मंगलवार, 9 जनवरी 2018

“उल्टा चोर कोतवाल को डांटे“

आधार कार्ड  की जानकारियां लीक होने से संबंधित खबर पर यूआईडीएआई (यूनिक आईडेटिफिकेशन ऑफ इंडिया) द्वारा खोजी पत्रकार के खिलाफ एफआईआर दर्ज  कराया जाना “अभिव्यक्ति की आजादी“ पर कडा प्रहार है।  यूआईडीएआई के एक अधिकारी ने भारतीय दंड संहिता की धारा 419 (गलत पहचान देकर धोखाधडी), धारा 420 (धोखाधडी), 468 (जालसाजी) और 471(नकली दस्तावेज को सही बताकर इस्तेमाल करना)  के तहत एफआईआर दर्ज  करने की शिकायत दर्ज  की है। अमूमन,  जालसाजी और धोखाधडी से जुडी धाराएं शातिर अपराधियों  पर लगाई जाती हैं। इनके अलावा पत्रकार के खिलाफ आधार अधिनियन की 36/37 के तहत भी मामला दर्ज  किया गया है। यह बात तो और भी ज्यादा चिंताजनक है। आधार के नियम इससे जुडी जानकारियों को सुरक्षित रखने के लिए बनाए गए हैं।  इन जानकारियों के लीक होने की खोजी खबर को अपराध कैसे माना जा सकता है़? इन् धाराओं के तहत अपराध साबित होने पर तीन साल की सजा को सकती है। जाहिर है  यूआईडीएआई की यह कार्रवाई मीडिया को डराने-धमकाने की मंशा   से की गई है और  “उल्टा चोर कोतवाल को डांटे“ जैसी है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया का काम व्यवस्था में व्याप्त खामियों  को उजागर करना है। देश  का इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया इस काम को बखूबी निभा रहा है। इसकी स्वतंत्र और निष्पक्ष  आवाज को दबाने के प्रयास जब-तब होते रहे हैं। सतहर के दशक में आपातकाल के दौृरान मीडिया को दबाने की  जीतोड़ कोशीश  की गई थी । तत्कालीन शासक दल को इसका गंभीर खमियाजा भुगतना पडा था। खोजी पत्रकारिता पूरी दुनिया में मीडिया की सबसे बडी ताकत रही है और इसी के दमखम पर पत्रकारिता फलती-फूलती रही है। आधार कार्ड की जानकारियां लीक होती रही हैं, यह सच्चाई पहले भी उजागर हो चुकी है। पिछले साल 2017 में टीम इंडिया के पूर्व  कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की आधार कार्ड से जुडी व्यक्तिगत जानकारी लीक हो गई थी। धोनी की पत्नी साक्षी ने मार्च, 2017 में आईटी एवं कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद से  शिकायत की थी कि कॉमन सर्विस सेंटर नाम की एजेंसी ने धोनी की आधार कार्ड  बनाने वाली जानकारियां  को सार्वजनिक  कर दिया था।  यूआईडीएआई ने एनरोलमेंट की प्रकिया को निजी कंपनियों को सौंप रखा है और आईटी से जुडी स्वंयसेवी संस्थाओं ने इसका कडा विरोध भी किया था। पिछले साल नवंबर माह में लगभग 200 सरकारी विभागों की वेबसाइटस पर आधार से जुडी जानकारियां सार्वजनिक किए जाने पर भी खासा बवाल मचा था। नियमानुसार लोगों की बायोमेट्रिक जानकारियों को सार्वजनिक नही किया जा सकता है। बंगलुरु स्थित सेंटर फॉर इंटनेनेट एंड सोसायटी (सीआईएस) ने मई, 2017 में अपनी रिपोर्ट  में बताया था कि चार सरकारी वेबसाइटस से लगभग 13 करोड लोगों की आधार से जुडी जानकारियां लीक हुईं थी । और सबसे खतरनाक बात यह है कि बायोमेट्रिक जानकारियों के अलावा लोगों के बेंक अकांउट तक लीक किए गए । इस रिपोर्ट  में यह भी कहा गया था कि सरकारी एजेंसियां आधार के बायोमेट्रिक डेटा को पूरी संजीदगी से संभाल नहीं पा रहे हैं। आधार की बायोमेट्रिक डेटा में कुछ ऐसी संवेदनशील जानकारियां हैं, जो लोगों की निजता में द्खल माना जाता है। आधार कार्ड  बनाने के लिए लोगों की उगुंलियों के निशान और आंखों की पुतलियों को भी आईडेटिफिकेशन के लिए लिया जाता है । और दोनों ही पूरी तरह से निजी है। इस साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट में एक याची ने कहा था“ उंगुलियों और पुतलियों पर किसी का हक नहीं हो सकता“। सरकार इन्हें मेरे शरीर से अलग नहीं कर सकती। अदालत भी इस पर सहमत थी। आंखों की पुतलियों और उंगुलियों के निशान जैसी निजता की जानकारियों को सार्वजनिक तौर पर लीक करना संगीन अपराध है।  यूआईडीएआई को व्हिस्लब्लोअर की बजाए उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए जो लोगों की निजता का सौदा कर रहे हैं।