मंगलवार, 23 जनवरी 2018

“लातों के भूत बातों से नहीं मानते“

सीमा पर पिछले कुछ दिनों से  पाकिस्तान की तरफ से लगातार जारी गोलीबारी से क्षुब्ध अवाम फिर मांग कर रहा है कि अब समय आ गया है कि “फितरती पडोसी“ को आए-रोज की भडकऊ हरकतों के लिए सबक सिखाया जाए।  पिछले एक सप्ताह के दौरान गोलीबारी में 12 जवान षहीद हो चुके हैं और 60 से ज्यादा घायल हुए हैं। 2017 में पाकिस्तान ने कुल मिलाकर 730 से ज्यादा सीजफायर तोडे और इनमें 67 सैनिक और 79 नागरिक मारे गए। 2001 से अब तक सीजफायर उल्लघंन के मामलों में 4675 भारतीय सैनिक मारे जा चुके हैं। पाकिस्तान के 5,000 से ज्यादा सैनिक मारे गए हैं। सामान्य स्थिति (पीस टाइम) के दौरान सैनिकों की यह शहादत बहुत ज्यादा है। बहुत पुराना जुमला है कि “लातों के भूत बातों से नहीं मानते“। पाकिस्तान को दोस्ती और अच्छे पडोसी की भाषा  समझ नहीं आती है। 1971 का शिमला समझौता भी देख लिया और 2003 का सीजफायर एग्रीमेंट भी। पाकिस्तान ने न तो  शिमला समझौते की भावना का सम्मान किया और न ही 2003 के सीजफायर एग्रीमेंट को माना। पाकिस्तान के साथ बडे से बडा समझौता कर लिया जाए मगर वह भारत को अस्थिर करने से बाज नहीं  आएगा। भाजपा विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस को पाकिस्तान के साथ सख्ती नहीं बरतने के लिए जी भर कर कोसा करती थी और सत्ता में आने पर इस्लामाबाद को ताउम्र का सबक सिखाने का दम भरती थी। भाजपा को सत्ता में आए साढे तीन साल से ज्यादा का समय हो गया है मगर सिवा एक सर्जिक्ल स्ट्राइक के और कोई कार्रवाई नहीं हुई है। माना मोदी सरकार आतंक के मुद्दे पर दुनिया में पाकिस्तान की कलई खोलने और उसे अलग-थलग करने में काफी हद तक सफल हुई है। यह भी माना कि भारत से दोस्ती निभाने के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान को उदार आर्थिक मदद देनी बंद कर दी है और उस पर हाफिज सईद जैसे आतंकी सरगना की गिरफ्तारी के लिए दबाव डाला है मगर इससे न तो पाकिस्तान का आतंकियो को पालने-पोसना बंद हुआ है और न ही  कश्मीर  में अमन-चैन बहाल हो पाया है। इसके विपरीत,  कश्मीर  में हालात बिगडते जा रहे हैं। जम्मू-कश्मीर  में भाजपा की सहयोगी पार्टी पीडीपी और मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी कहना शुरु कर दिया है कि भारत और पाकिस्तान के बीच की लडाई में  कश्मीर  “हलाल“ हो रहा है।   सच कहा जाए तो 1971 के बाद पाकिस्तान को सबक सिखाने की कोई बडी कार्रवाई नहीं हुई है। हां, 1999 के “कारगिल युद्ध“ (ऑपरेशन विजय) ने पाकिस्तान समर्थक आतंकियों को जरुर खदेडा था। अगर यह युद्ध ज्यादा देर चलता तो इसके परमाणु युद्ध में बदलने का खतरा था। पाकिस्तान के पूर्व  राष्ट्रपति   और तत्कालीन सेनाध्यक्ष  जनरल परवेज मुषर्रफ ने हाल ही में स्वीकारा था कि अगर युद्ध ज्यादा समय तक खींचता पाकिस्तान न्युक्लियर  अस्त्र-शस्त्र का इस्तेमाल कर सकता था। यह स्थिति दोनों  मुल्कों   के लिए बेहद खतरनाक साबित होती। यही खतरा आज भी बना हुआ है। पाकिस्तान, भारत से कन्वेशनल युद्ध में जीत नहीं सकता मगर परमाणु युद्ध में वह भारत से मुकबाला कर सकता है। दोनों देशों  के पास लगभग बराबरी के परमाणु हथियार हैं। समकालीन वैश्विक  हालात में दो परमाणु सपन्न देशोँ  में युद्ध पूरे विश्व   मे तबाही ला सकता है। सभी परमाणु हथियार सपन्न देश  इस हकीकत को बखूबी जानते है। यही कारण है कि भारी तनाव और धमकी-दर-धमकी के बावजूद उत्तर और दक्षिण कोरिया द्धिपक्षीय वार्ता के लिए राजी हुए हैं। बहरहाल, पाकिस्तान को सबक सिखाना बनता है। लंबे समय से सीमा पर पाकिस्तान से 1971 जैसा लोे-इंटेन्सिटी वार लडा जा रहा है। इससे भारत को ज्यादा  नुक़सान   हो रहा है।  बहरहाल, पाकिस्तान को सबक सिखाना बनता है।   इसे किस रुप में अमल में लाया जाए, यह सोचना सरकार और रक्षा विषेशज्ञों का काम है।