शुक्रवार, 25 मई 2018

एकता का मुखौटा

बुधवार को कर्नाटक की राजधानी बंगलुरु में जनता दल (एस)-कांग्रेस की सरकार के शपथ समारोह में विपक्ष के  शीर्ष   नेताओं  की बढ-चढ कर उपस्थिति ने विपक्षी दलों में एकता का संदेश  देने की  कोशिश  की गई। भारी अंतर्विरोध और महत्वाकांक्षाओं के टकराव के बावजूद एकता से कहीं ज्यादा नरेन्द्र मोदी- अमित शाह युगल की लोकप्रियता और 2019 में “रिपीट मोदी सरकार“ का खौफ  आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल, टीडीपी नेता एव आंध्र प्रदेश  के मुख्यमंत्री चंद्र बाबू नायडु, पश्चिम  बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से लेकर मायावती, सीपीएम नेता सीता राम येचुरी और भाकपा नेता डी राजा को शपथ समारोह में खींच कर ले आया। ममता दीदी और माकपा-भाकपा का पहली बार एक मंच पर आना वाकई ही काबिलेगौर है। पश्चिम  बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और माकपा एक-दूसरे की घुर विरोधी हैं। इसके बावजूद इन दलों का एच डी कुमारस्वामी के शपथ समारोह में एक साथ मौजूद रहना विपक्षी दलों की एकता के लिए  शुभ संकेत हैं।  इतिहास खुद को दोहराता है। एक जमाने में कांग्रेस को हराने के लिए भाजपा यही सब कवायद किया करती थी मगर दक्षिणपंथ और वामपंथ की वैचारिक और सिद्धांतिक दीवार हमेशा  आडे आती रहीं। समकालीन विपक्षी दलों में फिलहाल ऐसी कोई दीवार नही है। हां,  प्रधानमंत्री बनने की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं और राहुल गांधी के नेतृत्व क्षमता के प्रति विपक्षी नेताओं की “शंकाएं-आशंकाएं“ अपना रंग दिखा सकती है। बंगलुरु के शपथ समारोह में इसकी एक बानगी भी मिली। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चन्द्रशेखर राव शपथ समारोह से एक दिन पहले आए और चले भी गए। इससे यही संकेत मिलते हैं कि राव कांग्रेस से नजरें चुराना चाहते थे। सबसे बडा सवाल यह है कि “लोकत्रंत्र बचाओ, मोटी हटाओ“ का मुखौटा पहनकर विपक्षी दल का यह गठबंधन बनेगा भी या नहीं और अगर बन भी गया तो कितने दिन चलेगा़़? इतिहास इस बात का गवाह है कि फौरी मकसद से बनाया गया कोई भी राजनीतिक गठबंधन लंबे समय तक नहीं चल सकता। 1977 में जनता पार्टी और 1989 में जनता दल सरकार दोनों ही इस बात के गवाह है। इन दोनों का मकसद इंदिरा गांधी की कांग्रेस को सत्ता से हटाना था और मकसद पूरा होते ही, विपक्षी एकता का मुखौटा बेनकाब हो गया और गठबंधन फौरन टूट गया। बहरहाल, कर्नाटक का मौजूदा गठबंधन विपक्षी एकता की नई प्रयोगषाला बनने जा रहा है। न तो नए मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी और न ही कर्नाटक कांग्रेस के नेता दूध के धुले हैं। भ्रष्टाचार  के मामले में कुमारस्वामी का रिकॉर्ड  भाजपा नेता बीएस येदियुरप्पा से ज्यादा बेहतर नही है। वैसे भी जब गठबंधन सरकार की उमर को लेकर निश्चितता  न हो, कोई भी नेता मौका चूकने से पीछे नहीं हटेगा। और कांग्रेस का रिकार्ड  तो इस मामले पहले से ही खराब रहा है।  मरणासन्न पडी कांग्रेस को कर्नाटक के नतीजों ने थोडा आत्म विश्वास  भरा तो है मगर अभी भी ग्रांड ओल्ड पार्टी विपक्षी एकता के भरोसे प्रधानमंत्री मोदी को चुनाव में परास्त करने के “मुंगेरी लाल के हसीन सपने “ देख रही है। चार साल में कांग्रेस ने एक भी ऐसा काम नहीं किया है जिससे लोगों में उसकी धाक जमी हो। राहुल गांधी को उनके सलाहकार अध्यक्ष बनने के बाद भी यह बात समझा नहीं पाए हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र को गालियां देने से मतदाताओं को लुभाया नहीं जा सकता और न ही वोट मिलते हैं। कांग्रेस के लिए बस संतोष  की बात यह है कि कर्नाटक के चुनाव परिणाम साफ कह रहे हैं कि मोदी-शाह की जोडी अपराजेय नहीं है और अगर विपक्षी दल एक हो जाएं तो भाजपा को चुनाव में  परास्त किया जा सकता है। सालांत में होने वाले  मध्य प्रदेश , राजस्थान और छत्तीसगढ के विधानसभा चुनाव में विपक्षी दलों की एकता का पता चल जाएगा।