मंगलवार, 16 जनवरी 2018

इसरायल-भारत की दोस्ती

अठारह साल पहले 2000 में भारत के तत्कालीन गृहमंत्री लाल कृष्ण  आडवाणी जब इसराइल के दौरे पर गए थे, तब चरमपंथी विरोधी रक्षा विशेषज्ञ  रेवेन पेज ने टिप्पणी की थी कि वे सभी देश  जो फलीस्तीनी फ्रीडम फाइडर्स के खिलाफ इसराइली कार्रवाई की निंदा किया करते थे, वे अब अपने-अपने देश  में आतिकयों से निपटने के लिए इसराइल से ही सीख ले रहे हैं। भारत भी अब कई मामलों मे इसरायल  सीख  ले  रहा है। 2014 से भारत  कश्मीर  में पाकिस्तान प्रायोजित आतंक के लिए वही नीति अपना रहा है, जो इसरायल ने फलीस्तीनी आजादी अमर्थकों के खिलाफ अपनाई थी। भाजपा नेता राम माधव ने मई 2017 में एक न्यूज चैनल से कहा भी था कि जम्मू-कश्मीर  में हर आतंकी को खत्म कर देंगे और सीमा पर दंडात्मक हमले भी किए जाएंगे। उनका इशारा सर्जिकल स्ट्राइक जैसी सैन्य कार्रवाई की तरफ था। केन्द्र में भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद से भारत की इसरायल के बीच संबंध और प्रगाढ हुए हैं। एक जमाने में भारत फलीस्तीनी की आजादी समर्थकों का सच्चा दोस्त हुआ करता था। तब फलीस्तीनी नेता यासिर अराफात भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को अपनी बहन मानते थे। इससे भारत और फलीस्तीनियों के बीच गहरो संबंधों का पता चलता है। उस समय  यासिर अराफात  इसराइल और पश्चिम  देशों   की आंखों की सबसे बडी किरकिरी हुआ करते थे। दिसंबर, 2017 में  अमेरिका द्वारा यरूशलम को इसराइल की राजधानी बनाने के सयुंक्त राष्ट्र  प्रस्ताव का जब भारत ने विरोध किया, तब इसराइल मीडिया भडक उठा। इसराइल के एक प्रमुख समाचार पत्र ने तो यहां तक कह दिया कि “भारत इसराइल के साथ गंभीर रिश्ते  चाहता ही नहीं । ” आकर्षण  से  शुरु हुए  रिश्ते , प्रेम तक पहुंच गए और अब इसराइल विरोध तक आ गए हैं। मगर भारत की 6-दिन की यात्रा पर आए इसराइल के प्र्धानमंत्री ने यह कर रिश्तों  में आई खटास को दूर कर दिया कि “ मैरिज मेड इन हैवन, यूएन वोट से  रिश्तों  पर कोई फर्क  नहीं पडेगा“। 15 साल बाद इसरायल के प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतान्याहू भारत की यात्रा पर आए हैं। निसंदेह, भारत को अरब और मुस्लिम देशों  के साथ संतुलन स्थापित करने की जरुरत है। इसके साथ ही भगवा पार्टी  को देश  में मुस्लिमों का भरोसा जीतने की भी जरुरत है। 25 साल से  भारत और इसरायल के बीच कूटनीतिक संबंध हैं मगर रिश्तों   में  गर्माहट 2014 के बाद केन्द्र में मोदी सरकार बनने के बाद आई है। भारत और इसरायल में कई समानताएं हैं। इसरायल की तरह भारत भी  दुश्मनो  से घिरा हुआ है। इसरायल के पास रक्षा और कृषि  की उन्नत और बेह्तरीन तकनीक है। भारत को दोनों क्षेत्रों के लिए इन तकनीक की अविलंब जरुरत है। अभी भी भारत इन तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है और आगे भी जारी रखना चाहेगा। भारत, इसरायल के सहयोग से उन्नत रक्षा उत्पाद स्वदेश  में ही करने के पक्ष में है। इसरायल के पास उम्दा तकनीक है मगर मानव श्रम की कमी है। भारत के पास मानव श्रम की कोई कमी नहीं है। इस बात के  मद्देनजर  तकनीक सहयोग दोनों देशों  के लिए लाभदायक हो सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इसरायल दौरे के समय दोनों  के बीच विज्ञान और तकनीक समेत सात क्षेत्रों में सहयोग के समझौते हुए थे। अब इन्हें आगे बढाया जाएगा। बहरहाल, इसराइल और भारत के बीच एक और समानता है। इसरायल यहूदी बहुल देश  है और भारत हिंदू बहुल। इसरायल को यहूदी राष्ट्र  बनाने और भारत को हिंदू  राष्ट्र  बनाने की मुहिंम  तेज हो गई है। इसरायल में तो यह मुहिम पहले से चल रही है मगर भारत में मोदी सरकार के केन्द्र में सत्ता में आने के बाद यह मुहिम तेज हुई है। यही समानता मोदी और  नेतान्याहू को और करीब ला रही है। मगर यह  निकटता मुस्लिम देशों  से संबंधों की कीमत पर नहीं होनी चाहिए।