मौसम की मार, अमेरिका-ईरान वार और रुपया तार-तार। भारत में यह है “आज की ताजा खबर“। मौसम के मिजाज इन दिनों बिगडे हुए हैं और देश मई की भीषण गर्मी की बजाए, सुहाने मौसम का लुत्फ उठा रहा है। यह अपने आप में अनहोनी घटना है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का मिजाज भी मौसम की तरह बदलता रहता है। उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन से पंगा लेते-लेते उकताए गए तो चीन से व्यापार को लेकर दो-दो हाथ आजमा लिए और अब अमेरिका ईरान से उलझ गया है। ट्रंप ने मंगलवार को ईरान के साथ “बहुराष्ट्रीय “ परमाणु करार से अलग होने की ऐलान कर दिया है। लंबे समय से अमेरिका इस करार से अलग होने की धमकी दे रहा था। जुलाई, 2015 में विएना में अमेरिका, चीन, फ्रांस, रुस, ब्रिटेन और जर्मनी समेत 6 मुल्कों के साथ ईरान का परमाणु उपयोग पर समझौता हुआ था। डोनाल्ड ट्रंप शुरु से ही इसके मुखर विरोधी रहे हैं। राष्ट्रपति बनते ही वे इसे ध्वस्त करने में जुट गए। अमेरिका और पश्चिम के मुल्कों को शक है कि ईरान परमाणु बम बना रहा है। विएना करार के तहत अगर ईरान बम बनाता है, तो यह टूट सकता है। तेहरान के बार-बार स्पष्टीकरण के बावजूद अमेरिका और उसके मित्र देशों को ईरान पर विश्वास नहीं है। इस स्थिति में करार का टूटना तो तय था। वैसे भी दुनिया पर अपनी सैन्य और आर्थिक ताकत की धैंास जमाने वाला अमेरिका अपने सिवा किसी पर भरोसा नहीं करता है। इससे पहले जून, 2017 में ट्रंप महाशय का अमेरिका पेरिस जलवायु करार से भी अलग हो गया था। अपनी शर्तें मनवाकर दुनिया को उंगलियों पर नचाना अमेरिका की फितरत है। बहरहाल, ट्रंप की तरह इन दिनों डॉलर का भी जलवा भी बुलंदियों पर है। डॉलर की तुलना में इस समय भारतीय रुपया 15-माह के न्यूनतम स्तर पर है। आजादी के बाद से भारतीय मुद्रा रुपया कभी आर्थिक तो कभी सियासी हालात का शिकार होता रहा है। भारतीय मुद्रा रुपए की डॉलर के मुकाबले जो दुर्गति हो रही है, वह देष के सियासी कर्णधारों के “कर्मों का फल है“। आजादी के बाद 1947 में भारतीय रुपया डॉलर के बराबर था। तब देश पर कोई कर्ज नहीं था। 1975 में डालर 8 रुपए, 1985 में 12 रुपए था। 1991 में उदारीकरण के बाद अगले दस साल में रुपया डॉलर के मुकाबले 47.48 रुपया तक गिर चुका था। और अब साठ रुपए से नीचे आने का नाम नहीं ले रहा है। इसे संयोग कहा जाए या कमजोर आर्थिक नीति, रुपए ने सबसे निचला स्तर- एक डॉलर 68.80 रुपए के बराबर- 2016 में मोदी सरकार के राज में छुआ था। विपक्ष में रहते हुए भाजपा बराबर संप्रग सरकार और उसके अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह को कमजोर रुपए के लिए जी भर कोसती रही है। अब वही भाजपाई नेता रुपए की दुर्गति पर मौन साधे हुए हैं। संप्रग सरकार के समय तेल की कीमतें आसमान को छू रही थीं मगर मोदी सरकार के शासन में तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें अपेक्षाकृत काफी कम रही हैं। तेल की ऊंची कीमतें ही कमजोर भारतीय रुपए की प्रमुख वजह है। भारत दुनिया में सबसे बडा तेल आयात करने वाले मुल्क है और तेल की कीमतें डॉलर में चुकानी पडती है। भारत की 70 फीसदी विदेशी मुद्रा तेल आयात पर ही खर्च हो जाती है जबकि भारत का निर्यात न के बराबर। विदेशी मुद्रा निर्यात से ही कमाई जाती है। यह तो षुक्र है प्रवासी भारतीयों का कि उनकी कमाई से विदेशी मुद्रा भंडार भर रहा है। भारत दुनिया में प्रवासियों की आय (रेमिटनेस) कमाने वाला सबसे बडा देश है। दुनिया की कुल विदेषों से भेजी जाने वाली मुद्रा (रेमिटनेस) मेंसे 12 फीसदी भारत को भेजी जाती है। भारतीय रुपए को मजबूत करने के लिए भारत को निर्यात बढाना होगा और तेल का विकल्प खोजना होगा। इलेक्ट्रिक कारें पुख्ता विकल्प हो सकती हैं। चीन इसा मामले मैं हमसे कहीं आगे है ।
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