"पहाडों की रानी" शिमला में पेयजल के भीषण संकट ने इस साल फरवरी में दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन के संकट की याद तरोताजा कर दी है। नदी-नालों जैसे जल स्त्रोंतों से समृद्ध पहाडी इलाकों में भी अगर पेयजल संकट हो, तो मैदानी इलाकों की बदहाली का अनुमान लगाया जा सकता है। 2015 के भयंकर सूखे के बाद से केप टाउन में पेयजल के लिए त्राहि-त्राहि मची हुई थी और फरवरी 2018 आते-आते इस अफ्रीकी शहर में पानी की सप्लाई (डे जीरो) पूृरी तरह बंद हो चुकी थी। आपतकालीन हालात को देखते हुए केप टाउन के लोगों को पानी की खपत को 50 फीसदी तक कम करना पड रहा है और पीने के लिए बूंद-बूंद बचानी पड रही है। हालांकि शिमला का पेयजल संकट केप टाउन जैसा भीषण नहीं है, पर शिमला और पेयजल संकट से पीडित सभी शहरों, बस्तियों और ग्रामीण इलाकों को यही करना पडेगा। सभी को पीने के लिए माकूल पानी मुहैया हो, हर परिवार को पानी से जुडी जरुरतों को कम करना और रियूज और रिसाइकिल को आजमाना पडेगा। शिमला से केप टाउन तक जिस तरह से पीने के पानी के लिए मारी-मारी हो रही है, उससे इस आकलन को बल मिलता है कि तीसरा विष्व युद्ध “पीने के पानी के लिए लडा जाएगा“। जिस गति से पेयजल के स्त्रोत सूख रहे हैं और भूमिगत जल स्तर दोहन के स्तर से भी नीचे जा रहा है, उस हिसाब से 2025 तक दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी को पानी की बूंद-बूंद के लिए तरसना पडेगा। पानी की जरुरत सिर्फ पीने के लिए नहीं होती है, खेतों को सिंचने के लिए कहीं ज्यादा होती है। जैसे-जैसे नदी नालों में पानी कम होता जाएगा, पानी के लिए मारा-मारी बढेगी और नेशंस, स्टेट्स, लोकल बॉडीज, यहा तक कि गांव-गांव, घर-घर पानी के लिए:युद्ध“ जैसे हालात उत्पन्न हो जाएंगे। पंजाब, हरियाणा को पानी नहीं देना चाहता। कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को कर्नाटक और तमिल नाडु में सालों से “युद्ध“ छिडा हुआ है। गांव में अपने स्त्रोत से दूसरे को पानी ले जाने के लिए लठ्ठ चल पडते हैं। धरती पर 75 फीसदी पानी की मौजूदगी के बावजूद मात्र 3 फीसदी से भी कम ताजा पानी (फ्रेश वाटर) उपलब्ब्ध है। दुनिया में एक अरब आबादी को पीने का पानी उपलब्ध नही हे और 2.7 अरब आबादी को साल में एक माह पीने के पानी के लिए तरसना पडता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार विश्व के 500 बडे शहरों मेंसे हर चौथा शहर पीने के पानी की समस्या से जूझ रहा है। बीजिंग, बंगलुरु, लंदन, मास्को, काहिरा और जकार्ता समेत दुनिया के 11 बडे शहर केप टाउन की तरह जल्द ही पीने के पानी से महरुम हो जाएंगे। संयुक्त राष्ट्र का आकलन है कि 2030 तक पानी की मांग सप्लाई से 40 फीसदी ज्यादा हो जाएगी। बहरहाल, भारत में हर सरकार ने लोगों को पीने का पानी मुहैया कराने के लिए एक के बाद दूसरी स्कीम लागू की है। 1971 में पहली बार केन्द्र सरकार ने त्वरित ग्रामीण जल आपूर्ति कार्यक्रम ( एआरडब्ल्यूएसपी) की शुरुअात हुई थी। 1986 में केन्द्र ने पीने की पानी की गुणवता बढाने के लिए नेषनल ड्रिकिंग वाटर मिशन चलाया था। 1991 में इसका नाम बदल कर राजीव गांधी ड्रिकिंग वाटर मिशन रखा गया। 1999 में केन्द्र सरकार ने पेयजल परियोजनाओं में कम्युनिटी सहभागिता के लिए सेक्टर रिफॉर्म प्रोजेक्ट को लांच किया और फिर 2002 में इसका नाम “स्वजल धारा“ रखा गया। 2005 में शुरु की गई भारत निर्माण योजना में पेयजल कार्यक्रम को उच्च प्राथमिकता दी गई। 2009 में त्वरित ग्रामीण जल आपूर्ति योजना को बदल कर नेशनल ड्रिकिंग वाटर प्रोग्राम रखा गया। मोदी सरकार का पेयजल के साथ-साथ स्वच्छता (सेनीटेशन्) पर भी जोर रहा है, इसलिए अब पीने के पानी के अलवा स्वच्छता संबंधी परियोजनाए लागू की जा रही हैं। देश में इस समय 57,400 पेयजल परियोजनाएं चल रही है मगर लोग फिर भी प्यासे हैं।
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