देश की राजधानी दिल्ली का स्टेट्स क्या है? सुप्रीम कोर्ट की ताजा व्यवस्था से मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का भ्रम दूर हो जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट कर दिया है कि दिल्ली में उप-राज्यपाल (एलजी) को निर्वाचित एव लोकप्रिय सरकार से ज्यादा पॉवर है। दिल्ली सरकार के हर फैसले पर एलजी की मुहर जरुरी है। संविधान के अनुच्छेद 239-एए के तहत यही व्यवस्था है कि उपराज्यपाल को निर्वाचित सरकार की अपेक्षा अधिमान (प्राइमेसी) दिया गया है। इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट भी यही व्यवस्था दे चुका है। इससे साफ है कि दिल्ली सरकार की हैसियत उस इंसान जैसी है जो न तो मर्द माना जाता है और न ही औरत। निर्वाचित सरकार को अगर पैन, स्याही खरीदने अथवा चपरासी की भर्ती के लिए भी एलजी के द्वार खटखटाने पडे तो ऐसी सरकार के कोई मायने नहीं रह जाते हैं। लोकतंत्र में जनता द्वारा चुने गए नुमाइंदे ही सर्वोपरि होते हैं। सरकार और विधायकों की जनता के प्रति जवाबदेही होती है। पर अगर सरकार और विधायकों को जनापेक्षाओं को पूरा करने का अवसर ही न मिले, उनका छटपटाना स्वभाविक है। यही छटपटाहट दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और आप नेताओं में साफ दिख रही है। राजधानी दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार को सत्ता में आए लगभग अढाई साल हो गए हैं मगर अरविंद केजरीवाल इस दौरान ऐसा कोई काम नहीं कर पाएं है, जिससे उनकी सरकार अन्यों से अलग नजर आए। उनका उप राज्यपाल से छत्तीस का आंकडा रहा है। उप-राज्यपाल केन्द्र के अधीन काम करते हैं। दिल्ली पुलिस भी केन्द्र के अधीन काम करती है। केन्द्र में भाजपा की सरकार है। इस स्थिति में भाजपा भला क्यों चाहेगी कि आप सरकार लोक-लुभावने फैसले लेकर अपना जनाधार मजबूत करे। यही केजरीवाल की सबसे बडी पीडा है और दिल्ली की त्रासदी भी। दिल्ली अभी भी केन्द्र शासित क्षेत्र है हालांकि कहने को विधानसभा है और निर्वाचित सरकार भी। केन्द्र में भाजपा हो अथवा कांग्रेस या कोई और, कोई भी सरकार दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देकर अपने लिए सरदर्द मोल नहीं लेना चाहेगी। बहरहाल, इस मामले में न्यायपालिका भी अरविंद केजरीवाल की मदद नहीं कर सकती। अदालत संवैधानिक व्यवस्था के दायरे में फैसले सुनाती है। संविधान में दिल्ली के उप-राज्यपाल को अधिमान दिया गया है। ऐसा केन्द्र सरकार की सुविधा के लिए किया गया है। दिल्ली के लिए पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिलने की पीडा झेलने वाले केजरीवाल अकेले सियासतदान नही है। इससे पहले पचास और साठ के दशक में हिमाचल प्रदेश को इस पीडा से दो चार होना पडा था हालांकि उस जमाने में केन्द्र और हिमाचल में कांग्रेस की ही सरकारें हुआ करती थी। बतौर केन्द्र शासित हिमाचल को तब केन्द्र से उदार वित्तीय सहायता मिलती थी मगर दिल्ली की तरह यहां भी उप-राज्यपाल को ज्यादा पॉवर थी। विधानसभा थी मगर दिल्ली की तरह सरकार को हर फैसले पर एलजी की मुहर लगानी पडती थी। इस विकट स्थिति से तत्कालीन मुख्यमंत्री डाक्टर वाई एस परमार खासे परेशान थे। उन्होंने हिमाचल को पूर्ण राज्य बनाने का संकल्प लिया। 1966 में राज्यों के पुर्नगठन पर पंजाब के पहाडों चेत्रों के हिमाचल प्रदेश में विलय होने पर इस केन्द्रीय शासित क्षेत्र का क्षेत्रफल और आबादी दोनों में इजाफा हुआ। नतीजतन, हिमाचल प्रदेश का पूर्ण राज्य के दावा और पुख्ता हो गया। अततः, 1971 में हिमाचल प्रदेश केन्द्र शासित से पूर्ण राज्य बन गया। दिल्ली को भी राज्य का दर्जा हासिल करने के लिए लंबी लडाई लडनी पडेगी। और यह जंग अदालत में नहीं जीती जा सकती। हिमाचल की तरह दिल्ली को भी अपने पक्ष में भारी समर्थन जुटाना पडेगा। 2012 से पहले भाजपा दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की सबसे बडी पैरवीकार थी मगर केन्द्र में सत्तारूढ होते ही उसके सुर बदल गए। देश के संघीय ढांचे का भी यही तकाजा है कि दिल्ली को भी राज्य का दर्जा मिले। इससे केन्द्र के अधिकार कम होने वाले नहीं है।
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