बुधवार, 17 जनवरी 2018

न्याय ही कसौटी पर

सुप्रीम कोर्ट के चार  वरिष्ठतम  जजों की बगावत की  चिंगारियां भले ही फिलहाल बुझा दी गईं हों मगर अभी तक मूल समस्या का कोई स्थाई समाधान सामने नहीं आया है। यह स्थिति बेहद दुखद है कि देश  में पहली बार खुद न्याय कसौटी पर है। मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश  जटिस दीपक मिश्रा की चार “बगावती“ जजों से मुलाकात के बाद दावा किया जा रहा है कि “मतभेद सुलझा लिए गए हैं और सब कुछ पहले जैसा हो गया है़“। इससे पहले सोमवार को खबर आई थी कि मुख्य न्यायाधीश  ने महत्वपूर्ण  मामलों की सुनवाई के लिए गठित संवैधानिक पीठ में चारों वरिष्ठतम जजों  को  शामिल नही किया है। सोमवार को जारी सूची में सात महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई करने वाली  संवैधानिक पीठ में एक भी “बगावती“  वरिष्ठ  जज नहीं है। काबिले गौर है कि भारत की न्यायिक व्यवस्था में सुप्रीम कोर्ट के सभी जज एक बराबर का दर्जा रखते हैं और चीफ जस्टिस “फर्स्ट अमंग इकवल्स“ हैं। मुख्य न्यायाधीश  केवल मात्र प्रशासनिक प्रभारी होते हैं मगर उन्हें  वरिष्ठतम जजों  को दरकिनार करने का भी अधिकार नहीं है। तथपि चीफ जस्टिस को किसी विशेष  मामले को किसी भी बेंच को आवंटित करने का अधिकार है। इस व्यवस्था में अब तक  वरिष्ठ  जजों को अधिमान दिए जाने की परंपरा रही है और मौजूदा मुख्य न्यायाधीश  से भी स्थापित परपंराओं और मर्यादाओं के अक्षरश  पालन की  उम्मीद की जाती है। मुख्य न्यायाधीश  के खिलाफ बगावत करने वाले चार जजों मेंसे जस्टिस रंजन गोगोई इस साल अक्टूबर में जस्टिस दीपक मिश्रा के रिटायर होने पर अगले मुख्य न्यायाधीश  हो सकते है। जस्टिस जे  चेलमेश्वर  मुख्य न्यायाधीश  मिश्रा के बाद दूसरे  वरिष्ठतम  जज हैं मगर वे इस साल जून में रिटायर हो जाएंगें। जस्टिस मदन बी लोकुर और कूरियन जोसेफ भी इस साल के अंत में रिटायर हो जाएंगें। मौजूदा जजों की सूची में जस्टिस डी वाई  चन्द्राचूड सबसे युवा हैं और वे नवंबर, 2024 में रिटायर होंगे। बहरहाल, वरिष्ठतम जजों  में मतभेदों की मूल वजह महत्वपूृर्ण मामलों के आवंटन को लेकर है। चार वरिष्ठतम जजों की शिकायत है कि मुख्य न्यायाधीश  महत्वपूर्ण मामलों को सुनवाई पंसदीदा जजों को आवंटित कर रहे हैं। इस मामले में जजों ने सोहराबुद्दीन शेख  की मौत की सुनवाई कर रहे जज लोया की रहस्यमय मौत के मामले की सुनवाई  का हवाला दिया है।  भाजपा अध्यक्ष अमित शाह  भी इस मामले में आरोपी है। लोया से पहले वाले जज ने अमित शाह  को सभी आरोपों से बरी कर दिया था। जज लोया की नागपुर में एक समारोह के दौरान दिल का दौरा पडने से मौत हो गई थी। लोया मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस अरुण मेहरा वरिष्ठता    में दसवें क्रम पर हैं और उनसे  वरिष्ठ जजों को  शिकायत है कि इस मामले में उनकी उपेक्षा की गई है। बहरहाल, मुख्य न्यायाधीश  और “बगावती“ जजों में सुलह-सफाई होने से मूल समस्या खत्म होने से रही। मूल समस्या मुख्य न्यायाधीश  की कार्यशैली को लेकर है। न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार चार सीटिंग जजों ने अपने वरिष्ठ  सहयोगी के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए हैं और देश  की  शीर्ष   अदालत की स्वत्रंतता और  निष्पक्षता  पर सवाल उठाते हुए इसे लोकतंत्र के लिए बडा खतरा बताया है। इस तरह के गंभीर आरोपों को सुलह-सफाई से निपटाकर मूल मुद्दे से पल्ला नहीं झाडा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर जज समेत चार पूर्व  जजों ने भी “बगावती“ जजों से सहमति जताते हुए विवादास्पद मुद्दों को “ न्यायिक व्यवस्था“ की भीतर सुलझाने की पैरवी की है। न्याय का तकाजा है कि योग्य एवं विद्धान न्यायाधीशों  द्वारा देश  के समक्ष उठाए गए मुद्दों के समाधान को भी  अवाम के समक्ष रखा जाना चाहिए। “ज्युडिशियल लॉकजा“ अपनी जगह सही मगर लोकतंत्र में न्यायपालिका को और अधिक पारदर्शी  बनाए जाने में कोई हर्ज नहीं है।