एक जमाना था जब क्रिकेट को पूरी तरह भद्रों (जैंटलमैन गेम) का खेल माना जाता था। समय के साथ-साथ सब कुछ बदल गया। क्रिकेट अब भद्रों का खेल नहीं रहा, अलबता उग्रता, “बदले की भावना“ और बाउंसर से विरोधी को छकाने का खेल बन कर रह गया है। हार-जीत, रैंकिग सुधार, पैसा, शोहरत एवं कूटनीति खेल भावना पर भारी पडती जा रही हैं। फिर भी कुछ ऐसे किस्से हैं जिनसे आज भी किक्रेट को “भद्र लोगों“ का खेल माना जा सकता है। 2011 में इग्लैंड और भारत टेस्ट सीरीज के दौरान एक पारी में इयान बेल ने गेंद को बांउड्री के बाहर भेजने के लिए शॉट लगाया और यह सोचकर वे दौडे ही नही। गेंद बीच में रोक दी गई और बेल रन आउट हो गए। भारत इस भारत श्रंृखला में बुरी तरह से हार रहा था मगर कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी ने बेल को वापस बुला लिया। धोनी इस तरह का रन आउट नहीं चाहते थे। धोनी ने कई बार ऐसी मिसालें पेश की हैं जिससे क्रिकेट में उनकी “भद्रता“ झलकती है। मगर मौजूदा भारतीय कप्तान विराट कोहली “मिस्टर कूल “ से एकदम विपरीत है। जब तक बल्लेबाज मामूली से “निक“ पर अंपायर की अंगुली उठने से पहले पैवलियन लौटते रहेंगे , क्रिकेट तब तक “भद्रों“ की गेम बनी रहेगी। बहरहाल, पाकिस्तान में क्रिकेट को “भद्रो“ की गेम नहीं माना जाता। और भारत और पाकिस्तान के बीच का क्रिकेट मैच तो कतई इस श्रेणी में नहीं आता है। दोनों देशों के बीच क्रिकेट मैच लगभग “युद्ध“ जैसे लगते हैं और ऐसे मैचों की दुनिया भर में सबसे ज्यादा देखा जाता है। मगर चैंपियन ट्राफी और वर्ल्ड कप के अलावा भारत और पाकिस्तान के बीच द्धिपक्षीय सीरीज पूरी तरह से बंद है। सोमवार को विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने फिर कहा कि जब तक पाकिस्तान आतंकियों को पालना-पोसना बंद नहीं करता, भारत और पाकिस्तान के बीच कोई भी श्रंृखला खेली नहीं जा सकती। पाकिस्तान आतंक को पालने से पल्ला झाड लेगा, इसकी निकट भविष्य में कोई संभावना नहीं दिखती है। इस बात के मद्देनजर भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट सीरीज की कोई संभावना नहीं बनती है। देश की सामरिक नीति के लिए भारत का यह स्टैंड भले ही तर्कसंगत हो मगर इससे क्रिकेट का सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है। खेल में किसी भी तरह की दीवार खडी करना अच्छा नहीं माना जाता। माना पाकिस्तान फितरती है और वह भारत को अस्थिर करने का कोई मौका नहीं चुकता पर इसमें क्रिकेट और खिलाडियों का क्या कसूर है ? भारत को इस मामले में उदार दृष्टिकोण अपनाने की जरुरत है। पाकिस्तान को आतंकियों को पालने-पोसने से रोकने के लिए क्रिकेट को बलि का बकरा बनाने की जरुरत नहीं है। पाकिस्तान को अगर “आतंकी राष्ट्र “ बनने से रोकना है तो उसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग करना होगा और ऐसा तब तक मुमकिन नहीं है, जब तक चीन इस्लामाबाद की पीठ थपथपाता रहेगा। भारत के लिए सुखद स्थिति यह है कि डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद पाकिस्तान पर अमेरिकी द्बाव बढा है। सोमवार को अमेरिका ने पाकिस्तान को 255 मिलियन डॉलर की मदद रोक दी। इससे पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने टवीट में पाकिस्तान पर अमेरिका को मूर्ख बनाने का आरोप लगाया। ट्रंप के अनुसार अमेरिका 15 साल में पाकिस्तान को 33 अरब डॉलर की मदद कर चुका है मगर इस्लामाबाद ने बदले में छल-कपट के सिवा कुछ नहीं दिया। अमेरिका इस बात पर बेहद खफा है कि पाकिस्तान समर्थित हक्कानी नेटवर्क अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों पर लगातार हमले कर रहा है। छल-कपट पाकिस्तान की फितरत है और भारत शुरु से यही कह रहा है। अमेरिका का ताजा फैसला भारत के स्टैंड पर मोहर लगा रहा है। लगता है अमेरिका पाकिस्तान से उब गया है । भारत के लिए यह अच्छी खबर है।
यह ब्लॉग खोजें
ब्लॉग आर्काइव
- अप्रैल (2)
- मार्च (1)
- सितंबर (2)
- अगस्त (2)
- जुलाई (3)
- जून (2)
- मई (2)
- अप्रैल (4)
- मार्च (9)
- फ़रवरी (7)
- जनवरी (6)
- दिसंबर (11)
- नवंबर (7)
- अक्टूबर (4)
- सितंबर (10)
- अगस्त (22)
- जुलाई (2)
- जून (11)
- मई (12)
- अप्रैल (7)
- मार्च (6)
- फ़रवरी (1)
- दिसंबर (5)
- नवंबर (4)
- अक्टूबर (5)
- सितंबर (17)
- अगस्त (33)
- जुलाई (28)
- जून (21)
- मई (30)
- अप्रैल (20)
- मार्च (20)
- फ़रवरी (23)
- जनवरी (23)
- दिसंबर (22)
- नवंबर (22)
- अक्टूबर (22)
- सितंबर (19)
- अगस्त (22)
- जुलाई (21)
- जून (19)
- मई (20)
- अप्रैल (19)
- मार्च (20)
- फ़रवरी (20)
- जनवरी (19)
- दिसंबर (22)
- नवंबर (21)
- अक्टूबर (21)
- सितंबर (21)
- अगस्त (16)
- जुलाई (15)
- जून (20)
- मई (18)
- अप्रैल (21)
- मार्च (20)
- फ़रवरी (21)
- जनवरी (24)
- दिसंबर (25)
- नवंबर (27)
- अक्टूबर (23)
- सितंबर (27)
- अगस्त (35)
- जुलाई (22)
Copyright 2015 | Chander M Sharma . Blogger द्वारा संचालित.






