नेहरु-इंदिरा गांधी परिवार के वारिस राहुल गांधी को माता सोनिया गाधी का उत्तराधिकार बनाने के लिए कांग्रेस ने 4 दिसंबर की तारीख मुकर्रर की है। कांग्रेस अपने अध्यक्ष को लोकतांत्रिक तरीके से चुनने का बाकायदा आडंबर करती है। यह बात दीगर है कि पिछले 19 साल से सोनिया गांधी निर्विरोध अध्यक्ष चुनी जाती रही हैं और अब राहुल गांधी का चुनाव भी सर्वसम्मति से होना निश्चित है। पार्टी में किसी की क्या मजाल कि गांधी परिवार के खिलाफ चुनाव लडे। बहरहाल, कांग्रेस ने पार्टी अध्यक्ष चुनाव के लिए नामांकन पर्चा दाखिल करने की तारीख 4 दिसंबर तय की है। और अगर जरुरी हुआ तो 15 दिसंबर को चुनाव होगा और 19 दिसंबर को परिणाम निकाले जाएंगें। मगर यह सब फिजूल की कवायद है। कांग्रेस का हर छोटा-बडा कार्यकर्ता और नेता अर्से से राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष बनाने की पुरजोर मांग कर रहे हैं। इस बार पूरी तैयारी कर ली गई है। कांग्रेस चाहती है कि गुजरात में 9 दिसंबर को मतदान होने से पहले राहुल गांधी को पार्टी का अध्यक्ष चुन लिया जाए। राहुल गांधी जिस तरह से गुजरात में पार्टी के लिए प्रचंड चुनाव प्रचार कर रहे हैं और प्रधानमंत्री पर एक के बाद दूसरा तीखा हमला कर रहे हैं, उसके मद्देनजर पार्टी के आला नेताओं को लगता है कि वे पार्टी का नेतृत्व संभालने की अग्निपरीक्षा में पास हो गए हैं। पार्टी को इस बात की भी कोई परवाह नही है कि दुनिया के सबसे विशाल लोकतंत्र और देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी में आखिर परिवारवाद का बोलबाला ही क्यों? क्या कांग्रेस में नेहरु-गांधी परिवार के अलावा कोई भी दमदार नेता नहीं है? सच कहा जाए तो राहुल गांधी नेहरु परिवार के वंशज तो है मगर गांधी परिवार के नहीं। राहुल के दादा फिरोज गांधी मूलतः पारसी थे और उनका असली नाम फिरोज जहांगीर “घांदी“ था। मुंबई के पारसी परिवार में जन्मे फिरोज “घांदी “ 1930 में पढाई छोडकर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पडे। महात्मा गांधी से प्रेरित होकर उन्होंने 1930 में अपना उपनाम “घांदी“ से बदलकर “गांधी“ रख लिया था। इंदिरा गांधी से उनका ब्याह 1942 में हुआ था। बहुत से लोग आज भी इस मुगालते में है कि फिरोज गांधी ने इंदिरा गांधी से ब्याह के बाद पत्नी के कहने पर अपना उपनाम “घांदी “ से बदलकर “गांधी“ रखा था। बहरहाल, राहुल गांधी की ताजपोशी से कांग्रेस को और कुछ मिले या न मिले मगर युवा नेतृत्व मिलने से पार्टी में नया रक्त संचार हो सकता है। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस पंजाब को छोडकर लगातार एक के बाद दूसरा चुनाव हारती रही है। इससे कांग्रेस के आम कार्यकर्ता्ओं का मनोबल निरंतर गिरा है। पार्टी कार्यकर्ताओं की सक्रियता के बगैर कांग्रेस न तो काडॅर-मजबूत भाजपा का मुकाबला कर सकती हैं और न ही फिर से सत्ता में आ सकती है। भारत की 75 फीसदी आबादी अपेक्षाकृत युवा है और इसी युवा शक्ति के समर्थन से भाजपा और नरेन्द्र मोदी को 2014 के लोकसभा चुनाव में बडा जनादेश मिला था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2014 में युवाओं से दस करोड रोजगार के अवसर सृजित करने का वायदा किया था। मगर साढे तीन साल में भी यह वायदा पूरा नहीं हुआ है। यही वजह है कि देश के विभिन्न समुदायों में सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मंाग बढ रही है। गुजरात में पाटीदार और हरियाणा में जाट आरक्षण की मांग पर अडे हुए हैं। भाजपा जब विपक्ष में थी, तब पार्टी ने इस मांग को खूब हवा दी थी मगर अब पीछे हट गई है। नोटबंदी और आनन-फानन में लागू किए गए जीएसटी ने बेरोजगारी को और बढाया है। ताजा हालात में राहुल गांधी की ताजपोषी ग्रांड ओल्ड पार्टी के लिए संजीवनी बुटि साबित हो सकती है। पार्टी पहले से ही लोकप्रियता के निम्न पायदान पर है और कांग्रेस को वाकई ही “तारणहार“ की अविलंब जरुरत है।
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