शनिवार, 26 मई 2018

Four Years Of Modi Govt: From "Acche To Bure Din"?

देेखते-देखते मोदी सरकार के चार साल निकल गए और आम आदमी “अच्छे दिन“ आने की उम्मीद में और उमर दराज हो गया। इस साल होने वाले चार राज्यों के विधानसभा चुनाव और अगले साल मई में लोक सभा चुनाव की गहमा-गहमी में एक और साल भी निकल जाएगा। तब तक  आए  रोज की  दिक्क्तों  से  आम आदमी का दम निकल  आएगा ।  लोगों के “अच्छे दिन“ लाने के वायदे पर सत्ता में आई भगवा पार्टी की सरकार के चार साल में आम आदमी  बेहाल है। इस साल फरवरी में पेश  बजट में मोदी सरकार ने आम आदमी के लिए पांच लाख का बीमा और कृषि  के लिए विशाल बजट की घोषणा की थी। बीमा योजना से 50 करोड लोगों को फायदा हो रहा है। बजट में किसानों को उनकी उपज का दो गुना दाम मुहैया कराने का वायदा भी किया गया। इस साल रोजगार परक योजनाएं चलाने का भी वायदा हो रखा है। मगर पेट्रोल-डीजल के उच्चतम दामों से इन सन घोशषओं की चमक फीकी पड गई है।  पेट्रोल और डीजल के दाम अब तक के उच्चतम स्तर पर है़। मोदी सरकार के सत्ता में आने से पहले जनवरी, 2014 को अंतरराष्ट्रीय  बाजार में कच्चे तेल की कीमत 112 डॉलर बैरल थी। दो साल के भीतर जनवरी, 2016 में कच्चे तेल की कीमतें 34 डॉलर तक गिर चुकी थीं। 90 फीसदी से अधिक तेल आयात करने वाले भारत के लिए तेल की कींमतों में भारी गिरावट बहुत बडी राहत थी। इस मामले में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार सौभाग्यशाली रही है। प्रधानमंत्री ने 2015 में एक चुनाव रैली के दौरान स्वीकार किया था “ मान लेते हैं मैं सौभाग्यशाली हूं। यदि मोदी की किस्मत से लोगों का फायदा हो रहा है, तो इससे ज्यादा सौभाग्य की क्या बात हो सकती है़“। मगर सच्चाई यह है कि मोदी सरकार ने लोगों को  “सौभाग्यशाली“ बनने से महरुम रखा। न्याय का तकाजा है कि जिस तरह सरकार कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय  कीमतें बढने पर पेट्रोल-डीजल के दाम फौरन बढा देती है, उसी तरह कीमतें गिरने पर, पेट्रोल-डीजल के दाम भी फौरन घटाए  जाने  चाहिए। मगर सरकार ने बिल्कुल ऐसा नहीं किया। जैसे-जैसे कच्चे तेल के दाम गिरते गए, मोदी सरकार अपाा खजाना भरती गई। सरकार ने इस दौरान 9 बार उत्पाद शुल्क बढाया और केवल एक बार अक्टूबर, 2016 में राहत दी।  एक अंतरराष्ट्रीय   एजेंसी का आकलन है कि पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद  शुल्क बढाकर सरकार ने  तीन गुना ज्यादा राजस्व कमाया है। उत्पाद  शुल्क बढाते समय सरकार ने लोगों से वायदा किया था कि जब भी पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढेंगी, सरकार उत्पाद  शुल्क में कटौती करके राहत दी जाएगी। अभी तक तो ऐसा नहीं हुआ है। इसके विपरीत पेट्रोल-डीजल को जीएसटी से बाहर रखकर लोगों को “लूटा“ गया है। निसंदेह, इस लूट में राज्य  भी शामिल हैं मगर केन्द्र और 21 राज्यो में राज करने वाली भगवा पार्टी अगर चाहती तो पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के तहत ला सकती थी। कहते हैं, चुनावी वायदों का क्या है़ ये  शेयर मार्केट में “वायदा कारोबार“ की तरह होते हैं जिसमें 99 फीसदी आम आदमी को नुकसान उठाना ही पडता है। मोदी सरकार भी “वायदा कारोबारी“ निकली।  वायदे पूरा करना तो दीगर रहा, उल्टे नोटबंदी करके लोगों को मुसीबत खडी कर दी। दुनिया में  शायद ही कोई ऐसा “जनहित“ फैसला होगा जिससे कतार में खडे-खडे 100 से ज्यादा लोगों को अपनी जान गंवानी पडी हो। मोदी सरकार की स्वच्छ छवि रही है मगर बैंक घोटालों ने इस पर भी छींटे डाले है। सरकार  भ्रष्टाचार  पर लगाम नहीं लगा पाई है और न ही काले धन की “ अवैध उपज“ को रोक पाई है। असहिशुण्ता  और कटटरपंथी चरम पर है। पूरी व्यवस्था आज भी  भ्रष्ट  है। बैंक से लेकर बिल्डर तक हर व्यक्ति उपभोक्ता को ठगने में आगे है। कानून इन ठगों का कुछ नहीं बिगाड सकता। सरकार को आम आदमी की मुसीबतों से कोई सरोकार नहीं है। रामराज्य है, “जय श्री राम“।