मोदी सरकार को सत्ता में आए तीन साल से ज्यादा का समय हो गया है मगर आम आदमी के अच्छे दिन आने तो क्या, बुरे दिनों का सिलसिला खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। किचन किंग प्याज फिर रुलाने लग पडा है। एक साल में प्याज के दामों में 127 फीसदी से ज्यादा की वृद्धि हुई है। प्याज को लेकर अजीब सी स्थिति है। आंकडों के अनुसार अप्रैल से जुलाई के दौरान भारत ने 59 फीसदी ज्यादा प्याज का निर्यात किया है। इसी वजह मंडियों में प्याज की किल्लत हो गई है। अब सरकार चीन और मिस्त्र से प्याज का आयात करने जा रही है। सब्जियों के दामों में अक्टूबर माह में ही दोगुना इजाफा हुआ है। ताजा आंकडों के अनुसार सितंबर में 15.48 फीसदी की तुलना में अक्टूबर में सब्जियों की मुद्रा-स्फीति बढकर 36.61 फीसदी हो गई थी। अक्टूबर में थोक महंगाई छह माह के उच्च स्तर 3.59 फीसदी पर पहुंच गई है। अक्टूबर में रिटेल महंगाई भी सात माह के उच्च स्तर पर थी। टमाटर के दाम भी आसमान को छू रहे हैं। किसानों को दलहनों के वाजिब दाम नहीं मिल रहे हैं और आढती औने-पौने दामों में खरीद कर खुदरा में ऊंचे दामों पर बेच रहे हैं। सरकार का सर्मथन मूल्य मंडियों में कोई मायने नहीं रखता। मध्य प्रदेश में दमोह जिले के एक किसान ने उडद के वाजिब दाम नहीं मिलने से आत्मह्त्या करने की कोशिश तक की। सरकार ने दलहन का समर्थन मूल्य 5400 रु क्विंटल तय कर रखा था मगर मंडी में किसानों को 1200 रु क्विंटल दिया जा रहा था। मध्य प्रदेश की मंडियों में उडद, तुअर और मूंग न्यूनतम समर्थन मूल्य से काफी नीचे बिक रही है। थोक मंडियों में उडद औसतन 15 रु किलो बिक रही है और खुदरा बाजार में टमाटर 75 रु किलो। यानी एक किलो टमाटर के लिए पांच किलो उडद बेचनी पडती है। इन हालात में बेचारा किसान करे तो क्या करे़? मध्य प्रदेश ही नहीं, पूरे देश की मंडियों का यही सूरत-ए-हाल है। बेरोजगारों की संख्या में भी खासी वृद्धि हुई है। 2013 में आगरा की रैली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक करोड रोजगार के अवसर सृजित करने का वायदा किया था। आंकडों के अनुसार 2013-14 में 4.9 फीसदी की तुलना में 2015-16 में बेरोजगारी 5 फीसदी थी। 2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण में भी साफ कहा गया है कि रोजगार के बहुत ज्यादा अवसर सृजित नहीं हो पाए है़ं। भाजपा नीत संप्रग सरकार के सत्ता में आने के बाद से गुलजार रहे शेयर बाजार में इन दिनों मंदी व्याप्त है। चौतरफा बिकवाली से बुधवार को शेयर बाजार में मायूसी छाई रही। गला काट प्रतिस्पर्धा से टेलिकॉम सेक्टर का बुरा हाल है। नगदी के संकट और लगातार घाटे से जूझ रहे ऑप्रेरेटरों को अपनी संपत्तियां बेचने पर विवश होना पड रहा है। इस सोमवार को अनिल अंबानी का रिलांयसकॉम पहली बार अपने अंतराष्ट्रीय कर्जे की किस्त तक नहीं चुका पाया। यह कंपनी करीब-करीब दिवालिया होने की कगार पर है। आरकॉम के शेयर दस रु से भी कम दाम पर बिक रहे हैं। एक जमाने में बुलंदियां छू रहा रियल्टी सेक्टर मंदी की चपेट में है और इससे उभर नहीं पा रहा है। सरकारी बैकों का बुरा हाल है। सरकार द्वारा भारी पूंजी निवेश के बावजूद बैको की नॉन परफार्मिंग एसेटस उत्तरोतर बढती जा रही है। बाजार में अभी भी नगदी का संकट है। इन सब का असर रोजगार पर पडा है। आर्थिक गतिविधियां सिमटने से बेरोजगारी और बढी है। निष्कर्ष यह है कि महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड कर रखी दी है। किसान बेहाल है और रोजगार नहीं मिलने से देश में मांग नहीं उठ रही है। इसके बावजूद भी अगर कोई कहे कि सब-कुछ ठीक-ठाक है, तो वह भारी मुगालते में है। जमीनी हकीकत से आंखें मूदना कोई बुद्धिमता नही है। आम आदमी का धैर्य कभी भी जवाब दे सकता है।
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