प्रधानमंत्री द्वारा 8 नवंबर, 2016 को लागू नोटबंदी से देश को क्या मिला? एक साल बाद जनता इस सवाल का जवाब मांग रही है। नोटबंदी ने काले धन और धनाढय वर्ग की कमर तोड दी है और आम आदमी को इसका कोई प्रभाव नहीं पडा है, मोदी सरकार का यह दावा आंकडों से पुख्ता नहीं होता है। नोटबंदी के 45 दिन के भीतर बैकों के बाहर कतार में खडे-खडे 100 से अधिक लोगों को बेमौत मरना पडा। इन लोगों का क्या कसूर था? मृतकों में कोई धन्ना सेठ अथवा बडा आदमी शामिल नही था। मरने वाले सभी आम आदमी थे। मोदी सरकार ने मृतकों के परिजनों के लिए क्या किया। इस साल जुलाई में फिक्की (फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स् ऑफ कॉमस एंड इंडस्ट्री) का आकलन है कि नोटबंदी के कारण 15 लाख लोगों की नौकरियां चली गईं थी। देश में सबसे बडे रोजगार प्रदान करने वाले मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के 73 फीसदी उधोगों ने तीन महीने में एक भी रोजगार मुहैया कराया। अप्रैल, 2016 में जहां 401 मिलियन को रोजगार मुहैया कराए गया था, वहीं नवंबर 2016 में 406 मिलियन से अधिक लोगों को रोजगार मिला मगर जनवरी से अप्रैल 2017 के चार माह में 405 मिलियन रोजगार के अवसर सृजित हो पाए। नोटबंदी के पहले 34 दिनों में 35 फीसदी लोग बेरोजगार हो गए थे। मार्च 2017 में यह आंकडा 40 फीसदी पहुंच गया था। ऑल इंडिया मैन्युफैक्चरिंग आँर्गेनाइजेशन (एआईएमओ) का आकलन है कि मार्च, 2017 तक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 60 फीसदी रोजगार और 55 फीसदी आमदन का नुकसान हो चुका था। मध्यम और बडे उधोगों में 35 फीसदी रोजगार के अवसर कम हो गए थे और उन्हें 45 फीसदी राजस्व का नुकसान उठाना पडा । अप्रैल-मई तक कैश मैनेजमेंट एक्टिविटी सामान्य नहीं हो पाइं थी। अप्रैल माह में कैष मैनेजमेंट एक्टिविटी में 12 से 15 फीसदी की गिरावट बरकरार थी। नोटबंदी से पहले हर रोज देष के 30,000 एटीएम में प्रतिदिन कैश लोड किया जाता था। नोटबंदी के बाद तीन माह में मात्र 8,000 एटीएम में ही प्रतिदिन नगदी भरी जाती थी। नोटबंदी ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। देहातों में 90 फीसदी से ज्यादा कारोबार और लेन-देन नगदी में किया जाता है। नोटबंदी से पूरी देहाती अर्थव्यवस्था को तहस-नहस कर दिया। सिस्टम से अगर 86 फीसदी नगदी को अचानक सोख लिया जाए, अर्थव्यवस्था का पटरी से उतरना स्वभाविक है। इस कार्रवाई से देहातों में नगदी पर निर्भर कारोबार करीब-करीब ठप्प हो गया था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भ्रष्टाचार , काला धन, जाली करंसी और आतंकवाद को खत्म करना नोटबंदी का प्रमुख मकसद बताया था। मगर अर्थशास्त्रियों का आकलन है कि नोटबंदी से न तो काला धन बाहर निकलता है और न ही भ्रष्टाचार ख्त्म होता है। काली कमाई का अधिकतर हिस्सा बेनामी संपत्ति और सोने अथवा गहनों में छिपाया जाता है। नोटबंदी से बेनामी संपत्ति अथवा सोने-गहनों पर कोई फर्क नहीं पडा है। नोटबंदी से आतंक की कमर तोडने का भी दावा किया जा रहा है। मगर आंकडे इसकी पुष्टि नहीं करते हैं। इस साल जून तक 12 महीनों के दौरान जाली करंसी के जब्त किए जाने का सिलसिला बढा तो है मगर यह अभी भी कुल नगदी का मात्र 0. 08 फीसदी है। इससे पहले यह 0.07 फीसदी थी। आरबीआई नए 2000 की जाली मुद्रा तक को रोक नहीं पाई है। सरकार का दावा था कि कुल 15.44 लाख करोड की नगदी में एक तिहाई काला धन था मगर 99 फीसदी प्रतिबंधित नोट सरकार बैंकों के पास वापस आ गए। इन नोटों को गिनते-गिनते आरबीआई के भी पसीने छूट रहे हैं। नोटबंदी से ग्रोथ भी रुक गई है। तथापि नोटबंदी पर प्रधानमंत्री की मंशा पर शक-सुबह की कोई गुजांइश नहीं है। फैसला जनहित मे लिया गया था। यह बात दीगर है कि यह उल्टा पड गया।
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