कश्मीर लिए केन्द्र सरकार के वार्ताकार दिनेश्वर शर्मा तीन दिन का दौरा पूरा कर दिल्ली लौट आए हैं। अपने दौरे के दौरान शर्मा ने घाटी में दर्जनों शिष्टमंडलों से मुलाकात की। इनमें मुख्यधारा से जुडे सियासी नेता भी शामिल थे। मगर अलगाववादी नेताओं ने उनसे दूरी बनाए रखी। अलगाववादी कैंप से कोई भी नेता उनसे मिलने नहीं गया। अलगाववादी नेताओं की तिकडी- सैयद अली गिलानी, यासीन मलिक और मीरवाइज उमर फारूक ने पहले ही साफ-साफ कह दिया था कि अलगाववादी वार्ताकार से नही मिलेंगे। अलगाववादियों के इस स्टैंड से कश्मीर में वार्ता की पहल शुरू होने से पहले ही खत्म हो गई थी। राज्य के प्रमुख सियासी दल नेशनल कांफ्रेंस ने भी वार्ता की पहल को निरर्थक बताकर इसे तगडा झटका दिया था। वार्ताकार शर्मा की पहल से कुछ हासिल हो पाएगा, इसकी क्षीण संभावनाएं भी नजर नहीं आ रही हैं। अलगाववादियों को शामिल किए बगैर कश्मीर में वार्ता के कोई मायने नहीं रह जाते हैं। और न ही अलगावावादियों को मुख्यधारा में शामिल किए बगैर कश्ममीर में शांति बहाल हो सकती है। अलगाववादी पाकिस्तान की स्वीकृति के बगैर कोई काम नहीं करते हैं। कश्मीर में अमन-चैन बहाल हो, पाकिस्तान ऐसा किसी भी सूरत में नहीं होने देगा। इन हालात में जो लोग अलगाववादियों के बगैर कश्मीर वार्ता के ठोस नतीजे आने की संभावनाएं तलाश रहे हैं, उन्हे अतीत में झांकना चाहिए। आज तक कश्मीर के लिए जितने भी वार्ताकार नियुक्त किए गए हैं, कोई भी समस्या का रत्ती भर हल नहीं ढूंढ पाया। और अगर समस्या को हल करने के किए गंभीरता से प्रयास हुए भी, केद्र ने उन पर पानी फेर दिया। 2001 में केसी पंत को वार्ताकार नियुक्त किए जाने पर पहली बार कश्मीर की अवाम मैं शान्ति बहाल होने की आशा जगी थी मगर इससे पहले की वार्ताकार कुछ कर पाते, दिसंबर 2001 में संसद पर आतंकी हमले ने दोनों देशों को युद्ध की कगार पर खडा कर दिया था। इस स्थिति में केन्द्र सरकार को वार्ता की पहल ही समाप्त करनी पडी। 2002 में नामचीन वकील एव राजनीतिज्ञ राम जेठामलानी के नेतृत्व में आठ सदस्यों की टीम घाटी में अमन-चैन बहाल करने के लिए पहुंची मगर कुछ हासिल नहीं हुआ। फिर 2003 में एन एन वोहरा को कश्मीर के लिए वार्ताकार बनाया गया। वोहरा पूरे पांच साल 2008 तक कोशिश करते रहे और फिर उन्हें जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल भी बनाया गया मगर उनकी कोशिशों का भी कोई नतीजा नहीं निकला। वोहरा अभी भी जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल हैं। 2010 में मशहूर पत्रकार दिलीप पड्गांवकर की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय वार्ताकार समिति बनाई गई। समिति ने 2012 को अपनी रिपोर्ट में 1953 से पहले की स्थिति की बहाली की मांग को नामंजूर करते हुए जम्मू-कश्मीर मैं लागू सभी विशेष व्यवस्थाओं की समीक्षा के लिए संवैधानिक समिति गठित करने की सिफारिश की थी। समिति ने आर्टिकल 370 को बरकरार रखने पर भी जोर दिया था। समिति की रिपोर्ट संबंधित मंत्रालय (नॉर्थ ब्लॉक) में आज तक धूल फांक रही है। इसके बाद भाजपा के सीनियर नेता यशवंत सिंहा ने भी कश्मीर पर पहल की। इसका भी कोई फायदा नहीं हुआ। निष्कर्ष यह है कि कश्मीर के लिए वार्ताकार तो नियुक्त कर लिया जाता है, मगर आगे कुछ नहीं किया जाता। कश्मीर की अवाम को लगता है कि नई दिल्ली के पास उनकी समस्या को हल करने की इच्छा शक्ति ही नहीं है। मौजूदा हालात में कश्मीर “वार्ता का विकल्प“ ही अप्रासंगिक हो चुका है। कश्मीरियों को लगता है कि केन्द्र सरकार सिर्फ वार्ता की पहल का ढोंग करती है। पूरी दुनिया जानती है कि अलगाववाद कश्मीर समस्या का केन्द्र बिंदू हैं। अलगाववादियों को कश्मीर के अवाम से अलग-थलग किए अथवा उन्हें वार्ता में शामिल किए बगैर राज्य में शांति बहाली के कोई भी प्रयास सफल नहीं हो सकते है। कश्मीर घाटी की दीवारों पर चिन्हित इबादत साफ-साफ यही कह रही है।
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