दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र भारत में हो क्या रहा है? क्या लिखा जाए, क्या खाया-पिया जाए, क्या पहना जाए और कैसी फिल्म बनाए जाए, यह सब समाज के कथित ठेकेदारों से पूछ कर किया जाना चाहिए। पूरी दुनिया में भारत की जगहंसाई हो रही है। पूछा जा रहा है अरे भाई, यह कैसा लोकतंत्र है? सच और केवल सत्य बो्लने वाले की दिन-दहाडे सरेआम हत्या कर दी जाती है। मनमर्जी से खाने-पीने वाले को जिंदा जलाया जाता है। गोरक्षा और राष्ट्रवाद के नाम पर कमजोर और असहायों को पिटा जाता है। ऐतिहासिक विषय पर फिल्म बनाने पर भी बवाल खडा किया जाता है और फिल्म की नायिका के नाक काटने की धमकी तक दी जाती है। और सबसे बडी त्रासदी यह है कि संबंधित राज्य की सरकार “राज धर्म“ निभाने की बजाए धमकाने वालों की पीठ थपथपाती है। आजादी के सात दशक के बाद का यह मंजर किसी इंटरनेट और उच्च प्रोद्योगिकी सपन्न सभ्य समाज का नहीं हो सकता, अलबत्ता पुरातन कबायली समाज जैसा लगता है। नामचीन संजय लीला भंसाली द्वारा निर्देशित फिल्म पद्मावत को लेकर पिछले कुछ समय से देश भर में जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है। राजपूतो के मान-सम्मान की “संरक्षक“ करणी सेना ने फिल्म की नायिका का नाक काटने से लेक पद्मावत फिल्म को सिनेमा घरों से उतारने की धमकी दे रखी है। और भाजपा शासित राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और मध्य प्रदेश ने करणी सेना के आगे नतमस्तक होते हुए इस फिल्म को रिलीज होने से पहले ही प्रतिबंधित कर दिया है। करणी सेना के विरोध के कारंण फिल्म एक दिसंबर को रिलीज नहीं हो पाई। करणी सेना के साथ-साथ भाजपा और हिंदूवादी संगठनों ने भी फिल्म में ऐतिहासिक घटनाओं से छेडछाड का आरोप लगाया है। वीरवार को सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म पर लगे सभी प्रतिबंध हटाते हुए इसे हरी झंडी दे दी । अब फिल्म देश भर में 25 जनवरी को रिलीज होगी। सुप्रीम कोर्ट ने इस फिल्म पर चार राज्यो द्वारा लगाए गए प्रतिबंध पर भी रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से चार राज्यों के “विवेकहीन“ फैसले पर भी सवाल उठाया गया है। कोर्ट में कहा गया कि सेंसर बोर्ड द्वारा फिल्म को रिलीज के लिए सर्टिफेकेशन दिए जाने के बाद किसी भी राज्य को इस पर प्रतिबंध लगाने का कोई अधिकार नहीं है। यह संघीय ढांचे का सरासर उल्लघंन है। फिल्म निर्माता के वकील ने इसे गंभीर मामला बताया। किस वर्ग विशेष की अहं तुष्टि के लिए राज्य की सरकारें संविधान की मूल भावना को नष्ट नहीं कर सकती। संविधान ने हर नागरिक को अपने खुले और सुपष्ट आचार-विचार रखने और देश के समक्ष लाने का पूरा अधिकार दे रखा है। किसी को फिल्म पसंद नहीं है, तो वह इसे न देखे मगर दूसरों को फिल्म देखने से रोकना कानूनन अपराध है। अगर किसी को इस फिल्म से दिक्कत है तो वह ट्रिब्यूनल से राहत की अपील कर सकता है। मगर राज्य फिल्म के सब्जेक्ट से छेडछाड नहीं कर सकते हैं। बहरहाल, शीर्ष अदालत के आदेश के बावजूद फिल्म का विरोध थम जाएगा, इस पर संदेह है। करणी सेना ने फिर धमकी दी है कि अब जनता इस फिल्म को चलने नहीं देगी। वीरवार को बिहार के मुजफ्फरपुर में करणी सेना के वर्कर्स ने सिनेमा घर में तोडफोड भी की। जिस तरह से भाजपा शासित कुछ राज्यों ने फिल्म को प्रतिबंधित करने में जल्दबाजी दिखाई है, उसके मद्देनजर लगता नहीं है कि फिल्म का विरोध सख्ती से रोका जाएगा। अगर सरकारी तंत्र ही अराजक तत्च का साथ दें, तो हो ली लोकतंत्र की रक्षा। सरकारी तंत्र में इच्छा शक्ति का अभाव और निहित “राजनीतिक स्वार्थ“ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में सबसे बडे अवरोधक हैं। मौजूदा माहौल में न केवल “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता“ पर गंभीर खतर मंडरा रहा है, बल्कि लोकतंत्र भी खतरे में है। सुप्रीम कोर्ट के चार सीनियर योग्य जज भी यह बात कह चुके हैं।
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