बुधवार, 29 नवंबर 2017

गुजरात का दंगल

बाईस साल से भी अधिक समय से गुजरात में सत्तारूढ भारतीय जनता पार्टी ने इस बार गुजरात विधानसभा चुनाव में अपनी सारी ताकत झोंक दी है। गुजरात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदौ का गढ है। गुजरात के विधानसभा चुनाव  2019 के लोकसभा चुनाव के कर्टन रेजर माने जा रहे हैं। बतौर प्रधानमंत्री गुजरात में नरेन्द्र मोदी का पहला विधानसभा चुनाव है। पिछले विधानसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और तब भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला था। 2012 में मोदी ने कुल मिलाकर 175 छोटी-बडी जनसभाओं को संबोधित किया था। तब वे पार्टी के एकमात्र स्टार प्रचारक थे। इस बार वे देश  के प्रधानमंत्री हैं। पार्टी को उम्मीद है कि  इस  बार  पहले से भी अधिक प्रचंड बहुमत मिलेगा। मगर जमीनी सच्चाई कुछ और ही बयां कर रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अलावा इस बार उत्तर प्रदेश  के मुख्यमंत्री और भाजपा के हिन्दुत्व “मुखौटा“ योगी आदित्यनाथ समेत एक दर्जन से ज्यादा मुख्यमंत्री और केन्द्रीय मंत्रियों की फौज पार्टी के लिए धुंआधार चुनाव प्रचार कर रहे हैं। पहली बार भाजपा ने मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने के लिए प्रचार में मौलवियों तक को भी झोंका  हैं। मौलवियों को उत्तर प्रदेष से लाया जा रहा है। सूरत में मुस्लिम कार्यकर्ता  भाजपा के लिए दिन-रात प्रचार कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने सोमवार (27 नवंबर) को कई रैलियां की और अब वे बुधवार (29 नवंबर) को फिर एक के बाद दूसरी जनसभा को संबोधित करेंगें। इन सब बातों से साफ है कि इस बार भाजपा की स्थिति वैसी नहीं है जैसी पहले हुआ करती थी। सोशल मीडिया और वीडियो के माध्यम से एक-दूसरे के आचरण पर प्रहार किए जा रहे हैं। भाजपा ने पाटीदार अनामत आंदोलन के युवा नेता हार्दिक पटेल को लेकर आपतिजनक वीडियो क्लिप्स जारी किए है। और अब भाजपा के विरोधियों ने दो वीडियो क्लिप्स जारी की हैं। एक वीडियो में दावा किया गया है कि सोमवार को प्रधानमंत्री की जनसभाओं में कई जगह खाली कुर्सियां दिखाई गई हैं। एक अन्य वीडियो में मुख्यमंत्री विजय रुपाणी को अपने हलके में पार्टी के बागी उम्मीदवार को मनाते  यह कहते हुए दिखाया गया है कि उनकी हालत पतली है। आरोप-प्रत्यारोपों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। विकास का मुद्दा काफी पीछे छूट चुका है। विकास पगला गया है या नहीं मगर सियासी दल जरुर “पगला गए हैं। चुनाव मुद्दों पर लडे जाते हैं, खोखली बातों से नहीं। भाजपा भी विकास को चुनावी मुद्दा बनाने की बजाए कांग्रेस सरकार के घोटाले और वंशवाद को उछाल रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द मोदी की “चाय बेचने वाली“  पृष्ठभूमि   को खूब भुनाया जा रहा है। युवा कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर मोदी की  “चाय बेचने वाली“  पृष्ठभूमि    का जो मजाक उडाया था, उसे बार-बार उछाला जा रहा है। राहुल गांधी के सॉफ्ट हिन्दुत्व से भी भाजपा तिलमिलाई हुई है। इससे कांग्रेस ने भाजपा की भगवा छवि में सेंध लगाने की सफल कोशिश  की है। भाजपा को इस बात का अहसास हो गया है कि इस बार उसकी स्थिति पिछले चुनाव जैसी नहीं है। अब तक भाजपा के प्रबल समर्थक रहे पाटीदार बिदके  हुए हैं; पाटीदार आंदोलन के दौरान 12,000 से ज्यादा पाटीदारों की गिरफ्तारी और उन पर किए गए अत्याचार समुदाय आज तक नहीं भूला पाया  है। पाटीदार आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल भाजपा को सत्ता से हटाने पर आमादा है और उन्होंने कांग्रेस से हाथ मिला लिया है। ओबीसी नेता अल्पेश  ठाकुर भी कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। दलित नेता जिग्नेश  मेवानी भी कांग्रेस का समर्थन कर रहे हैं। कांग्रेस के समर्थन से वे निर्दलीय चुनाव लड रहे हैं। गुजरात में इन तीन युवा नेताओं ने हवा का रुख बदलने में खासी भूमिका निभाई है। बहरहाल, विकास और ठोस मुद्दों को दर किनार कर गुजरात चुनाव में एक-दूसरे पर जिस तरह से कीचड उछाला जा रहा है, उससे समकालीन राजनीति और बौनी हुई है।