सोमवार, 8 जनवरी 2018

पारदर्शिता का आडंबर !

पारदर्शिता राजनीतिक फंडिंग को साफ-सुथरा और  पारदर्शी  बनाने  के लिए सरकार ने चुनावी बांडस जारी करने का महत्वपूर्ण फैसला उठाया है। मगर मोदी सरकार की इस पहल ने राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता  की बहस को और तल्ख कर दिया है।   मंगलवार (2 जनवरी) को सरकार ने चुनावी फंडस जारी करने की बाकायदा  अधिसूचना भी जारी कर दी । स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की 53 अधिसूचित  शाखाओं को एक हजार, दस हजार, एक लाख, दस लाख और एक करोड के बांडस जारी करने के लिए अधिकृत किया गया है। कोई भी व्यक्ति अपना केवाईसी (नॉ युअर कस्टमर) भरकर इन बांडस को खरीद सकता है और  राजनीतिक दलों को बतौर चंदा दे सकता है। चंदा निर्वाचन आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त उन राजनीतिक दलों को ही दिया जा सकता है  जिन्हे  पिछले लोकसभा अथवा विधानसभा चुनाव में कम-से-कम एक फीसदी वोट मिले हों। हर साल जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्टूबर में चुनावी बांडस जारी होंगे और इन्हें दस दिन तक खरीदा जा सकता है। बांडस जारी होने के 15 दिन के भीतर उन्हें अधिकृत शाखा में जमा करना होगा। अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो बांडस की राशि  प्रधानमंत्री राहत कोष  में चली जाएगी। वित्त मंत्री अरुण जेटली के मुताबिक इन बांडस से चुनावी चंदे में पारदर्शिता आएगी। चंदा देने वाली कंपनियां अपनी बैंलेंस शीट्स  में बताएगी उन्होंने कितने बांडस खरीदे। राजनीतिक दल निर्वाचन आयोग को चंदे में मिले बांडस का ब्यौरे  देंगे। यही इस योजना की  पारदर्शिता है।  मगर एक लोचा यह भी है कि खरीदार का नाम गुप्त रखा जाएगा। यह कैसी पारदर्शिता ? बांडस किसने खरीदे अगर यह जानकारी गुप्त रखी जाएगी, तो यह कैसे सुनिष्चित किया जाएगा कि काले धन से लेन-देन नहीं हुआ है। राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता  तभी आ सकती है जब चंदा देने वाले और लेने वाले दोनों के बारे सुस्पष्ट  जानकारी सामने आए। 2017-18 के बजट में वित्त मंत्री ने चुनावी बांडस लाने का ऐलान किया था। निर्वाचन आयुक्त ओपी रावत ने एसोसिएशन फॉर डेमोक्रटिक रिफॉर्म  के सम्मेलन में इस बात पर हैरानी व्यक्त की थी कि चुनाव और आयकर संबंधी नियमों ( फाइनेंस एक्ट-2017) में बदलाव करके सरकार ने चुनावी बांडस को निर्वाचन आयोग में दाखिल की जानी वाली कॉन्ट्रीब्यूशन रिपोर्ट के दायरे से बाहर रखा है। इससे पारदर्शिता कहां रह जाती है? निर्वाचन आयोग ने 26 मई, 2017 को  फाइनेंस एक्ट-2017 में चुनाव से जुडे नियमों को बदलने पर सरकार से अपनी सख्त नाराजगी जताई थी। चुनावी बांडस लाने के लिए सरकार ने फाइनेंस एक्ट 2017 के जरिए जन प्रतिनिधि एक्ट 1951, इंकम टैक्स एकट, 1961 और कंपनी एक्ट, 2013 में कुछ बदलाव किए थे। निर्वाचन आयोग को  जन प्रतिनिधि एक्ट 1951 में चुनावी बांडस को  कॉन्ट्रीब्यूशन रिपोर्ट  के दायरे से बाहर करने पर सख्त ऐतराज है। सरकार ने बडी चतुराई से राजनीतिक चंदे को निर्वाचन आयोग की निगरानी से बाहर कर दिया है। नियम बदलने से अब  राजनीतिक दलों को जन प्रतिनिधि कानून, 1951 के  सेक्शन  29 बी का उल्लंघन करके चंदा लेने पर भी  दोषी  नहीं माना जाएगा। अब तक निर्चाचन आयोग को इस सेक्शन  का उल्लंघन करने पर दोषियों को  दंडित करने का अधिकार था। निर्वाचन आयोग को कंपनी एक्ट 2013, में संशोधन पर भी ऐतराज है। मोदी सरकार ने राजनीतिक चंदे के लिए कंपनियों के 7.5 फीसदी प्रॉफिट वाले प्रावधान को भी हटा दिया है। इसका मतलब है कि अब फर्जी कंपनियां बनाकर काले धन को राजनीतिक चंदा देने के लिए आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है। निष्कर्ष  यह है कि सरकार का राजनीतिक फंडिंग को पारदर्षी बनाने का दावा खोखला है। सरकार के फैसले से अगर  देश  का निर्वाचन आयोग ही संतुष्ट  नहीं है, ऐसी पारदर्शिता  के कोई मतलब नहीं रह जाते हैं।