गुरुवार, 2 नवंबर 2017

कमल में खिले “धूमल”

दूरदर्शी  और लोकप्रिय नेतृत्व के बगैर चुनाव बिसात सफलतापूर्वक नहीं बिछाई जा सकती। हिमाचल के परिपेक्ष्य में भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व को यह बात समझ तो आई मगर विलंब से। हिमाचल प्रदेश  में आधा चुनाव प्रचार खत्म होने के बाद भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व को अपने संभावित मुख्यमंत्री का नाम  घोषित  करना ही पडा। अपेक्षा के अनुरुप पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल को हिमाचल प्रदेश  का नेतृत्व सौंपा गया है। धूमल इस समय हिमाचल में भाजपा के सबसे कद्दावर और कार्यकर्ताओं के चेहते नेता हैं। धूमल औरों से अपेक्षाकृत कहीं अधिक सुलझे हुए, अनुभवी और परिपक्व  हैँ । दो बार पहले भी राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं।  1998 के बाद इस पहाडी राज्य में नेतृत्व का केन्द्र वीरभद्र सिंह और प्रेम कुमार धूमल तक ही सिमट कर रह गया है। अब तक चार मुकाबलों में दो बार (2003, 2013) वीरभद्र सिंह और दो ही बार प्रेम कुमार धूमल ( 1998, 2008) जीते हैं। वीरभद्र सिंह 1983 से लगातार कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री बने हुए हैं। मतदान के ठीक नौ दिन पहले प्रेम कुमार धूमल को मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट करना साफ  दर्शाता   है कि भाजपा का नेतृत्व हरियाणा और उत्तर प्रदेश  की तरह जो रिवायत शुरू  करने की सोच रही थी, वह हिमाचल में काम नहीं आई। मुख्यमंत्री के नाम पर संस्पेंस रखकर भाजपा को खासा नुकसान हो रहा था और कार्यकर्ताओं में वह जोश  नहीं दिख रहा था, जो प्रचंड चुनाव प्रचार के लिए अपरिहार्य  माना जाता है। विधानसभा चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लडे जाते हैं और प्रादेशिक  नेतृत्व जिस तरह से कार्यकर्ताओं को एकजुट करने में सक्षम होता है, राष्ट्रीय   नेतृत्व ऐसा नहीं कर पाता। स्थानीय नेतृत्व की पहुंच और दायरा  राष्ट्रीय   नेतृत्व  की तुलना में कहीं ज्यादा व्यापक होता है। मुख्यमंत्री का प्रत्याशी  घोषित  नहीं  होने से हिमाचल प्रदेश  में अब तक मुकाबला वीरभद्र सिंह बनाम नरेद्र मोदी के बीच सिमट कर रह गया था। भाजपा ऐसा कतई नहीं चाहती थी। पहले ऐसी संभावना जताई जा रही थी कि प्रधानमंत्री 2 नवंबर को अपने हिमाचल दौरे के समय मुख्यमंत्री का नाम घोषित करेंगे मगर चुनाव की नजाकत के  दृष्टिगत  भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को 2 नवंबर से पहले ही प्रेम कुमार धूमल को बतौर मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करना पडा। नामचीन अमेरिकी लेखक और मोटिवेशनल वक्ता जिम रोहन ने सफल एवं दूरदर्शी  नेता की खूबियां बताईं है। रोहन के अनुसार नेतृत्व मृदभाषी  और दयालू हो, कठोर नहीं। बोल्ड हो मगर धमकाने वाला न हो। विचारशील हो, आलसी न हो। विनम्र हो डरावना न हो। गर्व करे मगर अभिमानी न हो। विनोदी स्वभाव का हो मगर, मूर्ख न हो। यद्यपि इतनी सारी खूबियां समकालीन नेताओं में ढूंढे नहीं मिलती है। तथापि, शुरुआती कैरियर में अध्यापन से जुडे प्रोफेसर प्रेम कुमार धूमल में कई ऐसी खुबियां हैं, जो उन्हें समकालीन नेताओं से अलग करती है। संभवतय, उनकी इन खूबियों के कारण ही भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने हिमाचल प्रदेश  में पार्टी की सरकार बनने की स्थिति में  प्रोफेसर धूमल को तीसरी बार मुख्यमंत्री चुना है। 73 वर्शीय धूमल की यह आखिरी पारी मानी जा रही है, बशर्ते भाजपा अपनी मौजूदा नीति में बदलाव न करे। भाजपा ने बाकायदा  अपने नेताओं के लिए 75 वर्ष  की रिटायरमेंट ऐज तय कर रखी है। वैसे दे के नेताओं के लिए कोई रिटायरमेंट ऐज नहीं है। मगर भाजपा में प्रधानमंत्री मोदी ने इस मानदंड को तय किया है। इसी कट ऑफ ऐज की वजह से 83-  वर्षीय  पूर्व  मुख्यमंत्री और भाजपा के दिग्गज नेता शांता  कुमार रेस से बाहर हो गए और केन्द्रीय मंत्रिमंडल से भी बाहर रखे गए। खेल हो या राजनीति  आखिरी पारी खेलना काफी चुनौतीपूर्ण  होता है। भाजपा अगर सत्ता में आती है, तो प्रेम कुमार धूमल की यह पारी काफी चुनौतीपूर्ण होगी।