दिल्ली में सतारूढ अरविंद केजरीवल की आम आदमी पार्टी अब “खास“ लोगों की पार्टी बन गई है। दिल्ली की तीन राज्यसभा सीटों के लिए आम आदमौ पार्टी ने जिन तीन लोगों को चुना है, उन मेंसे दो का पार्टी के सिद्धांतों , संघर्ष और राजनीतिक दर्शन से दूर-दूर तक का कोई सरोकार नहीं है। राज्यसभा टिकट आवंटन ने फिर जता दिया है कि अपने गठन के समय आम आदमी पार्टी ने राजनैतिक-सांगठनिक सुचिता और उच्च आदर्षों के जो संकल्प लिए थे, वे सब कबके ध्वस्त हो चुके हैं। टिकट पाने वाले एक सज्जन हाल ही तक कांग्रेस में थे और 2013 में कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव भी लडा था। पार्टी के वरिष्ठ नेता कुमार विश्वास को अरविंद केजरीवाल ने राज्यसभा भेजना मुनासिब नहीं समझा जबकि वे उनके सबसे पुराने साथी हैं। पार्टी के ही कई वरिष्ठ कार्यकर्ता राज्यसभा टिकट के दावेदार थे मगर केजरीवाल ने किसी को इस योग्य नहीं समझा। पार्टी के सीनियर नेता संजय सिंह को राज्यसभा का टिकट मिलना समझ में आता है मगर अपने पुराने सहयोगी कुमार विश्वास और आशुतोष को दर किनार कर दो “बाहरी“ व्यक्तियों को टिकट देकर अरविंद केजरीवाल ने तरह-तरह के कयासों को जन्म दिया है। एक कयास यह है कि राज्यसभा टिकट आवंटन में पार्टी के प्रति निष्ठा , योगदान और वरिष्ठता के अलावा लेन-देन ने भी अहम भूमिका निभाई है। जिन दो को राज्यसभा का टिकट दिया गया है, उनका पार्टी को खडा करने में कोई योगदान नहीं है। पार्टी के अंदर और बाहर से सवाल उठ रहे हैं कि राज्यसभा के टिकट देने में किस तरह के मानदंड अपनाए गए। पहली बार पार्टी संसद के उच्च सदन में अपनी उपस्थिति दर्ज करने जा रही है। इस मौके पर ऐसे व्यक्तियों को पार्टी का राज्यसभा टिकट थमा गया है, जिनका पार्टी के किसी भी संघर्ष अथवा अभियान में कोई योगदान नहीं रहा है। यह बात सब जानते हैं कि आम आदमी पार्टी में सिर्फ अरविंद केजरीवाल की ही चलती है। इस बात के दृष्टिगत जाहिर है टिकट का आवंटन केजरीवाल के कहने पर ही हुआ है। केजरीवाल के विरोधी उन पर संगीन आरोप लगा रहे हैं। टिकट आवंटन के तुरंत बाद से ही पार्टी को अपना बचाव करना पड रहा है। यह स्थिति और भी हास्यास्पद है कि केजरीवाल एंड कंपनी को राज्यसभा के लिए नामांकित व्यक्तियों के परिचय के बडे-बडे ब्योरे देने पड रहे हों। पार्टी ने अपने बचाव में यह दलील भी दी है कि राज्यसभा नामांकन के लिए नामी-गिरामी और काबिल लोगों से संपर्क साधा गया मगर कोई भी पार्टी का टिकट लेने के लिए राजी नहीं था। इसके यही मायने निकाले जा सकते हैं कि आम आदमी पार्टी में कोई काबिल है ही नहीं। न तो कुमार विश्वास और न ही पत्रकार से नेता बने आशुतोष । अगर ये दोनों अरविंद केजरीवाल की नजर में काबिल नहीं है, तो वे पार्टी में रहकर कर क्या रहे हैं़़? एक-एक करके केजरीवाल के आंदोलनकारी सहयोगी उनका साथ छोडते जा रहे हैं अथवा साथ छोडने के लिए विवश किए गए । सबसे पहले उनके मेंटर अन्ना हजारे ने केजरीवाल से किनारा कर लिया। फिर पार्टी के संस्थापक योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण और प्रो आनंद कुमार अलग हो गए। कपिल मिश्रा पहले से बागी बने हुए हैं और अब कुमार विश्वास अपमानित करके उन्हें भी अलग राह चलने पर विवश किया गया है। अपनी इस दशा पर कुमार विश्वास की ये पक्तियां उनका दर्द बयां करती है“ सबको लडने ही पडे अपने-अपने युद्ध, चाहे राजा राम हो चाहे गौतम बुद्ध; सबकी लडाईयां अकेली हैं, मैं अपनी लड रहा हूं, आप अपनी लड रहे हैं“। बहरहाल, लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक दल को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनाकर ज्यादा देर तक नही चलाया जा सकता। जनता को केजरीवाल से बहुत उम्मीदें थी। उन्होंने अवाम को बुरी तरह से निराश किया है।
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