स्विटजरलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का शरीक होना ही दर्शाता है कि समकालीन वैश्विक आर्थिक परवेश में इस मंच का कितना महत्व है। यद्यपि 1971 में इस मंच का गठन हो चुका था और स्विटजरलैंड के जेनेवा में इसका मुक्यालय है मगर 1991 में भूमंडलीकरण के बाद ही इस मंच का महत्व बढा है। विश्व आर्थिक मंच हो या होई अन्य अंतरराष्ट्रीय फोरम, दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र और तेजी से आगे बढते भारत को कहीं भी दरकिनार नही किया जा सकता। दुनिया के हर छोटे-बडे मंच पर भारत की चर्चा होती है। भारत में मौजुद अपार संभावनाओं को हर दश भुनाना चाहता है। भारत के प्रधानमंत्री का दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की 48वीं बैठक में शिरकत करने से इसका मह्त्व और ज्यादा बढ गया है। अब तक एक बार को छोड़कर कभी भी भारत के प्रधानमंत्री ने इस फोरम की बैठक मेंशिरकत नहीं की थी । इससे पहले 1997 में तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवगौडा ने इस फोरम की बैठक में शामिल हुए थे । फोरम में शिरकत करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि पूरी दुनिया जानती है कि वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम विश्व की आर्थिक पंचायत है। इस पंचायत में दुनिया की बडी-बडी आर्थिक हस्तियां इक्कठी होती हैं और इसमें भावी आर्थिक नीतियां और दिशा तय की जाती हैं। दुनिया के समक्ष इस समय जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद और गरीबी-भुखमरी सबसे बडी चुनौतियां हैं। आतंकवाद ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है। जलवायु परिवर्तन ने धरती पर जीवन को ही खतरे में डाल दिया है और अगर धरती पर जीवन ही नहीं रहेगा तो बाकी सारी बातें अप्रासंगिक हो जाती है। अपेक्षा के अनुरुप प्रधानमंत्री ने इन विषयों की दावोस में चर्चा की और मिलकर इनका सामना करने का आहवान किया। प्रधानमंत्री का भाषण वैसा ही था जैसे सामान्य तौर पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर होता है। मोदी के भाषण का निचोड यह था कि भारत सबसे मिलकर आगे बढना चाहता है और भारतीय संस्कृति का पूरी दुनिया से हमेशा विशेष जुडाव रहा है। प्रधानमंत्री ने ग्लोबल के नामी-गिरामी उधमियों और बिजनेस नेताओं को भारत आना का न्यौता भी दिया। प्रधानमंत्री के अनुसार भारत में “रेड टेप इज आउट, रेड कारपेट इज इन“। भारत में लालफीताशाही (रेड टेप) ने विदेशी षी निवेशकों को हमेशा षा ह्तोत्साहित किया है। मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही इसे जड से उखाडने का संकल्प ले रखा है मगर उसे कुछ हद तक सफलता भी मिली है। प्रधानमंत्री ने दावोस में नए और तकनीक उन्नत , युवा भारत को प्रस्तुत करने की हर संभव कशिश की। हालांकि दावोस जैसे मंचों पर कंपनियां निवेश के फैसले नहीं लेती और न ही फ्री ट्रेड इन्वेस्टमेंट (एफटीए) किए जाते हैं मगर इनमें इन बातों के लिए पृष्ठ्भूमि तैयार की जाती है। इस समय अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपियन यूनियन, क्नाडा के एपटीए प्रस्ताव विचाराधीन है। पूरी दुनिया इस समय भारत की ओर देख रही है। भारत की भूमंडलीकरण प्रतियोगिता और आर्थिक उदारीकरण में भी विशेष भूमिका रही है। पूरी दुनिया की इस बात पर नजर है कि भारत भूमंडलीकरण और आर्थिक उदारीकरण में और कितनी छलांग लगाने जा रहा है। दावोस में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मौजूदगी बहुत बडी बात थी। इसलिए, भारत से भूमंडलीकरण और उदारीकरण के नए दौर के घोषणा की उम्मीद की जा रही थी पर ऐसा नहीं हुआ। दावोस में भारत को अपनी उादारीकरण की छवि को निखारने का भी मौका था। इस समय दुनिया में जिस तरह से आर्थिक धु्रवीकरण हो रहा है, उसके दृष्टिगत दुनिया की नजर भारत पर है। सब जानना चाहते हैं कि भारत अमेरिका के साथ है या चीन के। यह भी स्पष्ट नहीं हो पाया है। इस साल दुनिया आर्थिक मंदी से उभर कर नए आर्थिक रिश्ते तलाशेगी । विश्व आर्थिक मंच में इस तरह का नजरिया स्पष्ट होना चाहिए।
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