गुरुवार, 4 जनवरी 2018

कब खत्म होगा यह सिला

जात-पात, ऊंच-नीच और साम्प्रदायिकता की आड में  सियासी लोग अपने राजनीतिक हित साधने का कोई मौका नहीं चूकते हैं। इससे देश  और समाज को कितना नुकसान होता है, इसकी उन्हें जरा भी परवाह नहीं है। महाराष्ट्र  में दलितों और मराठों के बीच पिछले तीन दिन से जारी  जातीय संघर्ष  इसकी ताजा मिसाल है। इतिहास में  मराठों और दलितों के बीच किसी भी तरह के टकराव का कोई उल्लेख नहीं है। पहली बार महाराष्ट्र में मराठा और दलितों में किसी ऐतिहासिक घटना पर टकराव सामने आया है और यह देश  की अखंडता के लिए खतरनाक है। महाराष्ट्र  के कोरेगांव भीमा, पाबल और शिरकापुर से  शुरु हुई हिंसक झडपों की लपटों अब राज्य के अलावा दूसरे क्षेत्रों में भी पहुंच गई है। बुधवार को दलितों द्वारा आहुत महाराष्ट्र  बंद का व्यापक असर देखा गया। इस बंद का आहवान दलितों के महानायक डाक्टर भीमराव अंबेडकर के पौत्र प्रकाश  अंबेडकर ने किया था और करीब 250 दलित संगठनों ने इसका समर्थन किया था। दलित संगठनो की इतनी बडी संख्या राज्य में उनकी सक्रिय भागीदारी का सबूत है।  हिंसक संघर्ष   की  शुरुआत पहली जनवरी को 1818 के कोरेगांव भीमा में पेशवा बाजीराव पर ब्रिटिश  सैनिकों की जीत की 200वीं सालगिरह को लेकर हुई। दलित (महार समुदाय) एक जनवरी 1818 की ऐतिहासिक घटना की सालगिरह मना रहे थे। मराठों को महारों की यह हिमाकत गवारा नहीं गुजरी और इस पर दोनों पक्षों में हिंसक झडपें हो गई। दलितों को 1818 का मराठा बनाम ब्रिटिश  फौजियों के बीच का युद्ध उनकी अस्मिता का सवाल है तो मराठां को भी यही लगता है। इस युद्ध को हुए 200 साल हो गए हैं मगर इसकी पृष्ठभूमि  में आज भी जात-पात और ऊंच-नीच वाली मानसिकता काम कर रही है। 1881 के इस युद्ध में ब्रिटिश  फौज में महार भी लडे थे। महारों को तब भी अछूत माना जाता है और आज भी। 1 जनवरी, 1818 के ईस्ट इंडिया कंपनी की फौज, जिसमें ज्यादातर महार थे,  ने कोरेगांव भीमा के युद्ध में पेशवा बाजीराव द्धितीय को हराया था। इसी जीत की 200वीं सालगिरह को पुणे जिले के कोरेगांव भीमा में मनाया जा रहा था। महाराष्ट्र  के दलित इस घटना को दलित इतिहास का अहम हिस्सा मानते हैं। दलित इतिहास में इस बात का उल्लेख है कि किस तरह तब महारों को “अपवित्र“ और अछूत माना जाता था। महारों को चलते समय अपनी कमर में झाड लगाकर चलना पडता था ताकि  जहां-जहां भी  उनके कदम पडे झाड से  साफ होते रहें। इतना ही नहीं, महारों को थूकने के लिए अपने गले में एक बर्तन भी लटकाना पडता था ताकि स्वर्ण अपवित्र और अशुद्ध न हो पाएं। तब दलित स्वर्णों के कुएं अथवा पोखर से पानी लेने के बारे तो सोच भी नहीं सकते थे। दलितों का इतिहास इस तरह की अपमानित एवं अमानवीय घटनाओं से भरा पडा है। इतिहासकार यह भी कहते हैं कि दरअसल कोरेगांव भीमा के युद्ध में महारों ने मराठों को नहीं, अलबत्ता बाहृमणों को हराया था। तब  बाहृमणों ने दलितों पर जबरन छुआछूत थोपा था। दलितों ने  बाहृमणों से  छुआछूत को खत्म करने के लिए कहा मगर वे नहीं माने। इससे नाराज महार ईस्ट इंडिया कंपनी से मिलकर  बाहृमणों को सबक सिखाने चाहते थे।  बाहृमणों ने मराठों से पेशवाई भी छीनी थी। ईस्ट इंडिया कंपनी भी पेशवाई को खत्म करना चाहती थी और इसलिए महारों को बाहृमणों के खिलाफ खडा किया गया और फिरंगियों ने पेशवाई को खत्म करके ही छोडा। बाहृमण अगर छुआछूत खत्म कर देते तो शायद 1818 का युद्ध होता ही नहीं। बहरहाल, महाराष्ट्र  में मराठा और दलितों के बीच का टकराव भाजपा और शिव  सेना के लिए अशुभ है। दोनों ही समुदाय हिंदू हैं। महाराष्ट्र में दलितों की नुमाइंदगी करने वाली रिपब्लिकन पार्टी (आठवाले) मोदी सरकार के मंत्री है। जात-पात और ऊंच-नीच की राजनीति ने देश  को पहले ही खासा नुकसान पहुंचाया है। अब यह सिला बंद हो जाना चाहिए।