दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को निर्वाचन आयोग से जबरदस्त झटका लगा है। मुख्य चुनाव आयुक्त ने राष्ट्रपति से पार्टी के 20 विधायकों को “लाभकारी पदों“ (ऑफिस ऑफ प्रॉफिट) पर बने रहने के लिए अयोग्य करार देने की सिफारिश की है। निर्वाचन आयोग की सिफारिश पर राष्ट्रपति की मुहर लगते ही विधानसभा की 20 सीटों पर फिर से चुनाव कराने पडेंगे। 20 सीटों के खाली होने के बावजूद सत्तारूढ आम आदमी पार्टी की सरकार अस्थिर नहीं होगी। 70-सीटों की विधानसभा में आम आदमी पार्टी के 66 विधायक हैं और 20 विधायक अयोग्य घोषित होने के बाद भी पार्टी के पास 46 विधायकों का प्रचंड बहुमत बना रहेगा। 2015 में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 21 विधायकों को संसदीय सचिव के पदों से नवाजा था। तब केजरीवाल ने “संसदीय सचिव“ पद को लाभ के पद से बाहर रखने का कानून भी बनाया था मगर इसे उप-राज्यपाल की स्वीकृति नहीं मिल पाई। बाद में इन मेंसे विधायक जनरेल सिंह ने पंजाब में पार्टी टिकट पर विधानसभा चुनाव लडने के लिए अपने पद और सद्स्यता छोड दी थी। इसलिए अब 21 की जगह 20 विधायकों को अयोग्य ठहराया गया है। इससे पहले निर्वाचन आयोग आप विधायको की याचिका भी नामंजूर कर चुका है। आप के 21 विधायकों ने आयोग से अपील की थी क्योंकि उनके पास कोई “ऑफिस ऑफ प्रॉफिट“ नहीं है, लिहाजा उन पर कोई चार्ज नहीं बनता है। आप के विधायकों ने इस मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय में भी याचिका दायर की थी मगर अदालत ने इन नियुक्तियों पर उप-राज्यपाल की अनुमति नहीं होने से इसे अस्वीकार कर दिया था। दिल्ली में सरकार के हर फैसले पर उप-राज्यपाल की स्वीकृति अनिवार्य है। आम आदमी पार्टी ने निर्वाचन आयोग के फैसले पर मुख्य चुनाव आयुक्त पर ही सवाल उठाया है। आप के विधायक सौरभ भारद्धाज का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने अचल कुमार ज्योति ने प्रधानमंत्री का कर्ज चुकाया है। वे 23 जनवरी को रिटायर हो रहे हैं। ज्योति प्रधानमंत्री के काफी करीब है। जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, ज्योति तीन साल तक गुजरात के मुख्य सचिव थे। 2013 में रिटायर होने पर मोदी ने ज्योति को राज्य सतर्कता आयुक्त बनाया था। 2015 में मोदी सरकार ने ज्योति को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया था। जून 2017 में ज्योति मुख्य चुनाव आयुक्त बनाए गए थे। बहरहाल, हमेशा की तरह केजरीवाल एंड कंपनी को आम आदमी पार्टी के खिलाफ हर छोटे-बडे फैसले में प्रधानमंत्री मोदी का हाथ नजर आता है। मगर सत्य को छिपाया नहीं जा सकता। देश में इमानदार, साफ-सुथरी और औरों से अलग राजनीति का दावा करने वाले अरविंद केजरीवाल ने सत्ता में आने के बाद वही सब कुछ किया जो आज तक कांग्रेस और भाजपा करती रही है। देश की न्यायपालिका कई बार यह व्यवस्था दे चुकी है कि मंत्रिमंडल का आकार संविधान सम्मत होना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत मंत्रिमंडल का आकार सदन (हाउस) की कुल संख्या की 15 फीसदी से अधिक नहीं हो सकती। यह कानून 2004 में बनाया गया था। इससे पहले मंत्रिमंडल आकार की कोई सीमा नहीं थी और अक्सर दैत्य आकार के मंत्रिमंडल हुआ करते थे। इस कानून के बाद इसका तोड निकालने के लिए राजनीतिक दलों ने मुख्य संसदीय सचिव अथवा संसदीय सचिव बनाने का रास्ता निकाला है। मगर ये पद पूरी तरह से असंवैधानिक है। केजरीवाल और आम आदमी पार्टी लाख स्पष्टीकरण दें मगर सच्चाई यह है कि 21 विधायकों को संसदीय सचिव बनाकर पार्टी ने “ पद लोलुपता“ और “सत्ता की भूख“ का नंगा प्रदर्शन किया है। फिर आम आदमी पार्टी और अन्य “सत्ता लोलुप“ राजनीतिक दलों में क्या फर्क रह जाता है और जनता असली की जगह मुखोटों को क्यों चुने? आम आदमी पार्टी ने दिल्ली के बाद अन्य राज्यों में मिली चुनावी हार से भी कोई सबक नहीं सीखा है
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