कुप्रबंध, घोर कुप्रबंध और “अत्याचारी“ कुप्रंबध। शिमला में पेयजल संकट से नागरिकों को पर जो अत्याचार हो रहा है, उसके लिए शब्द भी कम पड़ जाते हैं । शिमला नगर निगम के पूर्व डिप्टी मेयर के अनुसार राजधानी के लिए पांच स्त्रोतों -गुम्मा, अश्वनी खडड, सियोग, गिरी नदी और चुरट- से कुल मिलाकर हर रोज 68 मिलियन लीटर पानी की व्यवस्था है जबकि जरुरत 45 मिलियन लीटर की है। यानी राजधानी के बाशिदों की कुल जरुरत से लगभग डेढ गुना ज्यादा पानी। लीकेज के बावजूद भी शिमला को हर रोज 35 मिलियन लीटर पानी की सप्लाई हो रही है। यानी जरुरत से 10 मिलियन लीटर कम। यह कोई बहुत बडा संकट नहीं है और अगर जरुरतों पर थोडी लगाम लगाई जाए, तो पूरी आबादी को माकूल पीने का पानी मिल सकता है। मगर इसके बावजूद लोग पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे हैं। इस बार पेयजल समस्या इतनी गंभीर हो गई है कि लोगों को पर्यटकों से शिमला नहीं आने के लिए आग्रह करना पडा है। ऐसा पहली बार हुआ है मगर क्या किसी ने सुना है कि मंत्रियों, विधायकों, बडे अफसरों और रसूखदारों को भी पानी के लिए कतार में खडा होना पड रहा है़़? आखिर कहां जाता है इतना पानी? अगर कुछ पानी का बीच में रिसाव हो भी जाता है, तो भी शहर के लिए इतनी सप्लाई आ रही है कि हर परिवार को हर रोज पर्याप्त पानी मिल सकता है। जाहिर है उपलब्ध पेयजल की बंदरबांट ने व्यवस्था को बिगाड रखा है। रसूखदारों को पर्याप्त पानी मिल रहा है मगर सारी मुसीबतें तो आम आदमी के लिए है। पेयजल का संकट हो तो आम आदमी को झेलना पडता है। रसोई गैस की किल्लत हो तो आम आदमी और महंगाई हो तो भी आम आदमी और खाने-पीने की चीजों की किल्लत हो तो आम आदमी। आखिर यह सिला कब तक चलेगा? पीने का पानी हर आदमी की बुनियादी जरुरत है। और अगर लोगों की सरकार इस जरुरत को पूरा करने में असमर्थ रहे तो लोकतंत्र की प्रासंगिकता पर सवाल उठना स्व्भाविक है। इतिहास के पन्ने झांक कर देंखें। फिरंगियों के राज में कम-से-कम शिमला के लोगों को पीने के पानी की किल्लत से नहीं जूझना पडता था।
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