1948 की फिल्म:“आजादी की राह पर“ का लोकप्रिय गीत “ विश्व विजयी तिरंगा प्यारा, झंडा ऊचा रहे हमारा; सदा शक्ति बरसाने वाला, प्रेम सुधा सरसानेेवाला, वीरों को हर्षानेवाला , मातृभूमि का तन-मन सारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा“। इस गीत को श्याम लाल गुप्त ने लिखा था। और तब यह गीत इतना लोकप्रिय हुआ था कि घर-घर में इसके बोल सुनाए देते थे। स्कूलों में बच्चों को आज भी यही गीत रटाया जाता है। तिरंगा हमारी राष्ट्रीय अस्मिता है, हमारी आन-बान और शान है। और इस तिरंगे में लिपटकर वीरगति प्राप्त करना स्वर्ग पा लेने जैसा है। तिरंगे के साथ ही राष्टगान का भी उतना ही महत्व है। राष्ट्रगान के बगैर तिरंगा फहराया जाना ठीक उसी तरह है जैसे आत्मा के बगैर बेजान शरीर । फिर इस राष्ट्रगान को लेकर किंतु-परंतु क्यों? सिनेमा थियटरों में तिरंगा फहराने ओर राष्ट्रगान पर भी ऐतराज। मदरसों में भी राष्ट्रगान का विरोध। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रगान पर अपना ही फैसला पलटते हुए सिनेमा घरों में इसकी अनिवार्यता को खत्म कर दिया। न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि सिनेमाघर स्वेच्छा से चाहें तो फिल्म दिखाने से पहले राष्ट्रगान प्ले कर सकते हैं मगर हर हाल में इसका सम्मान किया जाना चाहिए। इससे पहले 30 नवंबर, 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी सिनेमा घरों में फिल्म दिखाने से पहले राष्ट्रगान प्ले करना अनिवार्य कर दिया था। अदालत ने तब इसके किसी भी तरीके से प्रकाशन पर भी प्रतिबंध लगा दिया था। इस फैसले को सुनाने वाली पीठ के जज जस्टिस डीवाई चन्द्रचूड ने इसका इस बिला पर विरोध किया था कि सुप्रीम कोर्ट की यह व्यवस्था “मॉरल पुलिसिंग“ जैसा कदम है। योग्य न्यायाधीष का कहना था कि “क्या लोगों को अपनी देशभक्ति का प्रमाण छाती पर लटका कर देना पडेगा? अब हमारा अगला कदम यह होगा कि लोगों को सिनेमाघरों में टी-शर्ट और शॉर्ट्स पहनने पर भी प्रतिबंध लगाया जाए क्योंकि इससे राष्ट्रगान का अपमान होता है। सोमवार को केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अपने 30 नवंबर, 2016 के फैसले को रोकने का आग्रह किया था। संभवतय, अदालत ने देश का मूड भांप लिया था। भगवा पार्टी ने राष्ट्रगान तिरंगे और वंदेमातरम को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय अस्मिता का प्रश्न बनाकर वोट के लिए खूब भुनाया था। वैसे भी राष्ट्रगान भाजपा की जननी राश्ट्रीय स्वंय सेवक के सांस्कृतिक (कल्चर) राष्ट्रवाद का अहम हिस्सा है। मोदी सरकार का अपने ही फैसले से पीछे हटने की पृष्ठभूमि में गहन अर्थ निकाले जा रहे हैं। इस साल कर्नाटक, मध्य प्रदेश , राजस्थान और छतीसगढ समेत आठ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। कर्नाटक में भाजपा आरएसएस के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को बखूबी उछाल रही है और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इसके ब्रांड अबेंसडर हैं। गुजरात में योगी ने इस राष्ट्रवाद को खूब भुनाया था। जरुरत पडने पर भाजपा राष्ट्रगान के मुद्दे को फिर भुनाएगी। बहरहाल, राष्ट्रगान और तिरंगे को राजनीतिक हितों के लिए भुनाना न तो राष्ट्रवाद के हित में और न ही राष्टहित में। इससे देश की अखंडता को चुनौती मिल रही है। इससे अधिक मह्त्वपूर्ण मुददे तिरंगे और राष्ट्रगान के सम्मान से जुडे हैं। अक्सर सियासी नेता कई बार राष्ट्रगान का सम्मान करने में चूके जाते हैं। तिरंगे को गलत तरीके से फहराया जाता है और इसका अपमान किया जाता है। प्लास्टिक के झंडे बनाकर अच्छा-खासा मुनाफा कमाया जा रहा है। सरकार ने ताजा एडवाइजरी में राज्यों से प्लास्टिक झंडों के इस्तेमाल को अविलंब रोकने को कहा है। अक्सर लोग-बाग प्लास्टिक झंडे इधर-उधर फेंक कर तिरंगे का घोर अपमान करते हैं। 2002 में बनाए गए “फ्लैग कोड ऑफ“ इंडिया में स्पष्ट किया गया है कि तिरंगे को इस तरह से फेंकना अपराध है। राष्ट्रगान गाया जाए या नहीं, यह किसी पर थोपा नहीं जा सकता मगर तिरंगे का अपमान भी सहन नहीं किया जा सकता। जो लोग तिरंगे का सम्मान नहीं कर सकते, उन्हें इसे फहराने का भी कोई अधिकार नहीं है।
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