एक साल पहले आठ नवंबर, 2016 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की जनता को नोटबंदी का तोहफा दिया था। और एक साल बाद सरकार और विपक्ष में नोटबंदी के नफे-नुकसान पर जबरदस्त बहस-मुहासिब हो रही है। विपक्ष नोटबंदी पर जनता की तकलीफों को राजनीतिक फायदे के लिए भुनाने की जी-तोड कोशिश कर रहा है और सत्तारूढ दल बचाव की मुद्रा में है। मगर जमीनी हकीकत यह है कि भारी तकलीफों और तंगी के बावजूद आम आदमी ने नोटबंदी पर प्रधानमंत्री का साथ दिया है। नोटबंदी के बाद देश के सबसे बडे प्रांत उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाज्पा को मिली अप्रत्याशित जीत इस बात का प्रमाण है। पंजाब को छोडकर चार राज्यों में भाजपा को शानदार जनादेश मिला है। उत्तर प्रदेश में मिले प्रचंड जनादेश ने आलोचकों की बोलती बंद कर दी। पंजाब में भाजपा को शिरोमणि अकाली दल ( शिअद) के कुशासन का खमियाजा भुगतना पडा हालांकि राज्य में भगवा पार्टी कुशासन के लिए उतनी ही जिम्मेदार है, जितना शिअद। बहरहाल, नोटबंदी से एक अरब से अधिक लोगों को प्रभावित किया है और इसे इतिहास में किसी भी देश के सबसे अधिक असर डालने वाले आर्थिक नीतिगत फैसले में शुमार किया जाएगा। तथापि, नोटबंदी को “सामूहिक लूट“ बताना भी एकदम गलत है। यह निष्क्रिय विरोध की पराकाष्ठा है। नोटबंदी के पक्ष और विरोध में तरह-तरह के तर्क दिए जा रहे हैं मगर कुछ ऐसे तथ्य हैं, जो मोदी सरकार की इस कार्रवाई का सही-सही आकलन करते हैं। सबसे बडा शास्वत सत्य यह है कि भारत की 90 फीसदी से ज्यादा लेन-देन नगदी में किया जाता है। आंकडे इस बात के गवाह हैं कि नोटबंदी के फौरन बाद कम-से-कम तीन माह के लिए देश में 90 फीसदी से ज्यादा का लेन-देन करीब-करीब ठप्प हो गया था। इन्कलुसिव बैंकिग का सपना अभी पूरा नहीं हुआ है। नोटबंदी का सबसे ज्यादा खमियाजा छोटे कारोबारियों और कामगारों को भुगतना पडा । विपक्ष के इन आरोपों में भी वजन है कि बीस हजार करोड रु खर्च करके मात्र 16 हजार करोड रु बचाए गए हैं। नोटबंदी ने पहले से मंदी से जूझ रहे रियल्टी सेक्टर की कमर तोड दी है। इस सेक्टर में लेनदेन का बडा हिस्सा नगदी में किया जाता है और काले धन की प्रमुख भूमिका भी होती है मगर किसी भी लेनदेन में अगर काले धन का इस्तेमाल होता है, तो आयकर और प्रवर्तन निदेशालय जैसी सरकारी एजेंसियां काली भेडों को आसानी से पकड सकती हैं। नोटबंदी से आर्थिक सुस्ती और बेरोजगारी भी बढी है। नोटबंदी के बाद पिछले एक साल में ग्रोथ रेट में खासी गिरावट आई है। अप्रैल-जून तिमाही में ग्रोथ रेट सात फीसदी से गिरकर 5.7 ही रह गई थी। मगर नोटबंदी से कई फायदे भी हुए हैं। नोटबंदी के समय सिस्टम में 15.44 लाख की नगदी थी। इसमेंसे अधिकतर नगदी बैंकों में वापस आ गई है। इससे बैंकों की लिक्विडिटी में काफी इजाफा हुआ है। जाहिर है इससे निवेश बढेगा और रोजगार के अवसर सृजित होंगे। नोटबंदी के बाद तीन लाख फर्जी (शैल) कंपनियां) का पता चला है। डिजिटल लेन-देन बढा है और नोटबंदी के बाद इसमें 150 फीसदी का इजाफा हुआ है। भले ही अभी अर्थव्यवस्था पूरी तरह से कैषलैस नहीं हुई हो पर कुछ हद तक लैसकैश जरुर हुई है। आयकर रिटर्न भरने वालों में भी काफी इजाफा हुआ है। ताजा अंाकडों के अनुसार आयकर रिटर्न भरने वालों में 25 फीसदी की वृद्धि हुई है। भारत के लिए यह अच्छे संकेत है, जहां बहुत कम लोक आईटी रिटर्न भरते हैं। नोटबंदी का समग्र असर लांग रन में सामने आएगा। यह कार्रवाई वास्तव में देश के लिए इतनी भी बुरी नहीं है, जितनी विपक्ष इसे बता रहा है। विपक्ष की अपनी राजनीतिक विवशताएं हैं मगर उसे सियासी फायदे के लिए जनता को गुमराह करने का कोई अधिकार नहीं है।
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