किया गया था और इस दौरान जम्मू-कष्मीर में सुरक्षा बलों और नागरिकों समेत 211 लोग मारे गए थे। 28 दिसंबर से 26, जनवरी 2001 तक लागू दूसरे चरण के सीजफायर में 203, 27 जनवरी से 26 फरवरी के तीसरे चरण के सीजफायर में 235 और फरवरी 27 से 30 मई तक के चौथे चरण में 189 लोग मारे गए थे। इन आंकडों से स्पश्ट होता है कि रमजान जैसे पवित्र माह में हिंसा और खून-खराबे के दानवों को  सीजफायर से कोई सरोकार नहीं है। सरकार का यह फैसला आतंकियों से लडते-लडते षहीद हुए सैनिकों की षूरवीरता का घोर अपमान है। कष्मीर में सेना सबसे बडी स्टैकहोल्डर है। उन सियासी नेताओं से भी कहीं ज्यादा जो भारी सुरक्षा बंदोबस्त में आतंकियों को रमजान के दौरान “सेवईयां“ खिलाने की पैरवी करते हैं। कष्मीर का अवाम भी यही चाहेगा कि आतंकियों से वार्ता  करने की पैरवी करने वाले अलगाववादी और सियासी नेता बगैर भारी सुरक्षा के बाहर आकर देख ले, उन्हें जमीनी सच्चाई का पता चल जाएगा। और इस बीच भाजपा के वरिश्ठ नेता और पूर्व  उप-मुख्यमंत्री निर्मल सिंह ने सेना को “राजनीतिक साजिष“ का आरोप लगाकर माहौल को और खराब कर दिया है। सेना ने जम्मू के नगरोटा में निर्मल सिंह द्वारा निर्माणाधीन भवन को फौरन बंद करने का नोटिस भेजा है। “एक तो चोरी, उस पर सीनाजोरी“ को चरितार्थ करते हुए सेना पर ही संगीन आरोप मढ दिए हैं। यह प्रकरण इस बात का प्रमाण है कि राश्ट्रवादी का चोला ओढने वाले भाजपाई नेता भी अपने “निहित स्वार्थ“ के लिए कुछ  सकते हैं। कष्मीर में ताजा सीजफायर से एक बार फिर सेना का मनोबल गिर सकता है। सेना ने दक्षिण कष्मीर के आतंक बहुल जिलों में आतंकियों के तमाम-छोटे बडे  मॉड्यूल का ध्वस्त कर डाला था। मगर अब एक माह में आतंकियों को फिर से सक्रिय होने का मौका मिल जाएगा। महबूबा मुफ्ती की प्रतिश्ठा को बचाने के लिए कष्मीर में “ऑपरेषन आल आउट“ की सफलता को खतरे में डालना कारगर रणनीति साबित हो सकती है।              


               रमजान में “आतंकी भी भाईजान“

आतंकी हिंसा में झुलस रहे जम्मू-कष्मीर में मोदी सरकार द्वारा “सीजफायर“ की घोशणा से राज्य में रमजान के दौरान अमन-चैन कायम हो न हो, मगर केन्द्र के इस फैसले से राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को राहत जरुर मिल सकती है। वीरवार से जम्मू-कष्मीर मंे यह सीजफायर लागू हो गया है। इसके तहत सुरक्षाकर्मी आतंकियों के हमले की स्थिति में ही जवाबी कार्रवाई  करेंगेें। मगर राज्य के भाजपाई नेता ही “सेना को गोलियां, आतंकियों को सेवेइयां“ की नीति से खासे क्षुब्ध हैं। मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने केन्द्र से रमजान के दौरान सुरक्षाकर्मियों द्वारा “सीजफायर“ की मांग रखी थी। मुख्यमंत्री ने रमजान के दौरान “ऑपरेषन आल आउट“ को रोकने के लिए सर्वदलीय बैठक भी बुलाई थी। भाजपा ने इसका बहिश्कार किया था। सेना पिछले कई माह से आतंकियों के खिलाफ  “ऑपरेषन आल आउट“ चलाए हुए है। इस ऑपरेषन के दौरान इस साल अब तक 200 से ज्यादा आतंकी मारे जा चुके हैं। प्रधानमंत्री के जम्मू-कष्मीर दौरे से ठीक पहले सीजफायर की घोशणा के कई राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। इस षनिवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जम्मू-कष्मीर के दो दिन के दौरे पर श्रीनगर जा रहे हैं। कष्मीर के अलगाववादी नेता पहले ही इस दौरे के बहिश्कार की घोशणा कर चुके हैं। अलगाववादी सईद गिलानी, मीरवेज उमर फारुक  और यासीन मलिक ने “ षनिवार“ को “श्रीनगर के लाल चौक चलो“ का आहवान किया है। पाकिस्तान से ऑपरेट कर रहे आतंकी संगठन लष्कर-ए-तैयबा ने भी “सीजफायर“ को ठुकरा कर “वार्ता“ की मांग की है। 17 साल पहले अटल बिहारी वाजपेयी की राजग सरकार ने 2000-01 में भी रमजान के दौरान जम्मू-कष्मीर में चार चरणों में  सीजफायर लागू किया था। पहला सीजफायर नवंबर 28 से 27 दिसंबर 2000 तक लागू किया गया था और इस दौरान जम्मू-कष्मीर में सुरक्षा बलों और नागरिकों समेत 211 लोग मारे गए थे। 28 दिसंबर से 26, जनवरी 2001 तक लागू दूसरे चरण के सीजफायर में 203, 27 जनवरी से 26 फरवरी के तीसरे चरण के सीजफायर में 235 और फरवरी 27 से 30 मई तक के चौथे चरण में 189 लोग मारे गए थे। इन आंकडों से स्पश्ट होता है कि रमजान जैसे पवित्र माह में हिंसा और खून-खराबे के दानवों को  सीजफायर से कोई सरोकार नहीं है। सरकार का यह फैसला आतंकियों से लडते-लडते षहीद हुए सैनिकों की षूरवीरता का घोर अपमान है। कष्मीर में सेना सबसे बडी स्टैकहोल्डर है। उन सियासी नेताओं से भी कहीं ज्यादा जो भारी सुरक्षा बंदोबस्त में आतंकियों को रमजान के दौरान “सेवईयां“ खिलाने की पैरवी करते हैं। कष्मीर का अवाम भी यही चाहेगा कि आतंकियों से वार्ता  करने की पैरवी करने वाले अलगाववादी और सियासी नेता बगैर भारी सुरक्षा के बाहर आकर देख ले, उन्हें जमीनी सच्चाई का पता चल जाएगा। और इस बीच भाजपा के वरिश्ठ नेता और पूर्व  उप-मुख्यमंत्री निर्मल सिंह ने सेना को “राजनीतिक साजिष“ का आरोप लगाकर माहौल को और खराब कर दिया है। सेना ने जम्मू के नगरोटा में निर्मल सिंह द्वारा निर्माणाधीन भवन को फौरन बंद करने का नोटिस भेजा है। “एक तो चोरी, उस पर सीनाजोरी“ को चरितार्थ करते हुए सेना पर ही संगीन आरोप मढ दिए हैं। यह प्रकरण इस बात का प्रमाण है कि राश्ट्रवादी का चोला ओढने वाले भाजपाई नेता भी अपने “निहित स्वार्थ“ के लिए कुछ  सकते हैं। कष्मीर में ताजा सीजफायर से एक बार फिर सेना का मनोबल गिर सकता है। सेना ने दक्षिण कष्मीर के आतंक बहुल जिलों में आतंकियों के तमाम-छोटे बडे  मॉड्यूल का ध्वस्त कर डाला था। मगर अब एक माह में आतंकियों को फिर से सक्रिय होने का मौका मिल जाएगा। महबूबा मुफ्ती की प्रतिश्ठा को बचाने के लिए कष्मीर में “ऑपरेषन आल आउट“ की सफलता को खतरे में डालना कारगर रणनीति साबित हो सकती है।