स्विटरजलैंड के दावोस में विश्व आर्थिक मंच (वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम) की बैेठक में जहां भारत की तूती बोल रही है, वही सोमवार को फोरम द्वारा जारी इनक्लूसिव डेवलपमेंट इंडेक्स में देश की दो पायदान की गिरावट चिंताजनक है। और इससे भी ज्यादा शर्मनाक बात यह है कि भारत इनक्लूसिव डेवलपमेंट के मामले में पाकिस्तान से भी पिछड गया है। चीन भी भारत से आगे है। दुनिया की 74 उभरती अर्थव्यवस्थाओं में भारत इस बार 62 पायदान पर है। पाकिस्तान की रैंकिंग में पांच पायदान का सुधार आया है। पिछले साल भारत 60वें पायदान पर था। यानी भारत इनक्लूसिव डेवलपमेंट के मामले में निचले पायदान पर है। इसके बावजूद हम कह रहे हैं कि भारत तेजी से बढती अर्थव्यवस्था है और उसका ग्रोथ रेट चीन से भी ज्यादा है। दावोस में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंगलवार को दुनिया को भारत की तीव्र ग्रोथ का पाठ भी पढाया। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के चेयरमैन क्लॉस स्वॉप ने भारतीय “वसुधैव कुटुबकम“ दर्शन की प्रशंसा करते हुए कहा कि इसकी अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को सुलझाने में अहम भूमिका रही है। इस बीच, ग्लोबल कंसल्टेंसी कंपनी पीडब्ल्यूसी की ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत निवेश के लिए दुनिया में पांचवा आकर्षक डेस्टीनेशन है मगर इस मामले में भी वह चीन से पीछे है। चीन दूसरे स्थान पर है। ये सब बातें सुनने-कहने में तो अच्छी लगती है मगर जमीनी सच्चाई यह है कि आर्थिक विकास के तब तक कोई मायने नहीं जब तक इसके हर प्रतिभागी को समान अवसर न मिले। और इसीलिए समकालीन वैश्विक परिवेश में समावेशी विकास (इनक्लूसिव डेवलपमेंट) ही आर्थिक उन्नति और प्रगति का सटीक पैमाना माना जा रहा है। इनक्लूसिव ग्रोथ की अवधारणा में सभी आर्थिक प्रतिभागियों को बराबर का अवसर मिलता है। इसमें रोजगार सृजन पर विशेष जोर दिया जाता है। आर्थिक समानता को दूर करने के लिए जरुरी है कि अर्थव्यवस्था के हर हाथ को पर्याप्त काम मिले। बढती आर्थिक असमानता और संससाधनों की बंदरबांट से भारत ही नहीं, पूरी दुनिया चिंतित तो है मगर इसे दूर करने में बराबर विफल रही है। आजादी के सात दशक बाद भी भारत में अमीर और ज्यादा अमीर और गरीब पहले से भी अधिक गरीबतम हुआ है। सोमवार को अंतरराष्ट्रीय स्वंयसेवी एजेंसी आक्सफैम की सालाना रिपोर्ट में बताया गया है कि 2017 में जितनी भी संपत्ति अर्जित की गई, उसका 73 फीसदी अथवा पांच लाख करोड मात्र एक फीसदी अमीरों के पास चला गया। इन एक फीसदी अमीरों की संपत्ति पिछले साल 25 फीसदी बढकर 21 लाख करोड रु हो गई। पिछले ही साल 67 करोड भारतीयों की संपति में महज एक फीसदी का इजाफा हुआ। देश की कुल संपति का 59 फीसदी हिस्सा एक फीसदी अमीरों और 80 फीसदी हिस्सा 10 फीसदी अमीरों के पास है। भारत में आर्थिक असमानता का आलम यह है कि गॉवं में एक कामगार पचास साल में भी जितना नहीं कमाता, किसी बडी कंपनी का प्रबंधक 15 दिन में उससे ज्यादा कमा लेता है। किसानों का हाल यह है कि उन्हें गुजर-बसर करना भी दुर्भर हो रहा है। देश के कुल 9 करोड कृषक परिवारों का 70 फीसदी हर माह अपनी आय से ज्यादा खर्च करता है और इसके लिए वह कर्ज-दर-कर्ज लेता है। लगभग साढे छह करोड़ किसानों के पास तो एक हेक्टेयर से भी कम जमीन है। नतीजतन, किसान कर्ज के मकडजाल में फंसकर आत्महत्या पर विवष हो रहा है। आर्थिक असमानता भ्रश्टाचार को ही बढावा देती है। दुनिया के गरीब मुल्कों में अमीर मुल्कों की तुलना में कहीं ज्यादा भ्रष्टाचार है। आजादी के 70 साल बाद भी भारत में 20 फीसदी से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रही है। ऐसा विकास किस काम का ?
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