मंगलवार, 2 जनवरी 2018

2018 की चुनौतियां

जो गुजर गया सो बीत गया, आने वाले कल की चिंता करें तो भविष्य  सुखद रहेगा, बडे-बुजुर्गों की यह सीख हमें नए साल की नई चुनौतियों और संकल्पों का सामना करने की प्रेरणा देती है। पुरानी गलतियों से सबक लेते हुए, नए संकल्पों को बगैर किसी बाधा के पूरा किया जा सकता है। और सफलता का यही मूल मंत्र है। दस साल पहले 2008 में पूरी दुनिया को मंदी ने जकड लिया था और वह भी ऐसी कि रुस और ब्राजील जैसी तेजी से बढती अर्थव्यवस्थाएं आज तक इससे उभर नही पाई है। दुखद स्थिति यह है कि दुनिया ने इससे कोई सबक नहीं सीखा है और आज भी मानवीय सरोकारों को प्राथमिकत देने की बजाए, अधिकतर देश  आतंक, हिंसा और यु्द्ध विभीषका  पर अपने संसाधन और समय जाया कर रहे हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था के मजबूत फंडामेंटल्स ने हालांकि मंदी का असर ज्यादा देर तक रहने नहीं दिया मगर पिछले दस साल में इसके फिर से लौटने की आशंका बराबर बनी रही। 2017 की पहली छमाही  में नोटबंदी से यह और बलवित हुई पर दूसरी छमाही में अर्थव्यवस्था ने गति पकड ली थी। अब अंतरराष्ट्रीय  एजेंसियों का  आकलन है कि साल 2018 में ग्रोथ और रफ्तार पकडेगी। नोटबंदी का असर पूरी तरह से खत्म हो चुका है और गुडस एंड सर्विसिस टैक्स (जीएसटी)  भी काफी हद तक स्थापित हो चुका है। अच्छी खबर यह है कि 2018 में वैश्विक  ग्रोथ भी रफ्तार पकडेगी और  वैश्विक  जीडीपी 4 फीसदी की दर से बढेगी। 2017 में यह 3.7 फीसदी थी। अमेरिकी राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप ने अब तक के सबस बडे कर सुधार को लागू करके ग्लोबल इकॉनमी को नई गति प्रदान की है। कॉर्पोरेट टैक्स में 14 फीसदी की कटौती से अमेरिका में निवेश  बढेगा और अर्थव्यवस्था में और ज्यादा पैसा आएगा। अमेरिकी आर्थिक नीतियों का पूरी दिनिया  अर्थव्यवस्था पर हमेषा व्यापक असर पडता है। कहते हैं कि अगर अमेरिका को छींक भी आती है, पूरी  दुनिया  को जुकाम हो जाता है।  अमेरिका के अलावा दुनिया के दूसरी बडी अर्थव्यवस्था चीन ने भी आज (पहली जनवरी) से विदेशी  कंपनियों को टैक्स  में  छूट देने की घोषणा की है। इससे भी इस मुल्क में निवेश  बढेगा और ग्रोथ को गति मिलेगी।  कच्चे तेल की बढती कीमतें चिंताजनक हो सकती हैं मगर विशेषज्ञों   का आकलन है कि कीमतें 60 से 70 डॉलर प्रति बैरल के बीच स्थिर रहेगी। वैसे भी दुनिया इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर तेजी से अग्रसर हो रहा है और साल 2018 इस दिशा   में क्रांतिकारी बदलाव लाने जा रहा है। 2018 को  इलेक्ट्रिक कार का साल माना जा रहा है। अमेरिका में अभी कुल ऑटो सेल्स का  इलेक्ट्रिक कार का हिस्सा मात्र 1.5 फीसदी है मगर 2018 में स्थिति एकदम बदल जाएगी। बडी कंपनिया नए-नए मॉडल लाकर पेट्रोल-डीजल वाहनों के समक्ष कडी चुनौती पेश  कर रही हैं। भारत में भी  इलेक्ट्रिक वाहनों के प्रति मोह बढता जा रहा है। 2018 में भारत इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए मजबूत इंफरास्ट्रक्चर तैयार करने की ओर अग्रसर है। दस जनवरी भारत के लिए खास रहेगा। इसरो इस दिन एक साथ 31 उपग्रहों का एक साथ प्रक्षेपण करेगा। स्टॉक मार्केट इस साल नई बुलंदियां को छू सकता है मगर सरकार का बढता राजस्व घाटा और निर्यात एवं   कृषि सेक्टर की सुस्त चाल कुछ अवरोधक खडे कर सकती है। और भी कई ऐसी बातें जो 2018 में हमे निराश  कर सकती  हैं। मोदी सरकार का “ स्मार्ट सिटी“ मिशन तीन साल बाद भी  शिथिल पडा हुआ है। सरकार  दस हजार करोड (9860) मेंसे अब तक मात्र 7 फीसदी ही खर्च कर पाई है। गंगा स्वच्छता योजना पर भी धीमी गति से काम हो रहा है जबकि प्रधानमंत्री ने इसे उच्च प्राथमिकता दे रखी है। इन मामलों से यही संदेश  मिलता है कि नौकरशाही और लालफीताशाही अभी भी चरम पर है और प्रगति को  गति देने  की  बजाए इसे  रोकने में ज्यादा सहायक है।