सोमवार, 15 जनवरी 2018

न्यायपालिका में “सुनामी“

पिछले शुक्रवार को देश  की न्यायपालिका के इतिहास में कुछ ऐसा हुआ आज तक कहीं भी नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट  के चार सीनियर जजों के आरोपों से  देश  में जैसे सुनामी आ गई है। देश  इस अभूतपूर्व घटना से स्तब्ध और चिंतित है।  सीनियरों जजों ने बाकायदा पत्रकार सम्मलेन बुलाकर भारत के मुख्य न्यायाधीश  जस्टिस दीपक मिश्रा की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट  को बचाया नहीं गया तो लोकतंत्र जिंदा नहीं रह पाएगा। सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठता   में दूसरे क्रम के जज जस्टिस जे चेलमेश्वर  ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक  न्यायपालिका ही स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है। जाहिर है देश  के चार वरिष्ठ  जज अवाम को संदेश  देना चाहते हैं कि न्यायपालिका में सब ठीकठाक नहीं है और  न ही न्यायपालिका निष्पक्ष  रह गई है। पहली बार सुप्रीम कोर्ट के जजों ने देष के मुख्य न्यायाधीश  का मीडिया ट्रायल किया है। जस्टिस चेलमेश्वर  के अलावा जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ भी पत्रकार सम्मेलन में मौजूद थे।  देश  की न्यायपालिका के लिए यह बहुत ही गंभीर मामला है। यह “ज्यूडिशियल लॉकजॉ“ का खुलमखुला उल्लंघन है। भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि देश  के मुख्य न्यायाधीश  के खिलाफ उनके ही सहयोगियों ने सार्वजनिक तौर पर बगावत की हो। सामान्य स्थिति में निचली अदालत के न्यायाधीश  की कार्यशैली पर सवाल उठाए जाने पर भी संबंधित व्यक्ति को अदालत की अवमानना में दंडित किया जाता है। अब सवाल यह है कि क्या सुप्रीम कोर्ट अपने चार सीनियर जजों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई करेगा? अपना पक्ष रखने के लिए मीडिया के सामने आने के सवाल पर जस्टिस  चेलमेश्वर  ने  स्स्पष्टीकरण दिया कि उनके सारे प्रयास बेकार हो जाने के बाद ही उन्हें यह कदम उठाने पर विवश  होना पडा। जस्टिस  चेलमेश्वर  के अनुसार पत्रकार सम्मेलन बुलाने से पहले आज सुबह ही चारों जजों ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा से मुलाकात की थी और उनसे विवादस्पद मुद्दे  सुलझाने का आग्रह किया मगर बात नहीं बनी। उनके पास देश  के समक्ष अपना पक्ष रखने के अलावा और कोई भी विकल्प नहीं बचा था। और जिन मुद्दों पर वरिष्ठ  सहयोगियों और मुख्य न्यायाधीश  के बीच गंभीर मतभेद हैं, उनमे   पंसदीदा जजों को महत्वपूर्ण  मामले सौंपना, नियमों की अनदेखी और मामले को अदालत से वापस बुला लेना शामिल हैं। बहरहाल, देश  के चार सीनियर जजों ने देश  के मुख्य न्यायाधीश  का ओपन मीडिया ट्रायल करके न्यायपालिका की  विश्वसनीयता  पर कडा प्रहार किया है। अब तक अवाम न्यायपालिका पर आंख मूंद कर भरोसा करती है। पर अगर सुप्रीम कोर्ट  के सीनियर जजों को भी न्यायपालिका की  निष्पक्षता    और स्वतंत्रता पर  विश्वास   न हो और वे सार्वजनिक तौर पर अपनी हताशा  को जाहिर करें, तो कौन भरोसा करेगा न्यायपालिका पर। “ज्यूडिशियल  लॉकजॉ“ न्यायपालिका की आचार संहिता का अंतरंग हिस्सा होता है और इसका हर हाल में सम्मान किया जाना चाहिए।  भारत में न्यायपालिका अब तक बडी शिद्दत से इसका पालन करती रही है।  अमेरिका के जाने-मान न्यायविद जस्टिस फेलिक्स फ्रैंकफॉटर ने लगभग सात दशक पहले 1948 में कहा था,“ न्यायालय  के फैसले खुद अपनी  निष्पक्षता  और  विश्वसनीयता  का व्याख्यान करते हैं। अगर जज इन्हें सार्वजनिक तौर पर जस्टिफाई करने लग जाएं, तो उनमें और सियासी नेताओं में क्या फर्क रह जाएगा? कोलकता हाई कोर्ट के सजायाफ्ता  जज जस्टिस सीएन करनन भी सुप्रीम कोर्ट  के जजों के आचरण पर सवाल उठा चुके हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री को खत लिखकर जजों पर  भ्रष्टाचार   के आरोप लगाए थे। और अब सीनियर कोर्ट  के चार जजों के आरोपों का निचोड भी यही है।  सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को “फर्स्ट अमंग इक्वलस“ माना जाता है। सीनियर जजों से आचार संहिता का अक्षरश  पालन करने की अम्मीद की जाती है। ताजा आरोपों से देश  की न्यायपालिका की छवि को गहरा धक्का लगा है।