बुधवार, 30 मई 2018

कंगाली की कगार पर पाक

आतंक को पालते-पालते, चीन से दोस्ती निभाते-निभाते पाकिस्तान कंगाली की कगार पर पहुंच गया है। उसका सर्वजनिक कर्ज लगातार बढ रहा है। उसकी अर्थव्यवस्था बहुत खराब दौर से गुजर रही है।  आंतरिक हालात नाजुक हैं और सेना और सरकार के बीच दूरियां लगातार बढ रही हैं।  अंतरराष्ट्रीय  बाजार में  उसकी मुद्रा लगातार कर रही है। अमेरिकी डॉलर की तुलना में पाकिस्तानी मुद्रा 120 रु तक गिर चुकी है। पाकिस्तान की मुद्रा भी रुपया ही है। पाकिस्तान  पर विदेशी  कर्ज  उतरोतर बढ रहा है।  नेट सार्वजनिक कर्जा 2016 में ही 120 खरब डॉलर को पार कर चुका था।  अंतरराष्ट्रीय  बाजार में अपनी मुद्रा की लाज बचाने के लिए पाकिस्तान विदेशी   कर्ज-दर-कर्ज  उठा रहा है। निर्यात न के बराबर है। इसलिए पाकिस्तान विदेशी  कर्जा लेकर गुजारा कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय  मुद्रा कोष  के अनुसार जून 2019 तक पाकिस्तान का विदेशी  कर्ज 103.4 अरब डॉलर तक पहंच जाएगा और इसका ब्याज चुकाना ही पाकिस्तान के लिए मुश्किल  हो जाएगा। 2009 से 2018 के बीच पाकिस्तान का विदेशी  कर्ज 50 फीसदी से भी ज्यादा बढा है। इस साल पाकिस्तान को अपनी जिम्मेदारियां पूृरी करने के लिए कम-से-कम 27 अरब डॉलर की दरकार है मगर पाकिस्तान की जो आर्थिक हालत है, इसके मद्देनजर  उसे सस्ता विदेषी कर्जा  मिलने से रहा। इन हालत में पाकिस्तान को महंगा कर्ज  लेना पडेगा और उसकी माली हालत महंगा कर्ज लेने के काबिल नहीं है। पाकिस्तान का भुगतान संतुलन पहले ही संकटग्रस्त है। इस समय उसके पास जितनी विदेशी  मुद्रा है, उससे वह मात्र दस सप्ताह तक आयात कर सकता है। मई में पाकिस्तान के पास लगभग 10 अरब डॉलर का विदेशी  मुद्रा भंडार है, पिछले साल मई में उसके पास करीब 16 अरब डॉलर विदेशी  मुद्रा थी। उसकी सबसे बडी समस्या बढता आयात और घटता निर्यात है। इससे व्यापार घाटा लगातार बढ रहा है। पिछले साल व्यापार घाटा 33 अरब डॉलर को पार कर चुका था। पिछले कुछ समय से विदेशों  में मौकरी कर रहे पाकिस्तानियों भी स्वदेश  कम   पैसे (रेमेंटेंसिस) भेज रहे हैं। पाकिस्तान प्रवासियों से लगभग एक अरब डॉलर की उम्मीद लगाए हुए हैं मगर रेमेंटेसिस काफी कम है। 60 अरब डॉलर की चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के निर्माण में लगी कंपनियों को पाकिस्तान को विदेशी  मुद्रा में भारी भुगतान करना पड रहा है। इससे भी पाकिस्तान के विदेशी  मुद्रा भंडार खाली हो रहा  है। इसके अलावा पाकिस्तान को आर्थिक गलियारे के लिए चीनी मशीनों  को भी खरीदना पड रहा है। इसमें भी काफी विदेशी  मुद्रा खर्च  हो रही है। अमेरिका ने आर्थिक मदद देनी बंद कर दी है। ताजा स्थिति में पाकिस्तान के पास चीन के आगे हाथ फैलाने के सिवा कोई चारा नहीं है। अगले कुछ दिनो में पाकिस्तान चीन से एक अरब से दो डॉलर का कर्जा ले सकता है। पाकिस्तान अब तक चीन से पांच अरब डॉलर का कर्जा ले चुका है। अप्रैल माह में ही पाकिस्तान ने चीन से एक अरब डॉलर का कर्जा लिया था। दरअसल, चीन अपनी आर्थिक गलियारा परियोजना को जारी रखने के लिए पाकिस्तान को कंगाली की कगार से बचाने को हर संभव कोशिश  कर रहा है । इसलिए पाकिस्तान को चीन से कर्जा  मिलने में कोई दिक्कत नहीं आएगी। इस साल जुलाई में पाकिस्तान में आम चुनाव होने के बाद अगली सरकार अंतरराष्ट्रीय  मुद्रा कोष  की शरण में जा सकती है। 2013 में भी पाकिस्तान ने संकट से उभरने के लिए अंतरराष्ट्रीय  मुद्रा कोष  से 6.7 अरब डॉलर की मदद ली थी। हालांकि पाकिस्तान की चीन पर आर्थिक निर्भरता बढ रही है मगर उसकी कर्ज  संबंधी जरुरतें इतनी ज्यादा है कि चीन भी इसे पूरी नहीं कर सकता। इन हालात में चीन को सउदी अरब की षरण में भी जाना पड सकता है। बहरहाल, सबसे बडा सवाल यह है कि उधार लेकर पाकिस्तान कब तक गुजारा करता रहेगा।