पाकिस्तान में सेना और निर्वाचित सरकार में हमेशा छत्तीस का आंकडा रहा है। सेना को जब भी मौका मिला जनता द्वारा चुनी गई सरकार का तख्ता पलट दिया। निर्वाचित सरकार को अपदस्थ करने के लिए कभी मुकदमों का सहारा लिया जाता है तो कभी इस्लामिक कटटरपंथियों को आगे किया जाता है। पाकिस्तान की ताजा महाभारत में सेना कटटरपंथियों को आगे करके फिर जनता द्वारा चुनी गई सरकार को चलता करने की फिराक में है। इस्लामिक कट्टरपंथी पिछले लगभग तीन सप्ताह से भी ज्यादा समय से कानून मंत्री जाहिद हामिद के इस्तीफे की मांग को लेकर इस्लामाबाद में धरने पर बैठे हुए थे। न्यायपालिक क आदेश के वावजूद प्रदर्शनकारी टस-से-मस नहीं हुए। शनिवार को प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हिंसक झडपों में छह लोग मारे गए थे और 100 से ज्यादा घायल हो गए थे। इसके बाद हिंसा कई शहरों में फैल गई और सरकार को सेना बुलानी पडी। सेना बैरक से बाहर तो आई मगर हिंसक प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच दंगल में तमाशबीन बनी रही। इससे साफ था कि इन इस्लामिक कट्टरपंथियों को सेना का मूक समर्थन था। सेना के दखल के बाद सोमवार को सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच समझौता हो गया और कानून मंत्री हामिद बलि का बकरा बन गे। उन्होंने फौरन प्रधानमंत्री शाहिद खाकान अब्बासी को अपना इस्तीफा सौंप दिया। इस्लामाबाद में प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व कर रही तहरीक-ए-लब्बैक (टीएलपी) नाम का कटटरपंथी संगठन कानून मंत्री को ईशनिंदा कानून में बदलाव के लिए जिम्मेदार मान रहा है। तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान का गठन 2015 में हुआ था और 2017 में के उतरार्ध में इसे चुनाव आयोग ने मान्यता देकर चुनाव चिंह भी आवंटित कर दिया। तहरीक-ए-लब्बैक शरीयत कानून के सख्त नियमों का पैरवीकार है और स्वंय को पैगम्बर मोहम्मद की सर्वोच्चता का रक्षक बताता है। इसके नेता अल्लामा खादिम हुसैन तेज तर्रार मौलवी हैं। 2 अक्टूबर को पाकिस्तान संसद ने चुनाव सुधार बिल पारित किया था। इस बिल में निर्वाचित नुमाइंदों की शपथ से पैगम्बर मोहम्मद वाला खंड हटा दिया था। इस पर क्ट्टरपंथी भडक गए और सरकार को मात्र दो दिन में फिर से शपथ से हटाए गए खंड को वापस जोडने के लिए बाध्य कर दिया। अपनी जगहंसाई से बचने के लिए सरकार को सफाई देनी पडी कि यह तो “क्लेरिकल मिस्टेक“ थी। मगर टीएलपी कानून मंत्री के इस्तीफे पर अडा हुआ था। इस्तीफे के लिए 5 नवंबर से टीएलपी और एक और कट्टरपंथी संगठन सुन्नी तहरीक ने इस्लामाबाद में धरना शुरु कर दिया। बीच में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए 25 दिसंबर का समय दिया था मगर वे नहीं हटे और पुलिस के साथ झडप के कारण हिंसा भडक गई। सरकार ने मीडिया पर भी पाबंदी लगाई मगर अतंत उसे झुकना ही पडा। ताजा समझौते से फिर स्पष्ट हो गया है कि पाकिस्तान में कट्टरपंथियों की कितनी चलती है। अगले साल पाकिस्तान में आम चुनाव होने हैं मगर सेना किसी-न- किसी बहाने इससे पहले निर्वाचित सरकार को अपदस्थ करने का मौका ढूंढ रही है। जुलाई में घूसखोरी के एक मामले में तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को पद छोडना पडा था। नवाज शरीफ की पार्टी की पंजाब के दक्षिणपंथी महजबी मतदाताओं में अच्छी पकड है और अभी भी उनकी पकड बरकरार है। सेना पहले भी दो बार (1993 और 1999) नवाज शरीफ को अपदस्थ कर चुकी है। अगले साल के आम चुनाव में नवाज शरीफ की पार्टी का जनाधार तोडना आसान नहीं है। तहरीक-ए-लब्बैक के ताजा विरोध प्रदर्शन का असली मकसद नवाज शरीफ के महजबी जनाधार में सेंध लगाना है। सेना भी यही चाहती है और अगले साल आम चुनाव से पहले निर्वाचित सरकार को अपदस्थ करके चुनाव टालने की फिराक में है। बहरहाल पाकिस्तान में सैन्य शासन भारत की स्थिरता के लिए और भी ज्यादा खतरनाक है। कट्टरपंथियों की मदद से भारत को कमजोर और अस्थिर करना पाकिस्तानी सेना का प्रमुख लक्ष्य है।
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